मैं गत माह सिंगापुर से विमान द्वारा लौट रहा था। वह ५ १/२ घंटे की हवाई यात्रा थी। समीप की सीट, जो मात्र एक छोटे से आने जाने के मार्ग भर की दूरी पर थी, एक बालक बैठा था जो लगभग १२ वर्ष के आसपास का होगा। साथ में उसकी बहन बैठी थी मात्र कुछ वर्ष बड़ी। वे विमान में आने वाले आखिरी यात्री थे व बिलकुल अंतिम क्षणों में ही विमान पर सवार हो पाये थे। दस मिनट के भीतर ही विमान ने उड़ान भर ली।

जैसे ही हमारा विमान हवा में पहुंचा, उस बालक ने अपना फोन निकाला और एक विडियो गेम खेलने में व्यस्त हो गया। एक घंटे पश्चात उनकी माँ उनसे मिलने आईं, बालक ने दो-चार शब्द कहे और पुनः अपनी गेम खेलने लगा। उनकी माँ भी उसी समय लौट गईं। भोजन परोसा गया, उसने अपना फोन एक ओर रखा और उसके स्थान पर टी॰वी॰ चला लिया। भोजन के प्रमुख खाद्यों को उसने छुआ भी नहीं, वह केवल रुचिवर्धक अपेटाइज़ेर्स ही खाता रहा, जैसे सैटे-चिकन, वह बार बार वही मँगवाता रहा, तथापि उसने वह भी पूरा ढंग से नहीं खाया। भोजन के मध्य में ही उसने अपना फोन पुनः लिया और विडियो गेम खेलने लगा। टी॰वी॰ अभी भी चालू ही था।

लगभग २० मिनट पश्चात उसका मेज़ साफ कर दिया गया, उसकी प्लेट बचे हुए सैटे कबाब से भरी हुई थी और उसकी दृष्टि फोन पर ही गढ़ी थी। उसी समय उनसे मिलने उनके पिता आए। वह हंसमुख व्यक्ति लग रहे थे जिन्होंने वहीं एक बीयर का ऑर्डर दिया और अपने बेटे को कुछ स्थान बनाने को कहा ताकि वह भी उसके साथ बैठ सकें। हालांकि पिता और पुत्री ने तो कुछ बातचीत की, किन्तु उस बालक ने अपनी दृष्टि किंचित मात्र भी फोन से नहीं हटाई।

एक घंटे के उपरांत उसने फोन को एक ओर रखा और अपना लैपटाप निकाल लिया। जब तक वह आरंभ होता, उसने टी॰वी॰ स्क्रीन पर दृष्टि गढ़ाये रखी। जैसे ही लैपटाप चला, तत्काल वह उस पर एक विडियो गेम खेलने लगा। उस खेल में होने वाली निशानेबाजी, तीक्ष्ण स्वर व तोड़-फोड़ जैसी ध्वनियों से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह किसी हिंसात्मक मिशन पर निकला हो। ४ १/२ घंटे से अधिक का समय व्यतीत हो चुका था और हम दिल्ली से एक घंटे की दूरी पर थे। वह बच्चा अपनी सीट में बैठे बैठे ही कुछ लुड़क गया, उसका सिर कुर्सी की एक बाजू का सहारा लिए था और टांगें दूसरी बाजू को छू रहीं थीं, और वह नींद में खो गया। मैं उसे कंबल ओढ़ाना चाह रहा था। “और कुछ नहीं तो वह उस सीट की लंबाई की ओर लेट सकता था (चौड़ाई के स्थान पर) जिससे वह अधिक आरामदायक स्थिति में रहता”, मैंने सोचा। एक पल के लिए मैंने विचार किया की क्यों न मैं उठ कर उसकी सीट को थोड़ा पीछे झुका दूँ ताकि वह सीधे स्थान पर सो सके, किन्तु मैंने यह विचार त्याग दिया। कुछ ही क्षणों में विमान नीचे उतरने जा रहा था, और परिचारिका ने उसे उठाया ताकि वह अपनी सीट बेल्ट लगा सके।

उसने अपना फोन निकाला और पुनः विडियो गेम खेलने लगा। विमान उतरा और पंक्ति में वह मेरे ही आगे था, अपने फोन पर, क्रोधित भाव में, कुछ टाइप करते हुए, संभवतः किसी को संदेश भेजने हेतु। मेरे पीछे वाले सज्जन पहले से ही फोन पर तेज स्वर में बात कर रहे थे।

मैं हैरान हूँ की इस डिजिटल क्रांति ने हम सब के साथ ये क्या कर दिया है!

मैं यह नहीं कह रहा कि मौहल्ले की सड़कों पर अन्य बच्चों के साथ न खेल कर, पुस्तकें न पढ़ कर अथवा अपने दिन का अधिकांश भाग स्क्रीन के सम्मुख बिता कर, आज के बच्चे किसी महान विषय-वस्तु से वंचित रह रहे हैं, अथवा तो वे पहली पीढ़ी की तुलना में कतिपय कम सुविचारक हैं। हमें यह स्वीकारना ही होगा कि आधुनिक युग का जीवन जीने का ढंग यही है। हो सकता है युवाओं के रूप में जो प्रातिभा व विवेक वे प्रदर्शित करेंगे वह उस सब से भिन्न हो जो आज तक हमने देखा है। और क्यों न हो, दुनिया के सर्वाधिक क्रांतिकारी स्टार्टअप्स ऐसे युवाओं द्वारा आरंभ हुए जो अभी पब में एक पेग लेने की आयु तक भी नहीं पहुंचे थे। वे विद्रोहात्मक युवा वयस्क थे। उन्होंने भी विडियो गेम्स में अपना समय व्यय किया, किन्तु एक प्रमुख भिन्नता के साथ। उनके समय का, उनकी ऊर्जा का एक बड़ा भाग किसी सकारात्मक कार्य में निवेश किया गया था।

यह सब कहने के उपरांत, यह तथ्य दर्शाने के लिए बहुत आंकड़े उपलब्ध हैं कि आज के समय में अधिकांश बच्चे (और वयस्क) निराशा से भरे हैं। और यही तथ्य मुझे आज के विषय के मर्म की ओर ले जाता है – आधुनिक काल में प्रसन्नता पाना।

विडियो गेम्स खेलना बुरा नहीं, न ही ऑन लाइन समय बिताना। आप फ़ेस-बुक पर अपना स्टेटस सदा नवीनतम रखने व अपने मित्रों का स्टेटस देखने को ले कर अति-उत्सुक रह सकते हैं। व्हाट्ट्स-अप पर फोटो व जोक साझा करके आप अपने प्रसन्नता के भाव में कुछ थोड़ा सा आवेश अनुभव कर सकते हैं। किन्तु, रचनात्मक एवं अनुत्पादक उत्साह भरे मनोभावों में अंतर करना अति आवश्यक है। हमारी कुछ उत्कंठाएँ व शौक सकारात्मक क्रियाएँ होती हैं, जबकि अन्य हमें केवल शक्तिहीन व खोखला ही करते हैं।

जब आप स्वयं को एक रचनात्मक अभिरुचि में संलग्न करते हैं (यथा एक नवीन विधा का ज्ञान प्राप्त करना, अथवा तो उस पर संपूर्ण प्रवीणता पा लेना) तब आपको एक चिरस्थाई संतुष्टि का अनुभव होता है। यह आपको ऐसे भाव में ले जाता है कि आपको बेचैनी का अनुभव कम होता है । अब आपको ऑन लाइन मित्रों की ओर से लाइकस व रुझान की लालसा नहीं रहती। आप किसी विडियो गेम के ऊंचे स्तरों तक पहुँचने अथवा उन बोनस पॉइंट्स के लिए आतुर नहीं होते। इन सब ई – मेडल्स व मित्रों का अर्थ यहाँ यह है कि आपने अपने मन को इस डिजिटल दुनिया की भ्रमित खुशियों में ढाल लिया है। आपका मन हर समय उत्सुक रहता है, अथवा उन “लाइकस” व “कोमेंट्स” की लालसा करता रहता है, जबकि, व्यावहारिकता में वे आपके वास्तविक जीवन में कण मात्र भी लाभकारी सिद्ध नहीं होते। ये लाइकस, कोमेंट्स, वार्तालाप, चैट्स, हमें एक अधिक योग्य व्यक्ति नहीं बना पाते।

मेरे पास कम्प्युटर नहीं है, किन्तु मुझे फ़ेस बुक व ट्विटर के विषय में बताया गया और मैं वही नियम अपनाते हुए फ़ेस बुक व ट्विटर के बाहर मित्र बनाने का प्रयास कर रहा हूँ।

प्रतिदिन मैं बाहर सड़क पर निकलता हूँ और आने जाने वालों को बताता हूँ कि मैंने क्या खाया, मुझे कैसी अनुभूति हो रही है, गत रात मैंने क्या किया और आज सम्पूर्ण दिवस मैं क्या करने वाला हूँ। मैं उन्हें अपनी; अपनी पत्नी, बेटी , कुत्ते ; सबकी बागवानी करते हुए, छुट्टियों में तरणताल के समीप समय बिताते हुए, आदि सब तस्वीरें दिखाता हूँ; उनकी बातचीत भी सुनता हूँ, उन्हें बताता हूँ कि मैं उन्हें लाइक करता हूँ, व हर उस विषय पर अपनी राय देता हूँ जो मुझे भाता है… भले ही वह उन्हें पसंद हो अथवा न हो। और, यह सब करना सफल हो रहा है।

अभी से मुझे चार लोग “फॉलो” कर रहे हैं – दो पुलिस ऑफिसर, एक समाज सेवक, व एक मानसिक रोग विशेषज्ञ।

-पीटर वहाइट, हाल बुक

सोश्ल मीडिया के साथ आवश्यकता से कहीं अधिक जुड़े रहना अत्यंत व्यसनकारी, हानिकारक व आपके मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य के अतिशय प्रतिकूल है। सोश्ल मीडिया पर हर अन्य व्यक्ति आपसे अधिक प्रसन्न दिखाई देगा। और, आप और मैं दोनों यह भली भांति जानते हैं कि इसका सच्चाई से दूर का भी संबंध नहीं। हम तीव्र गति से एक ऐसी दुनिया की संरचना कर रहे हैं जो गहन उदासी, चिंता व विषाद की ओर विशाल कदमों से बढ़ती जा रही है। इस सब में सर्वाधिक भयावह तथ्य यह है कि यह ई-दुनिया अति वास्तविक आभासित होती है!

मैंने एक समय यह सूक्ति पढ़ी थी, “यदि आप इसके लिए मूल्य नहीं चुका रहे तो आप ग्राहक नहीं हैं; आप वह उत्पाद हैं जिसे विक्रय किया जा रहा है”।

संक्षेप में यही है सोश्ल मीडिया। ये विस्तृत, अति विशाल प्लैटफ़ार्म आपके कारण ही चल रहे हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि उनकी रुचि तो विज्ञापन दाता में है। आपको ऑन लाइन रखने हेतु कुछ भी करने को तत्पर।

हमारे असाधारण उपभोगवाद के आधुनिक युग में, एक ऐसी दुनिया जहां आपका ध्यान आकर्षित करने हेतु प्रतिभाशाली मस्तिष्क चतुराईपूर्ण मार्केटिंग की नवीनतम विधियाँ उजागर करते रहते हैं, यहाँ किसी मॉल से बिना कुछ भी क्रय किए बाहर आ पाना किसी चमत्कार से कम नहीं। सहस्त्र-कोटि मनुष्य, अनगिनत घंटों का समय ऑन लाइन व्यतीत करते हैं (अधिकांश अपने समय को इस प्रकार व्यर्थ करने पर अपराधबोध भी अनुभव करते हैं), प्रमुखतः सोश्ल मीडिया पर। दिन के ढलने पर, यथार्थ में हम किसी भी प्रकार से न तो अधिक ज्ञानवान व विवेकशील, न अधिक प्रसन्न अथवा संतुष्ट ही हो पाते हैं। तो यह सब करने का औचित्य क्या है?

स्मार्ट फोन के आगमन से बहुत पूर्व, मुझे स्मरण है मैं एक हॉलीवुड पिक्चर देख रहा था। उसमें दिखाया गया था कि मशीनें इंसानी बुद्धिमत्ता से आगे निकल गई हैं, वह सब बहुत बढ़ा चढ़ा कर दर्शाया गया था। किन्तु, आज ऐसा नहीं, मुझे लगता है वह समय आ चुका है। वास्तव में मशीनें हमारे जीवन पर हावी हैं।

लॉग आउट करने के लिए सजगता की आवश्यकता होती है। अपने स्क्रीन टाइम को (टी॰वी॰ मिला कर) कम करने का प्रयास करें और तब आपके पास अचानक वह सब करने के लिए इतना अधिक समय हो जाएगा जो आप हमेशा से करना चाह रहे थे। यदि आप अभिभावक हैं तो अपनी संतान के साथ दृढ़ रहें। मित्र बन कर रहना बेहतर है, किन्तु कभी कभी उनकी उन्नति के लिए आप को अभिभावक के रूप में भी सामने आना पड़ता है। और, भले आपकी आयु कुछ भी हो, यदि आप जीवन का आनंद लेना चाहते हैं, यदि आप में उस सुंदरता को देखने की इच्छा है जो आपके हृदय को पिघला कर उसमें स्थायी स्थान बना लेती है, तो मेरी तुच्छ मान्यता यह है कि वह आपको ऑन लाइन प्राप्त होने वाली नहीं। अपना ऑन लाइन समय सीमित करने हेतु आप विभिन्न ऐप्स प्रयोग में ला सकते हैं। वे अति सहायक सिद्ध होते हैं।

यदि आज मैंने कोई दार्शनिक संदेश साझा किया होता तो संभवतः वह अधिक हृदय-स्पर्शी होता। तथापि, व्यावहारिकता भी तो स्वयं में एक दर्शनशास्त्र ही है। और, यह क्रियात्मक भी तो है।

स्वयं का मोल करें, अपने समय का मूल्य पहचानें। इसका आरंभ अपने स्क्रीन टाइम को सीमित रखने से करें। आपके ऑफ लाइन होने पर भी सम्पूर्ण संसार भली भांति ही चलता रहेगा। अपना जीवन जीयें, वास्तविक जीवन। जीवन कितनी सुरम्यता से बहता चला जा रहा है, कितनी सुंदरता अपने में समेटे हुए, और हम यहाँ बैठ कर अपनी प्यास मात्र एक आभासी, यांत्रिक शैली द्वारा बुझाने में लगे हैं। क्या इसकी कोई सार्थकता है?

शांति।
स्वामी