एक पाठक ने एक टिप्पणी, दो भागों में बाँट कर, निम्न रूप में की –

यह एक सुंदर लेख है। मैं मात्र २३ वर्ष का हूँ और मैने अभी जिंदगी को पूर्ण रूप से नहीं भोगा। जैसा कि किसी ने कहा है – जीवन एक कार्डियोग्राम के समान है। यदि आपके जीवन में केवल शांति व स्थिरता है तो जीवन एक सीधी रेखा के अनुरूप है। यह दर्शाता है कि विज्ञान के दृष्टिकोण से आप मृत हैं। यदि उतार-चढ़ाव दिख रहा है तब मानो की आप जीवित हैं। तब क्यों न जीवन के हर रूप का अनुभव किया जाए, वरन इसके कि इतनी अल्पायु में शांति की खोज आरंभ कर दें? कृपया प्रकाश डालें…। मुझे तो जीवन को उसकी समग्रता में जीना है, न कि स्वयं को शांति के पथ पर समर्पित करना। कुछ भी हो, यदि जीवन में उतार-चढ़ाव ही नहीं होंगे, तो जिंदगी एक सीधी रेखा बन जाएगी, और, कार्डियोग्राम पर सीधी रेखा का अभिप्राय है आप मृत हैं…

कितना सार्थक उपमान है – कार्डियोग्राम! कार्डियोग्राम हृदय गति को दर्शाता तो है; वह उसका संचालन नहीं करता। साथ ही, बहुत से लोगों का जीवन-ओ-ग्राम अधिकाँशतः सीधी रेखा ही दर्शाता है, उस समय भी जब उनका कार्डिओग्राफ शेयर बाजार के सूचनांक की भाँति अस्थिर होता हो।

मुझे आपकी टिप्पणी से आरंभ करने की आज्ञा दें – “मुझे तो जीना है…!” –

यह बात आपको कौन बताता है कि आप क्या करें या क्या न करें? आप स्वयं? हमें क्या करना चाहिए – यह तथ्य अधिकाँशतः हमारे अंतर के गहन संस्कारों (प्रतिबंधिता) द्वारा निर्देशित होता है। आप कल्पना करें कि आपका जन्म एक गाँव में हुआ, मान लें पहाड़ी इलाक़े के किसी सुदूर गाँव में। एक ऐसा गाँव जहाँ आप केवल जंगल, नदी, झरने, पशु-पक्षियों के मध्य रह कर बढ़े हुए हों। कृपया गंभीरता से ऐसी स्थिति की कल्पना करें। तब भी क्या “अपनी जिंदगी को कैसे जीना है” के प्रश्न पर आप वही सोच पाएँगे जो आप इस स्थिति में सोचते हैं?

आत्म-साक्षात्कार का मार्ग स्वयं के नियम स्वयं द्वारा निर्धारित करने का मार्ग है। कृपया मेरा लेख दो आध्यात्मिक दृष्टिकोण पढ़ें जहाँ मैंने मधुमक्खी के मनोविज्ञान व उसकी कार्य-प्रणाली का वर्णन किया है। चूँकि आपके संपर्क में आने वाले अधिकांश लोग एक निश्चित प्रणाली से जी रहे लगते हैं, से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उनकी प्रणाली ही सर्वश्रेष्ठ है। मैं एक क्षण के लिए भी ऐसा नहीं सोचता व कहता कि आपका मार्ग उचित मार्ग नहीं है। हर वह मार्ग जो आपको एक योग्य व्यक्ति बनने की ओर प्रेरित करे व आपमें दूसरों की सहायता करने का भाव बढ़ाए, वह मार्ग, स्वतः, आपमें स्वयं के सत्य की खोज की अभिलाषा जगा देगा।

आप अपनी युवा आयु व जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव लेने के विषय में कह रहे हैं। शांति की खोज का यह अर्थ नहीं कि जीवन में उतार-चढ़ाव होंगे ही नहीं। इसका यह अर्थ भी नहीं कि अब कार्डीयो ग्राम सीधी रेखा प्रदर्शित करेगा। इसका अर्थ यह है कि अब उतार-चढ़ाव के समय आप विचलित नहीं होंगे। कल्पना करें जब आप बहुत से अन्य लोगों के लिए शांति, प्रसन्नता व हर्ष का माध्यम बन पाएँ। आत्म-साक्षात्कार से अभिप्राय मात्र शांति के सम्मुख समर्पण नहीं होता। यह अपने स्वयं के मार्ग पर चलना होता है। इसका औचित्य मात्र इतना नहीं कि जैसी जीवन – प्रणाली आपको प्राप्त हुई, आप उसी का अनुसरण करते रहें; वरन यह कि आप उसकी समीक्षा करें व उसे और अधिक उपयोगी बनाएँ। इच्छाओं का डीएनए लेख में मैंने लिखा, “युवा अवस्था में एक धनाढ्य जीवन जीते हुए, यह संसार अत्यंत सुखमय प्रतीत होता है…।” अतः जीवन की इस युवा बेला में शायद आप कुछ मस्ती भरा समय बिताना अधिक पसंद करें। और यह उचित ही है। मैं आपके लिए प्रसन्न हूँ। यदि आपको प्रतीत होता है कि आपका जीवन आनंदमय है व आप एक उपयोगी जीवन बिता रहे हैं; और, यदि आपकी कार्य-शैली से आसपास के लोगों की भी सहायता हो रही है, तब आपको कण मात्र भी बदलाव करने की आवश्यकता नहीं।

आध्यात्मिकता जीवन-बीमा योजना के समान है। जब हर परिस्थिति अनुकूल हो तब इसकी आवश्यकता नहीं होती, वरन किसी दुर्घटना की स्थिति में इसकी उपयोगिता उजागर होती है। शेयर बाजार जब ऊँचाई की ओर जा रहा हो, उस समय कोई अतिरिक्त-ऋण सुविधा का उपयोग नहीं करता। इसका उपयोग बाजार के नीचे लुढ़कने की स्थिति में किया जाता है। इसी प्रकार जब जीवन हर्षोल्लास से भरा हो, तब ईश्वर को कौन याद करता है? जब चारों ओर कठिनाईयों के बादल घिरे हों, तब आपके आंतरिक सामर्थ्य की परीक्षा होती है, ताकि आपका कार्डियोग्राम चलता रहे।

अरे हाँ, रिकॉर्ड के लिए मैं बताना चाहूँगा कि अपनी अंतः-उर्जाओं के संयोजन कौशल मात्र से मैं आपको, जब आप चाहें, शून्य-नाड़ी व अपने कार्डियोग्राम पर सीधी रेखा दिखा सकता हूँ। उस दौरान मैं अपनी पूर्ण चेतन अवस्था में रहते हुए अपनी पलकों को झपकाता रहूँगा। इसीलिए, सीधी रेखा से अभिप्राय सदा यही नहीं होता कि व्यक्ति मृत है। मेरे मतानुसार, इसका अभिप्राय है कि मार्ग सीधा है! सीधी रेखा सदा सबसे कम दूरी दर्शाती है – ऐसा मुझे कभी एक इंजीनियर ने बताया था।

जिस समय में आपकी टिप्पणी पर अपने विचार लिपीबद्ध कर रहा था, मेरे शिष्य स्वामी विद्यानंद, मेरे समीप बैठे थे। मैंने उन्हें आपकी टिप्पणी पढ़ कर सुनाई व उनकी राय माँगी। उन्होने अत्यंत सटीक जवाब दिया – “हर बाह्य अनुभव सीमित है, जबकि अंतःकरण में प्रकट होने वाला आनंद असीमित होता है”। उन्होंने १८ वर्ष की आयु में सन्यास धारण किया था व अब वे २६ वर्ष के हैं। मेरे मार्ग से भिन्न, उचित अथवा अनुचित, वह उनका मार्ग है। मेरे युक्ति-युक्त व लंबे उत्तर से भिन्न, उनका लघु कथन एक तीर की भाँति सीधा व सुंदर है। संदेहास्पद रूप से कार्डियोग्राम की सीधी रेखा से मिलता जुलता…

शांति।
स्वामी