जीवन का हर दिन मंदगति व सुस्त रूप से काटते हुए, अंततः मैं क्या कर रहा हूँ? प्रत्येक विचारपूर्ण व्यक्ति के जीवन में यह प्रश्न अनिवार्य है। इसे आप अस्तित्ववाद अथवा अधेड़ आयु संबंधी संकट काल या फिर चाहे जो कहें। यदि आपने अपना जीवन पुस्तक में लिखे गए नियमों के अनुसार जिया है और दूसरों की अथवा स्वयं की सहायता के लिए सभी कुछ किया है तो यह अवस्था अवश्यंभावी है।

अपने जीवन काल में कभी न कभी हर समझदार व्यक्ति इस शून्यता की भावना का शिकार अवश्य होता है। आपको लगता है कि सब कुछ होकर भी कुछ भी नहीं है। दुखी होने का कोई वास्तविक कारण नहीं है फिर भी कहीं प्रसन्नता नहीं मिलती। मेरे पास संपत्ति है, स्वतंत्रता है, परिवार है तथा समाज में सम्मानित स्थिति है, मुझे प्रसन्न होना चाहिए। किंतु जीवन निरर्थक लगता है। जितना हम और अर्जित करते जाते हैं उतने अधिक रिक्त होते जाते हैं।

यद्यपि हर धनी व्यक्ति खालीपन का शिकार नहीं होता एवं हर निर्धन व्यक्ति संतुष्ट नहीं होता, सदैव तो कभी भी नहीं। प्रसन्नता तो एक प्रेमविलासी साथी के समान है। आप इसकी निष्ठा व स्थिरता का विश्वास नहीं कर सकते। बहुधा हम यह सोचते हैं कि प्रसन्नता तो हमारे स्वप्न-संसार में मिलेगी। एक ऐसी जगह, जहाँ सभी कुछ (और हर कोई) हमारे अनुसार चलेगा और चूँकि जीवन वैसे ही कार्य करेगा जैसा कि मैं चाहता हूँ, तो मुझे किसी प्रकार की कमी, ईर्श्या, क्रोध व इस प्रकार की भावनाओं से नहीं जूझना पडेगा। यह एक अहंकारी-अज्ञानी दृष्टिकोण है।

यह आवश्यक नहीं कि चुनौती हीन एवं संघर्ष हीन जीवन सुखी ही हो। सत्य तो यह है कि ऐसा जीवन अत्यंत उबाऊ होता हैं। और यह अंततः गहन उदासी व शून्यता की ओर ले जाता है। हमारे संघर्ष हमें सिखाते अैार सवारते हैं।

यहाँ मैं डॉक्टर विक्टर फ़्रैंकिल का उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ, जिससे आज के लेखन में मेरे द्वारा प्रस्तुत किए गए दृष्टिकोण प्रत्यक्ष एवं सार्थक रूप से प्रभावित हैं –

वास्तविकता में मनुष्य को जिस वस्तु की आवश्यकता है वह चिंतामुक्त स्थिति नहीं है। किंतु निरंतर प्रयास एवं संघर्ष करते रहने की स्थिति है जो कि एक निश्चित उपयुक्त उद्देश्य के लिए हो। स्वतंत्र रूप से चुना गया कार्य। मनुष्य को इस की आवश्यकता नहीं कि उसकी चिंता समाप्त हो जाए। उसे तो जीवन की एक अर्थपूर्ण पुकार की आवश्यकता है जिसे वह पूर्ण कर सके।

जैसा कि हम देखते हैं मनुष्य प्रसन्नता की खोज में नहीं है मात्र प्रसन्न होने के कारण की खोज में है। जिसके द्वारा किसी परिस्थिति में निहित सुषुप्त अर्थपूर्ण संभावनाओं को वास्तविक स्वरूप दिया जा सके।

मैं यह समझता हूँ कि डॉक्टर फ़्रैंकिल ने बिल्कुल ठीक कहा। हमें प्रसन्न होने के लिए कारण चाहिए। कृतज्ञ होने के कारण चाहिये। किंतु ये कारण भी एक निश्चित सीमा के परे हमारे जीवन को सचमुच कोई अर्थ प्रदान नहीं करते। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये जीवन में रंग, विविधतायें, सुख, प्रसन्नता के पल तथा संतुष्टि ले कर आते हैं। फिर भी इसका अर्थ यह नहीं कि हम एक अर्थपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अन्यथा विश्व के हजारों करोड़ों व्यक्ति जो कि भौतिक सुविधाओं से परिपूर्ण हैं, वे अकेलेपन, उदासी व अवसाद के राक्षस से न जूझ रहे होते।

फ्रेद्रिक नीश ने दावे के साथ यह कहा “वह जिसके पास जीने का कारण है कुछ भी सह सकता है।”

यदि आपके पास सुबह बिस्तर से बाहर निकलने का कारण है, तो आप निकलेंगे। यदि जीने का कारण है, तो जियेंगे। प्रेम करने का कारण है, तो प्रेम करेंगे। यदि आपके पास प्रसन्न होने का कारण है, तो आप प्रसन्न होंगे। कुल मिला के उस कारण का एक ही तात्पर्य है – वह है उद्देश्य। यदि आपके संबंधों का कोई अर्थ है तो आप सहज ही संतुष्ट रहेंगे। कारण ही वह एकमात्र प्रकाश है जो खालीपन के अंधेरे को दूर कर सकता है।

अपने जीवन के अर्थ को जानने की तीन विधियाँ हैं।

सदाचार

वेदिक शिक्षा में एक प्रसिद्ध उक्ति है – सत्यम शिवम सुंदरम। सत्यम का अर्थ है सत्य। शिवम का अर्थ है दैवी और सुंदरम का अर्थ है सुंदरता। जिस क्षण आप अपने जीवन में सुंदरता को देखने और सराहने की कला जान जाते हैं उसी क्षण आप सत्य को उसके विविध रूपों में देखने लगते हैं। जीवन आपको जिन भी राहों से ले जाता है आप उनमें दैवत्व को देखने लगते हैं। आप उसकी सुंदरता से उत्प्रेरित हो जाते हैं। हर क्षण की भव्यता, उसकी कीर्ति, उसके चमत्कारों से आपका अंतर पिघलता जाता है। यह धीरे धीरे आपको अपने आसपास की सुंदरता देखने पर विवश कर देता है। नीला आकाश, स्वस्थ शरीर, स्वस्थ-चित्त मन, हरे भरे वृक्ष, विस्तृत समुद्र, सभी कुछ सुंदरता से परिपूर्ण हैं। वेद इसे सत्व कहते हैं। यह अच्छाई का एक रूप है। अच्छाई संतुष्टि के समरूप है। एक सात्त्विक मन जो कि अच्छाई से भरा है, वही एक शांत मन है। तो एक विधि यह है कि अपने मन को अच्छे विचारों से भर लिया जाए। अन्यथा सत्य, शिव व सुंदर को देखने का प्रयास करें जो इसी क्षण में है। फिर आपके जीवन का एक नया ही अर्थ हो जायेगा।

सेवा

दूसरी विधि है कि किसी उद्देश्य के लिए स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर दें। किसी लक्ष्य के लिए अपने तन मन व आत्मा को समर्पित कर देने से व्यक्तिगत चेतना का असाधारण रूप से विस्तार होता है। आपके चारों ओर जो कुछ भी चल रहा है उसके बीच आपके पास कुछ निराशा भरे क्षण भी आयेंगे किंतु आपको अपना जीवन कभी भी निरर्थक नहीं लगेगा। जैसे ही आप एक कारण को चुनते हैं आप व्यक्तिगत अस्तित्व के सीमित दायरे से बाहर निकल कर एक बड़े मैदान में आ जाते हैं। चिड़िया के बच्चे ने उड़ने की आशा से घोंसला छोड़ दिया है। वह धरती पर नहीं गिरेगा। ठीक समय पर उसे अपने पंखों को फड़फड़ाना आ जायेगा। प्रकृति उसे मरने नहीं देगी। स्वयं को किसी उद्देश्य के प्रति समर्पित कर देने से आपको अपने सामर्थ्य को उसकी अधिकतम सीमा तक ले जाने की शक्ति मिलती है। वेदों में इसे रजस कहा गया है। जब आप राजसिक होते हैं तो ऊर्जा से भरे होते हैं। और फिर कुछ करने के लिए प्रतीक्षा नहीं कर सकते। क्योंकि आपके उद्देश्य ने आपके जीवन को एक ध्येय दिया है। आपका उद्देश्य आपके प्राणों में नयी श्वास फूंकता है। जिससे आपकी सेवा भावना जाग्रत होती है जो आपके नकारात्मक भावों को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करती है।

पीड़ा

पीड़ा से मेरा यह तात्पर्य नहीं कि आपके साथ कुछ भयंकर हो जाए। जो कुछ भी हमें अचंभित कर हमें हमारे मति-भ्रम से निकाले वही पीड़ा है। ऐसी घटनायें एवं अनुभव जो की पीड़ा जनक होते हैं, हमें हमारे सुविधाजनक दायरे से बाहर ले आते हैं। वे हमें दूसरों के दृष्टिकोण के प्रति और भी विनम्र व अनुग्रही बनाते हैं। वे हमारे जीवन, हमारे चुनावों व हमारे कार्य का पुनरावलोकन करने के लिए हमें विवश करते हैं। आप समझ जाते हैं कि जिन वस्तुओं को आप कभी सहज और साधारण मान कर चल रहे थे वास्तव में वे सभी वरदान थे। बुद्धिमत्ता एवं नम्रता के इस नए पाठ में आप जीवन को एक नयी विधि से देखने लगते हैं। इसका वेदिक नाम है तमस। अज्ञान की विधि। अज्ञान हमें पीड़ा की ओर ले जाता है। (हाँ यह शत प्रतिशत सत्य है। क्योंकि जो हमारे साथ घटित होता है वह स्वयं पीड़ा नहीं है। अपितु हम किस प्रकार उसे समझते हैं और उसे महसूस करते हैं वह पीड़ा है। एक अज्ञानी व्यक्ति अपनी हानि को उतने गरिमामय विधि से नहीं ले पाता जितना कि एक प्रबुद्ध व्यक्ति।) मेरे विचार से व्यक्तिगत पीड़ा का मुख्य कारण अज्ञानता है और पीड़ा में ही सार्थकता का बीज है। बुद्ध को ही लें – पीड़ा को देख कर ही उनका अंतर इतना पिघल गया कि उन्होेंने राज-काज छोड़ दिया, भगवा पहना और अपनी यात्रा पर निकल पड़े।

एक युवक ने अपनी माँ से कहा कि उसे एक लड़की से प्रेम हो गया है और वह उससे विवाह करना चाहता है।
उसने कहा – “माँ, केवल हुलास के लिए, मैं तीन लड़कियों को लेकर आऊंगा और आप को यह पता लगाना होगा कि मैं उनमें से किससे विवाह करने वाला हूँ।”

और दूसरे दिन तीन सुंदर युवतियाँ उसकी माँ के सामने खड़ी थीं।
“क्या आप अनुमान लगा सकती हैं कि इनमें से मेरी पत्नी कौन होगी?” उतावले युवक ने पूछा।
“वह दाहिनी ओर वाली,” माँ ने पलक झपकते कहा।
“वाह! बहुत आश्चर्य की बात है। आपने कैसे जाना?”
“क्योंकि…” उसने उदासीनता से कहा, “वह मुझे बिलकुल पसंद नहीं।”

हमें किसी वस्तु को केवल इसलिए नापसंद नहीं करना चाहिये क्योंकि जीवन ने वह हमें सहज ही दिया है। कभी कभी एक दर्शक के समान या फिर अनिर्णायक साक्षी की भांति देखना ही यह जानने के लिए आवश्यक होता है कि हमें किस दिशा में जाना चाहिए।

हमारा आंतरिक स्वभाव हमें हमारे जीवन का ध्येय खोजने के लिए उत्प्रेरित करता है। एक जिज्ञासु के लिए जीवन के अर्थ की खोज ही प्रसन्नता का रहस्य है। आपने जाना होगा कि जैसे ही कोई चुटकुला समझ आ जाता है कैसे एक ऊर्जा मुक्त होती है और हम जोरों से हंस पड़ते हैं। जीवन के साथ भी कुछ ऐसा ही है। आप उसी क्षण मुक्त हो जाते हैं जिस क्षण आप को जीवन का अर्थ समझ में आ जाता है। विभिन्न वस्तुओं का विभिन्न व्यक्तियों के लिए विभिन्न अर्थ होता है। यह एक व्यक्तिगत विषय है।

जब आप जीवन की अच्छाइयों, उसकी सुंदरता एवं दैवत्व से अनजान रहते हैं या फिर आप अपना कुछ समय निस्स्वार्थ भाव से किसी कारण को नहीं देते तो फिर जीवन मजबूरन आपको तीसरा पहलू देता है – पीड़ा। पीड़ा आपके सामने ऊब, गहरी उदासी तथा गहन अवसाद के रूप में आती है। या फिर पीड़ा व्यक्तिगत हानि के रूप में आती है कि अब तो जाग जाओ। आप पहले, दूसरे, या तीसरे उपायों में से चुन सकते हैं। यह आपका चुनाव है।

हिमालय का कमल साफ पानी में नहीं खिलता। वह तो दलदल में खिलता है। खालीपन या दुःख जीवन की शिथिलता नहीं है। यह आपकी बुद्धि का भ्रष्ट होना भी नहीं है। इसका सीधा साधा यही अर्थ है कि जीवन चाहता है कि आप पुनरावलोकन करे, स्वयं का और अपने कार्य का। यह आपसे कह रहा है कि आप अपनी आंतरिक आवाज़ सुनें या फिर नया कुछ खोजें। इस सुवास का बीज ही आपके अस्तित्व का आधार है। जब निष्क्रियता आती है तो परिवर्तन का कमल खिलने को सज है। आप को बस यह करना है कि इसका विरोध ना करें।

धारा के साथ बहें और देखें कि जीवन आपको कहाँ ले जाता है। बीज को अंकुरित होने दें।

“वह जिसके पास जीने का एक उद्देश्य है वह इस प्रश्न का उत्तर जान जाता है कि जीवन को कैसे जीना है…”

शांति।
स्वामी