रोचक बात यह है कि सभी मानवीय सम्बन्धों में, विषेश रूप से सामाजिक एवं व्यक्तिगत, सौहार्द व सद्भाव स्थापित करना मात्र एक साधारण घटक पर निर्भर है। यह भौतिक उपहारों से संबंधित नहीं है, न ही यह आवश्यकताओं की पूर्ति को ले कर है। आप इसके द्वारा किसी का जीवन बिगाड़ भी सकते हैं; अथवा तो उस व्यक्ति के सर्वश्रेष्ठ गुणों को उजागर कर सकते हैं; आप उन्हें प्रोत्साहित कर सकते हैं अथवा तो उनके आत्म-सम्मान को पूरी तरह तहस नहस कर सकते हैं। आपको किस तरह देखा-समझा जाता है, यह मुख्य रूप से इसी पर निर्भर करता है। यह इस बात से संबन्धित नहीं है कि आप देखने में कैसे हैं, अथवा आपके पास क्या क्या है। श्रेष्ठतम से लेकर सामान्यतम व्यक्ति तक – बहुधा सभी इससे बंधे होते हैं। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं? मैं आपकी वाणी की बात कर रहा हूँ। आप बोलते समय किन शब्दों का चयन करते हैं व किस शैली में उन शब्दों को बोलते हैं, इससे बहुत अंतर पड़ता है। यह निर्धारित करता है कि आप को प्रेम मिल रहा है अथवा घृणा; अपनापन अथवा तिरस्कार; आपका ध्यान रखा जा रहा है अथवा छुटकारा पाने कि चेष्टा; आपके साथ कुछ साझा किया जा रहा है अथवा आपको टाला जा रहा है।

आपकी वाणी न केवल मनुष्यों, अपितु किसी भी सजीव प्राणी में, गहन उद्भाव उदित करने की क्षमता रखती है। केवल मात्र अंतर यह है कि कभी कभी आप झूठ बोलकर अथवा वह सब कह कर जो आप वास्तव में महसूस नहीं करते, अन्य मनुष्यों को छल सकते हैं; किन्तु पशु आपकी ईमानदारी भांप लेते हैं। जब आप सच्चे शब्द उपयोग करते हैं, मीठे व सुमधुर वचन; तो आपका अन्तःकरण प्रफुल्लित हो उठता है; आप शांति अनुभव करते हैं। आपके सम्बन्धों में स्वतः सुधार आने लगता है व आप अपने चाहने वालों को अधिक से अधिक संख्या में अपने आसपास पाते हैं। मुख्यरूप से इसलिए चूंकि आपकी वाणी, आपके शब्द, उन्हें अच्छा अनुभव करवाते हैं; उन्हें उनकी महत्ता का एहसास करवाते हैं; उन्हें मानव होने का एहसास करवाते हैं; कभी कभी दिव्य होने का भी।

वैदिक ग्रन्थों में सभी भावनाओं को मुख्य रूप से दो प्रकार में बांटा गया है; सकारात्मक और नकारात्मक। जब आप किसी में सकारात्मक भाव जगाते हैं तब आपको अनुकूल प्रतिक्रिया प्राप्त होती है। ऐसी प्रतिक्रिया आप दोनों को आपस में बांधती है; आपके बीच के संबंध को गहरा करती है; तदनुरूप, प्रेम का स्वाभाविक ही प्रसार होता है।

एक अन्य दिन, एक व्यक्ति जो पचास-पचपन की आयु के होंगे, बहुत दूर से मुझसे भेंट करने पहुंचे। उन्हें आश्रम तक पहुँचने में तीन दिन का समय लगा था। किसी सुदूर प्रांत के एक साधारण ग्रामीण – उन्होंने किसी से इस स्थान के विषय में सुना था, वे बोले कि यहाँ आकर मुझसे भेंट करने की अपनी तीव्र लालसा को वे रोक न पाये। मैंने उनसे भेंट की और वह फूले नहीं समाये, और प्रेम व हर्ष के अश्रु उनके नेत्रों से ढुलक आए। यह हमारी प्रथम मुलाक़ात थी। उस दिन उन्होंने मुझे एक कहानी सुनाई जो इस प्रकार है –

आज से लगभग ३० वर्ष पूर्व, एक विख्यात बाबा, जो एक साधु थे, हमारे निकट के एक गाँव में एक सप्ताह के लिए पधारे थे। चूंकि सैकड़ों श्रद्धालुओं के वहाँ आने की संभावना थी, अतः एक मंच एवं शामियाने इत्यादि की व्यवस्था की गई थी। यज्ञ-हवन, मंत्रोच्चारण, प्रवचन इत्यादि समयानुसार होने थे। अतः यह व्यक्ति एवं इनका एक मित्र अपने ट्रैक्टर पर सवार हो निकल पड़े। दोनों ही किसान थे, अतः साईकल के अलावा उनके पास यही एक वाहन था। चूंकि वह गाँव दूर था तो उन्होंने साईकल के बदले ट्रैक्टर द्वारा जाना तय किया। वह एक अत्यंत गर्म दिन था, मानो सूर्य देवता धरती पर ही उतर आए हों। भीड़-भाड़ से बचते बचाते, कभी टूटीफूटी तो कभी ठीकठाक सड़कों पर ट्रैक्टर चलाते हुए, पूरे ९० मिनट की थकान भरी लंबी यात्रा करके वे अपने गंतव्य पर पहुंच पाये।

तब तक दोपहर का समय हो गया था। उनके होंठ सूख रहे थे व बदन गर्मी से बेहाल हो रहा था। उन्हें अत्याधिक प्यास लग रही थी। वहाँ आसपास कहीं जल दृष्टिगोचर नहीं था। तथापि, मन ही मन वे प्रसन्न थे कि उन्हें अभी संत महाराज के दर्शन प्राप्त होंगे। वे उनसे मिलने के नियत कक्ष तक पहुंचे, वहाँ एक युवा साधु उपस्थित थे जो संभवतः उन महान साधु के शिष्य थे। उनका किसी प्रकार की दिव्यता से कोई भी प्रयोजन नहीं लग रहा था; उन्हें देखकर बिलकुल भी नहीं लगा कि उनका साक्षात्कार अथवा ईश्वर से दूर का भी कोई संबंध था। तथापि, क्योंकि उस व्यक्ति ने भगवा वस्त्र धारण किए थे, अतः इन लोगों ने पूर्ण सम्मान पूर्वक उनसे पूछा कि क्या वे संत महाराज से मिल सकते हैं।

“यहाँ प्रतीक्षा करें, मैं जाकर बाबा को बताता हूँ”, उस शिष्य ने बिलकुल भाव शून्य, उदासीन व शुष्क वाणी में कहा।
“हमें थोड़ा जल कहाँ मिल सकता है?” इन सज्जन ने पूछा ताकि उन्हें आसपास जल पीने का स्थान मिल जाये।
“जल? वह मैदान के दूसरे छोर पर है। किन्तु, यदि बाबा अभी आ गए और आप यहाँ न हुए तो क्या? बाद में पी लेना; पहले दर्शन कर लो।” वह बोला, इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए कि वे अत्याधिक प्यासे व गर्मी से बेहाल थे।

वे वहाँ बैठ गए व प्रतीक्षा करने लगे। वे जीभ से होंठों को गीला करते रहे, और अब तो उनके मुख में लार भी नहीं बन रही थी। उन्हें जल की अत्याधिक आवश्यकता थी। उन्होंने स्वयं को समझाया कि वे यहाँ अपने हृदय की प्यास बुझाने आए हैं। “बाबा” पूरे आधे घंटे के उपरांत वहाँ पधारे। उन्होंने दंडवत करके बाबा का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहा। बाबा ने उनसे हर प्रकार के प्रश्न किए – जैसे वे कहाँ के रहने वाले थे, उनके पास कितनी जमीन है, वे किस ट्रैक्टर द्वारा वहाँ पहुंचे, आदि आदि।

“बाबा, ऐसा कैसे कि यहाँ कोई भी व्यक्ति उपस्थित नहीं? यहाँ तो बहुत विशाल कार्यक्रम आयोजित किया गया है न।” इन सज्जन ने अति सादगी से कहा।
“तुम्हें क्या लगता है कि सब लोग तुम्हारी तरह मूर्ख व बुद्धू हैं जो इतनी भयंकर गर्मी में कहीं जाने को निकलेंगे? क्या वो सब तुम्हारी तरह निकम्मे व फालतू हैं जो भरी दोपहर में यहाँ आएंगे?” बाबा ने कर्कश स्वर में कहा।

पूर्ण सन्नाटा छा गया। ईश्वर-प्राप्ति को लेकर सभी प्रश्न, सारी आध्यात्मिक लालसा, आत्म-साक्षात्कार की तड़प इत्यादि सब उसी क्षण उनसे कोसों दूर भाग गए। दोनों ने एक दूसरे को देखा, बाबा को प्रणाम किया और जल्दी से वहाँ से वापिस चल दिये।

उन्होंने बताया कि वे पानी पीने के लिए भी नहीं रुके; तत्क्षण ट्रैक्टर पर चढ़े और जल्द से जल्द उस स्थान से बाहर आ गए। इस दौरान उन्होंने एक दूसरे से भी बात नहीं की। उन्हें बुरा व अपमानित महसूस हुआ था। वापिस के मार्ग में, एक वृक्ष की छाँव में नींबू पानी का एक स्टॉल लगा था। उन्होंने ट्रैक्टर रोका व उतरे। यह ३0 वर्ष पहले की घटना है, उस समय महंगाई की मार इतनी अधिक न थी। वह दुकानदार १० पैसे (०.००२ सेंट) में एक ग्लास नींबू पानी व २५ पैसे में (०.००५ सेंट) बर्फ वाला ठंडा चीनी युक्त, पुदीना व काला नमक मिला नींबू पानी बेच रहा था। दोनों ने बर्फ वाले मीठे नींबू पानी के तीन तीन ग्लास एक साथ गटक लिए। उन्होंने आधा घंटा वृक्ष की छाँव में विश्राम किया फिर एक ग्लास ठंडा नींबू पानी और पिया, और अपने पैसे चुकता किए। वह दुकानदार भी मुस्कुराया। सभी संतुष्टि का अनुभव कर रहे थे। उस दुकानदार ने ट्रैक्टर स्टार्ट करने में भी उनकी मदद की चूंकि उसे पुराने समय की घास काटने वाली मशीन की भांति एक झटके से रस्सी खींच कर शुरू करना पड़ता था।

उस घटना के पश्चात कई वर्ष तक वे किसी भी “संत-महात्मा” के दर्शन हेतु नहीं गए। उस बाबा की वाणी की कटुता ने उनकी आध्यात्मिक उत्कंठा को पूर्णत: समाप्त कर दिया था।

यह प्रसंग सुनते हुए, मैं कभी मंद-मंद मुस्कुराता रहा, तो कभी हँस रहा था। ऐसा उन सज्जन के भोलेपन व घटना को सुनाने के हाव-भाव के कारण अधिक था; यह सब परिस्थितिजन्य था।

वे सज्जन बोले, “यदि बाबा ने प्रेम से भरे मात्र दो शब्द भी कहे होते तो हम अपना सम्पूर्ण जीवन उन पर न्योछावर कर देते।”

वह सज्जन यहाँ आश्रम में कुछ दिन रुके व शांत मन से विदा हुए।

उनकी कहानी एक अति गूढ़ तथ्य को उजागर करती है – किसी भी प्रकार के ज्ञान, संपत्ति, विख्याति व उपलब्धि से ऊपर होती है – प्रेम की भावना। प्रेम प्रदर्शित करने के केवल दो माध्यम होते हैं – शब्दों द्वारा एवं सद-व्यवहार द्वारा। नेतृत्व-कौशल की बात छोड़ दें तो हर व्यक्ति भाषा से बंधा होता है। आप प्रेम से परिपूर्ण भाषा व हाव-भाव उपयोग करें और हर व्यक्ति आपका अपना बन जाता है।

बौद्ध ग्रन्थों में सकारात्मक व नकारात्मक भावनाओं का आठ विभिन्न रूपों में विस्तार किया गया है। प्रत्येक श्रेणी के चार चार प्रकार। और, उन आठ में से चार पूर्ण रूप से आपकी वाणी, उच्चारण व शब्दों के चयन पर निर्भर करते हैं। मेरा लक्ष्य इसी लेख में इनकी व्याख्या करने का था, किन्तु अब मैं आगामी लेख में ऐसा करूंगा।

यदि आप सुमधुर ढंग से बात कर सकते हैं – अपनी आवाज को ऊंचा किए बिना – तो आप अत्यंत उग्र विवाद को भी सुलझा सकते हैं; आप अविलंब अपना दृष्टिकोण दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। कोई भी विवाद भले कितना भी गंभीर, महत्वपूर्ण, उग्र, अथवा उलझा हुआ क्यों न हो, उस क्षण वाणी में मधुरता बनाए रखने के लिए मात्र सतर्कता की आवश्यकता होती है; स्वयं को हल्का सा स्मरण करवाना कि आप किस प्रकार का व्यवहार करना चाहते हैं। यदि आपका निश्चय वाणी पर संयम व मधुर शब्द बोलने का है तो आप दिव्य-शांति का स्वयं भी अनुभव करेंगे व वही शांति अपने चारों और भी फैलाएँगे। भले ही आपके पास बांटने के लिए भौतिक सम्पदा न हो, किन्तु आप शब्दों का चयन तो कर ही सकते हैं। कृपया सावधानी पूर्वक शब्दों का चयन करें। जीवन के बृहत्तम सुख छोटी छोटी बातों में ही छुपे होते हैं; उन अमूल्य सीधे-सादे सद्भावों में; मधुर शब्दों में। अपनी बात को जितना हो सके उतना मधुर ढंग से प्रस्तुत करें।

जाएँ, व किसी को बताएं कि उनका आपके जीवन में कितना अधिक महत्व है।

शांति।
स्वामी