युआन साम्राज्य काल में चीन के सम्राट स्वयं का एक चित्र बनवाने के इच्छुक थे। “मैं अपने आज तक बने किसी भी चित्र से पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हूँ।” उनने चित्रकारों के एक बड़े समूह को संबोधित किया। “मेरा एक ऐसा चित्र बनाओ जिसमें मेरे सूक्ष्मतम हाव-भाव भी दर्शाये गए हों – मेरा प्रतिरूप।”

सम्राट प्रतिदिन दो घंटे के लिए बैठते और अति कुशल चित्रकार उनका अवलोकन करते, व भिन्न भिन्न कोण लेकर चित्र चित्रांकित करते । पूर्ण समर्पण एवं सतर्कतापूर्वक वे सब अपने अपने कैनवस पर पेंसिल व ब्रुश चलाते। पारितोषिक की लालसा से भरे, वे सभी आगे की पंक्ति में स्थान के लिए वाद-विवाद करते, ताकि वे सम्राट का अवलोकन गहराई से कर पाएँ व सूक्ष्म से सूक्ष्म हाव-भाव भी समझ पाएँ। केवल एक ताओ सन्यासी चित्रकार इस सबसे पृथक रहता।

उसने सम्राट से निवेदन किया कि उसे एक एकाकी कक्ष दे दिया जाये जहां वह अपने स्मृति बल से एक अति सूक्ष्म प्रतिबिंब बना सके।

उसने घोषित किया, “यदि मैं पूर्णत: अनुरूप चित्र न बना पाऊँ तो मुझे मृत्यु दंड दे दिया जाये। किन्तु जब तक मैं अपना कार्य समाप्त न कर लूँ, कोई भी मुझे नहीं देखेगा। मेरी केवल यही एक शर्त है।”

उसके इस निवेदन को अनुमोदन मिल गया व तीन अन्य शिष्य उसकी सहायतार्थ साथ हो लिए। प्रतिदिन वे चारों कक्ष में जाते, दिनभर वहीं रहते व संध्या समय बाहर आते। यदा कदा, कुरेदने इत्यादि कि आवाज सुनी जा सकती थी। अन्य चित्रकारों के हाथों की भांति उनके हाथ कभी भी रंगों से भरे हुए नहीं होते थे। कभी कभी धूल भरे भले हों, किन्तु कभी भी रंगों से मैले नहीं। किसी को भी इस बात का ज्ञान नहीं था कि वे किस प्रकार की कृति चित्रित कर रहे हैं।

एक माह उपरांत तक भी सम्राट किसी चित्रकार की कला से प्रसन्न नहीं थे। तब, ताओ गुरु ने घोषणा की, कि उसकी कलाकृति पूर्ण हो गई है। उसने यह भी कहा कि वह कलाकृति दीवार पर बनाई गई है।

उत्सुकता व कुतूहल से भरे सम्राट ने शांत वातावरण से भरे उस कक्ष में प्रवेश किया। एक दीवार रेशम के पर्दे से ढकी हुई थी। कुछ सुंदर दीयों को मनमोहक रूप से आस पास सजाया गया था। ताओ गुरु मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। सन्यासी ने पर्दा हटाया व एक चमकदार दीवार सामने थी।

एक अति चिकनी सतह पर, जो कि कभी एक खुरदरी दीवार हुआ करती थी, सम्राट का प्रतिबिंब भव्यरूप से प्रदर्शित था। सम्राट के मुख-मण्डल पर एक मुस्कान बिखर गई, और वह प्रतिबिंब भी मुस्कुराने लगा। सम्राट बाईं ओर घूमे तो प्रतिबिंब भी घूम गया। यह एक सजीव चित्र था, हिलती डुलती कलाकृति, जिसमें हर सूक्ष्मतम भाव गहराई से प्रदर्शित हो रहा था।

“महाराजाधिराज, यह वू–वे है”, गुरु बोले, “ताओ की परंपरा – कार्य न करने का कार्य।”
“मुझे स्वीकार करना ही होगा”, सम्राट हंस कर बोले, “यह एक अति चतुराईपूर्ण कृत्य है। यही एक सर्वोत्तम व सर्वाधिक प्रभावी प्रतिरूप है जो कोई चित्रकार बना सकता था।”
“हे सहस्त्र वर्षों के सम्राट, सविनय निवेदन पूर्वक मैं कहना चाहूँगा कि यह प्रतिरूप मैंने नहीं गढ़ा। मैंने मात्र परिस्थितियाँ निर्मित की और चित्र स्वमेव प्रकट हो गया।”
“मैं असमंजस में हूँ कि आपको आपकी चित्रकला के लिए पुरस्कृत करूँ, अथवा आपकी बुद्धिमत्ता के लिए ?”
“दोनों ही के लिए परिस्थितियाँ तैयार की गई हैं,” गुरु ने व्यंग्य किया व झुक कर नमन किया।
सम्राट ने मुक्त-हृदय से उसे पुरस्कृत किया।

मैं समझता हूँ कि जीवन के साथ भी यही है। हमें जो कुछ भी चाहिए, उसके लिए हमें परिस्थितियाँ उत्पन्न करनी होती हैं। अपने स्वप्नों की पूर्ति की धुन में, प्रायः हम इतने केंद्रीभूत एवं स्वकेंद्रित हो जाते हैं कि यह विस्मरित कर देते हैं कि जब तक हम अपने आसपास उपयुक्त वातावरण तैयार नहीं करते, तब तक वास्तव में हम अपने लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं कर सकते। अपने उतावले अनुधावन के फलस्वरूप, हमारी परिस्थितियां ही हमारे मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बन जाती हैं।

आप अपने जीवन में सुख व समन्वय की इच्छा रखते हैं तो उसको पोषित करने वाला वातावरण निर्मित करें। प्रेम चाहते हैं? उस तरह का व्यवहार अपनाएं जो प्रेम को जगाए। सफलता चाहते हैं? ऐसी परिस्थितियां उजागृत करें जो उसका आश्रय बनें। परिणाम रचित नहीं किए जाते, वे तो स्वमेव सामने आते हैं। हम जो उत्पन्न करते हैं वह है परिस्थितियाँ, जो हमारी इच्छानुरूप लक्ष्य प्राप्त करने में प्रेरक हों।

वू–वे से तात्पर्य है कि प्रत्येक कार्य की अपनी एक अंतर्निहित गति होती है, एक नैसर्गिक व्यवस्था होती है। आपको मात्र उसे होने देना है, उसे आगे बढ़ने देना है। एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अति व्यग्रतापूर्ण लगे रहना ही सदा उत्तम मार्ग नहीं होता। यदा कदा, आपको उसे सहजता से लेना होता है, उसे समय देना होता है।

आप जब एक बीज बोते हैं तो उसके लिए उचित परिस्थितियाँ निर्मित करने की ओर परिश्रम करते हैं। जमीन को नरम रखें, गीला रखें, खाद डालें, और, बीज अंकुरित हो जाएगा। वह एक नन्हें से पौधे का रूप लेगा, फिर बढ़ा होगा, तत्पश्चात वृक्ष बन जाएगा। बीज का अलग से ध्यान रखने की आवश्यकता नहीं, वह तो वातावरण है जिसे आपके ध्यान की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार, जब आप उचित परिस्थितियाँ बना देते हैं तो आपके जीवन में अच्छाई, हृदय में शांत भाव, चेहरे पर एक मुस्कान, स्वतः ही आने लगते हैं। संक्षेप में इसे ही ‘ताओ’ कहा जाता है – सहज क्रियाओं को सहज रूप से होने देना। कार्य में रोक लगाना और कार्य में हस्तक्षेप एक समान नहीं होते। दोनों का अंतर समझें।

एक स्त्री ने अपने ताओ गुरु को फोन किया, और उसे उनकी उत्तर देने वाली मशीन से यह संदेश मिला –

“नमस्ते!
यह मेरी प्रश्न पूछने वाली मशीन है व दो प्रश्न इस प्रकार हैं –
आप कौन हैं व आप क्या चाहते हैं?
उत्तर देने से पूर्व ध्यान से सोचें। स्मरण रखें …. अधिकांश व्यक्ति इन प्रश्नों के उत्तर देने से पूर्व ही इस पृथ्वी से पलायन कर जाते हैं।
बीप …”

जीवन के साथ भी, इसके उत्तर तक पहुँचने का केवल यही एक मार्ग है कि इसके प्रश्नों का परीक्षण किया जाये। यदि आप अपनी ऊर्जा उत्तर (परिणाम) निर्मित करने में व्यय न कर, परिस्थितियाँ निर्माण करने में लगाएँ, तो बुद्धिमत्ता एवम अंतर्दृष्टि, एक सुंदर स्वप्न की भांति आप तक पहुँच जाएंगी। जीवन स्वयं आपके समक्ष दस्तक देगा। वह स्वयं आपके द्वार पर आ, एक सुमधुर प्रातःकाल की वंदना से आपको जगाएगा, शीतऋतु में खिली गुनगुनी धूप के समान। “ताओ” के अनुसार अधिकांश लक्ष्य संघर्ष द्वारा नहीं, वरन धैर्य द्वारा प्राप्त किए जाते हैं। जैसा कि “लाओत्ज़” ने “ताओ ते चिंग” में कहा, “जो ज्वाला दो गुना उजाला देते हुए जलती है, वह आधा समय ही जलती है।”

धीरज धरें, साधारण रीति से रहें और जीवन को सहजता से आगे बढ़ने दें। इससे आपको ज्ञान होगा कि कब तैरना आवश्यक है व कब मात्र बहाव के साथ बहना। आपको ज्ञात होगा कि कब किसी एक स्थिति में कुछ भी न करना ही सब कुछ करना होता है – “वू–वे”।

एक उत्तम जीवन का यही रहस्य है – यह जान पाना कि कब, कहाँ, क्यों व कैसे कार्य किया जाये अथवा तो न किया जाये। यही भगवद गीता का सम्पूर्ण दर्शन है, एक वाक्य में कहा गया कर्म का मर्म।

एक भिन्न संदर्भ में, मैं इस्मिता टण्डन व स्वामी विद्यानंद जी का आभार व्यक्त करना चाहूँगा। इस्मिता पूर्ण निष्ठा व परिश्रम से मेरी सभी पुस्तकों का सम्पादन करती हैं और स्वामी विद्यानंद विगत पाँच से अधिक वर्षों से मेरी निजी सेवा में हैं। उनका समर्पण अलौकिक है। आरंभ में मुझे संकोच हुआ, किन्तु फिर मैं उनके इस गहन भाव से अत्यधिक प्रभावित हुआ कि मेरे सानिध्य में हुए अपने अनुभवों को वे लिखित रूप में अन्य श्रद्धालुओं के साथ साझा करने के इच्छुक हैं। एक पुस्तक लिखने के लिए अप्रत्याशित यत्न की आवश्यकता पड़ती है। अपने बाल सुलभ हृदय के उद्गार व निष्कपट स्पष्टवादिता सहित उन्होंने अपनी पुस्तक – “ॐ स्वामी – एज़ वी नो हिम” (Om Swami : As We Know Him) में अनेकानेक प्रसंग साझा किए हैं। जब मैंने यह पुस्तक पढ़ी तो मुझे लगा कि पुस्तक में वर्णित घटनाओं की सत्यता के रसास्वादन हेतु पाठकों के हृदय में भी कुछ मात्रा में ईमानदारी एवं खुलापन बसा होना चाहिए, विशेष रूप से पुस्तक के प्रथम खंड के संदर्भ में। और, वह “सत्य” ही है, जिसके पक्ष में मैं सदा खड़ा हूँ – सम्पूर्ण सत्य, अपने वास्तविक रूप में। यहाँ स्वामी विद्यानंद जी के शब्दों में पुस्तक का एक संक्षिप्त भाग उद्धरित है –

एक बार, आश्रम में दो युवा श्रद्धालु, एक सेब से भरा छोटा सा थैला ले कर आए। वे आग्रह करने लगे कि गुरुदेव कम से कम एक सेब तो अवश्य ही लें। गुरुदेव ने थैले में से एक सेब निकाला, उस पर एक मंत्र का उच्चारण किया, किन्तु जैसे ही वे उसे चखने लगे, उन्होंने उसे पुन: थैले में रख दिया।

“मुझे खेद है,” उन्होंने कहा, “मैं इसे नहीं खा सकता, चूंकि इस थैले में से पहले से ही फल निकाल कर खाया जा चुका है इससे पूर्व कि मैं इसे माँ जगदंबा को भोग लगाता।”
उन दोनों युवकों ने लज्जा से अपने सिर झुका लिए। “हमें क्षमा करें स्वामीजी,” वे बोले, “हमें भूख सता रही थी, अतः नदी पार करने से पूर्व हम दोनों ने एक एक सेब खा लिया था।”
गुरुदेव बहुत तेज हँसे और बोले कि अच्छा ही हुआ, अब उन्हें उस थैले से नहीं खाना पड़ेगा।

एक अन्य अवसर पर, एक स्त्री ने गुरुदेव के लिए मिष्ठान बनाए थे और वह, अति सावधानी पूर्वक भली भांति बांध कर उसे आश्रम लाई थी। उसके साथ उसके पति व एक छोटा बालक भी था। एक बार पुन:, उन्होंने आग्रह किया कि गुरुदेव उसमें से कुछ अवश्य लें।

“क्या इसे पहले किसी ने खाया है?” गुरुदेव ने एक लड्डू हाथ में लेते हुए पूछा।
“नहीं, बिलकुल नहीं स्वामीजी,” व बोले, “हम जानते थे कि ऐसा होगा तो आप इन्हें नहीं खाएँगे।” गुरुदेव मुस्कुराए व उन्होने एक मंत्र उच्चरित किया। किन्तु, खाने से पूर्व ही उन्होंने वह लड्डू नीचे रख दिया और कहा, “मुझे खेद है, इसका भोग नहीं लगाया जा सकता।”
“गुरुजी हमें सौगंध है,” पति-पत्नी साथ साथ बोले। “इन्हें बिलकुल भी नहीं चखा गया।”
“आप असत्य नहीं कह रहे, किन्तु आपको भी ज्ञात नहीं,” गुरुदेव ने कहा। उन्होंने समीप बैठे बालक की ओर निहारा और उसे अपने पास बुलाया व उसका शीश सहलाया।
बालक बोला, “मुझे माफ कर दो माँ, मैंने उस समय एक लड्डू खाया था जब आप उन्हें ठंडा होने के लिए रखकर स्वयं रसोईघर से बाहर गई थीं। मैं अपने को रोक न सका।”

वह स्त्री बच्चे को डांटने के लिए उठीं और बच्चा भय से सहम गया। तभी गुरुदेव ने बच्चे को अपने और पास कर लिया। “कृपया ऐसा न करें!” उन्होंने उस माँ को रोक दिया। “इसने खाया मानो जगन्माता ने ही खाया।” गुरुदेव ने लड्डू का डिब्बा उठाया, एक बच्चे को दिया और एक स्वयं खाया।

परिवार ने प्रस्थान किया, किन्तु गुरुदेव का मुख गंभीर हो गया। “आज से,” वे बोले, “मैं अपना भोजन एक भिन्न रूप से जगन्माता के सम्मुख अर्पित करूंगा, ताकि किसी को कभी डांट न खानी पड़े, अथवा मुझे कुछ अर्पित करने से पूर्व चिंता न करनी पड़े। तब इस बात का आशय नहीं रहेगा कि यह पहले से चखा जा चुका है अथवा नहीं।”

हार्पर कॉलिन्स, इंडिया द्वारा प्रकाशित (अनुभवी अजिथा गणेशन, नियुक्ति संपादक, हार्पर कॉलिन्स के प्रति हार्दिक आभार) यह पुस्तक विश्व भर में उपलब्ध है – पेपर बैक व किंडल, दोनों रूप में। यहाँ क्लिक करें यदि आप भारत में हैं, और यहाँ शेष विश्व के लिए।

शांति।
स्वामी