मुझे रॉय बॉमीस्टर द्वारा रचित विलपावर का एक लेखांश स्मरण आया जिसमें लिखा था “भावनात्मक नियंत्रण विशेषकर दुष्कर होता है क्योंकि आप अपनी इच्छा शक्ति से अपनी मनोदशा को परिवर्तित नहीं कर सकते। आप किस विषय पर विचार करते हैं या कैसे व्यवहार करते हैं उसमें आप परिवर्तन ला सकते हैं परंतु आप स्वयं को प्रसन्न रहने हेतु बंधित नहीं कर सकते। आप अपने ससुराल वालों के प्रति विनम्रतापूर्वक व्यवहार कर सकते हैं परंतु यदि वे आपके घर एक महीने रहने आ रहे हों तब आप स्वयं को आनंदित होने पर बाध्य नहीं कर सकते।”

यह तब कि बात है जब मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिला जो यह जानता था कि उसे क्या करना चाहिए किंतु अधिक संघर्ष करने के पश्चात भी उसे कर नहीं पाता था। मैंने उस व्यक्ति को छोटे छोटे संकल्प लेने एवं उनका मान रखने को कहा।

“मेरे सभी संकल्पों का कोई अर्थ नहीं है,” उसने अवज्ञापूर्वक कहा। “मैं धूम्रपान नहीं करना चाहता या क्रोध नहीं करना चाहता या विलम्बन नहीं करना चाहता परंतु मैं स्वयं को यही सब करता पाता हूँ। मैं प्रातः शीघ्र उठकर ध्यान लगाना चाहता हूँ और व्यायाम करना चाहता हूँ परंतु मैं चाहे जो भी कर लूँ, ऐसा प्रतीत होता है जैसे मुझमें इच्छा शक्ति है ही नहीं।”

मैं ने शांतिपूर्वक उसे देखा क्योंकि मैं जानता हूँ कि यह प्रचालन कितना आम है और कैसे हम सभी इच्छा शक्ति के अभाव में दुख भोगते हैं।

“मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मैं सदैव पराजित होने के लिए जन्मा हूँ जो अपने शब्दों पर भी अटल नहीं रह सकता।”

हममें से अधिकांश के साथ ऐसा नित्य ही घटित होता है। हम कुछ करने का निश्चय करते हैं किंतु उसे क्रियान्वित नहीं कर पाते। हम स्वयं को वचन देते हैं कि ऐसा अनुभव नहीं करेंगे या ऐसा विचार नहीं करेंगे परंतु निरंतर होने वाले प्रलोभन एवं भावनाओं के आगे हम या तो स्वयं को परास्त अथवा पूर्ण रूप से असहाय पाते हैं। क्या इससे बाहर निकलने का कोई मार्ग है? हाँ, है।

वास्तव में स्वयं का रूपांतरण जितना दुष्कर प्रतीत होता है उतना है नहीं। आपने जीवन की जो परिकल्पना की है उस प्रकार जीवन जीना संभव है। अपने अतीत को निकाल फेंकना और अंधकार से चलकर प्रकाश की ओर जाना आप के हाथों में है। आप पूछेंगे – कैसे?

दार्शनिकता, रहस्यवाद एवं आध्यात्मिकता से परे, मेरे पास आपके लिए कुछ व्यवहारिक सूत्रों से युक्त शुभ समाचार है। यद्यपि इससे पूर्व मैं आपके साथ एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक परीक्षण जो कि प्रथम बार १९६० में किया गया था, साझा करना चाहूँगा जिसे मार्शमैलो कैंडी परीक्षण कहा जाता है। यह प्रयोगों की एक श्रृंखला है जिसे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों वाल्टर मिशल एवं एबि बी० एब्बेसन ने संरचित किया था।

वे अध्ययन कर रहे थे कि किस प्रकार एक बच्चा तत्काल संतुष्टि का प्रतिरोध करना सीखता है। उन्होंने चार वर्षीय बच्चों में इस प्रक्रिया के अवलोकन हेतु एक नवीन विधि ढूँढ निकाली। वे एक-एक करके बच्चों को एक कमरे में ले कर जाते तथा उन्हें एक कैंडी (मिठाई) दिखाते और उन्हें कमरे में अकेला छोड़ कर जाने से पहले उन्हें एक प्रस्ताव देते। बच्चे उस कैंडी का सेवन जब चाहे कर सकते थे परंतु यदि वे उनके वापस आने तक स्वयं को रोक सकें तब उन्हें खाने के लिए एक कैंडी और मिलेगी। कुछ बच्चों ने कैंडी तुरंत ही खा ली, और कुछ ने प्रतिरोध करने का प्रयास किया किंतु टिक न सके। कुछ बच्चे बड़े पुरस्कार हेतु पूरे पंद्रह मिनट तक प्रतीक्षा कर पाए। सफल हुए बच्चों ने ऐसा स्वयं का ध्यान दूसरी ओर आकर्षित करके किया था जो १९६० में किये गए इन परीक्षणों के द्वारा पता किया गया एक रोचक तथ्य था। ​

कईं वर्षों पश्चात भाग्यवश मिशल ने कुछ और खोज निकाला। स्टैन्फोर्ड विश्वविद्यालय के उसी विद्यालय में जहाँ यह कैंडी परीक्षण हुआ था उसकी पुत्रियाँ भी पढ़ रही थीं। जब वह यह प्रयोग समाप्त कर अन्य प्रयोगों पर कार्य कर रहे थे, मिशल को अपनी पुत्रियों के माध्यम से उनकी सहपाठियों के विषय में पता चला। उसने पाया कि जो बच्चे दूसरी कैंडी के लिए स्वयं को रोक पाने मे असफल रहे वे दूसरे बच्चों की तुलना में अधिक परेशानियों में थे, विद्यालय के अंदर भी और बाहर भी। यह देखने के लिए कि इसमें कोई सम्बन्ध है मिशल एवं उसके सहपाठियों ने प्रयोगों के सैंकडों प्रतिभागियों को खोज निकाला। उन्होंने पाया कि जिनमें चार वर्ष की आयु में अधिक इच्छा शक्ति थी उन्होंने परीक्षा में श्रेष्ठतर अंक पाए थे। उन बच्चों ने जो पूरे पंद्रह मिनट तक स्वयं को नियंत्रित कर पाए थे, एस ऐ टी नामक परीक्षा की अंक प्रणाली में उन बच्चों के अपेक्षा २१० अंक अधिक प्राप्त किये जो पहले आधे मिनट में ही लालच की चपेट में आ गये थे। ​जिन बच्चों में इच्छाशक्ति थी वे अपने साथियों एवं शिक्षकों में अधिक प्रिय थे। उनका वेतन अधिक था। उनका बॉडी-मास इंडेक्स कम था जो इस बात को इंगित करता था कि जब वे मध्यम आयु में होंगे तब उनके वजन बढ़ने की संभावना बहुत कम होगी।

आत्म-संयम युक्त व्यक्तियों के दूसरे व्यक्तियों के साथ सुदृढ़ संतोषप्रद सम्बन्ध थे। उन्होंने दूसरों के प्रति अधिक सहानुभूति प्रदर्शित की तथा दूसरों के दृष्टिकोण को ध्यान में रख कर स्थितियों पर विचार किया। वे भाव प्रवणता से अधिक संतुलित थे और उनमें चिंता, अवसाद, मानसिक विक्षेप व व्याधि, बाध्यकारी व्यवहार, खाने के विकार, पीने की लत एवं अन्य विकारों के प्रति कम प्रवृत्ति थी। वे कम क्रोधित होते और यदि होते भी तब उनमें मौखिक या शारीरिक रूप से आक्रामकता होने की संभावना कम थी।
(राय एफ बामिशर व जान टायरनी द्वारा लिखित पुस्तक विलपावरः रीडिस्कवरिंग अवर ग्रेटस्ट स्ट्रैंथ)

पिछले दशक में विभिन्न पुस्तकों में मैंने मार्शमैलो परीक्षण के अनेक प्रसंग देखे। इसलिए मैंने सोचा कि आत्म रूपांतरण के पथ पर आपको इससे लाभ पहुँचेगा। संक्षेप में यह स्वनियंत्रण या विलंबित परितोषण के महत्व को उजागर करता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में यम (नैतिक संयम) एवं नियम (स्वविनिमय) को अन्य पड़ावों से पूर्व रखा है। आत्म-संयम से रहित कोई भी सचेत परिवर्तन संभव नहीं है। यहाँ अपनी इच्छाशक्ति की संवृद्धि करने हेतु तीन सुझाव हैं जो आपके स्वविनियम को प्रबल करने में अत्यधिक सहायक होंगे।

ध्यान, दस धर्मादेशों या हथ योग के विपरीत ये नितांत सरल हैं तथा अत्यंत प्रभावशाली भी हैं।

१. संतुलित भोजन खाएं

स्वनियंत्रण के समय आपका शरीर ग्लूकोस का उपयोग करता है। अब आप जान गए होंगे कि क्यों कुछ लोगों को मीठा खाने की उत्कट इच्छा होती है जब वे किसी प्रलोभन का प्रतिरोध कर रहे होते हैं या अपने निरंकुश स्वभाव से लड़ रहे होते हैं। यदि आप उच्च ग्लाइसीमिक इन्डेक्स युक्त भोजन ग्रहण कर रहे हैं उदाहरणार्थ -संसाधित भोजन पदार्थ, पैक किया हुआ नाश्ता, सफेद ब्रेड इत्यादि तब आपके शरीर को तत्काल ऊर्जा मिलेगी परंतु सम्पूर्ण आहार की कमी से स्थिति अतिशीघ्र और भी बिगड़ जाएगी। इसलिए पैक किये हुए भोजन से पेट भरने के लोभ का त्याग करें तथा उसके स्थान में स्वास्थ्यवर्धक भोजन ग्रहण करें। इनमें ताज़ी साग सब्जियाँ, ताज़े फल, बादाम, अखरोट, पनीर एवं अन्य साबुत आहार सम्मिलित हैं। हाँ विटामिन के विषय में ना चूकें। इसके अतिरिक्त यह आवश्यक है कि आप संतुलित भोजन के साथ साथ शारीरिक व्यायाम पर भी ध्यान दें। आपके शरीर में यदि ग्लूकोस की मात्रा उचित होगी तब आप स्वयं का विनियमन उचित प्रकार कर सकेंगे। जब आप यह करके देखेंगे तो स्वयं जान जाएंगे।

२. छोटे लक्ष्य रखें

लक्ष्य जितना छोटा होगा उसे प्राप्त करने की संभावना उतनी अधिक होगी। प्रत्येक लक्ष्य प्राप्ति के पश्चात आपके आत्मसम्मान को प्रोत्साहन मिलता है जिसके फलस्वरूप इच्छाशक्ति और भी सुदृढ़ होती है। उचित भोजन मस्तिष्क में उचित तंत्रिका प्रवाहकों को उत्तेजित करता है जो व्यक्ति को सकारात्मक व आत्मविश्वासी बनने में सहायक होता है। यदि छोटे प्राप्य पड़ावों को परिभाषित किये बिना आप स्वयं के सामने एक विशाल कार्य रख देते हैं तब इस बात की अधिक संभावना बन जाती है कि आप ठीक प्रकार से आरंभ करने से पूर्व ही हार मान जाएं। एक बार में एक ही कार्य करें। विभिन्न कार्यों को एक साथ करने की प्रवृति उत्पादकता की सबसे बड़ी शत्रु है। मेरा व्यक्तिगत अवलोकन यह है कि एक बार में एक कार्य करना अधिक प्रभावकारी होता है तथा उसमें सफलता की संभावना भी अधिक होती है। कोई एक कार्य लें, पहले उसे समाप्त करें तभी दूसरे कार्य की ओर बढ़ें।

३. अपनी इच्छा शक्ति को बनाए रखें

यदि मन एक दुकानदार है तब मस्तिष्क एवं पेट इच्छा शक्ति के व्यापारी हैं। शरीर एकमात्र थोक व्यापारी है तथा चेतना एकमात्र पूर्तिकार है। अन्य शब्दों में, इच्छाशक्ति ग्रहण करने का एक ही मूल स्त्रोत है। यदि आप अपनी इच्छा को उन वस्तुओं पर व्यय करेंगे जो आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं तब जो वस्तुएं आपके लिए महत्वपूर्ण हैं उनके लिए इच्छा शक्ति कम पड़ जाएगी। जब आप प्रयत्न कर रहे हैं कि आप अपराध बोध, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध इत्यादि का अनुभव न करें, या जब आप प्रलोभनों का प्रतिरोध कर रहे हैं, तब आप इच्छा शक्ति का उपयोग कर रहे हैं। यदि आप संतुलित भोजन खाकर, छोटे लक्ष्यों की प्राप्तिकर तथा अपने ध्यान को सकारात्मक दिशा में ले जाकर स्वविनियमन करें तब आपको नकारात्मकता पर विजय प्राप्त करने हेतु अपनी ऊर्जा का उपयोग नहीं करना पड़ेगा। अपनी भावनाओं के परिवर्तन हेतु अपनी इच्छाशक्ति का प्रयोग करने में कोई समझदारी नहीं है (जैसा कि मैंने प्रारंभ में कहा था)। उसके स्थान पर अपनी ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए सकारात्मक विकर्षण सीखें।

मैंने माइकल क्रेस्नी की लेट देयर बी लाफटर नामक पुस्तक में यह पढ़ा था (संपादित संस्करण) – एक नवयुवती मुल्ला नसरूद्दीन के पास अपने भविष्य के विषय में पूछने गयी। उसने मुल्ला को बताया कि उसके जीवन में दो व्यक्ति हैं हुसैन और आमिर और दोनों ही उसे बहुत प्रेम करते हैं। वह संशय में थी कि वह किससे विवाह करे।

“मुल्ला, कृपया मुझे बताओ” उसने पूछा, “मुझसे कौन विवाह करेगा? वह भाग्यशाली कौन है?”
“ह म म म ….. ” मुल्ला ने अपनी दाढ़ी सहलाते हुए कहा, “आमिर तुमसे विवाह करेगा और हुसैन भाग्यशाली होगा।”

अपने द्वारा किये गये चुनावों के प्रति सचेत रहना सावधानी है और इच्छाशक्ति उस के प्रति दृढ़ रहने की कला है, चाहे कुछ भी हो जाए। आप इच्छा शक्ति को पैदा कर सकते हैं, उसे सबल कर सकते हैं, उसे धार लगाकर पैना कर सकते हैं। यदि एक बार आपने कुछ चुन लिया (कुछ करने का निश्चय कर लिया) बस कर डालें। करते रहें। नियमित रूप से। धैर्यपूर्वक। बस यही सार है।

आपकी इच्छाशक्ति आपकी सबसे बड़ी सम्पत्ति है। विचारों, भावनाओं, कष्टों एवं व्यसनों का विनियम, इसके द्वारा सभी कुछ संभव है। इसका प्रयोग बुद्धिमानी से करें। इसे परिश्रमपर्वूक निर्मित करें।

शांति।
स्वामी