जीवन अविरल बहती समयधारा का वह समुच्चय है जिसमें चरणबद्ध रूप से घटनाएँ प्रकट होती हैं; यह अनुभवों का एक गुलदस्ता है; मन की विभिन्न प्रवृतियों की एक अविराम दौड़; पुरानी चित्तवृत्तियाँ, मानसिक छापों का अपरिष्कृत संग्रह – जो सब आपके संग जन्मों जन्मों से यात्रा करते हुए, साथ साथ बंधा चला आ रहा है; जो आपको आपका वर्तमान स्वरूप प्रदान किए हुए है। प्रायः लोग कुछ नया करने; एक नवीन अभ्यास बनाने, किसी विचार को कार्यरूप देने, ध्यान में बैठने, व्यायाम करने आदि का प्रण ईमानदारी पूर्वक लेते तो हैं, किन्तु, अपने प्रण व उसके अनुपालन के मध्य ही वे उत्साहहीन होकर रुक जाते हैं। वे अनुशासित ढंग से रहना चाहते हैं, अपनी प्रवृतियों को बदलने का अथक परिश्रम भी करते हैं किन्तु, प्रायः, वे उससे विपरीत दिशा में कार्य करने लगते हैं जिसके लिए उन्होंने ईमानदारी से प्रण लिया था। क्या इसका अभिप्राय यह है की वे आरंभ से ही सच्चा प्रयास नहीं कर रहे थे? क्या उनके लक्ष्य कुछ अधिक महत्वाकांशी थे? वास्तव में ऐसा नहीं है।

आज मैं आपके सम्मुख एक महत्वपूर्ण व अनिवार्य जानकारी लाया हूँ। भावनात्मक रूपान्तरण की राह पर यह आपके लिए अति सहयोगी होगी। मान लें कि अपने मानसिक परिष्कार हेतु आप मौन, दृढ़ संकल्प, एकांत व एकाग्रता के अभ्यास में रत रहे; तत्पश्चात आपने कृतज्ञ भाव व सहिष्णुता अपना कर अपने भावनात्मक स्तर को ऊँचा उठाते हुए, स्वयं में विश्रांति व आनंद की अनुभूति प्राप्त करनी आरंभ कर ली है। तथापि, ऐसी कई स्मृतियाँ हैं जो आपको यदा कदा परेशान करती हैं, ऐसी घटनाएँ जिन्हें आप स्मृति से निकाल पाने में असमर्थ हैं, ऐसे व्यक्ति जिन्हें आप क्षमा नहीं कर पा रहे, कुछ कृत्य जो आप भूल नहीं पा रहे, इत्यादि। आप क्षमा करना चाहते हैं, भूलना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं, ऊपर उठना चाहते हैं, तथापि, कुछ ऐसा है जो आपके अन्तःकरण में गहरे पैठ जमाये हुए है, संभवतः कोई पीड़ा, कोई वेदना आपको निजरूप में रहने व सदा प्रसन्न रहने से रोक रही है।

भावनात्मक रूपान्तरण की आपकी निजयात्रा में मैं आपके साथ भावनात्मक उपचार का अभ्यास साझा करने जा रहा हूँ। यदि आप स्वयं को अपने जीवन के अधिकांश, यदि सभी नहीं भी तो, कटु अनुभवों से प्राप्त दुःख व पीड़ा से बाहर निकाल पाते हैं तो आप शीघ्र ही एक दिव्य-आनंद का अनुभव प्राप्त कर लेंगे, वह भी ध्यान प्रक्रिया के कठोर परिश्रम के बिना। इस लेख में मैं आपका परिचय मूल-अभिधारणा से करवा रहा हूँ; आगामी लेख में मूल-अभ्यास का विवरण होगा।

एक व्यक्ति था, उसका नाम बो था। उसकी आयु लगभग ४४- ४५ वर्ष, व वह एक उच्च अधिकारी के पद पर एक बड़ी संस्था में कार्यरत था। उसका एक हँसता-खेलता परिवार था जिसमें उसकी प्रिय पत्नी व दो प्यारे बच्चे थे। किन्तु, बो अपने दायें घुटने में अक्सर होने वाले दर्द व अपने स्वभाव में आने वाले अनियंत्रित बदलाव से लगभग टूट चुका था। शारीरिक रूप से वह पूर्णतः स्वस्थ था; उसकी सभी जांच रिपोर्ट भी सामान्य थीं। उसके घुटने में उठने वाले दर्द का कोई औपचारिक कारण नहीं मिल रहा था। जहां तक उसके स्वभाव के उतार-चढ़ाव का प्रश्न था, तो वह उस समय भी घटित हो जाता जब वह छुट्टियाँ मना रहा होता, काम के तनाव से कोसों दूर। उससे भी बिगड़ी हुई स्थिति यह थी कि यह अनुभव उस समय अधिक होता था जब वह अन्य लोगों के समूह में उपस्थित होता। जब कभी भी वह इस बुरी स्थिति में होता तो वह अपनी पत्नी को अपशब्द कह बैठता, जिससे उसकी पत्नी को बुरा लगता। उनके पारस्परिक संबंध बिगड़ रहे थे। वह बाद में क्षमा भी मांगता, किन्तु उस क्षमा-प्रार्थना का प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका था, चूंकि, उसका अपशब्द कहना फिर क्षमा-प्रार्थना करना – यह कड़ीबद्ध रूप से निरंतर हो रहा था।

उन्होंने अनेकों उपाय किए किन्तु कोई सफलता हाथ न लगी। एक शुभ दिन उनकी भेंट एक सच्चे-वास्तविक उपचारक से हुई। उन उपचारक ने बो को अपने जीवन की सभी प्रमुख घटनाओं का स्मरण कर उनका वर्णन करने को कहा, मुख्यरूप से जब उसे दुःख व पीड़ा का अनुभव हुआ हो – शारीरिक अथवा मानसिक। कुछ घंटों के स्मरणसत्र के उपरांत वे इस तथ्य को समझ चुके थे कि किस कारण उसे अचानक घुटने का दर्द होने लगता था व क्यों उसका स्वभाव अनियंत्रित हो जाता था। उन्हें यह समझ आया कि स्कूल में बो का मज़ाक बनाया जाता था। एक दिन एक दबंग विद्यार्थी ने बो के दाएँ घुटने पर बेस बाल के बल्ले से कठोर प्रहार किया। उस प्रहार से बो का घुटना टूटा तो नहीं, किन्तु वह असहनीय पीड़ा से कराह उठा। उसके रोने-बिलखने व चीखने-चिल्लाने के स्वर ने बहुत से अन्य लोगों का ध्यान उसकी ओर आकर्षित कर लिया, और उसे तत्काल प्राथमिक चिकित्सा दी गई। उस दबंग विद्यार्थी को विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया, तदोपरांत कभी किसी ने बो को विद्यालय में परेशान नहीं किया।

तथापि, उस कटु अनुभव ने बो के मन में स्थायी रूप से घर बना लिया। जब कभी भी वह बाजार से गुजरता, यदि उसकी निगाह बेस बाल के बल्ले या उस खेल से संबन्धित किसी भी वस्तु पर पड़ती, तो उसे घुटने में पीड़ा अनुभव होती। यह सब उसके अवचेतन मन में हुआ, जिसकी उसे स्वयं को भी जानकारी नहीं थी। चिल्लाना उसका पीड़ा सहने का माध्यम बन गया व उसके स्वभाव के उतार-चढ़ाव आरंभ होने का संबंध बेस बाल के खेल से जुड़ी किसी भी वस्तु से था, मुख्य रूप से बल्ला।

आप जीवन में जिस भी प्रकार के अनुभव करते हैं, जो भी क्रिया-कलाप करते हैं, अथवा जैसी भी स्थिति से गुजरते हैं, वह सब आप पर एक छाप छोड़ जाता है, एक मानसिक छाप। यही छाप आपके विचारों का इंद्रजाल बुनते हैं; आपकी प्रवृत्तियों की रूपरेखा, आपकी आदतें, आपका स्वभाव, आपके व्यक्तित्व से जुड़ी संभवतः हर बात निर्मित करते हैं। अनैच्छिक मानसिक छाप मिटाने के अनेक उपाय हैं। उसके लिए एक योगिक प्रणाली है व एक बौद्धिक। मैं इन दोनों का वर्णन आगामी लेख में करूँगा। नए लेख पढ़ते रहें।

शांति।
स्वामी