कई पूर्वीय परम्पराओं के अंतर्गत जब शिष्य गुरुकुल में अपना प्रशिक्षण सम्पूर्ण करते हैं तो अपने कृतज्ञ भाव दर्शाने हेतु वे गुरु के समक्ष गुरुदक्षिणा प्रस्तुत करते हैं। कुछ प्रकरणों में गुरु स्वयं अपनी आवश्यकता का उल्लेख करते हैं। इसी परंपरा के अंतर्गत, एक बार शिष्यों का एक समूह अपने गुरु के समक्ष उपस्थित होता है। शिष्य उनसे निवेदन करते हैं कि गुरुदक्षिणा स्वरूप यदि उन्हें किसी विशेष वस्तु की चाह हो तो कहें।

“सत्य कहूँ तो मुझे कुछ विशेष ही चाहिए,” गुरु ने कहा।
“आपके लिए कुछ भी गुरुवर,” सभी एक स्वर में बोले।
“क्या वास्तव में कुछ भी?”
“जी गुरुदेव,” उन सब ने उत्तर दिया।
“अच्छा तो…,” गुरु धीमे स्वर में बोले, “मुझे अपने गृहावास की सर्वाधिक मूल्यवान वस्तु ला कर दो। वह स्वर्ण, चाँदी, अथवा कोई माणिक-जवाहरात इत्यादि हो सकता है।”
आरंभ में शिष्यों को यह एक परिहास प्रतीत हुआ चूंकि १२ वर्ष के आवास के दौरान उन्होंने कभी भी गुरुजी को किसी भौतिक वस्तु की मांग रखते नहीं देखा था।
“किन्तु,” गुरु ने आगे कहा, “इसमें एक नियम है कि आप अपने माता-पिता अथवा किसी अन्य से कुछ मांग नहीं सकते। आप इसे चुपचाप लाएँगे, जब कोई भी आपको देख न रहा हो।”
एक शिष्य स्वयं को रोक न पाया व बोला, “गुरुजी, आप हमें चोरी करने के लिए कह रहे हैं?”
“मुझे तो लगा तुम सब मेरे लिए कुछ भी करोगे?”
“जी हाँ, हम यह करेंगे,” शिष्य बोले व चले गए।
“और स्मरण रहे कोई भौतिक वस्तु ही लानी है,” गुरु ने पुनः कहा।

एक सप्ताह उपरांत सभी आश्रम में एकत्र हुए, और, वास्तव में कोई भी बिना उपहार के न था। एक के बाद एक, सब आगे आए और गुरु को मूल्यवान वस्तुएँ भेंट करने लगे, केवल एक शिष्य को छोड़ कर।

“क्या कारण है कि तुम कुछ भी नहीं लाये?”
“मुझे क्षमा करें गुरुवर, किन्तु मुझे ऐसा एक भी अवसर नहीं प्राप्त हुआ जब कोई भी मुझे न देख रहा हो।”
“पूर्ण सप्ताह में एक अवसर भी नहीं?” गुरु ने विस्मित हो कर कहा। “तुम मुझे यह बता रहे हो कि सम्पूर्ण सप्ताह पर्यंत तुम कुछ पल के लिए भी एकाकी नहीं थे?”
“मैं एकाकी था गुरुजी,” उसने उत्तर दिया, “किन्तु, ऐसा एक भी पल नहीं आया जब कोई भी मेरे साथ नहीं था। जब मेरे माता-पिता व बहन-भाई आसपास नहीं थे, तब भी, ईश्वर मेरे साथ थे। जब कोई अन्य नहीं देख रहा था तब मेरी आत्मा मुझे देख रही थी। मैंने प्रयत्न किया किन्तु आपके नियम का उल्लंघन किए बिना मैं गुरु-दक्षिणा स्वरूप कुछ भी लाने में असमर्थ रहा।”

गुरु खड़े हुए व उसे गले लगा कर बोले, “तुम मेरे सर्वश्रेष्ठ शिष्य हो।”
अन्य विद्यार्थियों के उपहार लौटाते हुए उन्होंने कहा, “यह मात्र एक परीक्षा थी। मैं देखना चाहता था कि क्या वास्तव में तुम सब ने मेरी शिक्षाओं को पूर्णत: समझा है। मेरे लिए यह परीक्षण करना आवश्यक था कि क्या तुम सब ने अपने अन्तःकरण के स्वर सुनना व उस पर विश्वास करना सीख लिया है।”

बहुधा हम अपने कृत्यों के प्रमाणीकरण हेतु बाहरी अनुमोदन की अपेक्षा रखते हैं, सामान्यतः गुरुओं अथवा अन्य धार्मिक विशेषज्ञों द्वारा। किन्तु, सत्य यह है कि कहीं गहराई में हम अधिकांशतः सदा अपनी सच्चाई को स्वयं जानते हैं। किसी भी बाहरी व्यक्ति से कहीं बेहतर हम स्वयं अपनी मंशा जानते हैं। अपनी आकांशाओं एवं महत्त्वकांशाओं के झूलों में झूलते, हम अपने अन्तःकरण के स्वर अपनी सुविधानुसार मूक कर देते हैं। और, जब अन्तःकरण के स्वर को चुप करा दिया जाता है तो हमारा स्व-आनंद के वास्तविक स्रोत्र से संबंधविच्छेद हो जाता है। ऐसे में अपनी इच्छाओं, आकांशाओं के अनापूर्तित रहने की दशा में हम दु:ख एवं दर्द का अनुभव करना आरंभ कर देते हैं, मानो इस विस्तृत ब्रह्मांड के सम्मुख हमारी इच्छाओं का कुछ विशेष मूल्य है (उनका कोई मूल्य नहीं)।

प्रख्यात ऋषि कपिल मुनि (२००० बी सी ई) द्वारा सांख्य दर्शन की व्याख्या में प्रतिपादित लगभग ५२६ सूत्रों में से ५ सूत्र आज के संदर्भ में विशेष रूप से विवेचन योग्य हैं –

इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेद:।
व्यावृत्तो भयरूप:।
अक्षात्सबंधात्साक्षित्वम।
नितयमुक्तवम।
औदासीन्यंचेति। (कपिल सांख्य सूत्र १.१५९ - १.१६३)

लौकिक पदार्थों का प्रवाह सदा चलायमान है, किन्तु आत्मा सदा सर्वदा मुक्त है, भले वह कितनी भी बंधनमय गोचर क्यों न हो। आत्मा मात्र एक दर्शक है, साक्षी मात्र। आत्मा का वास्तविक व शाश्वत स्वरूप सदा सर्वदा मुक्त है, चूंकि वह सुख और दु:ख दोनों से तटस्थ है, उदासीन है।

यदि आप अपनी आत्मा पर ध्यान लगा पाएँ, यदि आप स्वयं को एक मूक दृष्टा के रूप में देख पाएँ, तो जीवन की लगभग सभी अवस्थाओं/वस्तुओं के प्रति आपका मूल दृष्टिकोण सदा के लिए परिवर्तित हो जाएगा। जब आपको इसलिए दु:ख का अनुभव होता हो कि आपका जीवन आपके अनुसार नहीं चल रहा, तो मात्र एक कदम पीछे को लें। ठहरें। रुकें। बैठ जाएँ। एक गहरा श्वास भरें। एक चित्रांकन करें मानो आप अपने जीवन के मात्र एक साक्षी हों – कि, आप अपने शरीर, अपने मन, अपने जीवन को देख रहे हैं। कि, आपका वास्तविक स्वरूप, वह विशुद्ध अवयव, हर प्रकार के दु:ख-दर्द से परे है।

अपने जीवन एवं अपनी भावनाओं का बिना प्रतिक्रिया के एवं बिना कोई राय बनाए अवलोकन कर पाने की योग्यता, जैसे आपकी आत्मा सदा आपको देखती है, यह आत्म-साक्षात्कार का एक गहन व द्रुतगामी मार्ग है।

मुल्ला नसीरुद्दीन एक ऊंची मचान से गिरे व तीन मंजिल नीचे आ पड़े। अन्य लोग दौड़े आए, और एक ने मुल्ला से पूछा, “गिरने से आपको चोट तो नहीं आई?”
मुल्ला कराहते हुए बोले, “गिरते हुए तो मुझे कोई चोट नहीं लगी, वह तो अचानक रुकने से लगी!”

ऐसे ही, किसी भी प्रकार की स्थिति में, हमारा अनुभव हमें दर्द नहीं पहुंचाता। दर्द पहुंचाता है हमारा दृष्टिकोण; जब हम रुक कर प्रश्न करते हैं, विश्लेषण एवं आकलन करते हैं, तब हम वह सब अनुभव करते हैं। आकलन के उस क्षण में आप एक चयन कर सकते हैं – आप मात्र एक साक्षी की भूमिका निभा सकते हैं, मानो वह सब आपसे संबन्धित न होकर आपके किसी जानकार से संबन्धित हो। ऐसा करने से आपकी दर्द भरी एवं उग्र प्रतिक्रियाएँ तत्काल प्रभाव से धीमी हो जाएंगी।

आप जो भी कर्म करते हैं व आपके साथ जो कुछ भी घटित होता है आपकी आत्मा उस सब की मूक साक्षी है। जब आपको इस तथ्य का अनुभव होना आरंभ हो जाता है कि आप अपनी देह एवं मन के अतिरिक्त और भी कुछ हैं, ऐसे में एक निरंतर बना रहने वाला आनंद का भाव आपका अंश बन जाता है, जैसे अगरबत्ती से आती सुगंध – जितना अधिक जीवन आपको ज्वलित करता है, उतनी अधिक आप सुगंधी बिखेरते हैं। और, जीवन समाप्त होने के पश्चात भी वह महक बनी ही रहती है।

शांति।
स्वामी