अति सम्माननीय बाबा बाल भारती के पास एक अति सुंदर, बलवान, अरबी घोड़ा था। उस स्टेलियन को निगाह भर देखने मात्र से उनका मन वैसे ही भावों से ओतप्रोत हो जाता जैसा किसी किसान का अपनी लहलहाती फसल को देख कर होता है। बाबा के सही-सटीक भविष्यवाणी करने के गुण से प्रभावित हो मुगल साम्राज्य के अंतिम सम्राट ने भेंट स्वरूप वह अश्व बाबा को दिया था। बाबा, जो एक फकीर थे, एक गाँव में मंदिर के प्रांगण में रहते थे जहां उन्होंने अपनी कुटिया व घोड़े के लिए अस्तबल बना रखा था। उस घोड़े को वे सुल्तान कह कर पुकारते थे।

“मैंने आपके घोड़े के विषय में बहुत सुना है,” खड़गसिंह बोला, “मैं भी उसे देखना चाहूँगा।”
खड़गसिंह बाबा का एक श्रद्धालु शिष्य था, किन्तु उसका परिचय मात्र यहीं तक न था; वह एक अति क्रूर डाकू था जो भोले भाले राहगीरों को लूट लिया करता। घोड़े के प्रति सदा उत्साह से भरे रहने वाले बाबा उसे अस्तबल तक ले गए।

“अद्भुत!” घोड़े की श्याम वर्ण की चमचमाती त्वचा सहलाते हुए खड़गसिंह ने कहा। “इतनी बढ़िया नस्ल का घोड़ा मैंने सच में पहली बार देखा है।”
बाबा की छाती गर्व से फूल गई, उन्होंने सुल्तान के गले के बालों पर प्यार से हाथ घुमाया और बोले, “सुल्तान के आने से मेरे जीवन को एक नया अर्थ मिल गया है। अब मेरा हर दिन सुंदर होता है!”

खड़गसिंह के कहने पर बाबा ने उसे सुल्तान की सवारी की अनुमति दे दी। वह मतवाला घोड़ा हवा से भी तेज़ गति से दौड़ पड़ा। “वाह! क्या बल, संतुलन और गति!” ईर्ष्या के तीव्र भाव ने खड़गसिंह के हृदय को लालच व लिप्सा से भर दिया। एक संत के लिए भला घोड़ा किस काम का; सुल्तान को उसकी संपत्ति होना चाहिए, उसका साथी होना चाहिए – उसने सोचा। घोड़े को वापिस रस्सी से बांध कर वे कुटिया में चले गए। वहाँ खड़गसिंह ने सुल्तान को खरीदने का प्रस्ताव रखा।

“कभी नहीं, लाखों वर्षों के बाद भी नहीं!” बाबा ने प्रतिरोध किया।
कुछ देर तक मोल भाव के पश्चात जब खड़ग को एहसास हुआ की बाबा किसी भी कीमत पर सुल्तान से जुदा नहीं होंगे, तो उसने चेतावनी दी, “एक दिन मैं यह घोड़ा तुमसे छीन कर ले जाऊंगा।”
“नहीं खड़ग, मेरी विनती है की तुम ऐसा कभी न करना। मैं सुल्तान के बिना जीवित नहीं रह सकता।”
“भले जो हो, मैं तो इसे सही या गलत, किसी भी तरह ले ही जाऊंगा,” अपने कंधे उचकाते हुए खड़ग बोला। इतना कहकर वह वहाँ से चला गया। और, उसी के साथ बाबा के प्रति सारा आदरभाव व शिष्यता के सभी सिद्धान्त भी उतार कर फेंक गया।

उस रात बाबा सो नहीं पाये। उन्होंने अपना बिस्तर अस्तबल में ही लगा लिया व दिन-रात सुल्तान की निगरानी में लग गए। कुछ सप्ताह बीत गए और उस बीच किसी ने भी घोड़े को चुराने का कोई प्रयत्न नहीं किया। पहले की अपेक्षा कुछ निश्चिंत से, एक संध्या समय बाबा सुल्तान पर सवार हुए व गाँव से बाहर की वादियों की ओर बढ़ चले।

“कोई मेरी सहायता करो, मैं मर रहा हूँ!” एक दुर्बल, शिथिल सी आवाज ने उन्हें पुकारा।
उन्होंने उधर निगाह डाली किन्तु उस व्यक्ति को पहचान नहीं पाये, चूंकि अंधेरा ढल चुका था। वे कुछ समीप गए और देखा कि समीप ही एक व्यक्ति, धूल-मिट्टी से सना, धरती पर पड़ा था।
“तुम्हें क्या हुआ?” घोड़े पर सवार बाबा ने पूछा।
“कृपया मुझे समीप के चिकित्सालय तक पहुंचा दो” उसने विनती की। “खड़गसिंह और उसके साथियों ने मुझे लूट लिया है।”
“किन्तु, मैं तुम्हें जानता तक नहीं।”
“मैं प्रख्यात चिकित्सक डा॰ दुर्गादत्त जी का भ्राता हूँ,” अपना पेट दबाये हुए, अति क्षीण स्वर में उसने कहा। “मैं आपसे भीख मांगता हूँ की कृपा कर के इस जरूरतमन्द की सहायता करें।”

एक संत के नाते अथवा तो मानवता के दृष्टिकोण से, भले कुछ भी कहें, बाबा को लगा कि किसी मुसीबत के मारे, मजबूर की सहायता करने का उनका दायित्व बनता है। वे घोड़े से उतरे और बहुत परिश्रम व कठिनाई से उन्होंने उस व्यक्ति को घोड़े के ऊपर बैठने में सहायता की। किन्तु इससे पूर्व कि बाबा स्वयं भी चढ़ पाते, उस घायल दिखने वाले व्यक्ति ने घोड़े की कमान संभाली और बाबा के सीने पर पैर से एक जोरदार वार किया जिससे बाबा जमीन पर लुड़कते हुए दूर जा गिरे।

“मैंने तुम्हें कहा था ना कि एक दिन यह घोड़ा मेरा होगा,” उस सवार ने जीत के स्वर में कहा।
उसने एड़ी मार कर घोड़े को दौड़ा दिया किन्तु वह मात्र कुछ गज़ दूर ही पहुंचा था जब बाबा ने दहाड़ती हुई आवाज में उसे पुकारा, “रुक जाओ खड़ग!” अपने गुरु की आवाज को खड़गसिंह अनसुना न कर पाया, और, अब उसे किसी प्रकार का भय भी न था चूंकि वह शस्त्रों से लैस, घोड़े पर सवार था। वह थम गया।
“यह बात किसी को बताना मत खड़ग,” अपने कपड़े झाड़ते हुए बाबा उठे और उसकी ओर आते हुए धीमे से बोले। “तुम सुल्तान को रख सकते हो, बस आज की घटना के बारे में किसी को बताना मत।”
“क्यों?” खड़गसिंह ने व्यंग्य पूर्वक कहा और घोड़े को सहलाते हुए बोला, “क्या तुम डर रहे हो कि लोग ये कहेंगे कि जब बाबा अपने घोड़े की रक्षा भी नहीं कर पाये तो हमें क्या आशीर्वाद देंगे!”
“देखो खड़ग, यदि लोगों को पता चल गया तो फिर कभी कोई किसी मजबूर, अंजान व्यक्ति पर भरोसा नहीं करेगा और लोग एक दूसरे की सहायता करना छोड़ देंगे”। ऐसा कह कर बाबा बाल भारती मुड़े और सुल्तान से दूर चले गए, मानो उन्होंने कभी उससे प्रेम किया ही नहीं था – एक ऐसा विरक्तिपूर्ण भाव जो किसी संत से ही अपेक्षित हो सकता है।

अभिमान से चूर खड़गसिंह, वहाँ से दूर निकल गया और बाबा को यह सोच विश्रांति महसूस हुई कि अब उन्हें किसी बात की चिंता नहीं करनी होगी चूंकि खोने को अब उनके पास कुछ भी नहीं था। उधर, हर बीतते दिन के साथ, खड़ग की बेचैनी बढ़ने लगी। मैं अपने ही गुरु के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर पाया? मेरे अंतर के शैतान ने मुझे कितने निम्न स्तर पर पहुंचा दिया, और वहाँ बाबा ने मुझ पर क्रोधित होने के स्थान पर अति करुणा पूर्वक, संसार के भले का विचार रखा! वे कितने शांत भाव से उस घोड़े से दूर चल दिये जिसके विषय में उनका कहना था कि वे उसके बिना जीवित नहीं रह सकते… इसी प्रकार के अन्यान्य विचारों ने उसे घेर लिया। एक रात, अर्धरात्रि के घने सन्नाटे में वह चुपचाप मंदिर के प्रांगण में आया, घोड़े को खूँटे से बांधा और बिना आहट वहाँ से चला आया।

प्रातःकाल जब बाबा अपनी कुटिया से बाहर आए तो सुल्तान ने अपने मालिक के पैरों की आहट पहचान ली व अति उत्साह से भर खुशी से हिनहिनाने लगा। अविश्वास से भरे बाबा, नंगे पाँव अस्तबल की ओर दौड़े। वहाँ अपनी आँख के तारे को सामने देख वे अभिभूत हो सुल्तान की ओर लपके, उसकी गर्दन पर स्नेह से हाथ फेरते हुए उसे मुख से चूम लिया और उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधार बह निकली। “ओह सुल्तान!” उन्होंने उसे पुचकारते हुए कहा, “अब लोग अन्य मजबूर व्यक्तियों की सहायता करने से डरेंगे नहीं।”

यह कहानी (हार की जीत) हिन्दी के प्रतिभासम्पन्न लेखक सुदर्शन (१८९५-१९६७) द्वारा लिखित है, मैंने तो केवल इसे यहाँ लघुरूप देते हुए दोहराने की हिम्मत भर की है। जब मैंने इसे प्रथम अवसर पर पढ़ा तो मैं स्वयं अत्यंत प्रभावित हुआ और इसने मुझे “बटरफ्लाइ इफैक्ट” की स्मृति करवा दी।

जैसे एक विशाल रेत के टीले में से हम रेत का एक नन्हा सा कण भी उस टीले को कुछ न कुछ हिलाये बिना नहीं निकाल सकते, उसी प्रकार हमारा प्रत्येक कृत्य, भले ही सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, इस विशाल ब्रह्मांड की चेतना में कोई न कोई लहर अवश्य लाता है। वह दूसरों को प्रभावित करता ही है। नन्हें नन्हें कृत्यों व कार्यों का भी एक बड़ा प्रभाव बन सकता है। संभव है कि हमारे कार्यों के परिणाम तत्काल रूप से दृश्यमान न हों (वास्तव में बहुदा वह नहीं ही दिखता), किन्तु वे एकत्रित होते रहते हैं, व अंततः दृश्यमान भी होते ही हैं। यह सिद्धान्त वैदिक दृष्टि से भी पूर्णत: सटीक बैठता है जिसमें कहा गया है कि हमारे प्रत्येक, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम कर्म का भी सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर प्रभाव होता है। चूंकि हम स्वयं ही ब्रह्मांड का स्वरूप हैं, यह ब्रह्मांड व इसमें विद्यमान प्रत्येक वस्तु उसी से निर्मित हुई है जो इसमें समाविष्ट है, जिसमें स्वाभाविक ही मैं और आप सभी सम्मिलित हैं।

एक तितली के द्वारा कई सप्ताह पूर्व की गई पंखों की फड़फड़ाहट वास्तव में हजारों मील की दूरी पर बनते किसी हवा के तूफान के निर्माण व उसके मार्ग को प्रभावित कर सकती है। जब १९६१ में एडवर्ड लौरेंज (Edward Lorenz) द्वारा मौसम के पूर्वानुमान का मानक बनाते समय पंख हिलाती एक तितली द्वारा वायु के अनिकसन (displacement) की अतिसूक्ष्म मात्रा को भी माप में लिया गया तो एकदम भिन्न परिणाम आए। अन्य शब्दों में कहें तो “बटरफ्लाइ इफैक्ट” कर्म के सिद्धान्त की और सूक्ष्म व अधिक परिष्कृत व्याख्या है। कि, हम जो कुछ भी करते हैं वह न केवल हम पर प्रभाव डालता है, अपितु वह प्रत्येक दूसरे व्यक्ति पर भी प्रभाव डालता है।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम् ॥

सभी पृथक सत्ताएं सार्वभौमिक ऊर्जा से जुड़े हैं। सात्विक भाव (ज्ञान) के द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियों में विभागरहित एक अविनाशी भाव (सत्ता) को देखता है।
(श्रीमद भगवदगीता १८-२०)

यह मानना कि हमारे कर्म केवल हमें प्रभावित करते हैं अथवा यह कि मेरी प्रसन्नता पूर्णत: मेरे जीवन से ही संबन्धित है, यह न केवल अज्ञान का चिह्न है अपितु चिरस्थाई दु:ख एवं कष्ट को निमंत्रण है। हमें ऐसा भान भले हो कि संभवतः हमारी स्वतन्त्रता किसी दूसरे पर निर्भर नहीं, अथवा किसी सुदूर स्थान पर हो रही किसी घटना से हम अप्रभावित हैं, किन्तु, कहीं न कहीं हम में से प्रत्येक प्राणी सार्वभौमिक प्रसन्नता एवं विश्व शांति का रक्षक एवं भक्षक दोनों है। भले ही हमें यह एहसास हो अथवा न हो, किन्तु हम सब निरन्तर दूसरों की सहायतार्थ कुछ न कुछ कर रहे हैं अथवा तो उनके कष्ट का हेतु बन रहे हैं। (कभी कभी ये दोनों कार्य समांतर रूप से होते रहते हैं।)

मुल्ला नसरुदीन की बेगम का छ: वर्ष का एक छोटा भाई था जो अपने माता पिता के कठोर अनुशासन से तंग आ चुका था।
उसने मुल्ला से पूछा, “क्या यह सच है कि माता पिता द्वारा किए गए कर्म संतान पर भी प्रभाव डालते हैं?”
मुल्ला ने गहरी आह भरते हुए जवाब दिया, “केवल इतना ही नहीं, वे उनके दामाद को भी प्रभावित करते हैं। मुझे ही देखो न जो तुम्हारी बहन के साथ रह रहा है।”

अपने छोटे प्रतीत होने वाले अस्थाई/क्षणभंगुर जीवन में हम शाश्वतत्त्व के संकेत लिए हुए हैं। यह असीमित, अथाह, सर्वत्र अपनी व्यापकता का विस्तार करता अविभक्त ब्रह्मांड, जिसका न तो कोई आदि न अंत है; यहाँ उपस्थित प्रत्येक जीव-जन्तु, प्राणी द्वारा निर्मित नन्ही नन्ही लहरों का ही विशाल, अयुत मिश्रित स्वरूप है। पर्वत से गिरती कोई विशाल शिला; जल पर तैरता एक सूक्ष्म कीट, सर्वदा आ जा रहे मस्तिष्क के विचार, हमारे शब्द एवं कार्य – प्रत्येक का अपना प्रभाव होता है। अतः मेरा कहना है कि यह हमारा कर्तव्य है कि हम हर उस प्राणी के प्रति करुणा, दया व प्रेम का व्यवहार रखें जो कोई भी हमारी जीवन-यात्रा के मार्ग में हमारे सामने से गुजरे। हालांकि हम सब अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए हुए अपने अपने लक्ष्यों व स्वाधीनता के प्रति कार्यशील हो सकते हैं, तथापि सत्य यह है कि एक विश्वव्यापी स्तर पर हम सभी एक दूसरे से जुड़े एवं एक दूसरे पर निर्भर हैं। हम सब एक हैं। संपूर्णता में सभी समाविष्ट हैं।

सर्वहितकर विचार, सर्वहितकर भाव, सर्वहितकर शब्द और सर्वहितार्थ कार्य – ये सब एक सर्वहितकारी विश्व की ओर ले जाने वाले हैं। और, परिणामस्वरूप सम्पूर्ण कायनात को यह सर्वहितकर बना देगा।

आइये, सजगता रखें; सर्वहितकर बनें। यह सब सुसाध्य है।

शांति।
स्वामी