मुझे हर प्रकार के ई-मेल मिलते हैं। ये स्वयं सेवकों की एक टीम के द्वारा चिह्नित और दर्ज किये जाते हैं। लगभग पचास प्रतिशत पाठक मुझसे, उनके जीवन के क्लेश, कष्टों पर सलाह मांगते हैं। तीस प्रतिशत मुझसे अपनी कृतज्ञता एवं प्रेम व्यक्त करते हैं। कुछ दस प्रतिशत अपने दार्शनिक विचार व्यक्त करते हैं। एक प्रतिशत (या कुछ कम) ई-मेल में मुझसे पूछा जाता है कि वे मेरी या मेरे उद्देश्य की किस प्रकार मदद कर सकते हैं।

शेष नौ प्रतिशत मात्र अपनी घृणा व्यक्त करने के लिये ई-मेल लिखते हैं। वे कभी मेरे दृष्टिकोण से असहमत हैं। कभी मेरे लेखन से आहत हैं, या किसी अन्य बात से विचलित हैं। और यह अनुकूल है। यह जीवन का हिस्सा है। सभी को प्रसन्न रख पाना असंभव है। इतने वर्षों में मैंने स्वयं को दूसरे के विचारों से पृथक रखना सीख लिया है। यह न तो स्वभाविक है और न ही सहज। हर वह व्यक्ति, जो अंतःकरण प्रसन्नता की धारा में स्नान करना चाहता है, उसके लिये बेहतर यही है, कि वह अपने विषय में, संसार की राय के प्रति, उदासीनता सीख ले।

मेरा मंत्र बहुत सरल है। दिन के अंत में (शब्दशः), सोने से पहले, मैं स्वयं से तीन प्रश्न करता हूँ। क्या मैंने अपनी पूर्ण क्षमता के अनुरूप दिन व्यतीत किया? क्या मैंने अपने वचन तथा कर्म में सावधानी रखी? क्या मैंने आज किसी की मदद की? वास्तव में यही वह सब कुछ है, जो हम कर सकते हैं। यदि आपने दिन पर्यंत अर्थपूर्ण कार्य करने का प्रयत्न किया, किसी की भावनाओं को चोट नहीं पहुँचाई, और आपने सत्कार्य किया, तब आपका दिन सार्थक है। आप जो कर सकते थे आपने किया और फिर भी यदि कोई, या कुछ लोगों का समूह, आपसे तीव्र घृणा करता है तो, भगवान उनकी मदद करें।

घृणा एक अविश्वसनीय रूप से सशक्त भावना है। वास्तव में, दुर्भाग्यवश, घृणा मनुष्य को असाधारण रूप से, तथा गलत ढंग से सशक्त करती है। ये पलक झपकते ही विवेक और करुणा-भाव को पछाड़ देती है। यदि आप अपने चारों ओर देखें, तो बहुत से धार्मिक कट्टरपंथियों को पाएंगे। और भी बुरा यह है कि, वे नहीं मानते कि वे कट्टर हैं। घृणा का यह उत्कृष्ट लक्षण है। यह आपको अंधा बना देती है। मुझे और वर्णन करने की आवश्यकता नहीं, हमारे इतिहास में बहुत से उदाहरण हैं।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर का यह बड़ा सुंदर कथन है, “घृणा, अनियंत्रित कैंसर की तरह, व्यक्तित्व को नष्ट करती है और उसकी एकात्मकता को खा जाती है। घृणा, मनुष्य की निष्पक्षता और मूल्यों को नष्ट करती है। यह सुंदर को कुरूप और कुरूप को सुंदर कहने के लिये बाध्य करती है, तथा सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझने के लिये भ्रमित करती है।”

दुखद यह है कि, प्रत्येक मनुष्य में कहीं न कहीं घृणा का अंश है। यही कठोर सत्य है। अंतत: घृणा, मात्र एक तीव्र भावना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। जब तक हममें अस्थिरता या भय है (जो कि हम सभी में है), तब तक हममें ईर्ष्या और घृणा भी होगी। इसका यह अर्थ नहीं कि हमें इन भावनाओं के साथ रहना ही होगा।

हम अपने अस्तित्व से घृणा और ईर्ष्या के हर अंश को मिटाने के लिये, स्वयं को शुद्ध कर सकते हैं। आंतरिक शुद्धीकरण की इस प्रक्रिया का आरंभ ध्यान से नहीं होता। बजाय इसके, यह वाणी पर संयम से शुरू होती है। प्रायः हम किसी के लिये भी हानिकर शब्द बोलते हैं, जिससे हम कभी मिले भी नहीं। किसी ऐसे को शिकार बनाते हैं, जो हमें जानता तक नहीं है। ऐसे शब्द, घृणा के लिये उपजाऊ भूमि का काम करते हैं।

मुझे अपने बचपन की एक छोटी सी घटना याद आ गयी। एक प्रसिद्ध धार्मिक व्यक्ति पर अनैतिक आचरण का आरोप लगाया जा रहा था, और वह किसी लोकापवाद का केन्द्र था। यह समाचार दूरदर्शन पर प्रसारित हो रहा था।
जैसी ही उनकी तस्वीरें आईं, तो मैंने कहा, “यही वह धोखेबाज़ है। वास्तव में, ये सभी धोखेबाज़ हैं।” तभी मेरी माताजी बीच में बोलीं, “बेटा किसी के विषय में अपशब्द क्यों कहो, जब हम उसे जानते ही नहीं? हमें पूर्ण सत्य का ज्ञान नहीं है। उसने किस कारणवश यह कार्य किया, इस बात का भी हमें ज्ञान नहीं है। संभवतः, हम उससे कभी नहीं मिलेंगे। वह भी तुम्हें नहीं जानता। एक धारणा बनाकर अपने मन को प्रदूषित क्यों करें?”
मै उस समय ८ या ९ साल का था, पर किसी तरह यह बात मुझे समझ आ गयी।
“इसके अतिरिक्त” उन्होंने कहा, “यदि हमारे पास अच्छा कहने को कुछ नहीं है तो, कम से कम हम इतना कर सकते हैं कि, दूसरे व्यक्ति पर थूकें नहीं।”
“क्या आप यह कह रहीं हैं कि मुझे कुछ गलत देखकर भी चुप रहना चाहिये?” मैंने उनसे पूछा।
“नहीं” उन्होंने तुरंत उतर दिया। “तुम्हें अधर्म के विरुद्ध खड़े होना चाहिये। किंतु यहाँ हम उस व्यक्ति के विरुद्ध कुछ बोलने की बात कर रहे हैं जो हमें सुन भी नहीं रहा। तुम्हारी टिप्पणी उस तक किसी भी प्रकार नहीं पहुँच रही। घृणाकारक शब्द तुम्हारे अंदर तिरस्कार का पोषण करेंगे। हमें पहले स्वयं के अंदर देखना चाहिये।”
उनके शब्दों का मुझ पर अमिट प्रभाव पड़ा, क्योंकि वह वही कहतीं थीं, जो वह स्वयं करतीं थीं। मैं उन लोगों पर टिप्पणी करने से दूर रहता हूँ, जिन्हें मैं सचमुच ठीक से नहीं जानता।

ऐसा कोई न कोई अवश्य होगा जो हमें पसंद न करता हो, और कोई हमें पसंद करे ऐसा आवश्यक भी नहीं। हम दूसरों को हमारे विषय में कुछ सोचने से रोक नहीं सकते। इसके अतिरिक्त, उनकी घृणा आपसे नहीं है। अपितु उस बात से है जो (वे सोचते हैं कि) वे आपके विषय में जानते हैं। वे आपको उनके दृष्टिकोण से देखते हैं। यह सोच, समझ के नितांत अभाव से उपजती है। आप जिसे नहीं समझते, उसी से घृणा करते हैं। क्योंकि यदि आप दूसरे व्यक्ति या उसके दृष्टिकोण को समझ लेते हैं, तो घृणा की ऊर्जा सहानुभूति में परिवर्तित हो जाती है।

मुल्ला नसरूद्दीन रेलगाड़ी में यात्रा कर रहा था। उसके पास बैठी एक महिला ने उसका ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया। किंतु वह पुस्तक पढ़ने में मगन था। महिला ने अपने ऊपर थोड़ा और इत्र छिड़का, और धीमे से एक गीत गुनगुनाने लगी। अपने बैग से एक शीशा निकाला और अपनी लिपस्टिक ठीक करी। वह शौचालय इस्तेमाल करने के बहाने कईं बार उठी। किंतु मुल्ला मगन रहा।
कुछ घंटों पश्चात वह उस पर चिल्लाई, “मुझे सताना बंद करो।”
“क्षमा करें” मुल्ला अचंभित होकर बोला, “मैंने तो आपसे एक शब्द भी नहीं कहा, यहाँ तक कि देखा तक नहीं।”
“बिल्कुल ठीक। मुझे यह बहुत ही खिजाऊ और असहनीय लगा” महिला ने उत्तर दिया।

यही संक्षेप में घृणा की संरचना है। हम उससे घृणा करते हैं जिसे हम सह नहीं सकते (या समझते नहीं)। और हम क्या सहन नहीं कर सकते, यह पूर्णतया हमारे ज्ञान, हमारी प्राथमिकताओं, दृष्टिकोण या पालन-पोषण पर आधारित है।

दुखद पहलू यह है कि घृणा वह भावना है, जो हमें सिखाई जाती है। कोई भी इसके साथ पैदा नहीं होता, यह अंतर्निहित नहीं है। जब हमारे हृदय में घृणा होती है तो इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति, विचार शैली या किसी घटना ने हमें यह सिखाया है कि घृणा कैसे की जाती है। जो पुनः कृतज्ञता के साथ यह दर्शाता है कि यह कुछ ऐसा है जिसे हम भुला सकते हैं। सब कुछ भुलाना (या सीखना) सावधानी के चार स्तरों पर होता है। इसे फिर कभी जानेंगे।

हम जो कुछ सीखते हैं, उसका चयन कर सकते हैं। उसमें घृणा का होना आवश्यक नहीं। हमें वे सब सीखनी चाहिये जो हमारी चेतना को शुद्ध करें, हमारी आत्मा का उत्थान करें, और हमें सत्य एवं सहानुभूति के मार्ग पर चलने के लिये प्रोत्साहित करें। क्योंकि, एकमात्र सदाचरण ही आपकी आंतरिक सुंदरता को उजागर करेगा। प्रेम, घृणा से करोड़ों गुना शक्तिशाली है, क्योंकि प्रेम उस जगह महल बनाता है जहाँ घृणा चुपके से भी नहीं घुस सकती।

प्रेम क्या है? आप पूछेंगे। दया, सहानुभूति, देखभाल, प्रतिदान प्रेम का निर्माण करते हैं। जब आप प्रेम में हों तो ये गुण स्वभावतः ही आ जाते हैं। अपने हृदय में इनका अभ्यास करें। और फिर, प्रेम आपके अस्तित्व के हर रोम से यूँ चमकेगा, जैसे शीत-काल में सूरज का ताप, प्रत्येक वस्तु को सुखद गरमाहट दे रहा हो।

प्रेम का घृणा के ऊपर चयन करें, और आप कभी भी निराश नहीं होंगे।

शांति।
स्वामी