बहुधा मैं ऐसे लोगों से भेंट करता हूँ जो मुझे बताते हैं कि उनके व उनके साथी के मध्य अच्छा सामंजस्य नहीं है। “हमारे विचार भिन्न हैं, हमारी आदतें, हमारे लक्ष्य भिन्न हैं। हमारे बीच अनुरूपता नहीं है”, वे कहते हैं। अधिकांशतः, पुरुष जहां अधिक स्वतन्त्रता ढूँढता है व निजी समय चाहता है, वहीं स्त्री अधिक सुरक्षा व उत्कृष्ट समय बिताने की अपेक्षा रखती है (कभी कभी, हालांकि बहुत कम, इसका उल्टा भी सत्य होता है)।

जब दो व्यक्ति सामंजस्य बना कर नहीं रहते, तब इसका यह तात्पर्य नहीं कि वे ऐसे सामंजस्यपूर्वक रह ही नहीं सकते। हाँ, इसके लिए अति युक्तियुक्त कार्य करने की आवश्यकता हो सकती है (एवं धैर्य भी), किन्तु यदि दोनों दृढ़ता पूर्वक ठान लें तो यह संभव हो सकता है। वैसे, प्रेम में सामंजस्य आज के युग की शैली नहीं। यह दुर्लभ है। यदि दो लोग एक समान हुए तो यह संभावना अधिक बनती है कि वे एक दूसरे की ओर आकर्षित ही न हों, चूंकि प्रकृति का नियम है कि विपरीत ही आकर्षित होते हैं। कभी कभी हम कुछ विशेष लोगों के साथ, दूसरों की तुलना में, अधिक घुलमिल जाते हैं, किन्तु सत्य यह है कि एक सच्चे संबंध में, प्रेम समय के साथ ही बढ़ता है। एक निष्कपट संबंध में, मत-भेद व सौहार्द स्वतः पनपते हैं। वे दोनों साथ साथ चलते हैं।

मैं इस विषय पर बात नहीं कर रहा कि क्या पुरुष जानते हैं कि सफ़ेद व रंगीन वस्त्रों को अलग अलग धोया जाता है, अथवा स्त्रियाँ यह जानती हैं कि क्रिकेट का मैच देखना पुरुषों के लिए एक धार्मिक अनुष्ठान जैसा है! हालांकि इस तरह के प्रसंग, सम्बन्धों की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं; किन्तु मैं यहाँ एक मूलभूत तथ्य को संबोधित कर रहा हूँ – प्रेम के प्रति हमारी समझ एवं प्रेम से अपेक्षाएँ। प्रायः जब हम प्रेम के विषय में सोचते हैं, हमारी अपेक्षा यह होती है कि कहीं किसी प्रकार की बाधाएँ नहीं आएंगी, हम पुनः कभी भी पीड़ा अनुभव नहीं करेंगे, जीवन हमारे द्वारा देखे गए स्वप्नानुसार रूप लेगा। किन्तु सच यह है कि प्रेम इसका विपरीत है।

सी॰एस॰लुईस के शब्दों में, “प्रेम करने का अर्थ ही है कि आप संवेदनशील हैं। किसी भी वस्तु-व्यक्ति-स्थान इत्यादि से प्रेम करें तो आपका दिल एक तोड़-मोड़ से गुजरेगा और संभवतः टूटेगा भी। यदि आप इसे सही रखने का दृढ़ मार्ग चाहते है तो आप अपना दिल किसी को भी न दें, एक जानवर को भी नहीं। इसे अपने शौक की विभिन्न गति-विधियों व छोटी छोटी खुशियों से भली भांति लपेट कर रखें, व हर प्रकार की उलझन से बचें। इसे अपने स्वार्थ के ताबूत में सुरक्षापूर्वक ताला लगा कर रखें। किन्तु, उस सुरक्षित, अँधियारे, गतिहीन, वायुरहित ताबूत में यह रूपांतरित हो जाएगा। यह टूटेगा नहीं; वरन पूर्णत: अभंजनीय, अभेद्य, अप्रतिदेय (जो कभी न सुधर सके) बन जाएगा। प्रेम करने का अर्थ है संवेदनशील होना।”

प्रेम में पूर्ण रूप से असंवेदनशील हो पाना असंभव है। और, ये संवेदनशीलता ही है जो अधिकांश सम्बन्धों को चुनौतीपूर्ण (और आनंदप्रद) बनाती है। चूंकि जब आप भावुक होते हैं उस क्षण आप सच में आप नहीं होते। आप ऐसा बहुत कुछ कह व कर जाते हैं जो आप नहीं चाह रहे होते। आप कई अनुचित कदम भी उठा लेते हैं। अब क्या किया जाये? यह तो निश्चित है कि आप स्वयं को प्रेम से पूर्णत: पृथक तो रख नहीं सकते, अन्यथा जीवन असह्य हो जाएगा। और, आप स्वयं को पूर्णत: भावुकता में भी नहीं छोड़ सकते, इससे तो आप बार बार पीड़ित होते रहेंगे। इस स्थिति में एक मध्यमार्ग है; आशा अभी शेष है। आइये मैं आपको प्रेम का स्वर्णिम नियम बताता हूँ –

जब कभी भी कोई आपका दिल दुखाए तो कृपया आप प्रतिक्रिया में उसे पीड़ा पहुंचाने का कदापि विचार न करें। आँधी के बाद के गुबार को जरा छट जाने दें, और, तब कुछ समय पश्चात अहिंसात्मक रूप से करुणापूर्वक अपने को स्पष्ट करें। मैं इसे ही प्रेम का नाम देता हूँ। चूंकि, यदि आपका प्रेम विशुद्ध है, तो वह आँधी पार हो जाएगी।

जब कोई हमारा दिल दुखाता है तो क्यों न हम भी बदले में वैसा ही करें? क्योंकि प्रेम केवल सुखकर अनुभूति मात्र नहीं होता; वह तो आप हर उस व्यक्ति के साथ अनुभव करते हैं जो आपका ध्यान रखता है। किसी को अतिभावुक होकर चाहना भी प्रेम नहीं है। हर कोई एक प्यारा सा साथी चाहता है। यह दर्शाते रहना कि आप दूसरे व्यक्ति से प्रेम करते हैं, वास्तव में प्रेम नहीं। वह तो एक तोता भी घंटों तक बोल सकता है। नि:संदेह यह भावनाएं, इच्छाएं, व शब्द भी प्रेम का ही हिस्सा हैं। किन्तु यह प्रेम के लक्षण अधिक लगते हैं। क्योंकि, प्रेम तो स्वयं में वह परम भाव है जो इन सबसे कहीं ऊंचा है। किसी के प्रेम की सही गहराई का अनुमान लगाना हो तो उनके व्यवहार को देखें। प्रेम व्यवहार है। यह हमारा रवैया है। यदि हमारे व्यवहार में निष्कपटता, समझदारी, समानुभूति एवं ध्यान रखना सम्मिलित नहीं तो वह प्रेम नहीं। संभवतः, बहुत कहें तो इसे दिखावटी प्रेम कह सकते हैं।

आसक्ति में, बहुधा आप उसी तथ्य को मूल्य देते हैं जिसकी ‘आपको’ परवाह होती है, प्रेम में आप को उस सब की परवाह होती है जो दूसरे व्यक्ति को प्रिय हो। आपका यह सोचना कि आप किसी से प्रेम करते हैं व वास्तव में आपका किसी से प्रेम करना – इनके बीच यही मूलभूत अंतर होता है। हालांकि ऐसा प्रेम न तो आसान है, न ही सुलभ। टनों की टनों मिट्टी को शुद्ध करने के उपरांत मात्र कुछ हीरे प्राप्त हो पाते हैं। खदानों में आप महीनों तक मिट्टी खोदते हैं, कई कई सप्ताह तक उसे महीन करते हैं, दिनों तक उसे छानते व जल से धोते हैं, तब जा कर आपके हाथ एक जवाहरात आता है। सम्बन्धों की खदान में प्रेम ऐसा ही एक हीरा है। उस हीरे को प्राप्त करने से पूर्व कई प्रकार की चुनौतियों से गुजरना होता है।

देखा जाये तो एक ऐसा साथी होना जो आपके विरोध में खड़ा हो, आपको चुनौती दे, यह एक सकारात्मक तथ्य है। वे आपको वास्तविकता के धरातल से जोड़े रखते हैं। आप आपसी मत भेद स्वीकारना, व उन्हें सुलझाना सीखते हैं। प्रेम किसी प्रकार की प्रतियोगिता अथवा दौड़ नहीं। यह कोई युद्ध नहीं जहां एक पक्ष सदैव दूसरे से अधिक बलवान अथवा उत्तम होता है। क्या आपने ध्यान दिया है कि विवाह की अंगूठी में सदा एक ही हीरा जड़ित होता है? नन्हें नन्हें माणिक और धातु उसके सौंदर्य को और अधिक निखार देते हैं। अपने सम्बन्धों में कभी आप हीरे का स्थान लें तो कभी अपने साथी को लेने दें। कभी आप सहायक की भूमिका में आ जाएँ, तो कभी सेनापति की। जीवन पर्यंत चलने वाले सम्बन्धों का यही आधार है। यदि आप सदा स्वयं की ही सुनेंगे व सुनाएँगे तो बहुत जल्द आपकी सुनने वाला कोई नहीं बचेगा।

मुल्ला नसरुद्दीन का अपनी पत्नी के साथ विवाद हो गया। पत्नी के क्रोध के भय से वह दूसरे कक्ष की ओर दौड़ा और स्वयं को भीतर बंद कर लिया।
“दरवाजा खोलो!”, पत्नी चिल्लाई।
“नहीं!” भयभीत होकर मुल्ला बोला, और उसने दरवाजे की सांकल को और अधिक मजबूती से पकड़ लिया।
“इसे खोलो!” दरवाजे पर बार बार दस्तक देते हुए वह चिल्लाई। “जैसा मैं कहूँ वैसा ही करो, वरना तुम नहीं बचोगे।”
“नहीं! मैं वैसा नहीं करूंगा जो तुम कहोगी”, वह चिल्लाया। “मैं तुम्हें दिखा दूँगा कि घर का मालिक कौन है!”

प्रेम में कोई एक व्यक्ति मालिक नहीं होता, चूंकि आपके, उसके एवं प्रेम के बीच केवल प्रेम ही मालिक होता है। जब दो लोग प्रेम में होते हैं तो वे “प्रेम” के पीछे चलते हैं। प्रेम के प्रति उस समर्पण में, उस संवेदनशीलता में ही तो सबसे बड़ी सुरक्षा छिपी होती है। मस्तिष्क इस तथ्य को नकार भी सकता है, किन्तु हृदय यह जानता है। यही कारण है कि आप दुखी तो होते हैं, तथापि आप प्रेम करना नहीं छोड़ते। आप पुनः दर्द झेलते हैं, पर फिर से प्रेम करते हैं। यही प्रेम है, यही जीवन है।

प्रेम अपने उच्चतम विशुद्ध रूप में तभी अनुभव किया जा सकता है जब आप दर्द पाकर भी बदले में दर्द नहीं देते, जब आप मन-वचन-कर्म से पूर्णत: सतर्क होते हैं। ऐसी स्थिति में, आप नकारात्मकता एवं तुच्छ भावों से ऊपर उठ जाते हैं। जो व्यक्ति अपने स्वयं की इच्छाओं में ही फंसा रहता है, अथवा अपने मिथ्या अहंकार में डूबा रहता है, वह कदाचित प्रेम में पड़ ही नहीं सकता।

एक ही तालाब में जहां एक ओर सुंदर कमल अपनी सुरभि से मधु मक्खियों व तितलियों को आकर्षित करते हैं, वहीं एक मैंढ़क ऐसे अद्वितीय सौंदर्य व ऐश्वर्य से बेखबर, एक कोने में बैठा निरंतर टर्र टर्र की टेर लगाए रखता है। आप कमल, मधु मक्खी, अथवा तो मैंढ़क, कुछ भी हो सकते है। अपना चुनाव सतर्कता व प्रेमपूर्वक करें। प्रेम विहीन जीवन का कोई अर्थ नहीं।

शांति।
स्वामी