अपने विभिन्न लेखों में व अन्य स्थानों पर मैंने दस प्राणाधार ऊर्जाओं का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया था। आज मैं आपके साथ, आपके शरीर में इन ऊर्जाओं का योगिक पक्ष साझा कर रहा हूँ। यह दस प्राणाधार ऊर्जाएँ शरीर की सभी स्वैच्छिक व अनैच्छिक गतिविधियों, प्रतिक्रियाओं, व आदतों को नियंत्रित करती हैं। और, बदले में, इन ऊर्जाओं पर आसन सिद्धि, योगिक मुद्रा के पूर्ण स्वामित्व, श्वासों के नियमन, व एकाग्रतापूर्ण ध्यान द्वारा नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए संस्कृत शब्द है – वायु, जिसका अर्थ है अस्थिर, सूक्ष्म ऊर्जा। इस शब्द को बहुधा हवा के लिए भी प्रयोग किया जाता है। दस प्रमुख प्राणाधार ऊर्जाओं को दो श्रेणी में विभाजित किया गया है – पाँच मूलभूत, मौलिक ऊर्जाएँ व पाँच अनुपूरक ऊर्जाएँ। इनके कार्य इस प्रकार हैं –
१. प्राणवायु  — प्रमुख प्राणशक्ति – यह ऊर्जा आपके अस्तित्व का मूल घटक है। यह आपके श्वासों की मूल प्राणशक्ति है, ऑक्सीजन में विद्यमान सूक्ष्म तत्व, शरीर के ईंधन के समान। इसका आपकी मानसिक स्थिति, आपकी भावनाओं, आपके स्वभाव, व मनोवृत्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

२. अपान वायु  — अधोमुखी ऊर्जा – इस नीचे की ओर प्रवाहित होने वाली ऊर्जा द्वारा उत्सर्जन, मूत्र, प्रजनक द्रव्य-स्राव क्रियाओं पर नियंत्रण होता है। यह प्रमुखतः आपके आमाशय के निचले भाग में व्यवस्थित होती है। इस वायु पर नियंत्रण स्थापित होने पर मल-मूत्र, रज, वीर्य आदि के विसर्जन पर नियंत्रण हो जाता है।
३. उदान वायु  — ऊर्ध्व ऊर्जा – यह ऊर्जा कंठ में विद्यमान रहती है व इसका कार्य ध्वनि-उदगम है। इस वायु पर नियंत्रण स्थापित कर थाइराइड (thyroid) ग्रंथि पर नियंत्रण संभव है। थाइराइड ग्रंथि का हॉर्मोन्स के विकास-प्रवाह पर सीधा प्रभाव होता है।
४. समान वायु  — ऊष्मीय ऊर्जा – यह ऊर्जा उदर में स्थापित होती है। यह भोजन के संचालन व पाचन का नियमन करती है। इस ऊर्जा पर नियंत्रण पा कर आप स्वेच्छानुसार अपने शरीर का तापमान बदल सकते हैं। ऊष्मीय ऊर्जा पर नियंत्रण आपकी पाचनशक्ति को विस्मयकारी ढंग से उच्चस्तरीय बना बना देता है व आपकी बृहदांत्र (बड़ी आंत) अत्यंत सुचारु रूप से अपना कार्य करने लगेंगी।
५. यान वायु  — विसृत ऊर्जा – यह ऊर्जा आपके सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित होती रहती है। इसके द्वारा शरीर के हर अंग तक रक्त-संचार द्वारा ऑक्सीजन पहुँचती है। इस ऊर्जा का परिचालन आपको एक ही मुद्रा में अपनी इच्छानुसार लंबी अवधि तक बैठे रहने में सहायक होता है।

अन्य पाँच अनुपूरक ऊर्जाएँ इस प्रकार हैं –

१. नाग – यह उदर के ऊपर की ओर होने वाली सभी क्रियाओं को नियंत्रित करती है, जैसे हिचकी, डकार, वमन, इत्यादि।
२. कूर्म – यह छींकना व इस प्रकार के सभी नासिका संस्थान संबन्धित अनियमित संचालन नियंत्रित करती है।
३. कृकर – यह नेत्रों के झपकने को नियंत्रित करती है।
४. देवदत्त – इस ऊर्जा के नियमन द्वारा जम्हाई लेने पर पूर्ण नियंत्रण पाया जा सकता है।
५. धनंजय – इस ऊर्जा के अंतर्गत शरीर के किसी भी भाग में होने वाली ऐंठन, खिंचाव आदि आते हैं।

ऐसी अनेकों योगिक क्रियाएँ हैं जिनके द्वारा इन दस ऊर्जाओं को स्थिर किया जा सकता है। इन ऊर्जाओं की स्थिरता साधक में असाधारण शांति व आत्म-बल का संचार करती है। किन्तु, प्रायः ऐसी सभी योगिक क्रियाएँ एक सुयोग्य गुरु की छत्र छाया में ही की जानी चाहिएँ। श्वासों का नियमन, जिस पर मैं विस्तृत चर्चा शारीरिक परिष्कार के अंतर्गत करूंगा, पाँच मौलिक ऊर्जाओं को सुव्यवस्थित करता है व एकाग्रतापूर्ण ध्यान शेष पाँच अनुपूरक ऊर्जाओं को स्थिर करता है जिससे आप अन्तःकरण में अथाह शांति व सुखानुभूति अनुभव करेंगे। आप पाएंगे कि वास्तव में बहुत कुछ आपके स्वयं के नियंत्रण में है।

इन ऊर्जाओं के व्यवधान-रहित संचार के लिए मेरुदंड सीधा रख एक उपयुक्त मुद्रा में बैठना सर्वोपरि है। इस पर भी मैं विस्तृत चर्चा करूंगा।

इस श्रंखला में आगे मैं ध्यान में आने वाले चार प्रमुख व्यवधानों व उनके समाधान पर चर्चा प्रारम्भ करूंगा।

शांति।
स्वामी