सभी आयु के पाठक मुझसे ऊब के विषय में प्रश्न करते हैं। कुछ अपनी दिनचर्या से ऊब रहे हैं, कुछ अपने जीवन-साथी से तो कुछ व्यक्ति अपने पूर्ण जीवन से ही ऊब रहे हैं। विशेषतर माता-पिता मुझसे पूछते हैं कि वे अपने बच्चों को कैसे समझायें जब बच्चे यह कहते हैं कि बोरियत के कारण वे पढ़ाई नहीं करना चाहते। मेरे अनुसार ऊब दो प्रकार की होती हैं – आलसी ऊब तथा क्रियाशील ऊब। इन दोनों परिस्थितियों में आप का मन आप को ऊब के साधन से दूर करना चाहता है। जब आप ऊब रहे हैं तब आप मन की कुशाग्रता खो देते हैं और यह आप को अशांत अथवा आलसी बनाता है। मैं ने सैकड़ों व्यक्तियों को देखा है जो हाथ में किसी वस्तु को ले कर चुलबुलाने लगते हैं और कईं तो ऊब के कारण पैरों को हिलाने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में ऊब सूक्ष्म परंतु अहम होती है। उदाहरणार्थ आप किसी रोमांचक चलचित्र को देखते समय अथवा एक अच्छी पुस्तक पढ़ते समय पैरों को नहीं हिलाते हैं।

जब व्यक्ति दिलचस्पी की कमी के कारण ऊब जाता है तो बहुधा मन मंद होने लगता है और नींद आने लगती है। यह आलसी बोरियत है। जब आप सोने जा रहे होते हैं तब आप इस का अनुभव करते हैं – मन की गति धीमी हो जाती है। एक ऐसा मन जिस में कईं विचार दौड़ रहे हों और जो अत्यधिक भावनाओं से भरा हो उसे शांत करने की आवश्यकता है। परंतु जब आप का परिवेश आप को प्रोत्साहित नहीं कर पाता और इस कारण आप ऊब जाते हैं तो आप अधीर हो जाते हैं। यह आप को अशांत कर देता है। यह क्रियाशील बोरियत है। अर्थात आप का मन सक्रिय है और वह कुछ नवीन करना चाहता है, किसी भिन्न प्रकार के परिवेश में जहाँ उसे उत्तेजना प्राप्त हो।

मेरा यह मानना है कि ऊब महसूस करने में कोई बुराई नहीं हैं। यदि बोरियत इतना बड़ा अभिशाप होता, तो हम अब भी पाषाण युग में होते। कहीं न कहीं मानव जाति की प्रगति में, ऊब की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कुछ महान आविष्कार आवश्यकता के कारण नहीं किए गए थे परंतु इसलिए किए गए थे क्योंकि कोई ऊब गया था और वह कुछ नया करना चाहता था। यदि आवश्यकता आविष्कार की जननी है, तो बोरियत संभवत: ऊब के पिता हो सकते हैं। यह इसलिए क्योंकि ऊब नवाचार की आवश्यकता को प्रोत्साहित करता है। जब आप ऊब रहें हों तब यदि आप को नींद आ रही है, तो इस का यह अर्थ है कि आप को अपने मन को उत्तेजित करने की आवश्यकता है और उस के लिए कुछ ऐसा खोजना है जिस में आप को दिलचस्पी हो। किंतु जो आप कर रहे हैं यदि वह अत्यंत महत्वपूर्ण है और आप ऊब के कारण उस का त्याग नहीं कर सकते, तो कुछ देर विश्राम करें। अपने मन को ताज़ा करने के पश्चात वह कार्य करें। जिस प्रकार हर व्यक्ति कुछ समय के लिए ही ध्यान कर पाता है, उस ही प्रकार उस के लिए हर कार्य करने की कोई सीमा होती है। कुछ पहले दस मिनट में ही ऊब महसूस करने लगते हैं तो कुछ तीस मिनट के पश्चात और कुछ उस से भी अधिक समय बिना ऊबे काम कर पाते हैं। अभ्यास एवं सचेत प्रयास द्वारा आप अपनी बोरियत की सीमा बढ़ा सकते हैं!

यदि आप ऊब रहे हैं तो इस का यह अर्थ है कि आप को ईश्वर ने बुद्धि और सोचने की शक्ति प्रदान की है तथा आप कोई बुद्धिहीन पशु नहीं हैं। यह विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए है जो ऊब के समय अधीरता का अनुभव करते हैं। यह दोनों परस्पर संबद्धित हैं – अधीरता ऊब की वृद्धि करता है और ऊब अधीरता को तीव्र करता है। बोरियत के विषय में आप को दो बातें जाननी हैं। एक प्रसंग द्वारा मैं इसे स्पष्ट करता हूँ।

एक समय की बात है एक साधक निष्ठा से ध्यान करता था परंतु सफल ना हो पाया। उस ने अपने गुरु से कहा – “मैं ऊब रहा हूँ और मैं बेचैनी महसूस कर रहा हूँ। मैं ध्यान करने में असमर्थ हूँ।”
“चिंता ना करो और इस के लिए कोई प्रतिक्रिया ना दिखाना। यह स्थिति अवश्य बदल जाएगी और यह समय बीत जाएगा। अपनी स्थिरता ना खोना। दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ते रहो”, गुरु ने कहा।
कुछ सप्ताह पश्चात वह दौड़ते हुए गुरु के पास आया और बोला “ओह, मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं ने पूर्ण जीवन में इतनी कुशलता से ध्यान कभी नहीं किया।”
“इतने अधिक उत्साहित ना हो और इस के लिए कोई प्रतिक्रिया ना दिखाना। यह स्थिति भी अवश्य बदल जाएगी और यह समय भी बीत जाएगा। अपने चुने हुए मार्ग पर चलते रहो। दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ते रहो।”, गुरु ने कहा।

यह कथन न केवल ध्यान करने के लिए उपयुक्त है किंतु जीवन के कईं अन्य पहलुओं के लिए भी यह निश्चित रूप से सही है। मनुष्य अपनी नौकरी से, रिश्तों से तथा अपने जीवन से भी ऊब जाता है। ऊब के विषय में आप को सर्व प्रथम यह जानना है कि यह अस्थायी है। यदि आप किसी ऐसी वस्तु, काम अथवा विषय से ऊब जाते हैं जिस से आप बच कर भाग नहीं सकते तो उसे स्वीकार करना सीखें तथा संकल्प के साथ सतर्कता का अभ्यास करें। शीघ्र ही बोरियत की अवस्था समाप्त हो जाएगी। जहाँ अनुराग और भक्ति हो, वहाँ ऊब जाने की संभावना अत्यंत कम होती है। एक माँ कदाचित अपनी संतान से ऊब नहीं जाती परंतु चंचल बच्चा बहुधा अपनी माँ से ऊब सकता है। अंत में यह आप की प्राथमिकताओं पर निर्भर है।

ऊब के विषय में आप को दूसरी बात यह जाननी है कि आप ही यह चुनते हैं कि आप को ऊब जाना है। हाँ, यही सत्य है। जब आप अपने अशांत मन को यह अवसर प्रदान करते हैं कि वह आप को अपने वश में कर ले, तब आप अधीरता एवं ऊब का अनुभव करते हैं। और जब आप का आलसी मन आप पर भारी पड़ जाता है तब आप नींद एवं ऊब का अनुभव करते हैं। यही सरल सत्य है। यदि आप ऊब को एक सकारात्मक विषय के रूप में देखना आरंभ करते हैं, तो आप का मन प्रतिकार करना बंद कर देगा। इस के लिए जागरूकता की आवश्यकता है। आप को स्वयं को ध्यान से देखना होगा और यह पता करना होगा कि आप कब ऊब रहे हैं। यह समझें कि आप को स्वयं का साक्षी बन ना होगा। स्वीकृति और सतर्कता द्वारा आप आलसी बोरियत को दूर कर सकते हैं। जागरूकता और विश्राम आप को अशांत ऊब से बाहर आने की सहायता करते हैं।

यदि कभी कभी आप ऊब जाते हैं तो यह कोई प्रचंड समस्या नहीं है। उसे स्वीकार करें। यदि आप उसे दूर करना चाहते हैं, तो जागरूकता के साथ ऐसा करें। जब मैं कईं महीनों के लिए हिमालय में एकांत में रहा तो वहाँ ना बिजली थी, ना बात करने के लिए कोई और व्यक्ति, ना पुस्तक, ना संगीत, ना पक्षी – केवल श्वेत हिम था – और ऐसे में मैं ने अपने आप को ऊब जाने की अनुमति नहीं दी। मैं ने केवल ध्यान की साधना की। जब ध्यान करते करते थक जाता तो मैं चिंतन करने लगता, और जब चिंतन करते करते थक जाता तो मैं ध्यान करने लग जाता। यदि आप पूर्ण प्रतिबद्धता से अनुशासित रहें, तो ऊब आप को छू भी नहीं सकती क्योंकि बोरियत अधिकतर एक बहाना होता है वास्तविक कारण नहीं। एक ऊबे हुए मन से दुष्ट विचार उत्पन्न होते हैं। महान ब्रिटिश विचारक बर्ट्रेंड रसल के शब्दों में – ऊब नीतिज्ञ के लिए एक महत्वपूर्ण समस्या है क्योंकि मानव जाति के आधे पाप तो ऊब के भय के कारण ही किए जाते हैं।

जब आप ऊब की लहर को पार कर देते हैं, तब आप स्वयं को आनंद के सागर में पाते हैं। आप की बुद्धि अत्यंत तीक्षण हो जाती है तथा उभरते हुए वह आप की चेतना में और प्रमुख एवं प्रभावशाली होते हुए आप को अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

शांति।
स्वामी