एक बार एक शिष्य था। उसे अपने गुरु से बहुत प्यार था और पूर्ण रूप से अपने गुरु के लिये समर्पित भी था।शिष्य अपने सांसरिक कर्तव्यो का भी पालन करता था, परन्तु उसका एक लक्ष्य जरुर रहता था कि वह हर संभव अवसर पर अपने गुरु के पास उनकी सेवा के लिये जाये तथा उनके उपदेश सुने। एक गृहस्थी का जीवन व्यतीत करते हुए तथा अपने सांसरिक कर्तव्यो का पालन करते हुए,उसे अपने गुरु के बताये हुए निर्देशों का पालन करने के लिये बहुत ही कम समय प्राप्त होता था। नैतिकता, अखंण्डता तथा उत्तम आचरण जैसे गुणो से वह परिपूर्ण था।

एक दिन वह अपने गुरु के पास जाता है। उसके गुरु उस समय धर्मोपदेश दे रहे थे। वे बता रहे थे कि कैसे भक्त के विश्वास के आधार पर ही भगवान को अलग-अलग रूप धारण करने पडते है और ये उपदेश शिष्य ने भी सुना।

इसके बाद शिष्य अपने गुरु के पास गया और बोला, “क्या ये कहना सही होगा कि भगवान एक है और वही भगवान सबमे विराजमान है?”
“यदि मैं हां कहता हूं तो बिना जाने ही सोचोगे कि तुमने समझ लिया है,” गुरु बोले, “और अगर नही कहता हूं तो तुम गलत समझ लोगे।”
“अगर तुम वास्तव मे इसका उत्तर जानने के इच्छुक हो तो, जीवन मे अनुशासन का पालन करो तथा ध्यान की तरफ जायो। तुम्हे स्वयं ही पता चल जायेगा,” गुरु बोले।
गुरु आगे बोले, “मेरी ही परिभाषा या मेरी विचारधारा का गुलाम क्यों बनना? जाओ भगवान को स्वयं देखो और उसके बाद गिनती कर लेना कि वो एक है, अनेक है या है ही नहीं।”

अगर केवल पढकर या सुनकर ही ईश्वर को समझा जा सकता तो अब तक सारे शिक्षित लोग दिव्य बन चुके होते। केवल पढना, सुनना या कुछ विक्षिप्त ज्ञान – ये सब आपको विचारो से मुक्त करने कि बजाय किसी दूसरे कि सोच के साथ, उसकी विचारधार के साथ बांध देते है।

कम से कम शुरुआत में, एकाग्र ध्यान के अनुशासन को अपनाये, भक्ति तथा सेवा को अपनाये। एक बार आपका मन आपके नियन्त्रण मे आ जायेगा तो आपको अन्तरदर्शन का अनुभव प्राप्त होगा।

अपना सत्य स्वयं खोजो।

शान्ति।
स्वामी