यदि आप मुझसे पूछें कि जीवन में आपकी सर्वोच्च प्राथमिकता क्या होनी चाहिए, मैं यह कदापि नहीं कहूँगा कि साक्षात्कार अथवा ईश्वर की उपासना। मैं यह भी नहीं कहूँगा कि वह दूसरों की सेवा करना है। सर्वप्रथम बात जो मैं कहूँगा वह है कि अपने शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना आपकी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यह मात्र मेरा दृष्टिकोण है। “चाहिए” का उपयोग कर मैं यह सलाह नहीं दे रह कि आपको ये ही करना “चाहिए”।

अनुकूल भोजन लेना, व्यायाम करना व शारीरिक रूप से पूर्णत: हृष्ट पुष्ट रहना – यह प्रसन्नता की नींव हैं। यदि आपका स्वास्थ्य उत्तम है तो आप दूसरों की सेवा कर सकते हैं और ध्यान कर सकते हैं; आप प्रभु-प्रार्थना कर सकते हैं व आप अपनी रुचि के अनेकानेक अन्य कार्य कर सकते हैं। किन्तु, हाँ, ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो पूर्णत: स्वस्थ हैं तथापि वे प्रसन्न नहीं हैं। यह मुझे आज के विषय की ओर ले जाता है – “सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य”।

आज, एक बार पुनः, मेरे पास आप सब के लिए कोई दार्शनिक दृष्टिकोण नहीं है। न ही मैं यह अनुशंसा कर रहा हूँ कि मानवता को बचाने हेतु आप किसी विश्वव्यापी अभियान पर निकल पड़ो (यदि आप वास्तव में ऐसा न करना चाहें तो ही )। मेरे पास मनन हेतु आज एक अति व्यावहारिक पहलू है। मेरा एक लंबे समय से इस विषय पर लिखने का आशय था। चलिये, इससे पहले मैं एक व्यंग्य साझा करता हूँ।

पुलिस, माफिया जगत के पीछे बुरी तरह से पड़ी हुई थी। तो डॉन ने एक नए व्यक्ति अबर्टो को भर्ती किया जो न तो बोल सकता था और न ही सुन पाता था। उसने सोचा कि यदि अबर्टो कभी पकड़ा भी गया तो वह पुलिस को कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं होगा।

अबर्टो नया वसूलीकार बन गया और उसे हफ्ते की उगाही के लिए भेजा गया। कुछ सप्ताह तक ईमानदारी से कार्य करने के बाद उसने कुल जमा में से थोड़ा सा अपने लिए निकालना आरंभ कर दिया। कुछ ही समय में अबर्टो ने १००,००० डॉलर एकत्र कर लिए। डॉन को पता चल गया कि वह नकदी कहीं अलग छुपा कर भी रख रहा है।

समस्या यह थी कि न तो कोई अबर्टो से बात कर सकता था और न ही उसकी बात समझ पाता। अतः, उन्होंने एक व्याख्याकार नियुक्त किया जो उनकी बात उससे करवा सके। अबर्टो को ढूंढ कर डॉन के सम्मुख पेश किया गया।
“नकदी कहाँ है?” डॉन चिल्लाया।
व्याख्याकार अबर्टो की ओर मुड़ा और सांकेतिक भाषा से उसे वह प्रश्न समझाया।

“मैं नहीं जानता” अबर्टो ने संकेत में कहा।
व्याख्याकार ने वह बता दिया।
डॉन ने अबर्टो के माथे पर पिस्तौल लगाते हुए व्याख्याकार को वही प्रश्न दोहरने हो कहा।
अपनी जान जाने के डर से उसने सच बता दिया और कहा कि सारा पैसा सेंट्रल पार्क के एक पेड़ के तने के खोल में छुपा कर रखा है।

“अबर्टो ने क्या कहा”? डॉन ने व्याख्याकार से पूछा।
“इसने कहा कि यह नहीं जानता कि पैसा कहाँ रखा है और तुम्हारे में इतना बल नहीं कि तुम बंदूक का घोड़ा दबा दो।” व्याख्याकार बोला।

आगे क्या हुआ? यह मैं आपकी कल्पना पर छोड़ता हूँ।

जो कोई भी व्यक्ति देनदारी का बोझ लिए है, वह किसी न किसी रूप में अबार्टो जैसी स्थिति में है। आपके सिर पर सदा एक मनोवैज्ञानिक बंदूक टंगी हुई है। भले ही आपने ऋण के ही साथ जीने का कोई उपाय निकाल लिया हो, किन्तु इस बात में संदेह है कि ऐसा कोई शांतिपूर्ण मार्ग हो सकता है। हमारे आज के बेतहाशा उपभोगवाद के युग में हम में से अधिकांश लगातार वह सब साजो सामान क्रय करते जा रहे हैं जिसका प्राय: अल्प उपयोग होता है और हमारे जीवन में उनकी कोई सार्थकता भी नहीं। खैर, मैं प्रवचन नहीं देना चाहता, तो चलिये इस समय के सर्वाधिक उपयोगी कार्य की ओर बढ़ते हैं।

मेरे विचार में, हर उस व्यक्ति के लिए जिसे किसी दूसरे का यदि एक रुपया भी उधार चुकाना बाकी है, सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं सर्वप्रथम करने वाला कार्य है – पूर्णत: ऋण मुक्त होना। ऋण से पूर्णत: मुक्त जीवन एक अति वैभवशाली जीवन होता है। ऐसा जीवन भले ही आपको बाहरी दिखावे के लिए कुछ न दे पाये, किन्तु आपके मुख पर सदा एक अनुपम मुस्कान होगी व मन में असीम आनंद। एक ऋणमुक्त व्यक्ति सदा शांति से सोता है व प्रसन्नतापूर्वक उठता है। मुझे इस तथ्य से इंकार नहीं कि रहने के लिए एक स्वयं का घर खरीदना प्रलोभक विचार होता है और इसीलिए आवासीय ऋण एक आवश्यकता का रूप ले चुका है। चलिये ठीक है। तथापि, एक श्वेत गाय खरीदने में या एक श्वेत हाथी खरीदने में बहुत अंतर होता है। आप स्वयं निर्णय करें।

यदि आप अपने चारों ओर निगाह दौड़ाएँ तो आप पाएंगे कि हमारी अधिकतर ख़रीदारी भावनात्मक निर्णय के आधार पर होती है, यदि तात्कालिक नहीं भी तो। हम सामान खरीदते रहते हैं और अव्यवस्था (clutter) बढ़ाते चलते हैं। घर में अलमारियाँ बढ़ा कर हम उसे चतुराईपूर्वक छुपा तो लेते हैं, किन्तु वह लगातार एकत्र होता रहता है। हम जो कुछ भी क्रय करते है, चाहे कितना भी बड़ा हो या छोटा, हमें उसका मूल्य देना ही होता है। और, उधार के पैसे पर खरीदी गई वस्तु अंतत: आपको कई गुना महंगी पड़ेगी।

ऋण कि उत्पत्ति होती है महत्त्वकांशा और इच्छा से। आप पहले लिए ऋण को और ऋण ले कर चुकता नहीं कर सकते। यह एक दुष्चक्र है। मेरी समझ के अनुसार अपने को ऋणमुक्त करने का मात्र एक ही मार्ग है। इसे कहते हैं स्वयं को खाली व हल्का करना (decluttering)। जीवन में जिन भी वस्तुओं की आपको आवश्यकता नहीं है, उनसे छुटकार पा लें। जितनी भी वस्तुएँ आपके पास हैं – छोटी से लेकर सबसे महंगी वस्तु तक – उन सब पर एक निगाह डालें और स्वयं से पूछें, “क्या वास्तव में यह मेरी आवश्यकता है?” जिन चीजों की आपको अब आवश्यकता नहीं, वह सब विक्रय कर दें। यह सब एक ही बार में कर दें।

आप धीरे धीर खाली नहीं हो पाते। या तो आप दूध को उबाल आने तक गरम करते हैं अथवा तो बिलकुल नहीं। आप यह नहीं कह सकते कि आप प्रतिदिन थोड़ा थोड़ा करेंगे। या तो पूरा होगा अथवा तो कुछ नहीं होगा। अपनी जीवन-शैली को सादगीपूर्ण बना लें और आपका जीवन स्वयं ही आसान हो जाएगा। यदि एक बार आप सादगीपूर्ण, सीधे-साधे जीवन से मिलने वाले आनंद का आस्वादन लेना प्रारम्भ कर देंगे तो आपको आभास होगा कि एक संतुष्टिपूर्ण जिंदगी जीने के लिए वास्तव में कितने कम की आवश्यकता होती है। और, आवश्यकताओं के कम होने से आप को अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाती है – व्यक्तिगत एवं आर्थिक स्वतन्त्रता।

वैसे ही हम पर अनेकानेक नैतिक, सामाजिक एवं भावनात्मक ऋण चढ़े हुए हैं। उस पर आर्थिक ऋण का बोझ भी लाद लेने का क्या औचित्य है? क्या आपको उस महंगे फोन, उस बड़ी सी गाड़ी, इतने बड़े घर, इतने साजो सामान, इतने सारे वस्त्रों, उस क्लब की सदस्यता, इत्यादि सब की आवश्यकता है? क्या वास्तव में ऐसा है?

आपके भौतिक जीवन में जितनी अधिक अव्यवस्था होगी, उसी अनुपात में आपके अन्तःकरण रूपी जगत में भी कूढ़ा करकट विद्यमान रहेगा। अपने आसपास दृष्टि डालें और मुझे इस तथ्य का एक भी विवाद दिखाएँ। यदि आप ध्यान प्रक्रिया के बिना ही शांति का अनुभव करने के आकांशी हैं, यदि आपकी रुचि साक्षात्कार से प्राप्त अनुभवों को जानने में है तो मेरा सुझाव है कि आप बेकार चीजों से छुटकारा पाने से आरंभ करें।

यदि कहीं निर्वाण है तो वह है एक सादगीपूर्ण जीवन जीना में, बिना आडंबर के। यदि कहीं आर्थिक-निर्वाण है, तो वह है ऋणमुक्त रहने में। संक्षेप में यही है “ज़ेन”। मेरे दो पैसे मूल्य की राय – बिना ब्याज के!

शांति।
स्वामी