अघोरी ने कहा “हे महाराज ! मैं बड़ी  ही आशा से आया हूँ क्या आप  मेरी इच्छा पूर्ण करेंगे?”

राजा ने उत्तर दिया कहिए आपको क्या चाहिए? मेरे पास दान के लिए बहुत कुछ है।

“ मुझे बस यह प्याला भरना है।”अघोरी ने अपना प्याला आगे बढ़ाया।

“ बस इतना ही? यह तो मेरे सामाजिक कार्य संबंधी मंत्री ही कर देंगे। क्या आप मेरा  मज़ाक़ बना रहे हैं? बस भिक्षा का कमंडल! मैं बहुत अपमानित अनुभव कर रहा  हूँ।”

राजा भद्रघोष ने उपरोक्त बातें कहीं, क्योंकि लोक कल्याण के कार्यों  के लिए  उसकी चारों ओर बहुत प्रशंसा की जाती थी । उसका साम्राज्य  बहुत विशाल था ।  एक तपस्वी  मात्र एक कमंडल भर भिक्षा के लिए राजा के पास  आए, राजा के अनुसार यह उसके समय की बर्बादी थी  ।

अघोरी ने कहा “आप सही कह रहे हैं परंतु महाराज यह कहना जल्दबाज़ी होगी क्योंकि  कोई भी इस कमंडल को ऊपर तक भरने में सक्षम नहीं है। हो सकता है, शायद आपका प्रताप अलग  हो।”

अघोरी की आवाज़ में निर्भयता ही नहीं यहाँ तक कि व्यंग्य भी था  और उसकी भेदक दृष्टि ने भद्रघोष की उत्सुकता को पकड़ लिया। अगर किसी और ने उसके साथ इस प्रकार से बात की होती तो उसे राजसभा से बाहर फेंक दिया जाता, लेकिन यह तपस्वी भिन्न प्रतीत हो रहा था। राजा ने ताली बजाई अपने कोषाध्यक्ष को  बुलाया और उस कमंडल को आभूषणों से भरने का आदेश दिया।

अघोरी ने कहा “इतनी जल्दी नहीं महाराज,   मैं अपना कमंडल मात्र एक ही शर्त पर दूँगा।”

“कहो।”

महाराज! “मेरी शर्त यह है कि,यदि आपके मंत्री  मेरा कमंडल नहीं भर पाए तो आप  अपना सिंहासन मेरे लिए त्याग देंगे।”

“और यदि मैं सफल हो गया तो?”

“ तो मैं अपनी जटाएँ मुंडा दूँगा और आपका दास बन जाऊँगा , और शेष जीवन आपके गुण  गाऊँगा। सत्य कहता हूँ मैं आपको अपना गुरु मान लूँगा।”

कमंडल कोशाध्यक्ष  को दे दिया गया, जिसने  उसे तुरंत आभूषणों से भर दिया।

भद्रघोष ने कहा “मुझे समझ में नहीं आता क्या झमेला  है कमंडल पहले ही भरा हुआ है।”

अघोरी ने कहा “फिर से देखिए महाराज ।”

कमंडल ख़ाली था। इसे भरने का एक बार और प्रयत्न किया गया और कुछ ही  क्षणों बाद यह वापस ख़ाली हो गया। उन्होंने इसे अनाज, दालों,स्वर्ण, दूध, जल,रेशम, और प्रत्येक भौतिक चीज़ जो उन्हें मिली यहाँ तक कि कंकड़ और  पत्थरों  से भी  भरने का प्रयत्न किया किंतु सब व्यर्थ रहा। राजा और मंत्री गण  पसीने पसीने हो गए।वे सब अघोरी के सिंहासन पर आरोहण  होने का दृश्य लगभग देखने लगे।

अघोरी के  चरणों में गिरते हुए राजा ने कहा “ मुझे क्षमा करें  । “क्या आप शिव हैं?आप कौन हैं?

अघोरी ने राजा को उठाते हुए कहा  “ महाराज मैं बस एक तपस्वी हूँ।आप मेरे चरणों में नहीं सिंहासन पर विराजमान हों।”

कृपया मुझे ज्ञान दें। इस कमंडल  में क्या विशेष बात  है?

“यह मानवीय कपाल  से बना है इसमें कितना ही भरो यह कभी भी कुछ क्षणों के अलावा संतृप्त  नहीं रहता।यह हमेशा और अधिक की माँग करता है।यहाँ तक कि यह भरा रहता है तो भी ख़ाली ही  दिखायी देता है।यह ख़ालीपन की झूठी प्रतीति बहुत ख़तरनाक है महाराज । यह मनुष्य को उसकी  अंतिम साँस चलने तक एक चीज़ के बाद दूसरी चीज़ के पीछे  घूमने हेतु विवश करती  है। किंतु यह कपाल  कभी संतुष्ट नहीं होता । लाखों विचार इसके भीतर प्रवेश करते हैं, फिर भी  यह ख़ालीपन का भ्रम बनाए रखता है।

विचारों और कामनाओं का हमारे मन में अनवरत प्रवाह, हमारी चेतना में भावनाओं का अविरल प्रवेश होते रहना और  हमारे अस्तित्व पर निरंतर गिरते रहना ही मानव की बेचैनी और असंतुष्टि का मूल  है। हम एक कामना पूरी करते हैं और अक्सर हम इसके फल का आनंद ले सकें उसके पूर्व ,  हम किसी अन्य काम को करने की ओर प्रेरित होते हैं। जब तक कि मन को स्थिर होने का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता यह संतुष्ट नहीं हो सकता।

और संतुष्टि हमेशा एक भावना  नहीं है। या इस की कमी का यह अर्थ नहीं है कि कोई लालची है। कभी – कभी वास्तव में अधिकतर असंतुष्टि  मस्तिष्क की  उस  बच्चे के समान  बकबक  है जो स्वयं से बातें करता रहता है, जिस प्रकार जिसबच्चे ने अभी अभी शब्द और वाक्य बनाना सीखा हो वह बकबक करता रहता है  , उसी प्रकार हमारे कपाल में विचार हैं।।, यह और भी अधिक मनोरंजक  है कि, कैसे एक अनियंत्रित  विचार निरंतर बनता रहता है और एक तालाब की तली से उठ रहे छोटे से बुलबुले की भाँति हमारी चेतना के सम्पूर्ण स्थान को घेर लेता है, और यह अपनी सतह पर पहुँचने की यात्रा को जारी रखता है। यह बढ़ता रहता है। और साथ पर पहुँच कर   क्षण  भर के लिए  तैरता है और फट जाता है

मन की अशांत प्रवृत्तियों के कारण एक  विवाद जनक  विचार इसके उत्पन्न होने से और फटने  के मध्य एक सुकरात से एक शैतान में बदल सकता है। वास्तव में मैं कहता हूँ कि मानव के अस्तित्व का सर्वाधिक शक्तिशाली पहलू विचार है।हमारी विचार करने की क्षमता हमें वह बनाती है जो हम हैं और इसी प्रकार हमारी संकल्प के अनुसार न सोचने की क्षमता हमें हमारे विचारों का दास बनाती है । उदाहरणार्थ आप सोने का प्रयत्न कर रहे हैं लेकिन मन अपनी  बकबक रोक नहीं रहा, आप आराम करना चाह रहे हैं परंतु यह अत्यधिक क्रियाशील है।

एक अच्छे और महान ध्यानी में अंतर मात्र मन की स्थिरता या परम एकाग्रता  का नहीं है मात्र  सजगता का  है। मैं ने कुछ वर्षों तक सजगता के बारे में लिखा और कहा है ।

अभी  वर्तमान में फिर भी मैं इसका प्रयोग एक भिन्न  संदर्भ में कर रहा हूँ,  वह है अपने मन की बकबक  की ओर ध्यान न देने की कला । इस  कौशल (आपके मस्तिष्क में जो विचार हैं उनकी उपेक्षा करने का कौशल)  में प्रवीणता प्राप्त करना सर्वाधिक लाभप्रद   है। चाहे कोई चीज़ आपके मन में कितनी अधिक गहरी  क्यों न हो वर्तमान क्षण  में स्वरूप ले  सकती है। एक बार मन शांत हो जाए तो वही मामला कम महत्वपूर्ण अनुभव होगा। जो पिछली रात को जीने मरने की स्थिति लग रही थी वह सुबह में विशेष रूप से अच्छी नींद  और पौष्टिक नाश्ते के बाद बिलकुल निरर्थक लगेगी, यहाँ तक कि हँसने वाली बात लगेगी।

क्या कभी आपने मुर्ग़ी को अंडे सेते देखा है। ऐसा करने के लिए यह इनके ऊपर कुछ  दिनों तक बैठी रहती है।अपने अंडों पर बैठकर उनको गरमी और सुरक्षा प्रदान करती है। उसका यह कार्य अंडों को जीवित रखता है और एक दिन छोटे छोटे चूज़े बाहर निकाल आते हैं।मुर्ग़ी अपने बच्चों के साथ प्रेम में पड़  जाती है और उन पर अपना अधिकार  समझती है। उसने जो अंडे दिए थे और जिनकी रक्षा की थी, उन अण्डों में ( जो कि अब चूज़े हैं) उसे आसक्ति हो जाती है।  यही ठीक उस विचार के साथ होता है जिसे हमने छोड़ा नहीं । सबसे पहले यह हमारे भीतर होता है जहाँ हम इसे विकसित होने देते हैं। एक दिन यह एक आकर्षक रूप ले लेता है और हम इसका सामना करने के लिए विवश हो जाते हैं । यदि आप इसके ऊपर बैठेंगे तो आप इसे ज़िंदा रखेंगे, एक दिन यह पक जाएगा और इस समय तक  व्यक्ति इस विचार में इतना घिर जाता है कि उसे  इस पर टिके रहना, इसका पीछा करना सही अनुभव होने लगता है । तब यह मन का तरीक़ा बन जाएगा।एक निराशावादी एक  चिरकालीन चिंता ग्रस्त बन जाता है और , एक  आशावादी अतिविश्वासी बन जाता है। धुन मनोग्रंथि   बन जाती है और मनोग्रंथि एक बीमारी बन जाती  है।

सजगता विचारों के प्रवाह पर नियंत्रण  रखती है। यह आपको जागरूक रखती है कि आप कहाँ लीन हो रहे हैं। इस सबसे भी अधिक  यह आपको अपनी इच्छानुसार अपनी एकाग्रता को स्थानांतरित  करने में सहायता करती है।

मुल्ला नसीरूद्दीन अंडे बेच रहा था, तभी एक ग्राहक आया और अंडों का परीक्षण करने लगा। वह एक अंडे को अपने हाथ में लेता उसकी बनावट का अनुभव करता और फिर उसे वापस रख देता। कभी वह अंडे को अपनी नाक के पास लाता उसे सूँघने का प्रयास करता और कभी उसे थोड़ा हिला कर देखता।

अंततः ऐसा  प्रतीत हुआ कि उसने अपना मन बना लिया है , फिर उसने मुल्ला से पूछा “क्या ये अंडे ताज़े हैं?”

मुल्ला नसीरूद्दीन ने उतर दिया “ ये तो मुझे नहीं मालूम , मैं उनको से नहीं रहा बस बेच रहा हूँ।”

मानव मन विचार की प्रकृति नहीं जानता। इसे यह नहीं मालूम यह अच्छा है या बुरा, सही है या ग़लत, ताज़ा है या बासा । ये उपनाम हमारे आकलनों और समझ पर आधारित हैं। यदि आप किसी विचार पर बैठेंगे नहीं तो यह पकेगा नहीं। यदि यह पकेगा नहीं तो आपको एक मोह कम होगा, चिंता करने के लिए एक चीज़ कम होगी ।

एक अनावश्यक विचार को भोजन (ध्यान  और विवेचन करने के ) की आपूर्ति करने या अपने मस्तिष्क   को (विचारों से) भरने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।  यह एक ऐसा पात्र है जो कभी नहीं भरता।

जाने दें। अपने ध्यान को हटाएँ। अपनी ऊर्जाओं को किसी रचनात्मक और अर्थपूर्ण  चीज़ में निवेश करें।

अंडे नहीं तो चूज़े नहीं ।

शांति।

स्वामी

मुझे यह घोषणा करते हुए प्रसन्नता है कि मैं जुलाई २०१९ में प्रथम ब्लैक लोटस चैम्पियंस ओरिएंटेशन  कार्यक्रम का संचालन करने वाला हूँ। चुने हुए प्रतिभागियों के लिए इसका जीवंत प्रसारण    होगा या आप के पास  आश्रम में  व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर इसमें भाग लेने का भी उपाय है  ।यह आमंत्रितों के लिए एक दम निःशुल्क  है। इसका विवरण इस प्रकार है