गत सप्ताह गतिविधियों भरा था। बहुत से लोगों से मैंने व्यक्तिगत भेंट की, प्रवचन दिए व कीर्तन का आनंद लिया। प्रतिदिन लोग आते रहे, व घंटों तक भजन गाते रहे, जबकि मैं विमुग्ध बैठा भाव विभोर होता रहा। उनके प्रेम व श्रद्धा ने मेरे अंत:करण को गहराई तक स्पर्श किया। जैसे जैसे वे, कभी भर्राये कंठ से, तो कभी अत्यंत मधुर स्वर में, भजन गा रहे थे – संगीत वाद्यों का रस-माधुर्य लिए; वैसे वैसे संपूर्ण वातावरण दिव्य आनंद से हर्ष-विह्वल हुआ जा रहा था। उनका प्रेम, कभी अश्रु धार बन कर, कभी मुस्कान के रूप में, तो कभी देह की थरथराहट लिए, उमड़ रहा था। मैं कुछ समय के लिए, अपनी देह व प्राणों को योगिक-क्रियाओं में विलीन कर, परम एकांत के रसास्वादन हेतु प्रस्थान कर रहा हूँ। अभी मैं भक्ति (दिव्य प्रेममय सेवा) के सन्दर्भ में व्याख्या करना चाहूँगा। भक्ति-मार्ग, ध्यान के मार्ग की भाँति दुष्कर नहीं है। किंतु, यदि केवल भक्ति के माध्यम से ही आप परम सत्य तक पहुँचने के इच्छुक हैं तो “संपूर्ण समर्पण” इसकी मूलभूत आवश्यकता है। ध्यान-मार्ग का सानिध्य पा भक्ति द्रुतगामी हो जाती है व अतिशय विस्मयकारी परिणाम लाती है। नवधा-भक्ति का प्रक्रम आपके मन को इस संसार के क्रिया-कलापों से विभक्त कर, चेतना को सुव्यवस्थित करने हेतु रचा गया है। किंतु परम चेतन अवस्था को पाना इतना सरल नहीं। एक अस्थिर मन आपको दुर्दम चित्तवृत्तियों का दास बना आपकी शांति भंग कर देता है, जबकि शांत चित्त ही भक्ति मार्ग में तत्परता पूर्वक आगे बढ़ने का प्रथम सोपान है। भक्त निम्न तीन श्रेणियों के होते हैं –

भाव रहित

यह भक्त मूलतः सामाजिक व्यक्ति है। उसके हृदय में ईश्वर सेवा अथवा प्राणी मात्र की सेवा का कोई भाव नहीं होता। इसने धर्म को ही आध्यात्मिकता समझ लिया है। लोभ व लाभ का लोलुप यह भक्त मंदिरों के निर्माण, धार्मिक संस्थानों के लिए विस्तृत भवन बनवाने, नित नई प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा व धूम-धाम से विशाल शोभा यात्राएँ निकालने की चिंता से ग्रसित रहता है। वह किसी मंदिर-समिति का सदस्य बन कर इन्हीं सांसारिक क्रिया-कलापों में व्यस्त रहेगा। उसी के सम वैचारिक अन्य लोग इसे एक महान भक्त मानते हैं, वहीं वह स्वयं को महानतम भक्त समझता है। विषयासक्ति से परिपूर्ण निजी जीवन जीने वाले ये लोग, हर पूजा-कार्य में अपने लिए एक विशेष स्थान की अपेक्षा रखते हैं। वास्तव में इन भक्तों ने अपने विकारों पर लेशमात्र विजय नहीं पाई होती। उनकी कामुक दृष्टि हर स्त्री को उपभोग की वस्तु के रूप में देखती है। उनका अहंकार भरा व्यक्तित्व, एक छोटे से मन-मुटाव पर भी आगबबूला हो उठता है। अपनी विभ्रमित सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों के आधार पर वे स्वयं को अब तक के श्रेष्ठ भक्तों की श्रेणी में गिनने लगते हैं। यदाकदा, एक-दो भजन या गीत गा कर वे स्वयं व दूसरों को प्रसन्न कर लेते हैं। इस प्रकार का भक्त, भले कुछ भी हो, किंतु भक्त तो नहीं होता। जब एक सिद्ध मान कर, लोग उनके चरण स्पर्श करते हैं तो उन्हें अति आनंद होता है और वे सिद्ध की ही भाँति लोगों पर निरर्थक आशीर्वादों की झड़ी लगा देते हैं। अपना प्रमुखत: आध्यात्मिक परामर्श देने को आतुर, वे अपना मत आप के हृदय की गहराइयों तक पहुँचाने के लिए घोर प्रयत्नशील रहते हैं।
ईश्वर का प्राकट्य आज तक किसी शोभा यात्रा के मध्य नहीं हुआ। वे कभी किसी पाषाण की मूर्ति से भी बाहर नहीं आए। ईश्वर पत्थर में भी विराजमान हैं किंतु वह पत्थर ईश्वर नहीं है। इस श्रेणी के भक्त एक गहन भ्रम में जी रहे हैं। उनकी सहायता केवल कोई दिव्य शक्ति, जिसे ईश्वर-कृपा भी कहते हैं, ही कर सकती है चूँकि वे किसी अन्य व्यक्ति की अनुनय विनय तो सुनेंगे नहीं।

गृहीत (माँगा हुआ) भाव

अधिकांश भक्त इसी श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। इन भक्तों ने अभी तक अपना स्वयं का सत्य नहीं खोजा। उनके पालन-पोषण व एकत्रित जानकारियों ने उन्हें इस रूप में रूपांतरित किया है। वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा दूसरों के ज्ञान को आधार बना कर आरंभ करते हैं, फिर वे दूसरों की पूजा-पद्धति भी अपना लेते हैं, प्रार्थनाएँ, स्तुति, भजन व अन्य विधियाँ भी दूसरों द्वारा रचित ही होती हैं, जिनका वे अनुसरण करने लगते हैं। दुर्भाग्यवश यह सब उन्हें उन लोगों से प्राप्त होता है जो स्वयं अभी परम वास्तविक अनुभव से कोसों दूर हैं। उन प्रचारकों ने भी किसी दूसरे से सब सुना होता है अथवा उन पुस्तकों का पाठन किया होता है जो पुरातन काल से संबंधित होती हैं, सम-सामयिक नहीं होतीं। वे पुरातन ग्रंथों में छुपे गूढ़ रहस्यों से अवगत नहीं हो पाते, अत: जैसा बताया जाए, वे वैसा ही पालन करने लगते हैं। यह भक्त अपनी दैनिक उपासना पद्धति अत्यंत अंतरंग भाव सहित करते हैं। उनका विश्वास होता है कि मूर्ति ही ईश्वर है! वे अपने ईश्वर को, एक नन्हे बालक, एक लाचार व्यक्ति, एक कुकुर अथवा तिलचट्‍टे में देख पाने में असमर्थ होते हैं। वे दूसरों के दु:ख से द्रवित नहीं होते, दया-करुणा का उनके जीवन में कोई स्थान नहीं होता। न जाने कहाँ से, उन्हें तो केवल यह विश्वास हो चुका होता है कि उनके ईश्वर तो बाह्य पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न होते हैं। अपने अंत:करण को एक उत्कृष्ट मंदिर बनाने के स्थान में, अपने घर में बने मंदिर की स्वच्छता की उन्हें अधिक चिंता होती है। विभिन्न धर्मों के असंख्य उपासक इसी श्रेणी में आते हैं। ऐसा भक्त अपनी सुविधानुसार सदाचार व नैतिकता का मार्ग अपनाता व छोड़ता रहता है। अपनी इच्छाओं द्वारा बद्ध व विमूढ़ यह भक्त क्रोध व अहंकार का दास ही बना रहता है।

भाव-शून्य भक्त से कुछ ऊपर उठे इस भक्त को साक्षात्कार होने के अधिक संयोग हैं यदि यह जीवन-निर्वाह में नैतिकता को मूल आधार बना ले व आत्म-शुद्धि को संपूर्ण जीवन का आधार। ऐसे में, उसके हृदय की गहराइयों में बसा दिव्य विशुद्ध भाव स्वत: उजागर होने लगेगा और वह उसे मार्ग पर आगे ले जाएगा।

स्व-भाव

इस उच्चतम कोटि के विरले भक्त ने अपने स्वयं के सत्य का अन्वेषण कर लिया है। तुलसीदास, मीरा बाई, सूरदास, चैतन्य महाप्रभु, गुरु नानक देव, की भाँति यह भक्त पूर्णत: अंतर्मुख हो चुका है। आप अभी भी अपने इष्ट की बाह्य पूजा-आराधना करते हैं किंतु अपने स्व के दिव्य भाव में स्थित रह कर। आपकी आंतरिक पूजा पर आधारित बाहर प्रकट होने वाले चिह्नों पर दृष्टि रखे लोग यह विषम अनुमान लगा लेते हैं कि यह बाह्य पूजा ही वास्तविक है जो नये मत-मतांतर को जन्म देती है। इससे जिज्ञासु और भ्रमित हो जाते हैं। यह भक्त पूजा के पारंपरिक बाह्य-विधि विधान से ऊपर उठ चुका है। अपनी अति विशुद्ध जीवन शैली व उससे भी उच्चतम मर्यादित व्यवहार ने आपको पूर्णत: पवित्र बना दिया है। तत्वत: आप स्वयं इष्ट स्वरूप हो चुके हैं। अपने बाल सुलभ, निर्दोष स्वभाव व सांसारिक क्रिया-कलापों से विमुख, आप अपना समय एकांत में व्यतीत करते हैं। तथापि, अपने एकांत में भी आप सदा अपने इष्ट के सम्मुख ही होते हैं और भीड़ में होने पर भी आप सदा अपने इष्ट संग एकाकी होते हैं। इच्छाओं, व परिणामस्वरूप सभी विकारों ने, आपका सर्वथा त्याग कर दिया है, चूँकि प्रकाश व अंधकार एक साथ कैसे रह सकते हैं! आप स्वयं प्रकाशमय हैं; प्रेम, विश्रांति, आनंद, ज्ञान के प्रकाश स्रोत। क्योंकि आपने अपने ईश्वर को पा लिया है, आप में उत्तम-वैराग्य उत्पन्न हो जाता है – वैराग्य जो आत्म-साक्षात्कार का स्वत: सिद्ध उपफल होता है। आप चमत्कार करने के लिए सज्ज हैं व आपकी उपस्थिति मात्र हर श्रेणी के भक्तों व सामान्य जन को रूपांतरित करने हेतु पर्याप्त है। जैसे एक विद्यार्थी को कक्षा से उत्तीर्ण होने के पश्चात उस कक्षा की पुस्तकों की आवश्यकता नहीं रहती; आप भी कर्म-कांड व पुस्तकों पर आधारित विधि-विधान से उपराम हो चुके हैं। वैसे भी, ऐसे विधि-विधान अपना कर आज तक किसे ईश्वर प्राप्ति हुई है?

भक्ति दिव्य प्रेम पूर्वक की गई सेवा का स्वरूप है, मूढ़ कर्म-कांड नहीं। एक गृहीत भाव लेकर भक्ति मार्ग पर प्रथम पग बढ़ाना उचित है। अपने जीवन व जीविकोपार्जन, दोनों स्तरों पर उत्तरोत्तर बढ़ती पवित्रता व दृढ़ संकल्प, आपको शीघ्र स्व के विशुद्ध भाव में स्थापित कर देंगे। एक महान भक्त की पहचान यही है की वह सदा पूर्ण वैराग्य व संभवत: हर स्थिति में मन के समत्व भाव में स्थित रहता है। जब आपकी सभी कामनाएँ स्वत: समाप्त हो जाएँ व पुन: जागृत न हों, उस स्थिति में जानिए कि ईश्वर दर्शन सन्निकट ही है। आप विह्वल हो कर ईश्वर गुणगान में लगे हों या सच्चे मन से क्षमा प्रार्थना में निमग्न हों, किंतु यदि आप हर समय याचक ही बने रहेंगे तो केवल कुछ छोटे पैसे ही एकत्र होंगे! एक सुपात्र बनें व देखें कि आपकी सभी कामनाएँ स्वत: पूर्ण होने लगेंगी।

जब भक्ति संपूर्ण शुद्धता, समर्पण व वैराग्य सहित की जाती है, तो सभी बंधन स्वत: छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। हालाँकि इससे आपका प्रारब्ध समाप्त नहीं होता, परंतु भक्ति आपको अविचल स्थिरता प्रदान करती है। कर्म-फल का सिद्धांत अटूट है। अपने स्व भाव को जानने के पश्चात, शनै: शनै: आप अंतिम भाव – पराभक्ति में प्रविष्ट हो जाते हैं, वही भक्ति की पराकाष्ठा है। ‘पराभक्ति’ पर मैं किसी अन्य अवसर पर लिखूंगा।

तो क्या आपको अपनी सभी कामनाओं को मार कर हर समय केवल हरि-नाम जप ही करते रहना चाहिए, और शायद इस भौतिक जगत का भी त्याग कर देना चाहिए? यदि आप किसी ऐसे निर्णय पर पहुँचे हों तो या मेरे समझाने में त्रुटि है अथवा आप इस विषय को उचित ढंग से नहीं समझ पाए। आप वायु को कैसे बाँध सकते हैं? आप अपनी इच्छाओं व कामनाओं को न तो दबा सकते हैं और न ही मार सकते हैं। ऐसा करने से आप एक ज्वालामुखी की भाँति फट जाएँगे। नैतिकता की सीमा का उल्लंघन किए बिना, आप अपना जीवन सहज रूप में बिताते चलें। आत्म-शुद्धि के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते रहें। इसके साथ-साथ, यदि आपको ईश्वर में श्रद्धा है तो पूर्ण समर्पण सहित भक्ति मार्ग पर पग बढ़ाएँ। भक्ति प्रथम दृश्य प्रेम के प्रारूप कभी नहीं होती। यह तो ऐसा प्रेम संबंध है जहाँ आपका अपने इष्ट के साथ प्रेम व संबंध कालांतर में धीरे धीरे घनिष्ठ होता जाता है। यदि आप पूर्ण समर्पण नहीं कर सकते तो भक्ति मार्ग आपके लिए नहीं है। ऐसी स्थिति में आप ध्यान मार्ग अपना सकते हैं और साथ ही स्वयं को इस मार्ग में आने वाली विघ्न बाधाओं के लिए सज्ज रखें। ध्यान में कर्मठता व कठोर प्रयत्न के पश्चात ही सुस्पष्ट परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं। अपनी इच्छाओं का मूल स्वरूप समझे बिना, कृपया, उन्हें दबाने की चेष्टा बिल्कुल न करें। विशुद्ध भक्ति अथवा उचित ध्यान प्रक्रिया द्वारा सभी इच्छाएँ, कालांतर में, स्वत: शांत होकर लुप्त हो जाती हैं। यदि भक्ति और ध्यान दोनों का युग्म बन जाए तो आप अति सहजता व शीघ्रता पूर्वक परम अवस्था पा सकते हैं।

अंतर्मन में जब तक कुछ विशेष अनुभव होना प्रारंभ न हो जाए, तब तक, बाह्य पूजा अर्चना न छोड़ें। सत्य को स्वत: धीरे धीरे सामने आने दें। जब आप अपने सुमार्ग पर श्रद्धा पूर्वक दृढ़ता से, सत्य, करुणा, क्षमा व प्रेम सहित, निरंतर चलते रहेंगे, तब निश्चित ही ईश्वर के कृपा पात्र बन जाएँगे – इसमें लेश मात्र संदेह न रखें।

अथक परिश्रम व आलस्य के मध्य संतुलित, अति भोग व बलिदान दोनों से समान दूरी बनाए हुए, भक्ति का उत्कृष्ट मार्ग सुस्थित है।

यदि आप अपनी कामनाओं को उचित रूप से समझ पाएं तो निश्चित ही आप अपने जीवन को समग्र रूप से बदल पाएँगे। कृपया नये लेख पढ़ते रहें।

अब मैं भोजन के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ, और, जाते जाते –
जीवन “रेस्टोरेंट की थाली” के समान होता है। आपको तीव्र भूख लगी है, तभी तो आपने ‘थाली’ ऑर्डर की, अथवा तो आपको लगा थाली सस्ती है, या फिर हो सकता है कि उसमें परोसे जाने वाली विविधता ने आपको लालायित किया हो। ठीक ऐसे ही, जीवन में भी किसी निर्णय पर पहुँचने से पूर्व आप स्वयं को विभिन्न कारण या बहाने सुनाते हो। थाली आपके सम्मुख है, वाह! इसमें तो विभिन्न प्रकार के व्यंजन परोसे गये हैं (हालाँकि, इनमें से अधिकांश के प्रति आप बेपरवाह हैं)। इनमें से कुछ व्यंजन आप चूस कर खाते हैं, कुछ को चबाने की आवश्यकता है, कुछ आप पी लेते हैं, और अन्य कुछ अभी शेष हैं जिन्हें आप छूते भी नहीं। और, यदि आपने ‘डीलक्स’ थाली मँगवाई थी तो वह अन्य चटपटे पकवानों व मिष्ठान से भी सुसज्जित होगी।

आप आरंभिक कुछ ग्रास जल्दी से खाते हो, हर निवाले का भरपूर स्वाद लेते हुए। फिर, स्वाभाविक तौर से आपकी संतुष्टि के स्तर में कमी आने लगती है। अब आप हर ग्रास के साथ वह पहले वाला आनंद अनुभव नहीं कर पाते, और अपने हर ग्रास के साथ ढेर सारी सब्जियाँ भी नहीं लगा रहे हो। स्वाद का चस्का तीव्रता से उड़न छू होता जा रहा है। अब आप खाने के साथ साथ स्वयं से या अपने सहभागी से बातें भी आरंभ कर चुके हो – अरे! ये लोग पनीर को तलते क्यों हैं? इन्हें पता होना चाहिए कि तलने से यह कड़ा हो जाता है व उतना सरस नहीं रह पाता। मुझे चावल नहीं, चपाती लेनी चाहिए थी। ज़रा इस सब्जी को देखो, गोभी के मात्र दो टुकड़े और आलू इतना बड़ा! यह दाल बेस्वाद है! आदि आदि ..

आपने मीठे व्यंजन भोजन के अंत में खाने के लिए बचा रखे थे, किंतु, अब आप तृप्त अनुभव कर रहे हैं। चूँकि आपने पूरी थाली पर धन व्यय किया है तो आपको लगता है कि मुझे थोड़ा और खा लेना चाहिए। आप भोजन बचा हुआ छोड़ने के अभ्यस्त नहीं हैं। तेल लगे हाथों के साथ, यदि सब्जी न भी लगी हो, आप पानी का ग्लास उठा लेते हैं, अपनी प्यास बुझाने के लिए। हर कटोरी में शेष बचे तेल की झलक आपको कुछ बैचन सा करती है, अपने स्वास्थ्य की चिंता में कि कहीं ‘थाली’ मँगा कर मैंने कोई अनुचित निर्णय तो नहीं न किया! किंतु अब सब समाप्त हो चुका है। इसमें ध्यान देने जैसी बात यह है कि संभवत: अगली बार पुन: आप इसी ‘थाली’ का ऑर्डर देंगे!

इसी प्रकार, जीवन भी चयन की कड़ियों से बना है। प्रारंभ में इस मोहक मायावी संसार के आकर्षण आपको अपनी ओर खींचते हैं, बिल्कुल उस थाली में सजे ढेरों व्यंजनों की भाँति। प्रकारांतर में, आप उकता जाते हैं – उन सब का रस लेने से नहीं, बल्कि इस बात से कि आप में उस आनंद को बनाए रखने की क्षमता नहीं रही। असंतुष्टि की एक सूक्ष्म भावना आपको जकड़े रखती है। आप चयन नहीं कर पा रहे कि क्या रखूं और क्या त्याग दूं? थाली के विश्लेषण की ही भाँति आप अपने जीवन में किए चयन का भी विश्लेषण करते रहते हैं। आप भूत व भविष्य काल से संबंधित विचारों की एक कड़ी बुनने में निमग्न रहते हैं। जीवन का “श्रेष्ठतम” आप अंत के लिए संजो कर रखते हैं, किंतु, जब अंत आपके सम्मुख प्रस्तुत होता है तब तक आप की अभिलाषा लुप्त हो चुकी होती है। जिहवा के स्थान पर अपनी पाचन-शक्ति का सत्य आपके सम्मुख है। अंतत:, जिससे आपकी प्यास बुझती है वह है पानी का एक ग्लास – जिसकी पौषकता अधिक नहीं, जिसके लिए धन भी व्यय नहीं किया व जिसे पुन: भरवाने की रोक भी नहीं होती। यह तो प्रकृति का वह अमूल्य उपहार है जिसकी विशुद्धता ही आपको संतुष्ट करने का मूल घटक है।

जाएँ, व आनंद लें! एक ‘थाली’ मँगवाएँ! कैसा हो यदि एक आत्मा हेतु भी मँगवा लें…..!

शांति।
स्वामी