एक बार मैंने एक उक्ति पढ़ी थी कि, “मौन स्वर्ण के समान है… यदि आपके घर में छोटा शिशु नहीं। उस स्थिति में, मौन बहुत संदेहास्पद है।”

उदाहरणस्वरूप, क्या आपने कभी गहन रात्रि में व्याप्त मौन में विश्रांति की अनुभूति की है? प्रमुख रूप से एक ऐसे स्थान में जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हो। वहाँ की वायु में एक अवर्णननीय ताजगी विद्यमान होती है। आप अपनी देह को स्पर्श कर हिलौरे लेती उस सुखकर, सुहावनी समीर की अनुभूति कर पाते हैं। आप उस भव्य, विशाल, तारों से जगमगाते अंबर को निहारते हैं, कोमल पत्तियों की हल्की सर्सराहट सुन पाते हैं। अधिकांश लौकिक जगत निद्रा में है, किन्तु आप इस परम आनंदमयी मौन में जागृत हैं। यह सब अतिगूढ़ होता है। आप जो कुछ भी देखते हैं, वह सब आपको एक दिव्य, शांत भाव से सराबोर कर देता है।

यही है मौन का परम आनंद।

मौन में ही हर प्रकार का साक्षात्कार एवं ज्ञान प्रस्फुट्टित होता है, उसी प्रकार जैसे वर्षा के समय झरने। ध्यान करने का उद्देश्य मन को उस सीमा तक मौन करना होता है जब आपके अंतस में विचारों की उथल पुथल पूर्ण रूप से समाप्त हो जाये। जैसे जैसे मन-मस्तिष्क में चलती उठापटक शांत होती जाती है, आप हर स्थिति को एक नए परिपेक्ष्य से देखने लगते हैं। तथापि, जैसा कि मैंने आरंभ में एक उक्ति के माध्यम से कहा कि एक शिशु की चुप्पी किसी योगी के मौन से सर्वथा भिन्न होती है। शिशु से मेरा तात्पर्य यहाँ उस बालक से नहीं जिसने आपके घर की दीवारों पर चित्रकारी कर रखी है, अथवा तो आपके फोन को बुलबुलों से भरे बाथटब में डुबो दिया हो। मेरा तात्पर्य शिशु के मानसिक तुल्यमान से है – वह है एक बेचैन मन।

आएं, आज मेरे संग ‘मौन के स्वरूप’ को समझने की सूक्ष्म यात्रा पर चलें। यदि मैं मौन के चार प्रतिरूप समझ पाने में आपकी सहायता कर पाता हूँ, तो आप ध्यान, निरभ्रता व विश्रांति के विषय में समझने योग्य हर तथ्य को समझ लेंगे।

नकारात्मक मौन

जब एक बेचैन मन चुप्पी साध लेता है तो वह सदा आनंद अनुभव नहीं कर पाता। वरन, अधिकांश परिस्थितियों में वह अकेलेपन का शिकार हो जाता है। और, यही है मौन का प्रथम प्रतिरूप – नकारात्मकता। जब चुप्पी साधे मन के समक्ष करने हेतु कुछ नहीं होता तो उदासी व अवसाद से भरे विचार उस पर नियंत्रण कर लेते हैं। नकारात्मक मौन में आपका मन सही मायने में मौन नहीं होता। वास्तविकता यह है की वह उदासी अनुभव कर रहा होता है और आश्चर्य की बात है कि वह उस खिन्नता से कुछ न कुछ आराम ही पाता है। और यह आपको उस नकारात्मक अवस्था में और गहरे खींच ले जाता है, व आप में अपने जीवन से हर एक व्यक्ति को बाहर करने कि इच्छा प्रबल होने लगती है। नि:संदेह, यह अल्प-कालिक होता है। यह है एक बेचैन मन की चुप्पी। यही है उस शिशु की संदिग्ध चुप्पी। वह आपके बटुए के साथ खेल रहा है (सारे नोट टुकड़े टुकड़े कर के, आपके बैंक कार्ड मोड़-तोड़ के, रसीद की पर्चियों को चबा कर, सब कुछ उसके बाल-सुलभ खेल की भेंट चढ़ गया)।

सकारात्मक मौन

वहीं दूसरी ओर, सकारात्मक मौन में आपको हर स्थिति के प्रति सुखकर आभास होता है। आप ऊर्ध्वगामी, सकारात्मक व आश्वस्त अनुभव करते हैं। आप में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जो मौन के एक लघु अंतराल के उपरांत आपको उठकर कार्य करने की दिशा में प्रेरित करती है। मौन का यह प्रतिरूप आवश्यक है क्योंकि एक तरह से यह आपको ऊर्जान्वित करता है और आप पुनः कार्यशील होने को तैयार हो जाते हैं। यह उसी प्रकार है जैसे एक शिशु क्षण भर के लिए खिड़की के पास बैठ कर बाहर का ट्रेफिक देख रहा हो। बटुए का आकर्षण अब नहीं रहा (उसका चमड़ा अब स्वादिष्ट नहीं लगता), और अतिशीघ्र जब ट्रेफिक देख कर उसका मन भर जाएगा, वह आकर किसी अन्य प्रयोजन में लगने की राह ढूँढने लगेगा। किन्तु, शिशु प्रसन्न है और खिलखिला रहा है। केवल कुछ समय के लिए।

गूढ़ मौन

तथापि, यदा कदा, और यह दुर्लभ है, आपका मौन न तो सकारात्मक और न ही नकारात्मक होता है। वह आशावादी या निराशावादी भी नहीं होता। वरन वह गहन रूप से आध्यात्मिक होता है। उसका निष्पादन एक दिव्य अनुभव के रूप में होता है, आप एक दिव्य, अनुपम प्रकाश से सराबोर हो जाते हैं। जब तक मौन का यह दौर समाप्ति की ओर अग्रसर होता है, आप आजतक जितना जान पाये, उससे कहीं अधिक अब आप जान चुके होते हैं, उस सब से कुछ भिन्न जो अभी तक आपकी जानकारी में था। आप एक अभिनव रूप में नए व्यक्ति हो कर प्रकट होते हैं। यह है मौन का दिव्य स्वरूप। जीसस, कृष्ण, महोम्मद अथवा बुद्ध, इनके द्वारा उजागर सत्य इसी मौन से प्रकट हुआ था। वह यही आध्यात्मिक मौन था जिसमें से आइन्सटाइन अपनी ‘थियरि ऑफ रिलेटिविटी’ खोज पाये अथवा न्यूटन ‘भौतिकशास्त्र के नियम’। इसकी दिव्यता का यही परम कारण है – आप ऐसा कुछ खोज लेते हैं जो आपको सदा सर्वदा के लिए परिणत कर देता है। यह ऐसा है मानो आपका एक नया रूप प्रकट हुआ हो, जैसे आपके अंतर्निहित ब्रहमंडीय-चेतना ने अपने स्वरूप का अंशमात्र आपकी वैयक्तिक हस्ती के समक्ष प्रदर्शित किया हो। हालांकि बात यहीं समाप्त नहीं होती। मौन का एक और रूप भी है – चतुर्थ प्रकार।

यथार्थ मौन

यह इतना सरल व सुस्पष्ट है कि हो सकता है आप इसे देख ही न पाएँ। ‘झेन’ में एक विख्यात उक्ति है, “साक्षात्कार से पूर्व – पर्वत, पर्वत होते हैं और जल जल होता है। साक्षात्कार के दौरान – पर्वत पर्वत नहीं और जल जल नहीं रहता। साक्षात्कार के उपरांत – पर्वत, एक बार पुनः पर्वत हो जाते हैं और जल जल।” और, मूल रूप से यही मौन का चतुर्थ प्रतिरूप है।

यह, केवल मौन है। मत-निरपेक्ष मौन। यथार्थ मौन। चतुर्थ प्रकार। आप चाँद-तारों की, नदियों व झरनों की, पर्वत व वृक्षों की सुंदरता को स्वयं रग-रग में समाहित करते हुए, उन्हें निहारते हैं। जीवन रूपी परम आनंद से सराबोर, आप एक ऐसे दर्शक मात्र हैं जो इस भव्य जगत लीला को एक निरासक्त भाव के साथ केवल देख रहा है। आप इन सब का आनंद लेने हेतु उपस्थित हैं किन्तु कुछ भी आपको बांधता नहीं। बांध सकता ही नहीं। चूंकि आपके अन्तःकरण में जो विराजमान है, वह है मौन की स्वाधीनता।

जब मौन की बात होती है तो यहाँ सकारात्मक, नकारात्मक का विपरीत नहीं होता। अपितु, नकारात्मक का विपरीत होता है मौन। जब आपका मन वास्तविक मौन से परिपूर्ण होता है तो भय अथवा नकारात्मकता के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं रहता।

एक विचारक ने दूसरे से कहा, “तो क्या आप वास्तव में यह विश्वास करते हैं कि कोई ‘पूर्ण-सत्य’ नहीं होते?”
“जी हाँ।”
“वास्तव में?”
“जी हाँ।”
“क्या आप पूर्णतः इस तथ्य पर अटल हैं?”
“बिलकुल !” उसने उत्तर दिया।

जब आप मौन को उसके सकारात्मक, नकारात्मक अथवा गूढ़ रूप से परे अनुभव कर पाते हैं, ऐसी अवस्था में आप ‘पूर्ण सत्य’ व स्वयं की राय बनाने से ऊपर उठ जाते हैं। आपको बोध होता है कि ठोस धारणाओं व आलोचनात्मक भाव के बिना भी जीवन चल सकता है। कि, आपके लिए किसी भी चीज से बंधना आवश्यक नहीं। कि, जीवन की शाश्वत यात्रा में आप मात्र एक यात्री हैं। यदा कदा आप एक पर्यटक की भांति व्यवहार कर सकते हैं, किन्तु, अधिकांशतः, आप एक यात्री ही हैं। अनंत जीवन कालों के क्रम में मात्र पुनः पुनः आते जाते यात्री। हम सभी यही हैं।

मौन ‘झेन’ का मार्ग है। यहाँ कोई आना-जाना नहीं, कुछ भी पाने की इच्छा अथवा पाना नहीं। पर्यटक के लिए कोई मील के पत्थर अथवा मार्ग-विवरणी नहीं, केवल मात्र यात्री का साहस-कर्म है। साक्षात्कार आपके द्वारा मौन के चतुर्थ रूप में पदार्पण है।

जीवन अंतर्विरोध, विरोधाभास व संघर्ष से भरा है। और इन सब के होने के बावजूद, जीवन ठीक ही प्रतीत होता है। वह वास्तव में इन सबके प्रति मौन है। यही जीवन है। यही ‘झेन’ है।

शांति।
स्वामी