हम सभी में भय विद्यमान रहते हैं। भविष्य में क्या घट सकता है इस बात का भय; अलमारी में बंद कंकालों का भय; दूसरों व स्वयं के विफल होने का भय। हम भयभीत रहते हैं कि क्या होगा यदि हमारे सबसे भयानक डर सच्च साबित हो गए तो! हमारी अधिकांश चिंताएँ ऐसे ही भय से उत्पन्न होती हैं। हम अपनी सहायता स्वयं करने हेतु पुस्तकें पढ़ते हैं जो हमें बताती हैं “चिंता न करें” अथवा “सकारात्मक रहें”। किन्तु, यह सब अधिकांश समय काम नहीं आता, हर समय तो बिलकुल नहीं। एक दिन किसी ने मुझे पूछा, “क्या अपने भय से ऊपर उठने का कोई मार्ग है?”

देखिये, यह आपके भय के स्वरूप पर निर्भर करता है। यदि आप विभ्रांति (परानोइड) के रोगी हैं (काल्पनिक भय व चिंताएँ जो अत्यधिक सोचने के परिणामस्वरूप उपजें), ऐसे में एक शांत मन वास्तव में अति सहायक सिद्ध होता है। तथापि, आज मेरा केंद्र बिन्दु एक अशांत मन की बक-बक से उत्पन्न काल्पनिक भय नहीं है। गत लेखों में मैंने इस विषय पर बहुत कुछ लिखा एवं बोला है। इसके स्थान पर, आज के लेख में मैं वास्तविक भय की चर्चा करूंगा। ऐसे भय जहां एक शांत मन आपकी चिंता को समाप्त नहीं कर पाता, ऐसे भय जहां हर प्रकार कि सांत्वना निष्फल हो जाती है। इस प्रकार के भय की स्थिति में केवल एक सूत्र कार्यशील हो पाता है। आप पूछेंगे कि वह क्या है?

चलिये, पहले मैं आपके साथ एक छोटी सी कथा साझा करता हूँ।

अनेकों वर्ष पूर्व, किसी समुद्र तट के किनारे एक किसान का बहुत बड़ा खेत था। उस क्षेत्र में विशेष रूप से भयंकर तूफान आते रहते थे जिस कारण किसान के लिए स्वयं को क्षति से बचा पाना अति कठिन होता था। वह सदा किसी ऐसे युवा, सशक्त, लंबे-चौड़े व्यक्ति की तलाश में रहता जो उसके खेतों, अनाज, उत्पाद व चारे की सुरक्षा कर पाये। किन्तु, भले ही किसान कितना भी अधिक वेतन देना चाहे, हर कोई एक या दो तूफान झेलने के उपरांत काम छोड़ कर चला जाता था।

एक दिन एक छोटी कद काठी का व्यक्ति उसके पास नौकरी हेतु आता है। उसके पतले-सिकुड़े बदन को देख किसान को इस कार्य हेतु उसकी योग्यता पर कुछ संशय होता है। वह याचनकर्ता को विस्तार पूर्वक बताता है कि किस प्रकार यह कार्य शारीरिक श्रम प्रधान है और उसे समझ नहीं आ रहा कि उसकी पतली सिकुड़ी देह यह सब कैसे संभाल पाएगी। तथापि, वह व्यक्ति किसान को पूर्ण विश्वास दिलाता है कि वह उस कार्य हेतु सक्षम है।
“हर कोई केवल एक तूफान झेलने के उपरांत ही कार्य छोड़ जाता है”, किसान बोला।
“वास्तव में मैं तो तूफान के मध्य भी निश्चिंत हो सोता रहता हूँ।”
हालांकि किसान उसके उत्तर से अचंभित हो जाता है, तथापि वह उसे कार्य हेतु हाँ कह देता है चूंकि उस समय उसे एक सहायक की अति आवश्यकता होती है।

वह छोटी कद काठी का व्यक्ति, वस्तुतः एक दक्ष व निष्ठावान कर्मी होता है। वह खेत में सुबह से शाम तक भली भांति कार्य करते हुए व्यस्त रहता, और किसान उसके कार्य से संतुष्ट था। एक रात्रि तेज हवाएँ चलने लगती हैं व एक भयंकर तूफान का रूप लेने लगती हैं। उसी समय बिजली भी गुल हो जाती है व चारों ओर घोर अंधकार छा जाता है। किसान तत्काल बिस्तर से निकलता है, एक टॉर्च लेता है और अपने सहायक के कक्ष की ओर लपकता है।

आसमान में कानों को बहरा बना देने वाली गर्जना होने लगती है। कड़कती बिजली की रौशनी और तेज चलती जोरदार हवाएँ उस शांत समुद्र तट को एक अति भयभीत करने वाले रूप में परिवर्तित कर देती हैं।

“शीघ्रता से उठो!” वह चिल्लाते हुए सहायक को हिलाने लगता है। “तूफान आने को है!”

अपने मुख पर आती रौशनी के कारण वह अधखुली आँखें तिरछी करता है और पुनः उन्हें बंद कर लेता है, यह इंगित करते हुए कि वह उस समय उठने की मनोदशा में नहीं। अविश्वास से भरा, किसान उसके कक्ष के चारों ओर एक निगाह डालता है, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं वह नशे में तो नहीं। किन्तु नहीं, कक्ष साफ-सुथरा व सही था।

इस बार वह उसे और अधिक बल से हिलाता है और अपना पूर्ण बल लगा कर चिल्लाता है, “क्या मुसीबत है, जल्दी से उठो और सब सामान बांध दो इससे पहले कि सब कुछ तूफान में उड़ जाये।”
“नहीं श्रीमान,” अपने बिस्तर में करवट लेते हुए वह बोला, “मैंने आपको बताया था ना कि मैं तूफान के मध्य भी शांति से सोता हूँ।”

उसकी इस उदासीनता से क्रुद्ध किसान उसे दो-चार खरी खोटी सुना, जल्दी से तूफान से बचने की तैयारी के लिए भागता है। किन्तु, बाहर सारा पशु-चारा पहले ही तारपोलीन से भली भांति ढका हुआ था; सभी गाय अपने तबेले में थीं; मुर्गियाँ सुरक्षित स्थान पर थीं व सभी कपाट बंद थे। समस्त बड़े बाहरी दरवाजे इत्यादि सही तरह से बंद थे व सब कुछ बंधा हुआ था। कुछ भी तूफान के कारण उड़ नहीं सकता था।

अति प्रसन्नता पूर्वक, व कुछ हैरान सा, वह अपने कर्मी से क्षमा मांगता है और स्वयं भी सोने चला जाता है; ऐसे समय में सोने, जब तूफान अपने चरम पर था।

यहाँ प्रमुख सूत्र है – तैयारी।

जब आपका भय वास्तविक हो, जिसके मूल में किसी बात के होने अथवा न होने का सही पूर्वाभास विद्यमान हो, ऐसे भय का सामना करने का मात्र एक ही मार्ग है – पहले से तैयार रहना। उदाहरण स्वरूप, यदि आपको डर है कि आप कल होने वाली परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाएंगे क्योंकि आपने उसके लिए कोई पढ़ाई नहीं की तो यह एक वास्तविक भय है। सकारात्मक बातें अथवा स्वयं को सांत्वना आदि देना, यह आपकी कुछ भी सहायता नहीं कर पाएंगे। केवल तैयारी ही एक मात्र राह है।

और, तैयारी के मूल में होता है एक साधारण पक्का इरादा। यदि आप अपने दिल पर हाथ रख कर यह कह सकते हैं कि मुझसे जितना हो सकता था मैंने किया, तो समझिए आपने अपने हिस्से का कार्य कर दिया। शेष सब प्रकृति पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उस सत्ता को आप भाग्य, कर्म, ईश्वर अथवा चाहे कुछ भी कह कर बुला लें। हम मात्र उतना ही कर पाते हैं जितना कि हम कर सकते हैं, और, अंततः, हम उतना ही तो कर सकते हें। यदि आपने उतनी तैयारी की है जितनी आपकी क्षमता हो, तो यही है जो मायने रखता है। हम हर वह घटना जो हमारे साथ या चारों ओर घट रही है, उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। अपने नियंत्रण से बाहर की बातों पर चिंतित रहने का कोई औचित्य नहीं।

यदि आपने अपनी सीट बेल्ट लगा रखी है और आप गाड़ी सावधानी पूर्वक चलते हुए यातायात के नियमों का भी पालन कर रहे हैं तो किसी संभावित दुर्घटना की चिंता करना एक निरर्थक भय है। आपका उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। हवाई यात्रा के दौरान विमान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की चिंता एक और उदाहरण है। आवश्यकता से अधिक सोचना ऐसे भयों का मूल कारण है। ऐसा कोई स्पष्ट भय जिसे आप अपने मन-मस्तिष्क से निकाल नहीं पाते, दुर्भिति (फोबिया) कहलता है। ऐसा जो कुछ भी हो, अच्छा ध्यान (मेडिटेशन), विचार-विमर्श अथवा इसी प्रकार के अन्य उपाय इससे छुटकारा पाने में आपकी मदद कर सकते हें। तथापि, जहां तक मुझे मालूम है, सभी वास्तविक भयों के लिए पहले से तैयारी रखना ही एक मात्र मार्ग है।

एक वृद्ध महिला ने अपनी अंतर्देशीय उड़ान के दौरान अपने समीप बैठे , लगभग 40 के आस पास के सह-यात्री से पूछा, “इस बात की कितनी संभावना बनती है कि हमारे विमान में कोई व्यक्ति बंब ले कर आया हो?”
“मैं इस बारे में कोई चिंता नहीं रखूँगा,” उसने पूर्ण विश्वास से कहा। “ऐसी संभावना दस लाख में से एक है।”
“ओ ……” महिला ने सिर हिलाया।
“और इसकी कितनी संभावना है कि दो पूर्णत: अंजान व्यक्ति एक बंब ले कर विमान में चढ़े हों?”, वृदधा ने एक मिनट के बाद पुनः पूछा।
“अनुमानत: दस करोड़ में एक”, वह बोला और अपनी पत्रिका पढ़ने लगा।
“तो ठीक है,” वह बोली और अपना विस्फोटक से भरा हाथ का बैग खोला, “मैंने हमारी सुरक्षा के अनुपात को बुरी तरह सुधार दिया है!”

यह हास्यास्पद लग रहा है किन्तु बहुधा इसी प्रकार से हमारा अशांत मन भय का निराकरण करने का प्रयास करता है। हम अपनी चिंताओं से मुक्ति पाने का प्रयास उनके बारे में और अधिक चिंता द्वारा करने लगते हैं। इससे कोई लाभ नहीं। आपके जीवन में विद्यमान आँधी-तूफान आपकी क्षमता पर निर्भर करते हें। आपके पास जितना अधिक देने हेतु होगा, उतना अधिक प्रकृति आपकी राह पर डालती जाएगी। आपको अगले स्तर पर पहुंचाने का यही एक मात्र मार्ग है, आपको आपकी पूर्ण क्षमता तक पहुंचाने और उससे पार हो जाने का मार्ग।

कबूतरों के सम्मुख चुनौतियों का उतना ऊंचा स्तर/पैमाना नहीं होता जितना बाज के सम्मुख होता है। जितना विशाल आपका अस्तित्व, उतने बलशाली तूफान। वे तूफान भावनाओं के अंदरूनी उफान अथवा विचारों के बर्फीले तूफान हो सकते हैं; वे कष्ट के बाह्य थपेड़े अथवा विरोधी परिस्थितियों के अंधड़ हो सकते हें। भले कुछ भी हो, यदि आप तूफान के समय भी शांतिपूर्वक नींद लेना चाहते हों तो अच्छा हो कि आप उसके लिए समय से पूर्व तैयारी करके रखें। इसका आरंभ होता है अपने द्वारा चुनी हुई स्थितियों एवं अपने कार्यों के प्रति सतर्क रहें व उनका दायित्व लें। ऐसा कुछ भी नहीं जो हम सीख नहीं सकते; प्रसन्न व सकारात्मक रहने से ले कर स्वयं के सम्राट बनने तक – सब कुछ संभव है।

तूफान तो आएंगे। उन्हें आने दें, चूंकि उसके उपरांत का आनंद व शांति लाखों गुना बढ़ जाते हैं। हर तूफान आपके लिए एक सबक छोड़ जाता है। इस प्रकार के सबक ही हमारे उस ज्ञान में वृद्धि करते हैं जो हम इस जीवन में अर्जित कर रहे हैं। ज्ञान कहते हैं कीचड़ से भरे जल में भी बिम्ब देख पाने की योग्यता को; तूफानी समंदर में भी अपने नाव का संचालन कर पाने की क्षमता को। यदि आप महासागर की विशालता का आनंद लेना चाहते हैं तो आप तूफानों से बच नहीं सकते। आइये बाहर निकलें, छलांग लगाएँ और गहराई तक चलें। खोने की लिए क्या है? और, पाने के लिए सम्पूर्ण सृष्टि आपकी अपनी है। किसी अन्य प्रकार से क्यों जिया जाए?

तैयारी करें। खेलें। ठहरें। विचारें। पुनः करें।

शांति।
स्वामी