संन्यासी होने के सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में से एक है संसार के प्रचंड दुख और कष्ट को निकट से देखना। संभवत: चिकित्सकों व मनोवैज्ञानिकों को भी ऐसा ही अनुभव होता है। कभी-कभी जब मैं लोगों से मिलता हूँ तो मुझे समझ आता है कि क्यों बुद्ध ने कहा कि जीवन दुखकारी है और क्यों गुरू नानक ने कहा था कि सम्पूर्ण संसार पीड़ा का अनुभव कर रहा है।

मैं हर प्रकार के व्यक्तियों से मिलता हूँ। उनमें वे भी हैं जो बड़ी कठिनाई से अपनी आजीविका कमा पाते हैं और वे भी जो एक पूरा द्वीप खरीदने की क्षमता रखते हैं। उनमें से कुछ गिने-चुने ही अपने जीवन से सुखी हैं। इन दुखों के मूल में है हमारे दृष्टिकोण एवं उन पर हमारी भावनात्मक निर्भरता। धनी व्यक्तियों को देखें तो भले ही उनका व्यापार उन्हें कितना ही तनाव दे, वे कुछ भी नहीं छोड़ना चाहते। आप उन्हें दोष नहीं दे सकते क्योंकि संभवतः एक बी.एम.डब्ल्यू. में बैठकर रोना एक बस में बैठकर रोने से अधिक सुखकारी है।

इतना कहने के बाद मेरा यह मानना है कि इन दुखों के मूल में हमारी वे अपेक्षाएँ हैं कि हम जो भी करें उसका परिणाम हमारे लिये सुखद ही होना चाहिये। हमें दूसरों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास जो कुछ भी है उसी के कारण वे सुखी हैं। सत्य तो यह है वह ‘कुछ’ भी कभी भी किसी के जीवन में सदैव सुख ले कर नहीं आता। आप क्या हैं और कैसे जीते हैं, यही आपकी प्रसन्नता निर्धारित करता है।

अपने आनंद को विनष्ट करने की एक निश्चित विधि है कि अपनी तुलना दूसरों से की जाए अथवा उनकी जीवन शैली से लोभ किया जाए। आधुनिक रूप से इसकी तुलना ‘फेसबुक’ पर अपने मित्रों के आकर्षक दिखने वाले खातों से की जा सकती है। उन व्यक्तियों की (आप जिन्हें जानते तक नहीं या कभी मिले नहीं और संभवत: कभी मिलें भी नहीं) मुस्कुराती तस्वीर, सुखद परिवारों व हर्षोल्लास को आप देखते हैं और सोचते हैं कि उनका जीवन कितना सुखद है। व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो कुल मिलाकर सामाजिक मीडिया का सम्पूर्ण समाज की उदासी में बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसा मुझे लगता है।

निःसंदेह कोई भी अपने खाते में अपनी रोती हुई तस्वीर तो नहीं डालेगा। वे उन्हीं क्षणों को साझा करेंगे जब वे प्रसन्न थे, पार्टी मना रहे थे, छुट्टियों का आनंद ले रहे थे या धूम धड़ाका कर रहे थे। कोई भी अपने साथी से हुई झड़प या लडाइयों का वीडियो बनाकर ऑनलाइन साझा नहीं करता। जब आप अपने जीवन की तुलना निरंतर किसी और के जीवन से करते हैं तो आप स्वयं को दुखों का निमंत्रण दे रहे हैं, चाहे वह दूसरों के ऑनलाइन विवरणों में ताक-झांक करने का साधारण सा कृत्य ही क्यों न हो।

एक दुर्घटना में एक व्यक्ति ने अपना दाहिना हाथ गवाँ दिया। उसे अपना कार्य छोड़ना पड़ा और वह बहुत नकारात्मक एवं कटु स्वभाव का हो गया। उसकी इस प्रवृत्ति से तंग आकर उसकी प्रेमिका ने उससे संबंध विच्छेद कर लिया। यह नौजवान गहरी उदासी में चला गया और उसने सबसे किनारा कर लिया। महीनों, वह अपने किसी भी मित्र से न मिला न ही बातचीत की। जब उसके घाव भरने शुरू हुए तभी उसने ऑनलाइन जाकर देखना चाहा कि उसकी प्रेमिका आजकल क्या कर रही है? उसे यह जानकर सदमा लगा कि उसने तो किसी और से विवाह कर लिया है।

उसने उसके चित्र देखे। सभी में वह प्रसन्न थी, हंस रही थी। फिर उसने अपने अन्य मित्रों के फेसबुक पृष्ठ पर जाकर देखा। किसी की प्रोन्नति हुई थी और किसी को संतान प्राप्ति। ऐसा लगता था कि हर कोई जीवन का पूर्ण आनंद ले रहा है।

“मेरा जीवन तो नरक है” उसने सोचा। “मैंने अपना दाहिना हाथ खो दिया और उसके साथ ही मेरा काम, मेरा प्रेम, मेरे मित्र सभी खो दिये। मुझे कोई नहीं चाहता, किसी को मेरी चिंता नहीं।” नकारात्मक विचारों ने उसके मस्तिष्क को पूरी तरह जकड़ लिया। यहाँ तक कि उसने स्वयं अपने जीवन का अंत करने का निश्चय कर लिया।

वह एक बहुमंजिली इमारत के शीर्ष पर गया और कूदने के विचार से उसने नीचे देखा। तभी उसने अत्यंत चमत्कारिक दृश्य देखा।

उसने देखा कि फ़ुटपाथ पर एक पदयात्री आनंद विभोर हो कर इस प्रकार नाच रहा था जैसे उसे कोई भी न देख रहा हो। यही नहीं उसके दोनों हाथ नहीं थे यहाँ तक कि उसकी दोनों बाहें भी नहीं थीं फिर भी वह प्रसन्नतापूर्वक नाच रहा था।
अपनी जान देने का विचार छोड़कर वह सीढ़ियों से नीचे भागा यह जानने के लिये कि उस पदयात्री की खुशी का रहस्य क्या था?

“महोदय” उस व्यक्ति ने नम्रतापूर्वक कहा “मैं आपके सकारात्मक दृष्टिकोण से बहुत प्रेरित हुआ हूँ। मैंने देखा कि आपके दोनों हाथ नहीं हैं फिर भी आप खुशी से नाच रहे हैं।”
“खुशी? नाच?” उसने अपने नृत्य को रोके बिना अचकचाकर पूछा। “मैं तो अपने पुष्ठों को खुजलाने का प्रयत्न कर रहा हूँ। मैं तुम्हें बता दूँ कि यह सरल नहीं है।”

अब आप उन लोगों के आनंद का रहस्य जान सकते हैं जब आप उन्हें नाचते, पार्टी करते देखते है। वह कारण है – खुजलाता नितंब!

प्रसन्नता आपकी व्यक्तिगत अवस्था है, एक निजी मामला। हालांकि आप उसे जितना बांटेंगे उतनी ही अधिक मात्रा में यह आपको और मिलेगी। जब आप अपने जीवन में अच्छी बातों को नहीं देख पाते (और यदि देखा जाए तो हर किसी के पास अच्छाइयों का भंडार है) तो आपके महसूस करने को कुछ भी अच्छा बचेगा ही नहीं। सरल बन कर रहें। कृतज्ञ बनें। जीवन जीने की आडम्बर-पूर्ण, भड़कीली शैली आपकी ओर सबका ध्यान तो आकर्षित कर सकती है किंतु जीवन में आनंद नहीं ला सकती। आपको अपनी सुविधाओं का नि:संदेह अधिकार है किंतु फिजूलखर्ची तो एक रोग है।

सुकरात ने एक मितव्ययी जीवन जिया। उसका विश्वास था कि साधारण जीवन की सुंदरता को एक बुद्धिमान व्यक्ति ही परख सकता था। ऐसा कहा जाता है कि वह जूते तक नहीं पहनता था। फिर भी वह बाजारों में प्रदर्शनी में लगी वस्तुओं को घंटों निहारता रहता था।

“तुम बाजार में अपना समय व्यर्थ नष्ट क्यों करते हो?” उसके मित्र ने एक बार पूछा “जबकि तुम खरीदते कुछ भी नहीं?”
“क्योंकि” सुकरात ने उत्तर दिया “जब मैं बाजार में जाता हूँ तो मुझे यह पता चलता है कि कितनी ही वस्तुएं हैं, जिनके बिना मैं सुखी हूँ।”

मुझे नहीं लगता कि प्रसन्नता के लिये सिवाय नेक कार्यों, कृतज्ञता व संतोष के और कुछ चाहिये। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रसन्नता केवल एक भावना ही नहीं अपितु जीने की एक अवस्था है। इन सभी से बढ़कर आनंद में रहना एक प्रवृत्ति है। जब आप अपने जीवन को सकारात्मक रूप से जीने का निश्चय करते हैं, अपने जीवन की अच्छाइयों को कुछ “खुजलाते पुष्ठों” के जीवन से तुलना किये बिना, सराहते हैं तो आपका संसार हजारों सूर्यों के प्रकाश से जगमगा उठता है।

“तुम्हें क्या लगता है कि आज का मौसम कैसा रहेगा?” मुल्ला नसरुद्दीन के मित्र ने उससे पूछा।
“ठीक वैसा ही जैसा कि मैं चाहता हूँ।” अपने गधे को थपथपाते हुए उसने कहा।
“तुम ऐसा इतने विश्वास से कैसे कह सकते हो?”
“यह जानते हुए कि जैसा मैं चाहता हूँ वैसा सदैव मुझे कुछ नहीं मिला, मैंने सदैव उसी को चाहना शुरू कर दिया है जैसा कि मुझे मिला है।” मुल्ला ने कहा “इसलिये मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज का मौसम अच्छा ही होगा।”

अब जबकि हम यहाँ हैं, इस ग्रह पर अपने जीवन की कुछ अवधि गुज़ारने के लिये तो फिर हम पूरी शालीनता से क्यों न रहें? हमें भाग्य से जो कुछ भी मिला है उसी से अपने आनंद-पथ को तराशते क्यों न चलें।

वह सभी कुछ जो आपने कभी भी अर्जित किया है या फिर हर वह व्यक्ति जिससे आपका परिचय है एक दिन आपसे पृथक कर दिया जाएगा। अतः बुद्धिमानी तो इसी में है कि जो भी है उसके महत्व को समझा जाए। क्योंकि कुछ भी निरंतर नहीं रहता। हम जियें और इस जीवन का उसके लिये सम्मान करें जो कि यह है – एक आशीर्वाद।

शांति।
स्वामी