आपके पढ़ने हेतु कुछ और प्रश्न व उनके उत्तर –

हरे कृष्ण प्रभु जी
आपका आज का लेख अच्छा लगा…. बस पूछना चाह रहा था कि जब आप अपनी तरह जीना चाहते हैं तो आसपास के लोग आपकी अच्छी व बुरी आदतों (स्वभाव) का फ़ायदा उठाना शुरू कर देते हैं। कार्यालय में भी, हालाँकि आप शांतिपूर्वक अपने काम में लगे हैं, तब भी लोग राजनीति शुरू कर देते हैं – जैसे वरिष्ठ अधिकारी को आपके बारे में वह सब बताना जो आपको पसंद नहीं। कृपया मुझे बताएँ इस सब से कैसे निपटा जाए व कैसे मन की शांति को बनाए रखा जाए?

यदि आप इस विषय पर चिंता करना छोड़ दें कि आपके सहयोगी वरिष्ठ अधिकारी से क्या कहते हैं, तो आप के लिए इस बात का प्रयोजन ही समाप्त हो जाएगा। आप उन सबको नहीं बदल सकते, किंतु आप स्वयं को अवश्य बदल सकते हैं। यदि आप स्वयं प्रकाश बन जाएँ, तो अंधकार आपके आसपास रह ही नहीं सकता। इससे निपटने का सर्वोत्तम उपाय है कि आप कार्यालय में अपना कार्य श्रेष्ठतम रूप से करें। आपके वरिष्ठ अधिकारी एक माध्यम हैं, वे पोषणकर्ता नहीं हैं। प्रकृति स्वयं आपको वह सब प्रदान कर रही है जिसके आप योग्य अधिकारी हैं। यदि आप इस सत्य को सदा अपने चित्त में धारण किए हुए अपना कार्य सुचारू रूप से करते रहें तो आप अवश्य ही शांति अनुभव करने लगेंगे।

हो सकता है अभी भी आपके वरिष्ठ अधिकारी आपके कार्य की सराहना न करें, किंतु वे आपके मन की शांति आपसे नहीं छीन सकते। आपके आचरण की सत्यता (एक निष्ठावान कर्मी) सदा आपको योग्य पात्र की श्रेणी में रखेगी व आपका ध्यान विधाता द्वारा अवश्य ही रखा जाएगा। यदि अन्य लोग कुछ योजनाएँ बनाते हैं व आप भी उसमें शामिल हो जाते हैं तो ऐसा करके आपने स्वयं ही उनके विनियोजन को स्वीकृति प्रदान कर दी है। संयोगवश आगामी प्रश्न ऐसे विनियोजन से संबंधित ही है, व प्रश्न दक्षता पूर्वक पूछा गया है। आपके सहकर्मी आपके साथ कोई योजना बना सकते हैं, अथवा तो आपके विरुद्ध; किंतु यदि आप न चाहें तो यह सब आप को विचलित नहीं कर सकता। आगामी ४० दिन के लिए आप प्रतिज्ञा करें कि आप अपने वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष अन्य किसी सहकर्मी की कोई भी कमी (बुराई) उजागर नहीं करेंगे और देखें कि कैसे प्रकृति स्वयं इसके प्रतिदान स्वरूप आपके लिए क्या भेजती है? कृपया यह करें और स्वयं इस अनुभव के साक्षी बनें।

प्रभु! मैं आपसे कुछ दिन पूर्व मिला था। आपके स्वयं के अनुभव सुन कर मैं आश्चर्यचकित हो गया। किंतु मैं सोचता हूँ कि आप जैसे व्यक्ति को, जिसका एक मात्र लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है, इस संसार में लिप्त होने की क्या आवश्यकता है? क्या यह आपके लिए जगत के साथ बंधना नहीं है, सोने की जंजीर से, जैसा लोहे की जंजीर से होता है? क्यों नहीं आप भी रमण महाऋषि, मीरा की भाँति अपनी ही राह पर चलते और संसार स्वयं उसे समझेगा व उस पर चलेगा। हमारी दुनिया में अनुभव से अधिक उपयोगी कोई और वस्तु नहीं, और वह आपके पास है ही, और इससे कहीं अधिक।

रोचक! आपकी टिप्पणी से मुझे मंद मंद हँसी आ रही है। इस टिप्पणी का उत्तर आपको अपने स्वयं के सत्य की खोज में सहायक नहीं होगा, तथापि, आपने समय निकाल कर इतनी दूर मुंबई से यहाँ तक आकर मुझसे मिलने का कष्ट उठाया और यह प्रश्न पूछने में भी अपना समयदान दिया, अतः मैं इसका उत्तर दे रहा हूँ।

अपना उत्तर देने से पूर्व, कृपया मुझे आपकी टिप्पणी को दो भागों में विभाजित करने की सहमति प्रदान करें। जैसा मुझे समझ आ रहा है – आपकी टिप्पणी में यह अनुमान लगाया गया है कि –

  • मुझे अभी भी ईश्वर की खोज है
  • मेरा कोई अप्राप्त लक्ष्य है
  • मैं संसार में उलझा हुआ हूँ

प्रश्न

  • या मेरे सांसारिक कार्य मुझे बंधन में डाले हुए हैं?
  • मैं अपना स्वयं का मार्ग क्यों नहीं चुनता?

अतः, यहाँ –
आपके अनुमान पर उत्तर – कृपया मेरा सत्य लेख पढ़ें। उसमें एक भाग यह है – “….अब यह कोई भ्रम नहीं रहा………” प्रमुखतः इसे पढ़े जिससे आपके सारे अनुमान सुलझ जाएँगे।

आपके प्रश्नों के उत्तर – कोई भी कर्म बंधन तभी बनता है जब आप उसके प्रतिफल में कोई इच्छा रखते हों। एक बँधा हुआ कुकुर तभी अपने को रस्सी से बँधा समझता है यदि उसे स्वतंत्र होने की इच्छा हो। यदि उसे स्वतंत्रता नहीं चाहिए, तब कोई बंधन है ही नहीं। बंधन में बँधे होने का भाव प्रतिबंधित मन में आता है। संसार के साथ मेरा व्यवहार तब ही बंधन का कारण बन पाएगा यदि प्रतिदान में मुझे संसार से कोई अपेक्षा है। संसार-व्यवहार में कोई कठिनाई नहीं। यदि किसी अपेक्षा सहित व्यवहार हो तब वह संकीर्णता हो जाती है। इसी प्रकार, आपके जीवन की परिस्थितियाँ आपको बंधन तभी प्रतीत होंगी यदि आपका अपने ‘स्व’, अपनी आंतरिक स्वाधीनता से नाता टूट गया है। कृपया कामना तरुवर लेख पढ़ें, जहाँ इस पर विस्तृत चर्चा है कि एक व्यक्ति को क्या क्या बंधन हो सकते हैं।

अपना स्वयं का मार्ग चुनने के सन्दर्भ में – बंधुवर! यही मेरा मार्ग है। यदि मैं रमण महाऋषि व मीरा के बताए मार्ग पर जाता हूँ तब वह मेरा स्वयं का मार्ग नहीं होगा। वह “उनका” मार्ग होगा। वस्तुतः, मैं सदा यही कहता हूँ – “अपना स्वयं का मार्ग खोजें”। मैं चाहूँगा कि आप भगवदगीता का अध्याय ३ पढ़ें। निम्न श्लोकों का अवलोकन अवश्य करें – एवं प्रवर्तित्म् चक्रम ना नुवर्ते… से उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्या… इसके साथ साथ अध्याय ६ के आरंभ के श्लोक व अध्याय १८ भी अवश्य पढ़ें। आपके लिए यह सहायक होगा।

मेरी आपसे विनती है कि आप महृषि रमण व मीरा के सन्दर्भ में और जानकारी प्राप्त करें ताकि आप समझ पाएँ कि उन लोगों का संसार-व्यवहार कैसा था। आपको उनका दर्शाया हुआ मार्ग अवश्य अपनाना चाहिए, यदि वह आपको स्वयं के सत्य की खोज में सहायक होता हो।

आपने अपनी टिप्पणी में महानतम संतों के नाम लिए हैं। मैं तो एक साधारण साधु हूँ जो एक सुदूर स्थान पर रहता है, व अपने को किसी संघ, संप्रदाय से नहीं जोड़ता। रमण महृषि व मीरा दोनों को मेरा कोटि कोटि नमन है। सैकड़ों वर्षों से असंख्य लोगों ने महान संतों के जीवन चरित्र व व्यवहार से प्रेरणा पाई है, जिनमें चैतन्य महाप्रभु, गोस्वामी तुलसीदास, संत तुकाराम, गुरु नानक देव, स्वामी राम कृष्ण परमहंस आदि अन्य बहुत से नाम आते हैं। मैं तो उन असंख्य लोगों में से एक हूँ। मेरे हृदय में उन महापुरुषों के लिए सर्वोच्च स्थान है व हम उनके आध्यात्मिक योगदान के लिए सदा सर्वदा ऋणी रहेंगे।

हरे कृष्ण
स्वामी