किसी ने मुझसे एक दिन पूछा अपनी मस्तिष्क की क्षमता बढ़ाने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ?  आगे उसने स्पष्ट किया कि उसका तात्पर्य यह है कि, व्यक्ति क्या करे कि वह  और अधिक रचनात्मक हो सके और  अपनी पूर्ण क्षमता का साक्षात्कार  कर सके।

उसके इस प्रश्न ने मुझे  प्लेटो के गुफा के दृष्टांत का स्मरण करा दिया।“बुक VII ओफ़  रिपब्लिक “ में प्लेटो ने  संसार और यहाँ के निवासियों की तुलना  गुफा और उसके क़ैदियों से की है । वे  जो सामने है  उसे ही मात्र देख सकते हैं, लेकिन अपने चारों ओर क्या है उसे नहीं देख सकते। “द बुक्स सेव्ड माय लाइफ़ इन प्रिसन” से क्रिस विल्सन के शब्द   इस प्रकार हैं:

“प्लेटो ने  लोगों के समूह के बारे में बात की है, जो  एक गुफा में ज़ंजीर से बँधे हुए  हैं। ये  सभी  मात्र उनकी छाया को देख सकते हैं । उनका  विश्वास है  कि,  उनकी छायाएँ सारा संसार हैं और वे उन छायाओं के बारे में  वाद – विवाद करते हैं और वे उनको अपना जीवन बना लेते हैं।  बाद में एक दिन एक आदमी बचकर सतह पर जाता है और वास्तविक संसार  नीले आकाश, हरे वृक्ष और गर्म सूर्य  को देखता है। वह उस सौंदर्य और संभावनाओं  को देखकर  इतना पागल  हो जाता है कि  बस रोने लगता है।”

बहुत अधिक प्रयास के बाद किसी भी कौशल में प्रवीणता प्राप्त कर पाना  संभव है, लेकिन इससे उसकी चेतना का  विस्तार हो यह आवश्यक नहीं है । जो भी आप करते हैं उसमें अच्छा होना  सदैव आपकी  पूर्ण क्षमता को जानने के समान नहीं होता क्योंकि उसे जानने के लिए और अधिक समग्र दृष्टिकोण आवश्यक होता है। अन्य शब्दों में कहा जाए तो हम अन्य क़ैदियों के साथ छायाओं के बारे में  बात करने की कला में प्रविणता प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन स्वयं को मुक्त करने के लिए हमारे भीतर  गुफा से बाहर जाने का साहस और इसके लिए तैयार होना चाहिए, इसे  मैं वास्तविक मानसिक क्षमता  की प्राप्ति कहता हूँ।  इसके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले तीन कारक हैं ।

१: स्वयं पर विश्वास

सबसे बड़ी क़ैद है हमारा सीमित आत्म विश्वास। जब हम विश्वास करते हैं कि हम कोई चीज़ नहीं कर सकते, तो आप  सही हैं।एक सामान्य ग़लती है कि यह विश्वास करना कि मैं प्रतिज्ञा करके  या   स्वयं से सकारात्मक बातचीत के द्वारा आत्म संदेह से बाहर आ सकता हूँ। लेकिन ऐसा करना  एक विशेष बिंदु से परे काम नहीं कर सकता। जो वास्तव में हमारे सीमित आत्म संदेह से परे जाने में सहायता कर सकता है वह है  श्रेष्ठ ज्ञान का अर्जन और जो कौशल या विषय हाथ में लिया है उसमें प्रवीणता हासिल करना। उदाहरण के लिए यदि मैं किसी परीक्षा में बैठने वाला हूँ, और मेरी तैयारी नहीं है, तो मैं संसार में सभी सकारात्मक चीज़ों के बारे में बात कर सकता हूँ या सुन सकता हूँ , लेकिन ऐसा करना  मेरी व्याकुलता को शांत नहीं कर सकता या मुझे अधिक बुद्धिमान नहीं बना सकता। मन के जाल से मुक्त होने के लिए आवश्यक है, वह सच्ची मानसिक दृढ़ता जो  कि ” जो भी हम सोचते हैं कि हम कर सकते हैं इस विश्वास को  चुनौती देने और उसके बाद  उससे अधिक श्रेष्ठ करने के द्वारा  उस  विश्वास को  समाप्त करने से  प्राप्त होती है। और ऐसा करने के लिए हमें हमारे  मन को प्रशिक्षित करना होगा। ध्यान, योग  और अन्य आध्यात्मिक साधनाओं का यही उद्देश्य है। स्वयं अपने में वे पर्याप्त नहीं हैं। अपने चारों ओर देखिए  आप पाएँगे  कि संसार में बहुत से ध्यानी, आध्यात्मिक लोग हैं लेकिन वे  एक औसत व्यक्ति से अधिक शांत, श्रेष्ठ या अधिक निपुण नहीं होंगे।

यह एक स्वर्णिम प्रश्न है जो जीवन में किसी भी चीज़ को  सिद्ध करने के लिए स्वयं से कर सकते हैं ।जब आपको अनुभव हो कि आप कोई चीज़ नहीं कर सकते तो स्वयं से पूछें :

‘मैं इसे कैसे कर सकता हूँ?’

लगातार स्वयं से पूछें कि मैं इसे कैसे कर सकता हूँ?”ऐसा  तब तक करें जब तक आपका मन आपको उत्तर देने के लिए तैयार हो जाए। यह कुछ भी हो सकता है जिससे आप अपने जीवन में संघर्ष कर रहे हैं। चाहे यह  कोई  मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक , सामाजिक या आध्यात्मिक बाधा है जिसे आप पार नहीं कर पा रहे हैं, तो स्वयं से प्रश्न करते रहें मैं इसे कैसे कर सकता हूँ? और आपको आश्चर्य होगा कि आपका मन कठिन प्रश्नों के उत्तर लाने में इतना अद्भुत रूप से   शक्तिशाली है, जिसका कि वर्णन करना असम्भव है।

२: आत्म अनुशासन

आप जिस क्षेत्र में हैं वह चाहे कितना भी  कठिनाइयों से भरा क्यों न हो, चाहे आप एक भव्य भवन ख़रीदने वाले हों या आत्म साक्षात्कार करना चाहते  हों, लगभग हर चीज़ संभव है।मैं अभी तक किसी ऐसे  सफल व्यक्ति से अभी तक नहीं मिला हूँ  जो कि आत्म अनुशासित नहीं है। यदि आपको किसी ऐसे व्यक्ति के साथ  काम करने का अवसर मिले जो कि अपने क्षेत्र  में ऊपर हैं , तो  बस उनको   ध्यान से देखिए।  आप पाएँगे कि वे इतने अधिक आत्म अनुशासित हैं कि, उनको किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता नहीं है जो उन पर  ध्यान रखे। आप देखेंगे कि वे स्वयं अपना  निरीक्षण करते हैं। आत्म अनुशासन का एकमात्र  मानदंड है कि “क्या आप स्वयं का और योजना के अनुसार काम किया या नहीं उसका निरीक्षण कर सकते हैं ।”  इसके लिए आवश्यकता है सजगता और दृढ़ निश्चय की । विचलित होना या टालना आसान और आकर्षक  है लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं है। ऐसा करके हर बार हम वास्तव में दिशा बदल लेते हैं, और  स्वयं पर और अधिक शक करते हैं।

मेरे लिए जिसने हमेशा काम किया, विशेष रूप से मेरी हिमालय में प्रचंड साधना के दिनों में, वह था बस स्वयं को एक सरल सी बात स्मरण कराना । मैं अक्सर स्वयं से कहा करता था “समय बीता जा रहा है। तुम्हें कुछ तो करना ही  है, और चूँकि तुम यहाँ ध्यान करने के लिए हो , इसलिए तुम्हें  इसे ठीक प्रकार से करना है।” बस स्वयं को स्मरण कराएँ कि “जब आप वह कर सकते हैं जो आपको करना चाहिए तो कुछ और क्यों करना ।”

आत्म अनुशासन  का अर्थ है इस बात का ज्ञान होना  कि ,  चाहे कोई भी कार्य क्यों न हो , यदि आप इसे नहीं करेंगे तो यह अपने आप होने वाला नहीं है ।

३: सच्चाई

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सच्चाई  या सदाचारी  जीवन आपकी मस्तिष्क की शक्ति को बढ़ाने के लिए क्या करता है?

सत्य तो यह है कि, यह लगभग सब कुछ  करता है।

हममें से हर एक के पास मात्र एक मस्तिष्क है( या इससे भी कम…) और इसकी भी एक सीमा है । यदि इसे निरंतर  असत्य को ढाँकते  रहना पड़े  या अपनी स्थिति को बचाता रहना पड़े  और  इस  शक्तिशाली छोटे से  अंग को आंतरिक शत्रुओं से निरंतर युद्ध करना पड़े, तो इसके पास एक बड़े परिदृश्य पर केन्द्रित करने के लिए  समय या ऊर्जा शेष नहीं रहेगी। आपका मस्तिष्क आपके आत्म रूपांतरण का साधन बने,  तो इसके लिए इसे अनचाहे विचारों और कर्मों के तुच्छ  बंधनों से मुक्त होना चाहिए। एक सदाचारी  जीवन व्यतीत करना ही  मात्र  आपको वह मुक्ति  प्रदान करता है। जब हम निरंतर सही चीज़ करते हैं तो  हमारा मस्तिष्क वैश्विक चेतना  से न केवल शक्ति और ऊर्जा खिंचता है बल्कि शक्ति भी ग्रहण करता है। क्योंकि सत्य व्यक्तिगत चेतना और ब्रह्मांडीय चेतना के मध्य की दूरी  को यदि पाट    नहीं सकता  तो कम अवश्य करता है। जब हम सरल और पारदर्शी जीवन व्यतीत करते है तो हमारे पास कम चिन्ताएँ होती हैं, और यह हमेशा बहुत अच्छा है।

सारांश यह है कि  यह आपको मस्तिष्क को शक्ति या एक बल की भाँति देखने में सहायता करेगी। इस  शक्ति का उपयोग और वृद्धि स्वयं को प्रतिबंधित करने वाले विश्वासों को झाड़ने, आत्म संयम का निर्माण करने और एक सदाचारी  जीवन व्यतीत करने से होगा।

शान्ति

स्वामी