उचित रीति से ध्यान करने की प्रक्रिया में चार प्रमुख व्यवधान हैं। ध्यान में सुस्पष्ट परिणाम पाने के लिए इनके प्रति सावधानी परम आवश्यक है। विगत लेखों में मैंने बेचैनी व आलस्य – इन दो व्यवधानों की विस्तार से विवेचना की। आज मैं तीसरे व्यवधान पर प्रकाश डालने जा रहा हूँ, वह है – अवांछित विचार। ध्यान द्वारा आप मात्र एक विचार पर अपने को एकाग्र करने की क्षमता विकसित करते हैं; स्वयं द्वारा चयनित एक विचार पर एकाग्रता; कालांतर में उस एक विचार के साथ सम्पूर्ण तादात्मय स्थापित कर, एकरूप हो जाने के लिए। ऐसी एकरूपता परमचेतना व परम ज्ञान को जन्म देती है। यह केवल प्रबल प्रयास व महान एकेन्द्रित-एकाग्रता के परिणामस्वरूप ही प्राप्त किया जा सकता है।

यदि आप उत्कृष्ट प्रयास करते हैं तो सब स्वतः आकर्षित होने लगता है। मन को विचारों से पृथक कर पाना वैसे ही असंभव है जैसे अग्नि को ऊष्मता से । एकाग्रता के अभ्यास में आपको अपना सम्पूर्ण ध्यान एक चयनित विचार पर बोध सहित, बलपूर्वक लगाना होता है। ध्यान में निपुणता का अर्थ है कि आप उस एक विचार पर आसानी से, बिना किसी अनुचित प्रयास के, एक तीक्ष्ण एवं स्थिर मन के द्वारा केन्द्रित रह सकें; नीरसता व उदासीनता से रहित हो कर। एक सिद्ध पुरुष, जितना समय वह चाहे, तब तक ध्यानावस्था में रह सकता है; वहीं, एक साधक केवल अनुकूल परिस्थितियों में ही ध्यान लगा पाता है – जैसे मनोहर वातावरण, शांत चित्त, कोई चिंता का बड़ा कारण नहीं, उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य इत्यादि। जो व्यक्ति अभी ध्यान की प्रक्रिया के अभ्यासिक चरण में है, वह अवांछित विचारों के जाल में सुगमता से फंस जाता है। यह विचार उसी तरह आपकी मानसिक शांति में विघ्न उत्पन्न कर देते हैं, जैसे स्थिर जल में पत्थर फेंकने से तरंगे उत्पन्न होती हैं।

स्वाभाविक वस्तु-स्थिति

बाह्य भौतिक जगत के अनुरूप, आपका अंतःजगत भी अन्योन्याश्रित व कड़ी-बद्ध होता है। उदाहरण स्वरूप – भौतिक जगत में यदि आपकी कार में ईंधन नहीं है तो वह चल नहीं सकती; यदि मार्ग व सड़क नहीं बनी तो आप कहीं आ जा नहीं सकते; यदि ऊर्जा (बिजली) की व्यवस्था नहीं तो तेल-शोधक संयंत्र को चलाना संभव नहीं; यदि तेल ले जाने वाला वाहन ही नहीं तो तेल-वितरण नहीं हो सकता; इत्यादि। हर प्रक्रिया कड़ी-बद्ध है। बाह्य जगत की कोई भी गतिविधि स्वतंत्र रूप से नहीं चलती। आप इस तथ्य का जितना विस्तृत विश्लेषण करना चाहें कर लें, अंततः आप इसी परिणाम पर पहुंचेंगे। एक क्रिया, दूसरी क्रिया के साथ जुड़ी हुई है।

आपके अन्तःकरण के विचारजगत का भी बिलकुल ऐसा ही कार्यस्वरूप है। ध्यान के समय आप अपने प्रथम विचार के उपजते ही यदि उसे नहीं रोक पाते, तो समझ लें कि सैंकड़ों अन्य विचार कड़ी-बद्ध रूप से आने ही वाले हैं। मान लें कि ध्यान के दौरान आप प्यास का अनुभव करते हैं। स्वाभाविक है कि आप जल का विचार करेंगे, तत्पश्चात किसी दुकान से एक बोतल पानी क्रय करने का, फिर, संभवतः क्रेडिट कार्ड उपयोग करने का; वहाँ से आपका मन शायद किसी अन्य दिशा की ओर मुड़ जाये व आप एक प्रसंग स्मरण करने लगें जब आपने कार्ड से गैस क्रय की थी, वहाँ से आपको शायद गैस के दाम स्मरण हो आयें, बढ़ते दामों व अपने सीमित साधनों का विचार आ जाये कि कैसे आप कुछ बचत कर सकते थे, अथवा क्यों आप बचत नहीं कर पाये; बचत के विचारों से आप भविष्य के विचारों में उलझ सकते हैं, इत्यादि। तभी आपको, अकस्मात, अनुभव होता है कि आपने एकाग्रता व ऊर्जा – दोनों खो दीं हैं। यदि आपने अपने प्रथम, जल के, विचार के समय ही मन को पुनः ध्यान की वस्तु पर एकाग्रचित्त किया होता तो इतनी लंबी विचारों कि कड़ी से आप संभवतः बच गए होते। देखिये, कितना सरल है ये सब ! क्या वास्तव में यह सरल है?

अवांछित विचार – एक स्वाभाविक व्यवधान

मन कि स्वाभाविक स्थिति दूर तक फैले स्थिर सागर की भांति शांत है। विचार तरंगों के समान हैं। कभी कभी वे ज्वारीय तरंग के रूप में भी आ सकते हैं। बेचैनी की तुलना समुद्रीय तूफान से की जा सकती है। उदासीन चित्त उस जहाज के समान है जिसका इंजन बंद है, और वह वायु की दिशा में स्वतः चला जा रहा है। जैसे लहरों के बिना सागर, सागर नहीं, वैसे ही विचारों के बिना मन, मन नहीं। विचारों के बिना मन की कोई सत्ता नहीं । एक स्मरण रखने योग्य तथ्य। विचार एक प्रतिबंधित मन की उपज होते हैं। मन को इसकी प्रतिबंधित स्थिति से ऊपर उठाना व इसे इसके वास्तविक शाश्वत स्वरूप में लाना ही ध्यान है। यह एक गहन अनुभव है। ध्यान में आने वाले सभी व्यवधानों में से विचारों का आना सर्वाधिक नैसर्गिक है। चूंकि यह करोड़ों वर्षों के विकासक्रम का परिणाम है, यह स्थिति चिरकालिक है, अन्तःकरण में गहरी स्थापित है, चिरसेवित है, अतः इससे ऊपर उठना सर्वाधिक कठिन कार्य है। उचित अभ्यास द्वारा सफलता प्राप्त की जा सकती है।

कारण

यह एक ऐसा व्यवधान है जिसके लिए आप स्वयं को दोषी नहीं मान सकते। इसका मूल कारण विकास-क्रम है। प्रतिबंधित मन का स्वाभाविक लक्षण है – विचारों में निमग्न रहना । आप जब भी ध्यान दें, आप अपने को विचारमग्न अवस्था में ही पाएंगे। ध्यान के दौरान जैसे जैसे आप बेचैनी व नीरसता पर संतुलन पाना सीखते हैं; तब यह तीसरा व्यवधान – विचारों के रूप में – आपके सम्मुख प्रस्तुत होता है। यह एक अत्यंत उलझन भरी स्थिति है। विचार बेचैनी उत्पन्न करते हैं और यदि वे अनियंत्रित रहेंगे, तो आपको नीरस व थका-मांदा भी कर, आपके ध्यान को निम्न कोटि का कर देते हैं।

जैसे जैसे आप, ध्यान के दौरान, कभी विश्रांत व कभी प्रयत्नशील हो एकाग्रचित्त होने के अपने अभ्यास में संतुलित होते चले जाते हैं, आपका अपने विचार-प्रवाह पर भी संचालन स्थापित होने लगता है। हालांकि वे आते-जाते रहते हैं, तथापि आपको उदास होने की कोई आवश्यकता नहीं। यह स्वाभाविक है। विचारों की अपनी स्वयं की कोई सत्ता नहीं, कोई मूल्य नहीं। जब तक आप सचेतन हैं, विचार तो उदित होते ही रहेंगे। अथाह यत्न के द्वारा आप अपने सभी विचारों को समेट कर, उनसे ऊपर उठ कर, स्वयं को अपने ध्यान के उस एक मात्र विचार पर केन्द्रित कर पाते हैं। हो सकता है आप विचार-शून्य अवस्था पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हों – शून्यता पर। यहाँ अवांछित विचार रुकावट व भटकन का रूप ले लेते हैं। और, जब आप ध्यान कर रहे हैं तो हर एक विचार रुकावट ही है; केवल उस एकमात्र विचार को छोड़ कर जिस पर आप ध्यानरत हैं।

समाधान

किसी भी विचार के उदित होने पर प्रातिक्रिया न दें। बस, उसे जाने दें, त्याग दें, व पुनः अपने ध्यान के केन्द्रबिन्दु पर आ जाएँ। सभी विचारों को एक समान उदासीनता से देखें। किसी भी विचार का परीक्षण न करें; उसे किसी भी प्रकार का महत्व न दें। एक संस्कृत शब्द जो बहुत से तांत्रिक, योगिक, व ध्यानभ्यास के ग्रन्थों में बहुधा उपयोग में लाया जाता है, वह है – स्मृति। इसका अर्थ है स्मरण, अथवा सतर्कता/ सावधानी । केवल एक सतर्क मन ही नए उपजते विचारों को पकड़ सकता है। महत्वपूर्ण सूत्र यह है कि विचार के उदित होते ही उसे त्याग दिया जाये। जैसे जैसे आप सतर्कता व सावधानीपूर्वक ध्यान के अभ्यास में रत रहते हैं, विचार, न केवल दुर्बल होने लगते हैं , अपितु, एक समय के उपरांत, उनका उदय होना ही रुक जाता है। उस परम निश्चल विश्रांति की अवस्था में जब आप सजगता पूर्वक ध्यानभ्यास में दृढ़ रहते हैं, तब आप परमानंद की दिव्य अनुभूति अवश्यमेव कर पाते हैं।

शांति।
स्वामी