मैंने एक उद्धरण पढ़ा था, जिसमें कहा गया था कि “मुझसे प्रेम करो तो मैं तुम्हारे लिये पहाड़ भी उठा लूँगा और यदि तुमने मुझे चोट पहुँचाई तो मैं उसी पहाड़ को तुम्हारे सर पर पटक दूँगा।” मुझे लगता है कि यह हमारे जीवन के दो पहलुओं का मूल निष्कर्ष है। प्रथम यह कि किस प्रकार प्रेम की उपस्थिति या अनुपस्थिति हमें दूसरों के प्रति या स्वयं के प्रति कुछ भी महसूस करने को बाध्य करती है। दूसरा यह कि हम कैसे आत्मसंतुष्टि को ही प्रेम मानकर बैठ जाते है। क्या प्रेम का सचमुच यही अर्थ है कि आप किसी रिश्ते में सदैव प्रसन्न रहेंगे? यदि कुछ हमारी आशा अनुसार नहीं घटित हो अथवा यदि कोई व्यक्ति हमारी आशा अनुसार व्यवहार न करे तो स्वाभाविक रूप से हम चिढ़ जाते हैं।

मुझे प्रतिदिन प्रेम संबंध में चोट खाए लोगों से कईं ईमेल आते हैं। मैं कईं लोगों से मिलता हूँ जो अपने रिश्ते से प्रसन्न नहीं हैं। कुछ शिकायतों के होते हुए भी साथ रहते हैं, कुछ ही विरले हैं जो समाधान निकाल पाते हैं। अधिकतर तो अपनी राहें अलग कर लेते हैं जिससे उनके जीवन में शांति बनी रहे। एक प्रभावशाली महिला जो कि एक समूह की ओर से बोल रही थी, मुझसे बोलीं, “पुरुषों के लिये हम महिलाओं को समझ पाना इतना कठिन क्यों है? हम केवल प्यार करते रहना चाहते हैं और चाहते हैं कि बदले में हमें प्यार मिले।”

मेरा यह आशय नहीं था फिर भी मैं अपनी हँसी दबा न सका। यह बात बहुत ही सरल लगी – प्यार करो और बदले में प्यार मिले। थोड़ा या अधिक, सभी यही चाहते हैं। परंतु प्रेम इतना सरल नहीं है। यदि आप मुझसे पूछें तो निश्चित ही इसका अर्थ यह नहीं है कि आप अपने प्रेमी के साथ घनिष्ठ आलिंगन में निरन्तर लिपटे रहेंगे ठीक उसी प्रकार जैसे दो सर्प प्रेमालिंगन में बंधे रहते हैं (मै जानता हूँ कि यह कोई सुंदर परिदृश्य नहीं!)। यदि शाम के समय, समुद्र तट पर दो लोग हाथों में हाथ डाले टहल रहे हों तो यह भी प्रेम दर्शाता है। पुनः विचार करें तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा प्रतिदिन किया जा सकता है। यदि आप तटरक्षक हैं तो बात अलग है।

मोमबत्ती की मंद-मंद रोशनी में किया गया रात्रिभोज, संभवत: एक छुट्टी, कुछ विशेष देख-रेख, सहानुभूति, करुणा, क्षमा, सुरक्षा, घनिष्ठता, निष्ठा, वचनबद्धता व सराहना – हममें से अधिकतर व्यक्ति प्रेम को इन्हीं रूपों में देखते हैं। हममें से अधिकतर का यह मानना है कि प्रेम में आप सदैव सुरक्षित महसूस करते हैं। आप वांछित, प्रसन्न, सुखद एवं पूर्ण महसूस करते हैं। जैसे कि दूसरा व्यक्ति सदैव आपका प्याला भरने के लिये तत्पर है (जैसे कि वह किसी भोजनालय का एक उत्सुक सेवक हो जो खाली प्याले को भरने के लिए तत्पर है)। संभवत: यह सब कुछ संभव है किंतु सदैव हर परिस्थिति में संभव नहीं।

उनसे पूछिये जो दशकों से साथ-साथ हैं और वे आप को बतायेंगे कि यह प्रेम की परिभाषा नहीं होती। उनसे पूछिये जिन्होंने जीवन का सारा रहस्य समझ लिया है, जो प्रसन्न हैं और वे आप को बतायेंगे कि प्यार ऐसा नहीं है। ऐसा कभी था ही नहीं। प्रेम से संबंधित “सदैव” शब्द को आज तक कोई ढूंढ़ नहीं पाया है। क्योंकि बहुधा आप प्यार को जैसा देखते हैं, दूसरा व्यक्ति वैसा नहीं देखता। प्रेम की उनकी परिभाषा आपकी परिभाषा से भिन्न हो सकती है। वास्तव में प्रेम असंगति दूर कर सामंजस्य स्थापित करने जैसा है। यह एक पारस्परिक सहमति बनाने जैसा है। प्रेम हृदय की धड़कनों को समक्रमिक बनाने जैसा है। जिससे आप दोनों एक दूसरे की असमानताओं के बीच सहजता से रहें। इस पारस्परिक समझ के अभाव में प्रेम एक काल्पनिक अव्यवहारिक परिभाषा है।

प्रेम करने का अर्थ दूसरे व्यक्ति को बदलना नहीं है अपितु उनके आने से हमारे जीवन में जो भी परिवर्तन आते हैं उन्हें स्वीकार करना है। आप जो चाहते हों, दूसरे व्यक्ति को भी वही चाहने पर प्रेम विवश नहीं करता। ऐसा तो अधिपत्य एवं अहंकार में होता है।

प्रेम करने का अर्थ है यह जानना कि दूसरे व्यक्ति के लिये क्या महत्वपूर्ण है। उनके प्रयासों की सराहना करना और वे जो चाहते हैं उसकी परवाह करना प्रेम है। क्योंकि इससे समझ दिखती है। इसमें सम्मान दिखाई देता है। यही प्रेम है क्योंकि किसी को समझे बिना उससे प्यार कर पाना असंभव है। किसी को भी उस प्रकार प्रेम करना जैसा कि आप चाहते हैं, वह प्रेम नहीं है। सच्चे प्रेम का अर्थ है कि आप उन्हें उस प्रकार प्रेम करें जैसा कि वे चाहते हैं। यदि आप उन्हें उस प्रकार प्रेम कर रहे हैं जैसा कि आप स्वयं के लिये चाहते हैं तो कदाचित् आप उन्हें प्रेम नहीं कर रहे। आप केवल अपनी प्राथमिकताओं और अपने दृष्टिकोण के अनुसार उन्हें प्यार दे रहे हैं। इस अन्तर को जानिये। यदि आप प्रेम चाहते हैं तो प्रेम करना सीखें।

एक चिरस्थायी संबंध की नींव एक मूलभूत प्रश्न पर टिकी है जो दो व्यक्ति एक दूसरे से पूछते है – “आप के लिये क्या महत्वपूर्ण है?” एक बार आप यह पता लगा लेते हैं कि दूसरों के लिये क्या महत्वपूर्ण है और उनकी देख-रेख में लग जाते हैं तब आप उन्हें प्यार कर रहे हैं। ऐसे संबंधों में शांति, सम्मान, तालमेल स्वभाविक रूप से उपजता है।

“मैं तुमसे प्रेम करता हूँ” यह कहने का कोई अर्थ नहीं यदि आप यह नहीं जानते कि जिसे आप प्रेम करते हैं उसके लिये क्या महत्वपूर्ण है। यदि आपने यह जानने का प्रयास ही नहीं किया अथवा वे जो चाहते हैं उस में आपने उन्हें सहारा नहीं दिया तो आप आसक्ति को ही प्रेम समझ बैठे हैं। यदि ऐसा हो तो “मै तुम्हें प्रेम करता हूँ” के स्थान पर “मुझे तुम्हारी आवश्यकता है” होना चाहिए। क्योंकि तुम मेरी कुछ जरूरतों को पूरा करते हो। मुझे तुम्हारी आवश्यकता है क्योंकि तुम मुझे कुछ विशेष अहसास देते हो। यह निश्चित रूप से प्रेम नहीं है। यह प्रेम की भ्रांति है। ऐसे संबंध जिसमें एक सहभागी सब कुछ अपने ढंग से करता है क्योंकि वह ऐसा कर सकता है, अत्यंत अस्थिर, विषैले और बोझिल होते हैं।

जब आप दूसरे व्यक्ति को उसके पसंद आये ढंग से प्रेम करते हैं तो उन्हें प्रसन्नता, आनंद एवं एक प्रकार की सुरक्षा से भर देते हैं। और फिर कुछ चमत्कारिक होता है। आपने जो कुछ भी उन्हें दिया है वह वापस आपके पास बहने लगता है। प्रेम का यही सिद्धांत है। यदि आप सच्चा प्रेम करते हैं तो आपको वापस प्रेम मिलेगा। केवल एक ही शर्त है कि प्रेम की मूलभूत शर्त को पूरा किया जाए। अर्थात दूसरे व्यक्ति को उन्हीं के पसंद आये ढंग से चाहना ही प्रेम है। यदि उन्हें स्पैगेटी चाहिये और आप उन्हें किसी एशियन भोजनालय में नूडल खिलाने ले जा रहे हैं तो यह प्रेम नहीं है।

इसके अतिरिक्त प्रेम एक व्यापक घटना है और कोई व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं। आपके प्रेम के बहीखाते का संबंध केवल उसी से नहीं जिससे आप प्रेम करते हैं, अपितु इस सृष्टि में हर एक इससे संबंधित है। जब आप एक प्रेमपूर्ण जीवन के लिये वचनबद्ध होते हैं तो प्रकृति आपको प्रेम से भर देती है। आपको बदले में प्रेम मिलेगा। कोई और रास्ता ही नहीं। और फिर कभी-कभी बहुत ही अप्रत्याशित दिशा से प्रेम मिलता है। मुझे एक चुटकुला याद आया जो कुछ दिनों पूर्व किसी ने मुझे लिखा था। शब्दशः उद्धरण है –

“मेरी दादी ने मुझे बताया कि कैसे उनका विवाह मेरे दादाजी से हुआ। वे बीस वर्ष की थीं और जिस व्यक्ति से वे प्रेम संबंध बना रहीं थीं, उसे युद्ध पर जाना पड़ा।
“हम एक दूसरे से प्यार करते थे” उन्होंने याद करते हुए कहा “और हर सप्ताह एक दूसरे को पत्र लिखा करते थे। उस समय मैंने जाना कि तुम्हारे दादा कितने अद्भुत थे।”
“क्या जब वे युद्ध से लौटे तो आपने उनसे विवाह कर लिया?”
“नहीं, जिन्होंने वे पत्र लिखे थे मैंने उनसे विवाह नहीं किया। तुम्हारे दादा तो पत्रवाहक थे।”

आशा है कि आपका प्रेम इतने विकृत रूप में नहीं आएगा। किंतु प्रेम एक अनोखा पर्यटक है जो सबसे अनपेक्षित समय पर सबसे अप्रत्याशित द्वार पर दस्तक देता है।

मैं फिर से पूछता हूँ – क्या सचमुच प्रेम का यही अर्थ है कि आप किसी रिश्ते में सदैव प्रसन्न रहेंगे? नहीं; प्रेम का अर्थ है कि आप अपने दुख और सुख साझा करें। कि आप साथ-साथ बढ़े और प्रेम के साथ जो अतिसंवेदनशीलता आती है उसे स्वीकार करें। कभी आपके दिल को चोट पहुँचेगी और कभी आप दुखी होंगे। जब तक आप दूसरे व्यक्ति की चिंता कर रहे हैं, आप प्रेम में हैं।

यदि आप प्रेम करने और पाने के लिये उद्वेलित हैं तो इसका आरंभ, जिससे आप प्रेम करते है, उससे इस महत्वपूर्ण प्रश्न द्वारा करें कि “तुम्हारे लिये क्या महत्वपूर्ण है।” उसके बाद उन्हें सुनें और उस पर ध्यान दें। अपने विचार, कथन एवं कृत्यों का उसी के अनुसार एकत्रीकरण करें और फिर वापस प्रेम मिलने की प्रतीक्षा करें। आपको बदले में प्रेम मिलेगा। क्योंकि सच्चा प्रेम एक ही वस्तु आकर्षित करता है और वह है प्रेम। आप किसी को उस प्रकार प्रेम करें जैसा वे चाहते हैं और आपको बदले में वैसा प्रेम मिलेगा जैसा आपने चाहा है। जैसै-जैसे आप प्रेम में आगे बढ़ेंगे वैसे-वैसे समय के साथ आपके अपने स्वप्न एवं महत्त्वाकांक्षाएं परिवर्तित होती जाएंगी। यह नवीन परिवर्तन आपको प्रेम एवं कृपा ग्रहण करने की बेहतर स्थिति में लेकर आता है। किंतु आप को धैर्य रखना होगा।

प्रेम आपके अन्तर्मन के दर्पण में आपका स्वयं का प्रतिबिम्ब है। आप उसकी ओर एक कदम आगे बढ़ते है तो वह आपकी ओर दो कदम आगे बढ़ता है। आप एक कदम पीछे जाते है तो वह दो गुना पीछे जाता है। आप यदि आगे ना बढ़ें तो वह भी आगे नहीं बढ़ता। सत्य यही है कि बहुत कुछ आप पर ही निर्भर करता है।

प्रेम ऐसे करें कि मानो आप स्वयं को ही खो दें। उसी खोने में आपको कुछ महत्वपूर्ण प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त यह भी जानें कि आप कुछ पाएं या ना पाएं किसी भी स्थिति में निश्चित रूप से आपकी व्यक्तिगत प्रगति ही होती है – आध्यात्मिक एवं भावनात्मक रूप से प्रगति। अतः यह अति उपयोगी मार्ग है।

शांति।
स्वामी