गत कुछ महीनों में हमने आत्म-परिवर्तन के मार्ग पर, मानसिक परिष्कार के मुख्य सूत्रों की विवेचना की। अब मैं आपके लिए भावनात्मक रूपान्तरण का उल्लेख करूंगा। आने वाले आठ से दस सप्ताह में मेरा इस श्रंखला को सम्पूर्ण करने का लक्ष्य रहेगा।

यद्यपि मैं अपनी व्याख्या का प्रारम्भ आज से कर रहा हूँ, तथापि, भावनाओं के विषय पर मैं पहले भी बहुत कुछ लिख चुका हूँ। मुख्यतः सकारात्मक व नकारात्मक भावनाओं पर, सकारात्मक रहने पर, प्रेम पर, एवं नकारात्मक भावनाओं पर विजय पाने को ले कर। यदि आपने वह लेख नहीं पढ़े तो मेरा आपसे अनुरोध है कि आप उन्हें अवश्य पढ़ें, विशेष रूप से “आठ सांसारिक भावनाएं”। तो चलें अब आगे कि खोज की ओर बढ़ें –

जीवन में सभी प्रकार की प्रतिक्रियाएँ आपकी भावनाओं से ही उत्पन्न होती हैं। साधारणतः वह विचार जिनका आप त्याग नहीं करते, वही भावनाओं एवं इच्छाओं का रूप धारण कर लेते हैं। जैसे, यदि आप किसी को नापसंद करने के विचार का त्याग नहीं करते, तो संभवतः वह विचार घृणा के रूप में परिणत हो जाएगा। तथापि, भावनाएँ केवल अपरितक्त विचारों तक ही सीमित नहीं। वह इससे कहीं अधिक गुह्य हैं; विचारों को रखने अथवा त्यागने के सरल गणित से कहीं अधिक गहरी। जब कभी भी आपका प्रतिबंधित मन किसी अच्छे अथवा बुरे अनुभव से गुजरता है, तो वह अपनी मानसिक छाप छोड़ जाता है।

योगिक ग्रन्थों में इसे “चित्तवृत्ति” कहा गया है। यह छाप अनेकानेक जन्मों से उपार्जित होते हैं व एकत्र होते चले जाते हैं। ऐसे मानसिक छाप एक विशाल भंडारगृह में एकत्रित होते रहते हैं, जिसे आप मन के नाम से जानते हैं। अवसादन (तलछटी बनना) की प्रक्रिया की ही तरह आप मानसिक छाप अवसादित कर लेते हैं – अति गहन मानसिक चिन्ह (संस्कार)। उनसे छुटकारा पाना कठिन होता है। किन्तु, ऐसा संभव है। और, भावनात्मक रूपान्तरण के अंतर्गत मेरा मुख्य ध्यान इसी बिन्दु पर है – आपके समक्ष आपकी भावनात्मक स्थिति उजागर करना; उसके कारणों को समझना; उसे निर्मल करने की दिशा में कार्य करना – जो आपको सम्पूर्ण भावनात्मक रूपान्तरण की ओर ले जाएगा।

विचारों की इकाई की भांति, भावनाएं निरपेक्ष (सुनिश्चित) नहीं होतीं। वे सापेक्ष (प्रासंगिक) होती हैं। चूँकि इनका मौलिक स्वभाव अनिश्चित है, अत: इन पर सतर्कता/सजगता एवं अभ्यास द्वारा विजय पाई जा सकती है। अक्सर, सबके पास अच्छा या बुरा, प्रसन्न या अप्रसन्न, दयालु या निर्दयी इत्यादि महसूस करने के पीछे एक कारण होता है। ऐसे कारण केवल बहाने होते हैं। एक विशेष भावना, या किसी भी भावना को अपने ऊपर हावी होने देने को किसी भी तर्क द्वारा न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। जैसे जैसे आप अपने मन को स्थिरता द्वारा शुद्ध करते चलते हैं, मानसिक छापों को मिटाते चलते हैं, वैसे वैसे आप समता की स्थिति अनुभव करने लगते हैं, भले ही आपके आसपास के वातावरण में कुछ भी हो रहा हो। आप भौतिक जगत के सापेक्ष व अन्योन्याश्रित (एक दूसरे पर निर्भर) रूप को समझने लगते हैं।

एक बार किसी व्यक्ति ने आइन्स्टाइन से कहा, “मुझे आपका थियरि ऑफ रिलेटिविटी  से संबन्धित तकनीकी ज्ञान व वैज्ञानिक खोज बिलकुल समझ नहीं आते। क्या आप इसे सरल शब्दों में मुझे समझा सकते हैं?”
“जब आप किसी सुंदर स्त्री के साथ भोजन कर रहे हों तो दो घंटे का समय दो मिनट लगता है,” आइन्स्टाइन ने कहा, “और, यदि आप एक गरम तवे पर बैठे हों तो दो मिनट भी दो घंटे प्रतीत होते हैं। यही सापेक्षता है।”

आपको हँसी आ गई? यही बात, हूबहू, भावनाओं पर भी लागू होती है। यह सब सापेक्ष है। स्व-भ्रम/विभ्रांति आपको इस विश्वास की और ले जा सकता है कि आपकी भावनात्मक स्थिति निर्भर करती है कि आपको क्या प्राप्त है अथवा अभाव हैं। जबकि आपका वास्तविक स्वरूप, आपकी अनुभवातीत भावनात्मक स्थिति, हर प्रकार की सापेक्षता व अन्योन्याश्रितता से पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। जब आप यह मानना शुरू कर देते हैं कि कुछ विशेष चीजें पा कर ही आपको खुशी मिलेगी, तो आप स्वयं को भावनात्मक स्तर पर दुर्बल कर लेते हैं। जैसे ही आपको वह सब प्राप्त हो जाता है, तब कामनाओं की एक और सूची बन कर तैयार हो जाती है, जो आप अपनी प्रसन्नता हेतु चाहते हैं। आप उस सूची को पूरा करते चलते हैं और वह सूची बढ़ती चली जाती है। यह कभी न समाप्त होने वाली एक दौड़ बन जाती है – प्रसन्नता को ढूँढना या अच्छा महसूस करना।

यदि आपकी भावनात्मक स्थिति बहुत सी वस्तुओं पर निर्भर करती है, तो समझ लें कि आप में भावनात्मक स्थिरता नहीं है। चूँकि, जब भी उनमें से एक भी वस्तु अविद्यमान होगी तो वह आपका भावनात्मक संतुलन बिगाड़ देगा। अंतर्जगत की यात्रा आपका आपके वास्तविक स्वरूप से साक्षात्कार करवाती है, ताकि आप सांसारिक भावनाओं से ऊपर उठ सकें। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि अब आप संसार का आनंद नहीं ले पाएंगे, वरन, अब आप किसी भी समय किसी भी भावना का, अपनी इच्छानुसार परित्याग कर सकते हैं; अब आप अपने चारों ओर की वस्तुओं व परिस्थितियों का सापेक्ष रूप समझने में समर्थ हो रहे हैं। आपका वास्तविक स्वरूप, जो सम्पूर्ण है, वह किसी भी अस्थिर वस्तु अथवा स्थिति पर निर्भर नहीं होता। सापेक्षता को देख पाना, उसका बोध होना, व उससे ऊपर उठना ही आत्म-साक्षात्कार है।

प्रसिद्ध सूफी व्यक्तित्व – मुल्ला नसरूद्दीन – के बीस वर्षीय पुत्र ने एक बार पूछा, “पिताजी, क्या एक टन कोयला बहुत अधिक होता है?” मुल्ला जी बोले, “पुत्र, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप कोयला खदान से निकाल रहे हैं अथवा क्र्य कर रहे हैं।”

संसार तो सदा इसी सापेक्ष रूप में रहेगा, किन्तु आपके पास यह विकल्प है कि आप इस भौतिक जगत में रहते हुए ही अपने वास्तविक बोध को पा लें। इस प्रकार का वास्तविक बोध आपको अपना संसार अपनी इच्छानुसार रचित करने का आधार प्रदान करेगा। और, इसके साथ एक लाभ यह होगा कि हर वह व्यक्ति जो आपके संपर्क में आएगा, वह भी दिव्य आनंद का आस्वादन कर पाएगा।

आगामी लेख में मैं भावनात्मक रूपान्तरण के एक महत्त्वपूर्ण अभ्यास को शब्दरूप दूँगा।

शांति।
स्वामी