पिछले वर्ष जब मैं ओशो के सिक्रेट्स ओफ़ सिक्रेट्स को सुनते हुए( धन्यवाद है कि यह श्रव्य था ), मैने एक रूसी संत जी आइ गुर्दजीफ़्फ़ के जीवन से एक कहानी सुनी। हालाँकि मैने स्वयं कुछ वर्ष पूर्व उनकी पुस्तकों  का स्वयं अध्ययन किया तो उनमें मैने उनके जीवन की ऐसी  किसी घटना के बारे में नहीं पढ़ा और ना ही इस प्रकार की किसी घटना का पी डी ओऊसपेंस्की   (वे  काफ़ी दीर्घ काल तक  उनके शिष्य रहे ) की पुस्तकों में  कहीं वर्णन है। इसलिए हालाँकि  मैं इस कहानी  की तथ्यात्मक यथार्थता को प्रमाणित नहीं कर सकता, किंतु इसमें एक  सुंदर संदेश है।

जो मेरे साथ सम्पर्क में आते हैं उनसे मैं हमेशा सुनता हूँ कि : मैं अपना क्रोध कैसे नियंत्रण करूँ? या मैं वासनाओं को नियंत्रित करने में असफल क्यों रहता हूँ? मैं अपने संकल्प पर टिका नहीं रह पाता ऐसा क्यो है?

मैं इस कहानी को अपने शब्दों में आपके साथ साझा कर रहा हूँ  :

कहानी तब कि है  जब  गुर्दजीफ़्फ़  छोटे  थे , उस समय जब उनके दादा जब मृत्यु शय्या पर  थे तो उन्होंने अपने प्यारे पोते को अपने पास बुलवाया। ग्रीस के वंशज  उस वृद्द व्यक्ति ने सम्पूर्ण जीवन  महान ग्रीस के दार्शनिकों को पढ़ा था और वे उसे एक महत्वपूर्ण सलाह देना चाहते थे।

उन्होंने ९ वर्षीय गुर्दजीफ़्फ़ को पास लाते हुए कहा जीवन क्षणों का सतत प्रवाह है।अपने आप में वे क्षण अच्छे और शुद्द होते हैं । लेकिन इस प्रवाह का मार्ग कुछ तीव्र इच्छाओं  और अनैतिक चुनावों से अटा  पड़ा है ।तुम समझ रहे हो न, मैं क्या कह रहा हूँ? गुर्दजीफ़्फ़ ने सिर हिलाया, उसकी आँखें अपने दादा की आवाज़ सुनकर डबडबा आयीं।वह जानता था कि शायद यह उनकी आख़िरी बातचीत हो।

वृद्ध व्यक्ति ने आगे कहा“ मेरे पास तुमको देने के लिए कोई सम्पत्ति नहीं है, न घोड़े हैं न घर।  लेकिन मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ  स्वर्णिम वाक्य हैं।तुम अपने मन में इनको उकेर लो और तुम्हें एक दिन भी पश्चाताप  नहीं होगा।  मेरे बच्चे! तुम देखोगे कि जीवन तुमको अनगिनत परीक्षाओं  और प्रलोभनों  से गुज़ारेगा । उनको तुम्हें मिथ्याभिमान या आत्मध्वंस  की  संकट पूर्ण  सड़क पर खींच कर ले जाने मत  देना। ध्यान पूर्वक अच्छे  को बुरे से अलग करना और उसके बाद पहले वाले का चुनाव करना। अच्छे विकल्प अच्छे  परिणामों की ओर लेकर जाते हैं ।

गुर्दजीफ़्फ़ ने पूछा लेकिन अच्छा  क्या है यह मैं कैसे जानूँगा?

यह कहना कठिन है।इसे जानने के कोई निश्चित नियम नहीं हैं।लेकिन मैं तुमको अनुभवाश्रित एक नियम बता देता हूँ : जब भी तुम किसी को आहत करोगे या झूठ बोलोगे तो यह अच्छी बात नहीं होगी । एक दिन यह वापस आएगी और तुम्हें बार बार परेशान करेगी ।

याद रखो अरस्तू  ने क्या कहा था ? “ सम्मान या भौतिक संपत्ति की खोज कभी भी सर्वाधिक  लाभप्रद नहीं हो सकती । इसके स्थान पर यह वह है   जो तुम्हारी मानव के रूप में तुम्हारी योग्यताओं में वृद्धि करने सर्वाधिक सहायक होती है।  सरल शब्दों में तुम्हें एक श्रेष्ठ मनुष्य बनने हेतु प्रयास करना ही चाहिए। तुम मेरी बात समझे?”

गुर्दजीफ़्फ़ ने पुनः सिर हिलाया और कहा मैं आपसे वादा करता हूँ दादाजी मैं ऐसा करूँगा।

वृद्ध व्यक्ति ने कहा अब चूँकि तुमने वचन दे दिया है “ इसलिए मैं तुम्हें ख़ुशी का, अच्छाई का जीवन व्यतीत करने का रहस्य दे सकता हूँ। तुम ध्यान पूर्वक सुन रहे हो न ?”

“हाँ।”

जब भी तुम कुछ  बुरा करने हेतु उद्धत   हो अथवा तुम क्रोधित  हो और   अपने मन की शांति किसी और  को देना चाहते हो, तो बस इसमें २४ घंटे की देर कर दो।कभी भी जल्दबाज़ी में प्रतिक्रिया मत दो और कभी भी यदि तुम्हें किसी प्रकार का अच्छा करने का अवसर मिले तो इसे कभी टालो मत। इसे तुरंत करो।

“अच्छे विकल्पों की ऋंखला , सही कर्मों की एक ऋंखला अंततः आपको   एक अनचाही परिस्थितियों और घटनाओं से  दूर  करने हेतु आपके चारों ओर आती है। वास्तव में यह उतना ही  सरल है। अच्छे  विचार,शब्द और कर्म आपकी ढाल बनाने हेतु एकत्र होते हैं। इसका यह मतलब नहीं है  कि जीवन तीर फेंकना बंद कर देगा,  लेकिन इनके  कारण आप सुरक्षित खड़े रहेंगे।

और मैं सोचता हूँ कि अधिकांश लोग  इसे इस प्रकार कार्यान्वित कर सकते हैं:

अपने द्वेषपूर्ण  कर्मों को स्थगित कर दें और दया के कर्मों को तत्काल करने के भाव से लें। मामला शायद समझ में नहीं बल्कि क्रियान्वयन में है। लेकिन हम कैसे सुनिश्चत करें कि हम इसे तब याद रखेंगे  जब हम क्रोध से पागल हैं और सारा ज्ञान की पाताल की ओर जा रहा है?  प्रलोभन,आदतें,तीव्र इच्छाएँ और  हमारी  यंत्रवत  प्रतिक्रिया विस्मृति को बढ़ाती  है।

विस्मृति:

 क्रोध और घृणा का एक दौरा  अच्छाई को हमसे  इस प्रकार  बाहर कर देता है जैसे एक ज़ोर की ताली की आवाज़ चिड़ियों को झाड़ से उड़ा देती है। आप यह कैसे निश्चित करेंगे कि जब आपको सर्वाधिक आवश्यकता  है उस समय स्मृति  जो कि सोची समझी  और देरी से दी गयी प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक है  आपके साथ रहेगी ? इसके लिए सर्वप्रथम तो  वास्तव में  उस स्मृति  का अभ्यास करना है, जिसे आपने  स्वयं की  जागरूकता को बार बार वर्तमान क्षण में लाने के द्वारा अर्जित किया है। ऐसा करने के लिए आपको दो सरल प्रश्न करना है :

अ : मैं अभी क्या कर रहा हूँ?और

ब: मुझे इस वर्तमान क्षण  में क्या होना  चाहिए ?

दूसरी जो कि अधिक गम्भीर बात है कि  एक अनुकूल  वातावरण  सजगता और दयालुता के अभ्यास के लिए महत्वपूर्ण  है । उदाहरण के लिए आप यदि आप ओलम्पिक में तैराकी में भाग लेना चाहते हैं? तब आपको तैराकी का अभ्यास एक ओलम्पिक आकार के  पुल में करना पड़ेगा।एक दिन ऐसा करना आवश्यक होगा । जितना जल्दी उतना अच्छा, जितना अधिक उतना श्रेष्ठ।

क्या एक आदमी आग को अपने बग़ल में लेकर जाए और उसके कपड़े न जलें? क्या कोई गरम कोयलों पर चले और उसके पैर न जलें?

 

(प्रोवर्ब्ज़ ६:२७:२८)

स्वयं को सही वातावरण में रखें और बिना किसी प्रयास के स्मृति  का जादू देखें । सही परिस्थितियाँ सृजित कीजिए और चमत्कार होते देखिए।

मुल्ला नसरुद्दीन का किरायेदार चिलाया देखो यह छत  कितनी बुरी तरह टपक  रही है!” मैने यह महीनों पहले तुमको बताया था। यह कब तक चलता रहेगा?

मुल्ला नसीरूद्दीन ने शांति से कहा “ मेरे मौसम का पूर्वानुमान हमेशा ग़लत ही होता है।’

हमारी किसी भी परिस्थिति के साथ व्यवहार करना मूलतः दो चीज़ों पर निर्भर करता है, हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण और हमारी आदतें। इनमें परिवर्तन हमारी भावनाओं, प्रतिक्रियाओं और वापसी   में  स्वतः परिवर्तन लाता है।

एक विस्फोट को हमेशा टालें । एक अच्छे कार्य में  कभी भी देर न करें।

शांति ।

स्वामी।