पेमा चोद्रन (Pema Chödrön) ने ‘वेन थिंग्स फॉल अपार्ट’ (When Things Fall Apart) में अपने गुरु के विषय में एक रोचक घटना का उल्लेख किया है – उनके गुरु तिरुङ्ग्पा रींपोचे – जो एक दृढ़, विवादास्पद, किन्तु स्पष्ट, पारदर्शी व सत्यवादी थे। एक युवा ने एक बार उनसे पूछा कि क्या उन्हें कभी डर लगा? रींपोचे ने उत्तर में कहा कि उनके मठ से जुड़े प्रशिक्षण के अंतर्गत उन्हें शमशान जैसे स्थान पर जाना होता था जो उन्हें भयभीत कर देता; और उन्हें ऐसे विषयों पर चिंतन करना होता था जो उनके लिए अरुचिकर थे। उसी उल्लेख में आगे –

तब उन्होंने अपनी यात्रा से संबान्धित एक प्रसंग सुनाया जब वे अपने सहायकों सहित एक ऐसे मठ में जा रहे थे जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। जैसे ही वे लोग मुख्य द्वार के समीप पहुंचे तो उन्होंने एक विशालकाय रक्षक-कुकुर देखा जिसके बहुत लंबे लंबे दाँत व सुर्ख लाल नेत्र थे। वह भयंकर ध्वनि कर गुर्रा रहा था व अपने को उस मोटी साँकल से छुड़ाने का प्रयास कर रहा थे जो उसे बांधे हुए थी। ऐसा लग रहा था कि वह कुकुर उन पर वार करने के लिए उग्र हो रहा हो। जैसे ही रींपोचे उसके समीप पहुंचे, उनकी दृष्टि उसकी नीली जिह्वा एवं मुख से टपक रहे लार पर पड़ी। वे उस कुकुर से कुछ दूरी बनाते हुए उसके आगे से चल कर द्वार के भीतर पहुँच गए। अचानक सांकल टूट गई और कुकुर उनकी ओर लपका। सभी सहायक चिल्लाये व भय से मानो वहीं जम से गए। तभी रींपोचे मुड़े और अपनी तीव्रतम गति दिखाते हुए सीधा कुकुर की ओर दौड़ने लगे। कुकुर ऐसे अचंभे में आया कि उसने अपनी दुम टांगों में दबाई और वहाँ से भाग गया।

जब मैंने यह घटना पढ़ी तो मुझे हिमालय के घने जंगलों में अपने ऐसे ही एक अनुभव का स्मरण हो आया, जब मेरा सामना कुछ आवारा कुत्तों के एक बड़े समूह से हुआ था। उन कुत्तों को मालिक लोगों ने इसलिए आवारा छोड़ दिया था कि न तो अब वे पालतू रहे थे और न ही उनकी भेड़ों की सुरक्षा कर पाते थे। किन्तु, जंगल उनके भोजन का एक उपयुक्त स्थान नहीं था अतः वे निरंतर भूखे ही रहते और इसी कारण से विक्षिप्त से भी। मार्ग में कई ग्रामीणों ने मुझे उनसे सचेत रहने को कहा चूंकि वे कुत्ते प्रायः अनुभवी आक्रमणकारियों की भांति एक समूह में ही रहते थे। तथापि, उन कुत्तों के साथ हुआ मेरा व्यक्तिगत अनुभव बहुत भिन्न प्रकार का था। जब मैंने उन्हें भौंकते हुए देखा तो मैं उनकी ओर चल दिया। पूर्ण दृढ़ता से संकल्पबद्ध, उनके प्रति प्रेम व करुणा के भाव संचारित करते हुए, मैंने यह निर्णय कर लिया था कि भले कुछ भी हो, मैं उनको न तो कोई हानि पहुंचाऊंगा और न ही उन्हें वहाँ से भगाऊंगा। इस रूप में मेरा ढंग तृङ्ग्पा रींपोचे से कुछ भिन्न था। किन्तु यह सफल रहा। जैसे ही मैं उनके समीप पहुंचा, कुत्ते तत्क्षण शांत हो गए। मेरे पास उनके लिए किसी भी प्रकार का भोजन नहीं था अन्यथा मैंने अवश्य ही उन्हें कुछ खिलाया भी होता। तथापि, यह एक ऐसा मुक्त अनुभव था जिसका उपयोग बाद में मैंने अन्य सभी जाति के वन्य जीवों पर किया व समान रूप से परिणाम भी पाये।

ऐसा ही हर किसी भय के साथ किया जा सकता है। बहुधा यह कहा जाता है कि अपने भय का सामना करो, किन्तु भय का सामना करने का वास्तविक अभिप्राय है क्या? और, अभिप्राय कुछ भी रहे, उससे निपटा कैसे जाये? तो आरंभ ऐसे करें कि – अपने भय का मानवीकरण करें। आपका भय भले कुछ भी हो, उसे एक मानव रूप दें और गहन मानस दर्शन आरंभ करें। कल्पना करें कि आपका भय वास्तव में एक व्यक्ति है और आप उसके सम्मुख खड़े हैं। अपने भय से वार्तालाप करें; उसके प्रति प्रेम व करुणा के भाव संचारित करें, उसके संग एक मित्रवत संबंध बनाएँ। ऐसा करने से वह ऊर्जा जो आपके भय को ईंधन प्रदान कर रही थी, वही अब आपका बल बन जाएगी। कृपया ऐसा करके देखें।

भय से मेरा तात्पर्य हमारे मृत्यु के भय जैसे प्राथमिक/मौलिक भय नहीं। वरन, यहाँ मैं ऐसे विभिन्न प्रतिबंधित भयों का संदर्भ ले रहा हूँ जो हम अपने पालन-पोषण एवं अन्य सामाजिक मानदंडों के आधार पर बना लेते हैं, अथवा तो स्वयं में एकत्रित करते रहते हैं।

विक्टर फ़्रांकल ने ‘लोगोथेरेपी’ को प्रतिपादित करते हुए एक बार एक ऐसे व्यक्ति के विषय में जानकारी दी जिसे जन समुदाय के मध्य होने पर अत्यधिक स्वेदन होता था। जब कभी भी उसे मंच से बोलना होता था, अथवा तो किसी जन-समूह को संबोधित करना होता तो उसे अत्यधिक पसीना आना आरंभ हो जाता – एक ऐसी स्थिति जो उसके लिए अत्यधिक लज्जाजनक हो जाती। स्वेदन की आशंका को ले कर जो भय उसमें व्याप्त जाता था, वह उसके पसीने की मात्र और बढ़ा देता।

“अपने भय की घोषणा कर दो,” विक्टर ने उसे परामर्श दिया। “यदि आप अपने श्रोताओं को भली प्रकार से नहीं जानते तो यह घोषणा स्वयं से कर दो।”
एक सप्ताह बीतने के उपरांत, वही व्यक्ति पुनः प्रस्तुत हुआ, केवल यह बताने के लिए कि जब कभी भी वह किसी ऐसे व्यक्ति से मिला जिसकी उपस्थिति में उसे पसीना अधिक आने की संभावना होती, तो वह स्वयं से कहता, “पहले तो मुझे केवल १ क्वार्ट पसीना आ रहा था, किन्तु अब कम से कम १० क्वार्ट आने वाला है।”

इसका परिणाम यह हुआ कि चार वर्ष से चली आ रही कष्टसाध्य स्थिति के उपरांत, मात्र इस एक आत्म-अनुबोधन से, केवल उस एक सप्ताह में ही उसे अपनी समस्या का स्थायी रूप से निदान मिल गया।

डॉ॰ फ़्रांकल ने इसे हाइपर-ईंटेंशन नाम दिया – एक विशिष्ट रूप से बनने, कार्य करने अथवा आभास करने के लिए अतिशय दृढ़ धारणा। भले ही वह किसी का अंतरंग पलों के दौरान भयभीत महसूस करना हो, किसी विद्यार्थी का परीक्षा में बैठना अथवा एक वक्ता द्वारा जनसमूह का सम्बोधन हो, हाइपर-ईंटेंशन आपकी आंतरिक भावनाओं को नियंत्रित कर अतिशय कम कर देती हैं। अपने भय का मानवीकरण व उसे प्रेम व करुणा की संवेदनाएँ भेजना – अपने भय व आशंकाओं के प्रबंधन की एक उत्तम विधि है। प्रथम, गहरे श्वास भरें। दूसरे, अपने भय, आशंका या व्यग्रता को दूसरों या स्वयं के समक्ष बोल दें – यह शांत होने में सहायक होता है। प्रारम्भ में ही अपनी आशंका या उसके कारण को घोषित कर दें, बजाय उसे छुपाने के प्रयास के। उसे छुपाने का कोई भी प्रयास या तो उसे ओर अधिक उजागर कर देता है अथवा तो उस समय आपके समक्ष आए कार्य के प्रति आप १००% केन्द्रित नहीं हो पाते, चूंकि आप अपनी आशंकाओं के प्रति इतना सतर्क होते हैं कि यह सब आपमें और अधिक घबराहट पैदा कर देता है। आपका मन एवं कई अन्य लोग भी आपकी हिम्मत के लिए, व आगे बढ़ कर ईमानदार होने के लिए आपका सम्मान करेंगे। पूर्व घोषणा द्वारा आपने दूसरों को बता दिया है कि वे आपसे किस प्रकार की अपेक्षा रखें। यह ढंग अधिकांशतः सही सिद्ध होता है चूंकि यह सीधा भय के स्रोत तक जाता है।

और, आप पूछेंगे कि हमारे भय का स्रोत क्या है?

अपेक्षाएँ।

मेरी दृष्टि में, हमारी अपेक्षाएँ ही हमारे भय, आशंकाओं एवं व्यग्रता का प्राथमिक स्रोत हैं (मानसिक रोगों को छोड़ कर)। वे अपेक्षाएँ जो हमें स्वयं से एवं दूसरों से हैं। हम में से प्रत्येक अपने दैनिक जीवन में अपेक्षाओं का बोझ अनुभव करता है। यदि आप “सामान्य” समझे जाने की श्रेणी से किसी भी प्रकार से कुछ भिन्न हैं, तो इस बात का दबाव निरंतर बना रहता है कि आपको अन्य सभी की तरह का बनना होगा, अथवा तो अपने विलग होने का प्रमाण देना होगा। उदाहरणस्वरूप, लाखों बच्चों द्वारा अच्छा बनने का दबाव अनुभव किया जाता है। यह तब बनता है जब माता-पिता प्रेरणादायक कथनों द्वारा बच्चों को बताते रहते हैं कि वे किस प्रकार उन पर गर्व करते हैं, और बदले में बच्चे उस तरह का जीवन जीने के लिए दबाव महसूस करते हैं। यह सब सरल नहीं। यह उन्हें और अधिक व्यग्र कर देता है।

इस प्रकार की व्यग्रता व भय की स्थिति में से इन दो में से कोई एक बात होगी – या हम उस चीज का प्रतिकार आरंभ कर देते हैं (वह एक व्यक्ति, एक अपेक्षा,एक स्थिति अथवा अन्य कुछ भी हो सकता है) अथवा तो हम पूर्णत: हथियार डाल देते हैं (कि अब मुझे कोई परवाह नहीं)। हमारी आध्यात्मिक एवं भावनात्मक उन्नति के मार्ग में दोनों ही उपागम घातक हैं। एक आदर्श स्थिति में जिस बात की आवश्यकता है वह है अपनी अपेक्षाओं के मूल में बैठी अपनी अज्ञानता को समाप्त किया जाये, जो हमारे भय का मूल हैं। कभी न कभी तो हमें अपने प्रतिरोध को स्वयं में ही आत्मसात करना सीखना होगा, अपनी लापरवाही को सतर्कता में परिवर्तित करना ही होगा।

पुनः, जहां से मैंने प्रारम्भ किया था वहीं का संदर्भ लेते हुए, प्रेमा चोदरण का एक सुंदर उद्धरण प्रस्तुत है –

जीवन के प्रति अपने प्रतिरोध को विलय कर देने का मार्ग है उसका सामना करना। यदि हम इसलिए परेशानी अनुभव करते हैं कि कक्ष बहुत गरम है, तो हमें गर्मी का सामना कर उसकी उष्मता एवं भारीपन को महसूस करना होगा। जब हमें इसलिए परेशानी अनुभव होती है कि कक्ष बहुत ठंडा है, तो हमें शीत से मिलना होगा और इसकी ठंडक व चोट को महसूस करना होगा। जब हम वर्षा के प्रति शिकायत करना चाह रहे हों, तो हम उसका गीलापन महसूस करें। जब हमें चिंता होने लगती है कि तेज हवा हमारी खिड़कियाँ हिला रही है, हम हवा से भेंट कर उसकी आवाज सुन सकते हैं। अपनी अपेक्षाएँ मिटा कर निदान खोज लेना – यह एक उपहार है जो हम स्वयं को दे सकते हैं। गर्मी व सर्दी का कोई निदान नहीं। वह सदा इसी प्रकार आती जाती रहेगी। हमारे इस दुनिया से जाने के उपरांत भी सब कुछ निरंतर ऐसे ही चलेगा। सागर की लहरों के समान, दिन और रात की तरह – हर चीज का यही सहज स्वभाव है। हर चीज की सराहना कर पाना, हर चीज को गहराई से देख पाना, अपने दिलो-दिमाग खुले रख पाना – यही मर्म है।

अपने विभिन्न प्रकार के भय का सामना कर पाने के लिए कुछ मात्रा में साहस, कुछ दृढ़ संकलप का भाव, व एक प्रकार की प्रतिबद्धता की नितांत आवश्यकता रहती है। जब तक हम उनका सामना नहीं करते, हम उन्हें समझ नहीं पाएंगे। और जब तक हम अपने भय को समझ नहीं पाते, हम कभी उससे ऊपर कैसे उठ पाएंगे? भले कुछ भी हो, एक प्रेम व दयामय रवैया विकसित करना व सतर्कता का पालन करना – अपने अज्ञान को हटाने व भय को समाप्त करने हेतु ये अत्यंत आवश्यक हैं। यह हमें हमारी कमजोरियों का सामना करने के लिए तैयार करता है।

थियेटर में अपने मित्र के साथ फिल्म देखते हुए मुल्ला नसरुद्दीन जब जब शेर की दहाड़ सुनता तो कभी अपनी सीट में सिमट जाता, कभी इधर-उधर हिलता और कभी तो कूदने लगता। कभी वह अपने चेहरे को ढक लेता, कभी चिल्ला कर मित्र का हाथ पकड़ लेता।
“तुम्हें क्या हो गया है?” उसके मित्र ने उसे झिड़की दी। “अरे! यह एक फिल्म ही तो है!”
“मैं मूर्ख नहीं हूँ, मैं भी जानता हूँ की यह मात्र एक फिल्म ही है।” मुल्ला बोला, “लेकिन क्या उस शेर को यह बात पता है?”

हमारे विभिन्न भय भी कुछ इसी प्रकार हैं। हम अपने भय देखते हैं व बेचैन महसूस करते हैं। हम उनका विरोध करते हैं, उन्हें टालते हैं, उनसे दूर भागते हैं। हमारे भय उस शेर की भांति बस अपना काम कर रहे हैं। यह ऐसे ही चलता रहे, ऐसा आवश्यक नहीं। जिस क्षण हम स्वयं को और अधिक क्षमाशील, प्रेममय व सतर्क रहने की ओर प्रतिबद्ध कर लेते हैं, तब हम अपने भय से कहीं अधिक बलवान हो जाते हैं। जब आप इसमें परीक्षणरत होने लगते हैं कि जो अपेक्षाएँ आप स्वयं से व दूसरों से पाले हुए हैं, भले वे अधिकार भाव से आ रही हों अथवा अज्ञानता वश, तब आप स्वतः भय के उदगमस्थल तक पहुँच जाते हैं। एक बार उनके मूल तक पहुँच जाने पर, अपने भय को उखाड़ फ़ैकना आसान हो जाता है। इसके साथ ही, भय सदा बुरे ही नहीं होते। कभी कभी यह हमें योजना बनाने व तैयारी करने में, संयम रखने, योजनाओं के कार्यान्वयन से पूर्व उनके हर संभव परिणाम पर विचार करने में सहायक होते हैं।

वैदिक ग्रंथानुसार हमें भय के निवारण हेतु इन चार गुणों की आवश्यकता है –
१. दक्षता – एक स्तर का सामर्थ्य; इसका अर्थ है तत्परता, तैयारी।
२. उदासीनता – विरक्ति, वैराग्य का दूसरा नाम।
३. समर्पण – इस बात का ज्ञान कि अपने चारों ओर होने वाली सभी घटनाओं को मैं नियंत्रित नहीं कर सकता।
४. कृपा – यह अटल विश्वास कि जो दिव्य सत्ता इस सम्पूर्ण अनंत, अथाह ब्रह्मांड में विराजमान है, वही मेरे जीवन में भी संचारित हो रही है।

प्राथमिक भय तो अब भी, यदा कदा आकर आपको भयभीत करते रहेंगे, किन्तु यदि आप उपरोक्त गुणों के विकास की ओर अग्रसर हों तो निराधार भय समाप्त हो जाएँगे। अन्तःकरण में उपजा ज्ञान का प्रकाश आपके भय रूपी अंधकार का नाश कर देगा। और, स्मरण रहे, प्रकाश हमारा स्वाभाविक धर्म है। आप हाथों में नन्हा से दीपक छुपाए एक पूर्णत: अंधकार से भरे कक्ष में प्रवेश कर सकते हैं। जिस क्षण आप अपनी हथेलियाँ खोलते हैं, सम्पूर्ण कक्ष प्रकाशमय पाते हैं। किन्तु आप अंधकार के साथ ऐसा नहीं कर सकते। इसी सिद्धान्त को लागू कर आप अंधकार को हाथेलियों में नहीं छुपा सकते व एक जगमगाते हुए कक्ष को अंधकार से नहीं भर सकते। हम सब प्रकाश का ही अंश हैं, बस हमें केवल यह करना है कि हम स्वयं को छुपाएँ न।

अपनी चेतना को प्रकाशित करें ताकि आपके हृदय में अंधकार के लिए कोई स्थान न बचे। भय से ऊपर उठने हेतु उनसे बड़ा बनें। यह हर प्रकार से श्रेयस्कर है।

शांति।
स्वामी