क्या आप जानते हैं कि निपुणता पाने योग्य सर्वोच्च कौशल कौन सा है? एक ऐसा कौशल जिसका लेशमात्र नकारात्मक पहलू नहीं है। कुछ ऐसा जो आपको एक श्रेष्ठतर व्यक्ति बनाता है और इस संसार को एक श्रेष्ठतर स्थान। यह सुनिश्चित है कि यह अधिक से अधिक ज्ञान अथवा धन एकत्र करने की योग्यता तो कदापि नहीं। यह सदाचारी व्यवहार या सम्बन्धों को अति उत्तम रूप से निभाने की निपुणता भी नहीं। यह दूसरों को प्रसन्न रखने की कला भी नहीं। और तो और, यह स्वयं द्वारा अपनी वास्तविक खोज भी नहीं। आप सोचते होंगे कि आखिर वह क्या है? आइये पहले मैं आपके साथ एक छोटी सी कहानी साझा करता हूँ।

किसी गाँव में एक वृद्ध रहता था जो सदा चिड़चिड़ा व विचित्र सा ही रहा करता। गाँव में कोई भी उससे संबंध नहीं रखना चाहता, क्योंकि वह हर समय शिकायतों से भरा हुआ रहता। ऐसा कहा जाता कि कुछ भी अथवा कोई भी उसे प्रसन्न कर ही नहीं सकता। और क्या आप जानते हैं कि उदासी उस अवांछनीय इत्र के समान है जिसे यदि समूह का एक व्यक्ति भी लगा लेता है तो अन्य को भी उसे सूंघना ही पड़ता है। उनके समीप जाओ और आप भी उसी गंध से भर जाएंगे। वह वृद्ध भी उदासी की गंध से भरपूर था और सबने मानो उसका परित्याग ही कर दिया था।

एक दिन सारा दृश्य अचानक परिवर्तित हो गया जब एक सुबह लोगों ने उस वृद्ध को एक सुंदर सी मुस्कुराहट लिए टहलते हुए देखा। यह सब असामान्य के साथ ही पूर्णत: अप्रत्याशित भी था। उसने दूसरों का अभिवादन किया, उन्हें मधुर वचन कहे और गेहूं के खेतों से गुजरते हुए, गेहूं के नरम बालों को छूते हुए, प्रसन्नता का उद्घोष किया। उससे संबन्धित सब कुछ नया नया सा लग रहा था। कुछ दिन और बीते, तथापि उसकी प्रसन्नता विलुप्त नहीं हुई, न ही कुछ कम हुई।

एक दिन ग्रामीणों ने उससे पूछा, “तुम्हारे साथ क्या हुआ? हमने इससे पहले कभी तुम्हें इतना प्रसन्नचित्त नहीं देखा।”
“मैं ८० वर्ष का हूँ,” वह बोला, “अपना सम्पूर्ण जीवन मैं प्रसन्नता के पीछे भागता रहा। लेकिन मुझे कुछ प्राप्त नहीं हुआ। मैंने और बड़े खेत खरीदे, और अधिक धन संग्रह किया। मैंने प्रसन्नता को धन, परिवार, मित्रों, सत्ता, में ढूंढने का बहुत प्रयास किया। किन्तु वह सदा मुझसे दूर ही रही।”
“तब एक दिन मैंने प्रसन्नता के विषय में एक आकर्षक मित्र के रूप में सोचा। और तब मुझे यह एहसास हुआ कि यदि मुझे मित्रता में सदा मित्र के पीछे पीछे भागना पड़े तो ऐसी मित्रता का क्या औचित्य? मुझे स्वयं को ही इतना योग्य बनाना होगा कि प्रसन्नता स्वयं मेरे पीछे आए, अथवा तो मैं उसके बिना ही जीना सीख लूँगा। जीवन की हर एक परिस्थिति में हर्षित रहने हेतु मैं कृत संकल्प हो गया। जैसे ही मैंने अपना निश्चय दृढ़ किया, प्रसन्नता चुपके से जीवन में प्रवेश कर गई। अब यह एक ऐसा भाव है जो मुझे छोड़ता ही नहीं।”

हम सब भी प्रसन्नता का अनंत काल से पीछा कर रहे हैं, वैसे ही जैसे एक भूख से विक्षुब्ध कुक्कुर भोजन से आने वाली गंध का करता है। हम सोचते हैं कि खुशी कोई संपत्ति है और हम उसे क्रय कर सकते हैं, व सुरक्षित रूप से कहीं रख सकते हैं। वास्तव में यह एक त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण है। यह उसी प्रकार है जैसे बिना मथे दूध से माखन निकालने का प्रयास। और यही मुझे आज के विषय की ओर अग्रसर करता है। मेरे विचार में, सर्वोच्च कौशल होता है – स्वयं के प्रयास द्वारा प्रसन्न रहने की कला सीखना। यदि हर समय नहीं तो कम से कम अधिकांश समय तो अवश्य ही।

शायद आप कहें कि फलां व्यक्ति के साथ रहने से मुझे प्रसन्नता होती है, अथवा तो किसी को प्रेम करने से व प्रतिदान में प्रेम पा कर मैं हर्षित अनुभव करता/करती हूँ। आप यह भी कह सकते हैं कि सफलता मुझे खुशी प्रदान करती है, इत्यादि। किन्तु यह सब कितने समय के लिए व किसकी शर्तों पर? जब मैं प्रसन्नता को एक कौशल के रूप में देखते हुए बात करता हूँ तब मैं, उदाहरण के लिए, शायद जिम्नास्टिक्स के बारे में अधिक सोचता हूँ, बजाय फुटबाल के। फुटबाल में आप इस तथ्य से अधिक प्रभावित रहते हैं कि मैदान में अन्य खिलाड़ी आपके साथ किस तरह का आचरण करते हैं। हो सकता है कि वे बॉल को आपकी ओर धकेलें ही न, अथवा तो आपको गोल करने का अवसर ही न दें।

जब बात प्रसन्नता की हो तो जीवन फुटबाल का मैदान नहीं। यह जिम्नास्टिक्स का मंच है और आप ही वह जिम्नास्ट हैं। वहाँ एक निर्णायक मण्डल हो सकता है जो आपकी एक-एक शारीरिक मुद्रा का आंकलन कर रहा हो, वहाँ दर्शकों का एक समूह हो सकता है जो आपको प्रोत्साहित करेगा, किन्तु, अंततः, आपकी सफलता आपके द्वारा विभिन्न मुद्राओं को उत्कृष्ठ रूप से प्रदर्शित कर पाने पर ही निर्भर करती है। वह निर्भर करती है कि आप कितने कुशल हैं, कि आपने जिम्नास्टिक्स सीखते समय कितनी लगन व परिश्रम से इस कला में प्रवीणता हासिल की। आपके प्रदर्शन की उत्कृष्टता का सम्पूर्ण दायित्व स्वयं आपके ऊपर होता है। अरस्तु द्वारा लिखित निकोमशियन एथिक्स (Nicomachean Ethics) में एक प्रसिद्ध उक्ति है –

हम जो कुछ भी करना सीखते है, वह
हम वास्तव में उसे कर के ही सीखते हैं;
जैसे लोग बिल्डिंग खड़ी करके ही बिल्डर कहलाते हैं,
बाजा बजाने से ही बाजेवाला कहलाते हैं।
इसी प्रकार,
उत्तम कृत्य करने से हम उपयोगी व्यक्ति बनते हैं,
आत्म-संयम के कार्यों द्वारा हम आत्म-संयमी कहलाते हैं,
और, वीरता के कार्य करके हम वीर बन जाते हैं।

यदि केवल मात्र एक ही ऐसा कौशल जिसमें आपको प्रवीणता प्राप्त करनी हो तो यह चयन करें कि कैसे स्वयं को प्रसन्न रखा जाये, भले ही आपके चारों ओर कुछ भी घटित हो रहा हो। संतुष्टि प्रसन्नता की जननी है। किन्तु, यदि किसी कारण वश आप संतुष्टि अनुभव नहीं कर पाते तो स्वयं को ऐसे किसी निमित्त अथवा लक्ष्य के प्रति समर्पित करें जो आपमें एक पूर्णता के भाव का संचार कर पाये। यदि आपके पास अभी ऐसा कोई ध्येय नहीं, तो कृपया उसे खोजें। वह अन्य किसी भी कार्य से कहीं बढ़ कर होगा। इस बात के लिए मैं आपको पूर्णत: आश्वस्त करता हूँ। सबसे बढ़कर, प्रसन्नता किसी प्रकार की ईश्वर कृपा नहीं, यह एक कौशल है। यह ऐसा कुछ नहीं जो जन्मते ही हमारे साथ होता हो, यह ऐसी कला है जिसे हम स्वयं सीखते हैं।

एक बार ऑस्कर विल्डे (Oscar Wilde) ने कहा था, “कुछ लोग जहां जाते हैं, खुशियाँ लाते हैं; अन्य, जब जहान से जाते हैं।” आप किस श्रेणी में हैं? मैं दूसरों पर आपके प्रभाव की बात नहीं कर रहा हूँ। आप उनके लिए खुशियाँ ला पाने में संभवतः सफल या असफल रह सकते हैं, चूंकि उनकी खुशियाँ तो उनकी अपनी प्राथमिकताओं पर अधिक निर्भर हैं, बजाय आपके सहयोग के। मैं हर व्यक्ति के स्वयं के संदर्भ को ले कर प्रसन्नता की बात कर रहा हूँ। मेरा संकेत इस ओर है कि आपका आपके स्वयं के ऊपर क्या प्रभाव है। क्या आप स्वयं के साथ, स्वयं के सानिध्य में प्रसन्न हैं? यह है प्रसन्नता का कौशल।

हम अपने विचारों के धागों को लेकर बैठे जीवन के विभिन्न रूपों के ताने बाने बुनते रहते हैं, जैसे कोई बुनकर बुनाई करता है। ऐसा करते समय हम में से कुछ, सच कहा जाये तो अधिकांश, इसे अति विषम व पेचीदा बना लेते हैं। हमारे द्वारा बनाए गए नमूने आवश्यकता से अधिक जटिल होते हैं और हमारी बुनाई थकान से भरी हुई। जितना अधिक हम सरल डिज़ाइनों की सुंदरता को निहारना सीखते चलते हैं, उतनी ही हमारी जिंदगी आसान होती चलती है। परम प्रसन्नता सरलता में ही मिलती है।

आप क्या बुन रहे हैं? हो सके तो इस पर ध्यान दें।

शांति।
स्वामी