आश्रम मे पहले दिन से ही नियमित रूप से आगंतुक आते रहे हैं। इस क्षेत्र से दो आगंतुक प्रतिदिन आते हैं, उनमें से एक गौर तथा दूसरी श्याम वर्ण की है। उन दोनों की प्रकृति भिन्न है परन्तु दोनोंलगभग एक ही समय आती हैं। गौर वर्ण वाली मेरे पास बैठना पसंद करती है पर श्याम वर्णवाली दूरी बनाए रखना पसंद करती है। ऐसा नहीं लगता है की वो कोई ज्ञान अथवा उपदेश पाने के लिए आती हैं। वास्तव में उनके पास कोई प्रश्न नहीं है, वो केवल अपना स्नेह प्रदर्शित करती हैं। श्याम वर्णवाली के तीखे नाक-नक्श हैं पर वो गौर वर्णवाली के समान भावुक नहीं है जबकि गौर वर्णवाली की आँखें कोमल तथा मुखड़ा रुचिकर है। दो पैरोंवाले स्थानीय निवासियों की तरह, गौर वर्णवाली ने लगता है पिछली दीवाली के बाद से स्नान नहीं किया है। ज्यों ही मैं उसके समीप जाता हूँ वो धरती पर लोटने लगती है। श्याम वर्णवाली सहज रूप में दूर से ही पूंछ हिलाती रहती है। पशु-मानव संबंध बताने के लिए मैं हम सभी को मनुष्य श्रेणी में रख रहा हूँ किन्तु थोड़ा सशंकित सा…

हम लोग प्रतिदिन दो समय भोजन पकाते हैं और इस बात का सदैव ध्यान रखते हैं कि दो अतिरिक्त रोटियाँ हमारे मित्रों के लिए भी बने। उनके स्नेह के कारण वे कुछ अतिरिक्त निवाले भी पा जाते हैं।जब मैं भोजन कर रहा होता हूँ, वे आते हैं और मेरे बगल में बैठकर अपने भावपूर्ण नयनों से अपलक मुझे निहारते हुए भोजन की आवश्यकता व्यक्त करते हैं। उनके भावों की अभिव्यक्ति और पाने की दृढ़ता हमें बाध्य करती है।

एक दिन की बात है जब उनकी स्नेहपूर्ण दृष्टि मेरे भोजन में से हिस्सा पाने के लिए आग्रह कर रहीं थीं कि अचानक उन्होंने भौंकना शुरू कर दिया। जब मैं उनके अप्रत्याशित जोर से भौंकने से जड़वत बैठा रहा, वे बिजली कि गति से आश्रम के दूसरे छोर की ओर गए। मैं अचंभित हुआ और सोचा शायद किसी अन्य कुत्ते के इनके क्षेत्र में आगमन ने इन्हें उकसाया होगा । क्योंकि मैने एक बार इनको पहले भी आश्रम मे निर्दयता से दूसरे कुत्तों के साथ लड़ते हुए देखा था। करोड़ों वर्ष के क्रमिक मानसिक विकास के प्रतिफल से हमारे मन की प्रकृति ऐसी हो गयी है। हम अपने अतीत के अनुभव प्रदत्त ज्ञान पर निर्भर करते हैं वर्त्तमान को जानने के लिए, उसका अर्थ निकालने के लिए। इस प्रवृति से ऊपर उठना ही आत्मबोध या आत्मसाक्षात्कार है। सदैव वर्त्तमान में जीना और अपने समक्ष आते हुए क्षणों से अवगत रहना ही अत्यधिक सचेत मन की प्रमाणिकता है।

पुनश्च वर्त्तमान कहानी पर वापस आते हैं, किसी अन्य कुत्ते का कोई निशान नहीं था, बल्कि वो आश्रम मे आये कुछ दर्शनार्थियों पर भौंक रहे थे। अपरिचितों की गंध से वो आश्वस्त हो गए कि कोई क्षति-हानि नहीं है अतः परिणामस्वरूप वो पीछे हट गए। वो अपरिचित गाँव की तीन महिलायें थीं जो दर्शनार्थ आयी थीं। स्थानीय लोग आश्रम ऐसे आते हैं जैसे मंदिर दर्शन के लिए आये हों। उनके पास ईश्वर या दिव्यता से सम्बंधित कोई प्रश्न नहीं होते। कभी कभी उनके मवेशी और बच्चों की कुशलता, वर्षा और जादू-टोने से सम्बंधित प्रश्न होते हैं, बस इतना ही।

शिक्षा किसी प्रकार से भक्ति हर लेती है। शिक्षित कुछ करने के पहले जानना चाहता है। उसको लगता है कि उसका विश्वास किसी ठोस बौद्धिक आधार पर टिका होना चाहिए। तुलनात्मक रूप से ग्रामीण सरल होते हैं। वो विश्वास करके खुश होते हैं चाहे वह अंधविश्वास ही क्यों न हो। किसी दूसरे के अनुभव को मानकर और विश्वास करके शिक्षित लोग अपने आप को ज्ञानी समझ बैठते हैं। ग्रामीणों के विश्वास का कोई आधार नहीं है। यह सभी संज्ञानात्मकता से खाली है। एक में, विश्वास्कर्ता अंधा है और दूसरे में विश्वास ही अंधा है। अब आप ही निर्णय कीजिये कि दोनों में से कौन अच्छा है। भक्त को तर्कसंगत होने की आवश्यकता नहीं है। भक्ति बनी ही है धारणा और प्रवृति के धागों को काटने के लिए और इसके लिए हमें बुद्धि से ऊपर उठना होगा। ऐसी भावातीत स्थिति विश्वास्कर्ता और विश्वास को एकाकार करती है। जिस क्षण आप एक होते हैं उसके दूसरे क्षण में आपको आपके इष्ट की प्रतिमूर्ति दिखाई देगी जो कि न केवल एक प्रकाश पुंज या विभिन्न रंगों की आकृति होगी बल्कि एक साक्षात आकृति जिसे आप स्पर्श कर सकते हैं।

एक बार फिर से कुत्तों की बात करते हैं, उनकी स्वामिभक्ति मुझे छू गयी। क्योंकि हम उन्हें खिलाते रहे हैं, वे आश्रम की रखवाली करने लगे। वे हमारी रक्षा करना चाहते हैं। यह विश्वासपात्र की मूक सहमति है। उन्हें भोजन मिलता है, वो पहरा देते हैं। उन्हें प्यार मिलता है, वो वापस प्यार देते हैं। उन्हें प्यार नहीं मिलता है, फिर भी वो प्यार देते हैं। आपके मन की अवस्था कैसी भी हो, वे पूंछ हिलाते हैं। उनके मन की अवस्था कैसी भी हो, वे फिर भी पूंछ हिलाते हैं। जब आपकी खेलने की इच्छा होती है, वे आपके साथ खेलना चाहते हैं। आप उन्हें घी के साथ चपाती दें, वे सहर्ष स्वीकार करते हैं। आप उन्हें बिना घी के देते हैं, वे फिर भी प्रसन्न रहते हैं।

वो केवल भेद करते हैं अपने पोषण करनेवाले और अपरिचित में, मित्र और शत्रु में। ये विश्वापात्र की मूक सहमति है।

ऐसा प्रतीत होता है कि उनका आचरण किसी सिद्ध पुरुष से कम नहीं है। वो वर्त्तमान में जीते हैं। तो क्या इसमें कोई आश्चर्य है के, अंग्रेजी मे कुत्ता भगवान् का विपर्यय शब्द है। आखिरकार वही भगवान् सभी प्राणियों में रहता है। और भगवान मे कौन रहता है? क्या बूंद को सागर कि आवश्यकता है या सागर को बूंद की? बूंदें सागर का आधार हैं क्योंकि सागर बूंदों से बना है या बूंदों को सागर चाहिये अपने अस्तित्व को खोकर बचाने के लिये? किसी भी प्रकार से, दोनों पूर्ण हैं अपने आप में। ईशावास्य उपनिषद् का आवाहन मंत्र है –

ओऽम् पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||

अर्थात – वो भी पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निकला है। पूर्ण में से पूर्ण को निकालने के बाद शेष भी पूर्ण है।

शान्ति।
स्वामी