एक समय एक आश्रम में एक गुरू के सैकड़ों शिष्य एकत्रित हुए। वे वहाँ अपने गुरू की एक झलक पाने, उनके ज्ञानपूर्ण वचन को सुनने और ध्यान आदि सीखने के लिए एकत्रित हुए थे। विशेषत: वे सभी यह जानना चाहते थे कि इस तनावपूर्ण संसार में प्रसन्न कैसे रहा जाए। क्या ऐसा कोई मार्ग है भी?

गुरू ने उनके प्रश्नों को धैर्यपूर्वक सुना और फिर ‘प्रसन्नता’ पर अपना व्याख्यान आरंभ किया। अपने प्रवचन के बीच में वे रुके और अपने पाँच सौ अनुयाइयों में प्रत्येक को एक गुब्बारा दिया।

उन्होंने कहा “यह प्रसन्नता का गुब्बारा है। इसे फुला कर इस पर अपना नाम लिख दो।”

उन्हें कुछ पेन वितरित किए गए जिससे नाम लिखे जा सकें।

नाम लिखने के पश्चात गुरू ने कहा “अपने गुब्बारों को पास के खाली कमरे में जा कर रख दें।”
“मुझे पता है यहाँ क्या होने वाला है”, एक शिष्य ने कहा। “थोड़ी देर में या तो गुब्बारे फूट जाएंगे या वे स्वयं ही पिचक जाएंगे। प्रसन्नता भी कुछ कुछ ऐसी ही होती है। वह ठहरती नहीं। वह जितनी अधिक मात्रा में होगी उतनी ही शीघ्र नष्ट हो जाएगी। हमें इसे बहुत संभाल कर रखना होगा।”

गुरू उस जिज्ञासु शिष्य की ओर देख कर मुस्कुराए और इशारे से उसे उनके निर्देश का पालन करने को कहा। एक-एक करके उन सभी ने अपने गुब्बारे कमरे में रख दिए और वापस आकर अपने स्थान पर बैठ गए।

जब सभी अपने स्थान पर बैठ गए, तो गुरू ने कहा “जाइये और अपने नाम का गुब्बारा लेकर यहाँ वापस आ जाइये।”

सभी उठे और अपना गुब्बारा लेने के लिए दूसरे कमरे की ओर भागे। आखिर वह “प्रसन्नता” का गुब्बारा था। शीघ्र ही गुब्बारे फटने की आवाजें आने लगीं। बहस शोरगुल सुनायी पडने लगा क्योंकि हर व्यक्ति पागलों की तरह अपना गुब्बारा खोज रहा था। पांच मिनट पश्चात केवल कुछ ही व्यक्तियों को अपना गुब्बारा मिल सका, वह भी संयोगवश।

गुरू ने उन सभी को रोकते हुए कहा कि कोई भी एक गुब्बारा चाहे उस पर कोई भी नाम लिखा हो ले आएं। कुछ ही समय में हर व्यक्ति एक-एक गुब्बारे के साथ कमरे में उपस्थित था।

गुरू ने कहा “अब गुब्बारे पर लिखा नाम पुकारें और वह जिस व्यक्ति का है उसे दे दें।”

शीघ्र ही हर व्यक्ति के हाथ में उनका गुब्बारा था, सिवाय उनके जिनके गुब्बारे उस आपा-धापी में फूट चुके थे।

गुरू ने कहा “इस संसार में जहां हर व्यक्ति प्रसन्नता की खोज में है वहाँ सबसे सहज उपाय यही है कि हम अन्य व्यक्तियों को उनकी प्रसन्नता दे दें और फिर कोई आकर हमें हमारी प्रसन्नता दे जाएगा।”
“यदि किसी दूसरे व्यक्ति के कारण मेरा गुब्बारा फूट गया हो, तो क्या करें?” उनमें से एक ने कहा “मेरे पास तो कुछ भी नहीं।”
“एक नया गुब्बारा फुला लो।” गुरू ने उसे एक नया गुब्बारा देते हुए कहा।

संभवतः इससे बेहतर कोई और उदाहरण नहीं जो प्रसन्नता के सार को समझा सके। हम चाहे कितना भी विश्वास करना चाहें कि दूसरों को अप्रसन्न करके हम स्वयं को प्रसन्न रख सकते हैं, परंतु सत्य तो यही है कि दूसरों को दुःख देकर हम स्वयं को कभी प्रसन्न नहीं रख सकते। संभवतः आप अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ दिखाने में सफल हो जाएं, संभवतः आप दूसरों को दबा भी दें; पर क्या ऐसा करके आप प्रसन्न रह पाएंगे? मुझे तो ऐसा नहीं लगता।

आप बस उन्हें उनकी प्रसन्नता का गुब्बारा दे दें। और, कोई और आकर आप को आप का गुब्बारा दे जाएगा। अन्य व्यक्ति ऐसा न भी करें, तो प्रकृति अवश्य करेगी। ऐसा नहीं है कि वही व्यक्ति आपको आपका गुब्बारा वापस दे किन्तु कोई और व्यक्ति अवश्य देगा। यहाँ आप पूछ सकते हैं कि यदि कोई भी आकर आप को आप का गुब्बारा नहीं देता, तो? आपने उन्हें उनका गुब्बारा दे दिया पर किसी ने भी आकर आप को आप का गुब्बारा नहीं दिया, तब क्या करें?

ऐसी स्थिति में अपना नियत कर्म करते रहें और प्रतीक्षा करें। धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें। एक ऐसा समय आएगा जब सभी के पास उनके गुब्बारे होंगे और एक गुब्बारा आपके लिए भी बचा होगा। यदि आप किसी दौड़ में भाग नहीं ले रहे हैं, तो फिर किसी भी तनाव या आकुलता का कोई स्थान नहीं है। यदि आप इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि किसी एक को गुब्बारा किसी दूसरे से शीघ्र मिलेगा तो फिर आपको आपका गुब्बारा अभी मिले या बाद में, इससे आप विचलित नहीं होंगे।

इस कहानी में विचार करने योग्य कुछ और भी महत्वपूर्ण बातें हैं – आप अपना गुब्बारा प्राप्त करने की आशा तभी कर सकते हैं जब आपने पहले कभी, कोई भी गुब्बारा फुलाया हो। अपने गुब्बारे के निर्माण के लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं। दूसरे आप की प्रसन्नता का सृजन नहीं कर सकते। यह सृजन आप को स्वयं ही करना होगा। अधिक से अधिक वे यही कर सकते हैं कि आप की प्रसन्नता मिलने पर आप को वापस कर दें। परंतु यदि आप का गुब्बारा ही वहाँ नहीं है, ऐसा कुछ जो आप को प्रसन्नता दे सके, तो फिर आप को कोई भी, कैसे प्रसन्नता दे सकता है। दूसरा व्यक्ति तो केवल आप से जुड़ी प्रसन्नता ही आप को वापस कर रहा है। इस बात को अपने अंदर गहरा उतरने दें – वे हमारी प्रसन्नता के गुब्बारे का निर्माण नहीं कर रहे, केवल उसे वापस कर रहे हैं।

और यदि किसी ने आप के गुब्बारे में सुई लगा दी; तो जाएं और अन्य कोई गुब्बारा खोजें। यह बहुत सरल है। उन पर चिल्लाने अथवा उनके प्रति द्वेष रखने का कोई अर्थ नहीं है। यदि वे चाहें तो भी आपके गुब्बारे को पहले जैसा नहीं कर सकते। दुखी होकर या परेशान होकर स्वयं को दण्ड ना दें। फटे हुए गुब्बारे पर जान बूझ कर चिल्लाने का कोई अर्थ नहीं। इससे तो बेहतर है कि धमाके का आनंद लिया जाए। बाहर निकलें और दुनिया देखें। ऐसे बहुत से गुब्बारे हैं जिन्हें आप चुन सकते हैं।

प्रसन्नता के अवसरों की कोई कमी नहीं है। इस जीवन में इस संसार में करने के लिए बहुत कुछ है। आप को केवल प्रारंभ करना है। कहीं से भी, कभी भी। या फिर यहीं से- अभी। तुरन्त; एक नयी शुरूआत।

जीवन बहुत शीघ्रता से दौड़ रहा है। हो सकता है, किसी दिन जागने पर आप को लगे कि जीवन के कईं दशक तो यूं ही निकल गये। दूसरों के गुब्बारों में छेद करने में अपना समय व्यर्थ क्यों करें? क्यों पत्थर उठाएं कि उन्होंने हमारा गुब्बारा फोड़ दिया? आप इन सबसे उपर उठें और शुभकर्म के मार्ग पर आगे बढ़ें। जीवन के हर मोड़ पर आपको एक प्रसन्नता का गुब्बारा मिलेगा।

आप उन्हें उनके गुब्बारे देते रहें और आप को अपना गुब्बारा व कोई और जो किसी का भी न हो मिलता रहेगा। किसी भी स्थिति में बेहतर तो यही होगा कि हम अपनी प्रसन्नता के गुब्बारे को फुला लें; इससे पहले कि जीवन का गुब्बारा ही फूट जाए। उसे तो एक दिन फटना ही है।

शांति।
स्वामी