प्रेम एक कला है और कदाचित सबसे महत्वपूर्ण कला। क्योंकि किसी भी संबंध में सामंजस्य के लिए, न केवल प्रेम एक मूलभूत तत्व है अपितु यह हमारे अस्तित्व का आधार भी है। यह एक ऐसी वस्तु है जिसकी हर कोई अभिलाषा करता है और जिसे पूरे ह्रदय से अर्पण भी करता है, फिर भी यह भ्रांतिजनक रहती है। या फिर मनुष्य को ऐसा प्रतीत होता है।

प्रेम की कुंजी, यदि है, तो क्या है?

यदि प्रेम की बात हो तब यह प्राचीन लोकोक्ति कि “दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा कि अपने लिए चाहते हो” काम नहीं करती। प्रेम का प्रचालन किसी दूसरे ही सिद्धांत से होता है। मुझे चाँग त्ज़ू के द्वारा रचित एक सुंदर ताओ कथा साझा करने दें।

प्राचीन चीन में एक शिष्य ने यह समझने के लिए कि लोगों से प्रेम कैसे किया जाए अपने गुरू से परामर्श लिया।

“गुरू जी”, उसने पूछा, “ऐसा कहा गया है इस संसार में लोगों के साथ सकुशल जीने हेतु मात्र यही ज्ञान पर्याप्त है कि आप दूसरे के साथ वही आचरण करें जैसा आचरण आप दूसरों से स्वयं के लिए चाहते हैं। आपका क्या विचार है?”
“मैं तुम्हें बताता हूँ कि कैसे लू प्रदेश के राजपुरुष ने समुद्री पक्षी का मनोरंजन किया,” गुरू ने उत्तर में कहा।

“एक दिन एक सुंदर व दुर्लभ समुद्री पक्षी को एक तूफान बहुत दूर उड़ा ले गया। वह पक्षी लू प्रदेश की राजधानी में एक भद्र राजपुरुष के शाही बागीचे मे जा पहुँचा। उस दुर्लभ अनूठे शानदार पक्षी को देखकर राजपुरुष प्रसन्न हो गया और उसने पक्षी को पकड़ लिया। उसने उस पक्षी को अपना विशिष्ट अतिथि मानकर उसे विशिष्ट अतिथियों के लिए आरक्षित एक विशाल कक्ष में रख दिया।”
“उस राजपुरुष ने कलाकार नियुक्त किये जो दिन रात पक्षी के लिए नाचते गाते थे। उसने उसे भुना हुआ उत्कृष्ट मास और विशिष्ट मदिरा, आकर्षक बीज और अन्य स्वादिष्ट खाद्य प्रस्तुत किये। किंतु वह पक्षी भयभीत और हैरान था। और उसने न कुछ खाया, न कुछ पिया। तीन दिनों के पश्चात वह पक्षी मर गया।”
“तुम्हे क्या लगता है कि वह पक्षी क्यों मर गया?”
“क्योंकि वह भूखा और थका था”, शिष्य ने वही कहा जो कि स्पष्ट था।
“ऐसा नहीं है”, गुरू ने कहा। “वह पक्षी मरा क्योंकि लू के उस राजपुरुष ने पक्षी का सत्कार उस विधि से किया जैसा वह अपने लिए चाहता था, न कि जैसा एक समुद्री पक्षी का सत्कार किया जाना चाहिए।”

यह लघुकथा प्रेम पर रचित हज़ारों पुस्तकों के समकक्ष है। संक्षेप में यही प्रेम की कला है। किसी व्यक्ति को उस विधि से चाहना जैसा कि वह व्यक्ति चाहता हो, ही वास्तव में प्रेम है। और सभी कुछ मात्र प्रेम का भ्रम है जिसे हम प्रेम का नाम देते हैं। वे जो चाहते हैं, वही उन्हें दें।

यदि आप मुझसे पूछें तो कहानी का समुद्री-पक्षी मरा नहीं था। उसे मारा गया था। उस पक्षी से उपयुक्त प्रेम न करके उस भद्र राजपुरुष ने उस पक्षी की जान ले ली। प्रेम के साथ भी ऐसा ही है। यह मरता नहीं है अपितु इसे मारा जाता है। जब दो व्यक्ति अपनी अभिलाषाओं या व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को लेकर अंधे हो जाते हैं तब इससे प्रेम की क्षति होती है। और प्रेम नष्ट होता है।

मैं यह नहीं कह रहा कि आपको अपना जीवन जीने का अधिकार नहीं है मात्र इसलिए कि आप एक संबंध से जुड़े हैं। मैं मात्र यह सुझाव दे रहा हूँ कि यदि आप किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं तो यह जानने का प्रयास करें कि उसके लिए क्या महत्वपूर्ण है या उसे क्या पसंद है।

एक युवा माँ ने अभी-अभी अपनी बेटी को सुलाया था। वह अपने पति के साथ पालने के पास खड़ी थी। उस नन्हीं सोती सुंदर पुत्री को निहारती हुई वह अपने बचपन के दिनों को याद करने लगी।

“मेरा बचपन अपेक्षाकृत अधिक कठोर था।” उसने कहा, “मैं सदा चित्रकला सीखना चाहती थी परंतु मेरे माता-पिता ने मुझे पियानो प्रशिक्षण के लिए विवश किया। मैं वास्तव में क्या चाहती थी इसकी उन्होंने कोई परवाह नहीं की। मुझे पियानो से घृणा थी।”
“हम यह सुनिश्चित करेंगे कि हमारी पुत्री को वह सब न सहना पड़े।”, पति ने पत्नी के हाथों को पकड़ते हुए कहा।
उसकी पत्नी ने कहा, “बिल्कुल सही! मैं अपनी पुत्री को कभी पियानो नहीं साीखने दूँगी। इसके स्थान पर वह चित्रकला सीखेगी।”

अधिकतम संबंधों में संघर्ष का मूल कारण यही है। हम अपने सपनों को दूसरों के माध्यम से जीना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि दूसरा व्यक्ति हमारी आकांक्षाओं को पूर्ण करे। कदाचित ऐसा चाहना स्वभाविक है। इसी कारणवश प्रत्येक व्यक्ति संबंध बनाता है कि उसकी तुष्टि पूर्ण हो सके। परंतु इस तर्क को अच्छी तरह जानते हुए भी अधिकतर व्यक्ति दूसरे की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। आप जानते हैं क्यों? टूटते या असफल संबंधों में दोनों ही लोग अधिकारपूर्वक यह जताना चाहते हैं कि वे दूसरे के लिए क्या और कितना कर रहे हैं। और वे इस विषय पर पूरा शोध लिख सकते हैं कि कैसे उनके साथी उसका प्रतिदान शुरू करने में भी असफल हैं। इस विषय में किसी को कोई भ्रान्ति नहीं है। दोनों को ही यह बात पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि उनका साथी क्या नहीं कर रहा।

फिर भी जो वस्तु वे प्रायः नहीं करते वे है यह समझना कि उनके साथी को क्या चाहिये। और यह खोज अपने साथी से पूछे जाने वाले इस सरल से प्रश्न से होती है,“ऐसा क्या है जो हमारे इस संबंध में तुम्हें प्रसन्न रखेगा?” या “मैं क्या कर सकता हूँ जिससे तुम्हें यह लगे कि तुम मेरे लिए महत्वपूर्ण हो या लगे कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ और तुम्हारी देखभाल करता हूँ।”

यह दूसरे व्यक्ति को विवश कर देगा कि आपसे अपनी अपेक्षाओं पर विचार करे और उनका संश्लेषण करे। और आप यह जान पाएंगे कि समुद्री पक्षी को क्या चाहिये या कि उसे कैसे रखा जाना पसंद है। जबकि हम सभी चाहते हैं कि हमें प्रेम मिले, वास्तव में हममें से प्रत्येक भिन्न प्रकार से प्रेम चाहता है, जैसा हमें पसंद हो। आपके वे शब्द या भाव जिनका आपके लिए कोई अर्थ नहीं है, हो सकता है आपके साथी को प्रिय हो परंतु जब तक आप पूछेंगे नहीं, आपको कभी भी पता नहीं चल पाएगा कि वे किस प्रकार प्रेम की आकांक्षा रखते हैं।

दीर्घकाल तक चलने वाले संबंधों का यह सरल सा नियम है – दूसरे व्यक्ति को उस प्रकार से प्रेम करें जैसा वे चाहते हैं न कि जैसा आप करना चाहते हैं।

प्रेम का यह अर्थ नहीं कि दूसरे व्यक्ति को इतना तराशा जाए कि वह पूर्णता की उस मूरत के समान हो जाए जो आपने अपने मन में गढ़ रखी है। उसके लिए एक बेहतर शब्द है – मूर्खता। वास्तव में प्रेम का अर्थ है असम्मति और दोषों का स्वीकार्य। यह मनुष्य की त्रुटियों व दुर्बलता का युक्तिसंगत स्वीकरण है। अंततः हमारी त्रुटियों के बीच ही प्रेम की उत्कृष्ट भावना रहती है, जैसे कि स्याह खान में हीरा पड़ा रहता है।

प्रेम को ढूंढ़िए, उसे थोड़ा तराशिए – संवारिए और वह एक अनमोल मणि के समान चमकने लगेगा। मृदुल किंतु प्रभावशाली चमक। जैसे कि शीत ऋतु की रात्रि में पूर्णिमा का चाँद चमकता है। प्रेम संवारे जाने के योग्य ही नहीं वरन उसे संवारने की आवश्यकता भी है।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - The Art of Love