गत सप्ताह के लेख के उपरांत मेरा मेल बॉक्स मानो ई-मेल से डूब ही गया। अधिकांश पाठकों के समक्ष एक ही प्रकार के व्यवधान थे। विषेशरूप से यह कि ध्यान करते हुए उनका मन भटक जाता है व उन्हें पुनः उसे अपने ध्यान की वस्तु पर स्थापित करने में अतिशय संघर्ष करना पड़ता है। दूसरा सर्वाधिक किया गया प्रश्न यह कि उन्हें किस वस्तु पर ध्यान लगाना चाहिए? अपने विगत लेख में मैंने कुछ भी न करने एवं वर्तमान क्षण में बने रहने के संबंध में लिखा था। “वर्तमान क्षण में कैसे बने रहा जाये तथा किस प्रकार कुछ भी न किया जाये?” उन सब ने प्रश्न किया। आइये इसे क्रमबद्ध रीति से समझा जाये।

आज मैं महामुद्रा ध्यान के नौ चरणों पर लिखने का विचार कर रहा था, किंतु गत सप्ताह प्राप्त आप सब के प्रश्नों के उपरांत मैंने सोचा कि पहले मैं आप सब को मन की नौ अवस्थाओं से परिचित करा दूँ, जिन्हें मनोयोग/सावधानी की नौ अवस्थाएँ भी कहा जाता है। यौगिक ग्रंथों में इसे नवकार चित्तस्थिति कहा जाता है, जिसका मौलिक अर्थ है – मानसिक दशा के नौ रूप। ध्यान के अभ्यास में अनेकानेक वर्षों के अपने अनुभव के पश्चात मैं यह बात पूर्ण विश्वास व दृढ़तापूर्वक आपको बता सकता हूँ कि सभी महान ध्यान-योगी – पूर्णत: नए जिज्ञासु से लेकर बड़े से बड़े योगी तक – सभी इन अवस्थाओं से हो कर गुज़रे हैं। कोई भी व्यक्ति ध्यान कौशल में जन्म से पारंगत नहीं होता। इसे सीखा जाता है। और, इस प्रशिक्षण हेतु जीवन का हर समय उपयुक्त है।

सभी जिज्ञासु जो उस दिव्य आनंद की अनुभूति के लिए लालायित हैं, उन्हें मैं बताना चाहता हूँ कि मन की उस शाश्वत, शांतिप्रिय अवस्था तक पहुँचने के लिए, जहां आपका मन पूर्ण समत्व भाव में रहता है और आपका अपने विचारों से संघर्ष पूर्णत: समाप्त हो जाता है, इसके लिए निरंतर, अविराम, अनुशासित, गहन प्रयास आवश्यक होता है। आप पूछ सकते हैं कि कितना गहन प्रयास? इसके उत्तर से पूर्व मुझे आपके साथ मनोयोग (सावधानी) की नौ अवस्थाएँ साझा करनी हैं। आप उन्हें मन के प्रशिक्षण का मार्ग भी कह सकते हैं। अधिकांश जिज्ञासुओं को ध्यान में जिस स्थिति तक पहुँचने की आकांक्षा रहती है वह है नौवीं अवस्था। वहाँ पहुँचने हेतु आपको हर पूर्व अवस्था से गुज़र कर आगे बढ़ना होगा।

१. मनोयोग का स्थान-निर्धारण करना

ग्रंथों में इसे ‘चित्तस्थापना’ कहा गया है, अर्थात, मन का स्थान नियोजन। ध्यान पिपासु के जीवन का यह प्रथम सोपान है। इस अवस्था में मन निरंतर इधर उधर भटकता रहता है व किसी एक विचार पर मात्र कुछ क्षण से अधिक नहीं रुक पाता। इस अवस्था में ध्यान करना मन के साथ युद्ध जैसा प्रतीत होता है। मूलरूप से इस अवस्था में साधक द्वारा विचारों को दिशा देने का प्रयास और अधिक बेचैनी में परिणित हो जाता है।

२. सविराम मनोयोग

इस अवस्था को ‘संस्थापना’ कहते हैं जिसका अभिप्राय मनोयोग को सांत्वना अथवा बढ़ावा देना भी है। ध्यान करते समय साधक अच्छे मनोयोग के लघुकाल (कुछ क्षण तक बने रहने वाले) अनुभव करता है। यह वह समयकाल होते हैं जब मन इधर उधर नहीं भटकता। मन के कुछ क्षण तक शांत बने रहने के पश्चात विचार पुनः उठने लगते हैं, परंतु बहुधा साधक कई मिनट तक इन भटकते हुए विचारों से अनभिज्ञ होता है। उसे “विस्मरण” हो जाता है कि वह ध्यान करने बैठा था।

३. स्थायी मनोयोग

इस अवस्था को ‘अवस्थापना’ कहते हैं, और दिलचस्प बात यह है कि इसका अर्थ प्रकट करना अथवा खोल देना भी होता है। क्या होता है जब आपके शरीर को ताप अथवा शीत के सम्मुख खोल दिया होता है? आपको उसका अनुभव और अधिक होता है न? इसी प्रकार ध्यान के समय जब आप अपने मन को प्रकट करते हैं, खोलते हैं, तो आप और अधिक जागरूक व सतर्क हो जाते हैं। अपने मन को खोल कर रखना ही सजगता कहलाता है। पूर्व की एवं इस अवस्था में मूल भिन्नता सतर्कता के स्तर की है। इस अवस्था में साधक अपनी चौकसी सदा बनाए रखता है और जैसे ही मन का भटकाव आरंभ होता है, उसे ज्ञात हो जाता है।

४. स्थिर मनोयोग

इसे ‘उपस्थापना’ कहते हैं। अक्षरक्ष: इसका अर्थ है तैयार होना, और यह अवस्था इसी संदर्भ में है – वास्तविक ध्यान के लिए तैयार होना। इस अवस्था में अधिकांश समय साधक एक सत्र में अपना मनोयोग बनाए रख पाता है। किंतु, अभी भी उसे बेचैनी व नीरसता के दौर अनुभव होते हैं।

५. सुबोधगम्य मनोयोग

साधक मन की गहन शांत अवस्था का अनुभव कर पाता है। इस अवस्था को संस्कृत में ‘दमन’ कहते हैं जिसका अर्थ है साधी हुई अथवा विरक्त। इस अवस्था में साधक का मनोयोग साधा जा चुका होता है। यहाँ मुझे अधिकांश साधकों में व्याप्त एक त्रुटिपूर्ण धारणा का विवरण अवश्य देना चाहिए। जब आप ध्यान में शांतिमय अनुभव करते हैं तो कभी कभी यह इस कारण भी होता है कि आपकी सुस्पष्टता (आपके ध्यान में व्याप्त वह कुशाग्रता, तीक्षता) पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी होती है। यह मनोयोग को साध लेना नहीं है।

६. मन का प्रशमन

इस अवस्था को ‘शमन’ कहते हैं व इसका अर्थ है बुझा हुआ। ऐसे साधक के मन से सभी विचार समाप्त हो चुके होते हैं, और मन हर प्रकार के व्यवधानों से मुक्त होता है किंतु ऐसा मानसिक श्रम कभी कभी बेचैनी अथवा उत्सुकता भरी कुछ मंद भावनाओं को जन्म दे सकता है। यह ऐसा प्रमुखतः इस कारण होता है चूंकि आपने वह कर दिखाया है जिस की आदत मन को कभी थी नहीं – यानि शांत रहना, स्थिर रहना। केवल गंभीर व पूर्णत: समर्पित साधक इस अवस्था में पहुँचते हैं।

७. मन का सम्पूर्ण शमन

इसे ‘व्युपशमन’ कहते हैं । सर्वाधिक दिलचस्प बात यह कि ‘व्युप’ शब्द का अर्थ है वह जो अपने ही हाथों से खाता हो। यह ध्यान की सर्वोत्कृष्ट अवस्थाओं में से एक है। इस अवस्था में मन अपने आप पर तीक्ष्ण निगरानी रखता है। वह नीरसता, बेचैनी, विचार, भावनाओं एवं अन्य सभी व्यवधानों को पहचानने में समर्थ होता है। मन पूर्ण रूप से शमित है व शांति सागर में डूबे रहने से भयभीत नहीं।

८. गहन मनोयोग

इस अवस्था में मन एकेन्द्रित एकाग्रता प्राप्त कर चुका होता है। इसे ‘एकोतिकरण’ कहते हैं। साधक एक स्थिर आसन में अविचल बैठे हुए लगभग दो घंटे तक बिना किसी व्यवधान के, सुस्पष्ट ध्यान लगा सकता है। इस कालावधि में लगभग कोई नीरसता अथवा बेचैनी अनुभव नहीं होती।

९. प्रगाढ़ तन्मयता

इसे ‘समाधान’ कहते हैं व इसका अर्थ है सम्पूर्ण प्रशांत संतुलन। इस अवस्था में साधक बिना प्रयास के ध्यान लगा लेता है व एक बार में चार घंटे तक सम्पूर्ण विश्रांति की स्थिति में, अपना आसन पूर्णत: स्थिर रखते हुए बैठ सकता है।

इन नौ अवस्थाओं से आगे है परम-चेतना, परम-बोध की चरम अवस्था। अस्तित्व का पारलौकिक आयाम। महामुद्रा के नौ चरण उपरोक्त नौ अवस्थाओं से लगभग मिलते जुलते ही हैं। एक गंभीर साधक इनके विषय में जानकारी पाकर लाभान्वित हो सकता है। अतः मैं आगामी लेख में इन पर लिखने का प्रयास करूंगा। यह प्रश्न पूर्ववत खड़ा है कि – कितने गहन प्रयास की आवश्यकता होगी? आगामी लेख की प्रतीक्षा करें।

शांति।
स्वामी