बलूचिस्तान के राजा एक बार संत ख्वाजा नक्रुद्दीन (जिन्हें शाल पीर बाबा के नाम से भी जाना जाता है) के पास गए। राजा ने ख्वाजा नक्रुद्दीन से अनुरोध किया कि वे उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करें। परंतु राजा को स्वीकार करने के विषय में ख्वाजा संशयात्मक थे।
राजा ने कहा “यदि शिष्य नहीं तो, मुझे अपने एक नम्र सेवक के रूप में ही रख लें। मैंने अपने राज्य का परित्याग कर दिया है और आपकी सेवा में आया हूँ।”

राजा की भक्ति ने ख्वाजा नक्रुद्दीन के हृदय को छू लिया और वे उन्हें अपनी छत्रछाया में लेने के लिए सज हो गए। ख्वाजा ने उन्हें अपने बड़े से घर की सफाई करने और उसका कूड़ा करकट शहर से बाहर किसी दूर स्थान पर फेंकने का कार्य सौंपा। उस घर में अन्य शिष्य भी निवास करते थे और एक व्यक्ति द्वारा सारा कूड़ा निकालना प्रायः दुष्कर होता था। राजा ने इस प्रयोजन हेतु एक ठेलागाड़ी का निर्माण किया। कुछ समय बीत गया परंतु ख्वाजा ने उन्हें कोई शिक्षा नहीं दी। अन्य शिष्यों को ज्ञात था कि राजा ने स्वेच्छा से अपने राज्य का परित्याग किया था। राजा को निर्वासित या देश से निकाला नहीं गया था। शिष्यों को लगा कि गुरू का राजा को कूड़ा फेंकने का कार्य सौंपना कठोर था।

शिष्यों ने ख्वाजा से अनुरोध किया, “अब कई मास बीत चुके हैं। उसे आप का व्यक्तिगत सेवक बनने का अवसर दें। वह एक श्रेष्ठतर कार्य करने योग्य है।”
“वह अभी दीक्षा संस्कार के योग्य नहीं है” गुरु ने उत्तर दिया।
“किंतु वह अपना कार्य कितनी तत्परतापूर्वक करता है। तथापि वह इस देश का राजा था।”
“यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है तो उसकी परीक्षा स्वयं लें,” ख्वाजा ने उत्तर दिया और पुनः सूफी कविताएं लिखने में मगन हो गए।

अगली सुबह जब राजा अपना कार्य कर रहा था एक वरिष्ठ शिष्य ने कूड़े से भरा थैला उसके सर पर दे मारा और चिल्लाकर बोला, “धूर्त व्यक्ति, तुम मेरा कमरा साफ करना भूल गए।”
राजा ने उत्तर दिया, “यदि मैं अभी भी राजा होता तो अपनी तलवार के एक झटके से तुम्हारा शीश धरती पर गिरा देता। परंतु मैं तुम्हें छोड़ता हूँ क्यों कि अब मैं एक साधारण शिष्य हूँ।”

शिष्यों ने इस घटना के विषय में ख्वाजा से चर्चा की। शिष्यों का यह मानना था कि राजा ने कोई हिंसक कृत्य नहीं किया और इसलिए वह निश्चित ही दीक्षा के लिये सज था।
“नहीं! वह अभी सज नहीं है।” उनके गुरू ने कहा। “उसके मन में जो राजा रह रहा है वह उसके हृदय में बसे शिष्य से अधिक शक्तिशाली है।”

कुछ और माह बीते और शिष्यों ने राजा के अनुकरणीय व्यवहार की चर्चा करते हुए फिर से गुरु से प्रार्थना की। इस बार भी उन्हें यही बताया गया कि अभी समय नहीं आया है और पुनः शिष्यों ने राजा की परीक्षा लेने का निश्चय किया ताकि वे यह सिद्ध कर सकें कि राजा दीक्षा के लिए सज है। एक शिष्य ने उसकी ठेलागाड़ी को लात मारकर कूड़ा चारों ओर बिखरा दिया। शिष्य को मारने हेतु राजा मुट्ठी बनाकर एक कदम आगे बढ़ा, किंतु ठहर गया। रजा पीछे हट गया और कूड़ा इकट्ठा कर के कुछ बुदबुदाते हुए अपने रास्ते चला गया।

“हम भी इतने शांतचित्त नहीं हो सकते,” शिष्यों ने ख्वाजा से कहा। “ख्वाजा जी, कृपया राजा को दीक्षा दें।”
“नहीं अभी वह सज नहीं है,” उन्होंने उत्तर दिया। “उसने धन और पद का त्याग कर दिया है परंतु राज्य का त्याग नहीं किया। इससे पहले कि मैं उसे दीक्षित करूँ अभी और परिवर्तन शेष है।”

एक वर्ष और बीत गया। अब दो वर्ष से भी अधिक हो चुके थे और राजा ने एक दिन की भी सेवा मे चूक नहीं की थी।
“वह सज है” एक सुबह ख्वाजा ने अपने शिष्यों से कहा।
“यह आप कैसे जानते हैं?” उन्होंने पूछा।
“जब मैं उसकी आँखों में झाँकता हूँ, जब मैं उसकी चाल ढाल को देखता हूँ तब मुझे एक राजा दिखाई नहीं देता, केवल एक शिष्य दिखाई देता है।”
“और यदि वह ऐसा दिखावा कर रहा हो?” उनमें से एक शिष्य ने तर्क दिया।
“उसे परख लें।”

पुनः जब राजा कूड़ा फेंकने जा रहा था तभी एक शिष्य ने सड़े मांस से भरा थैला उस पर घुमाकर दे मारा और उस पर अपना कार्य ठीक प्रकार से न करने का आरोप लगाया। राजा ने कुछ भी नहीं कहा, कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, अपना मुख धोया, कूड़ा इकट्ठा किया और अपने रास्ते चला गया। शिष्यों ने इस घटना की सूचना अपने गुरू को दी।

ख्वाजा ने कहा “यही है अंतर शिष्टता और विनम्रता के बीच। वह अब पूरी तरह सज है।”

प्रायः आप यह पाएंगे कि शिष्टता विनम्र होने का केवल एक प्रक्षेपण है। वास्तव में विनम्रता स्वयं के विशेष होने की भावना का पूर्ण रूप से परित्याग करना है। शिष्टता अधिक से अधिक एक सामाजिक शिष्टाचार है जबकि विनम्रता मन की एक स्थिति है। बहुत से शिष्ट व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हैं, परंतु मात्र विनम्र ही प्राप्ति के शिखर पर पहुँच पाते हैं। बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह और गुरू नानक के विषय में सोचें। क्या उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता उनकी विनम्रता नहीं है?

किसी का मन अस्त व्यस्त तथा हृदय कालिमा युक्त हो सकता है फिर भी वह व्यक्ति नितांत शिष्ट हो सकता है। अर्थात शिष्टता के द्वारा कोई व्यक्ति ऐसे चरित्र एवं शुद्धता का दिखावा कर सकता है जो उसमें हो ही नहीं। शिष्टता वह व्यवहार है जिस रूप में हम चाहते हैं कि दूसरे व्यक्ति हमें देखें। परंतु नम्र होना भिन्न है। नम्रता हमारा वास्तविक स्वभाव है। केवल एक निष्कपट हृदय ही विनम्र हो सकता है। एक मन जो विश्वास करने और स्वप्न देखने से नहीं डरता, एक हृदय जो बच्चों की भांति संवेदनशील और वेदनीय है, वही नम्र होने का आकांक्षी हो सकता है। मैंने जिन प्रबुद्ध आत्माओं का वर्णन किया था उनके विषय में पुनर्विचार करें। क्या उनका जीवन और आचरण सरलता व निष्कपटता का उदाहरण नहीं है? ऐसा इसलिये है क्योंकि सरलता और विनम्रता साथ-साथ चलते हैं।

शिष्टता एवं विनम्रता के बीच के इस मूलभूत अंतर को समझ पाने में असफल होना ही वह कारण है जिससे बहुत से जिज्ञासु उलझ कर चूक जाते हैं। मैं बहुत से ऐसे आकांक्षी व्यक्तियों से मिलता हूँ जिन्होंने ध्यान करने में कई घंटे व्यतीत किये हैं। परंतु उनका ध्यान मात्र घड़ी की सुई पर केंद्रित होता है ना कि मूलभूत गुणों को विकसित करने में (करुणा, सहानुभूति, विनम्रता इत्यादि)। परिणाम स्वरूप वे और भी कठोर हो जाते हैं और अपने भीतर एक श्रेष्ठता और विशेषाधिकार की भावना लेकर चलते हैं। ऐसा करना आध्यात्मिक पथ से चूक जाना है। जब हम आध्यात्मिकता में उन्नत होते हैं तब हम एक दूसरे को प्रेम करना तथा सम्मान देना सीखते हैं। आपके जीवन-पात्र से करुणा व सहानुभूति ऐसे निकलती है जैसे गंगोत्री से गंगा निकलती है, बूंद बूंद कर, निरंतर।

गुप्त रूप से हम में से प्रत्येक यह अनुभव करता है कि हम विशेष हैं, महत्वपूर्ण हैं। एक शिष्ट व्यक्ति बहुधा यह मानता है कि वह दूसरों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण और विशेष है। विडंबना यह है कि यह शिष्टता ही उनमें इन भावनाओं का आह्वान करती है। यहाँ तक कि विनम्र व्यक्ति भी चुपचाप अपने मन में विशेष होने की भावना को स्थान देता है क्योंकि विनम्रता का यह अर्थ नहीं कि आप स्वयं के विषय में उच्च धारणा नहीं रख सकते या आप स्वयं की निन्दा करें। इसका अर्थ केवल यह है कि जब आप स्वयं को विशेष समझते हैं, आप दूसरे व्यक्तियों को भी स्वयं के प्रति ऐसा ही सोचने का अधिकार प्रदान करते हैं। नम्रता की यह माँग नहीं कि आप दूसरे व्यक्ति से उसकी श्रेष्ठता की भावना छीन लें। क्यों कि जैसा मैंने पहले भी कहा, विनम्रता कोई व्यवहार नहीं, यह मन की अवस्था है।

नम्रता को विकसित करने की दो विधियाँ हैं। सरल विधि तथा कठिन विधि। कठिन विधि अधिकतर हमारे वश में नहीं होती। ऐसा तब होता है जब जीवन में हमें कष्ट का सामना करना पड़ता है या अचानक हमारे साथ कुछ बुरा घट जाता है जो हमें अपना दृष्टिकोण बदलने पर बाध्य कर देता है। जीवन की अनेक विधियों के समान यह दुखदायी परंतु रूपांतरणकारी होती है। यह एक ही आघात में स्वयं की श्रेष्ठता के मिथ्या बोध को चकनाचूर कर सकता है। किंतु सरल विधि हमारे नियंत्रण में है। इसका प्रारम्भ एक तीक्ष्ण प्रेक्षक तथा एक अच्छा श्रोता बनने से होता है। अपने चारों ओर रहने वालों को जानने से आपके चित्त पर इसका धीरे धीरे प्रभाव पड़ता है। जैसे जैसे आप सुनते हैं, और अवलोकन करते हैं, आप यह जानने लगते हैं कि आप ऐसे व्यक्तियों से घिरे हैं जो किसी न किसी क्षेत्र में प्रतिभा सम्पन्न हैं। ये शांतचित्त व्यक्ति चारों ओर घूमकर अपनी प्रतिभा का विपणन नहीं करते या स्वयं के विशेष होने का कोई दावा नहीं करते हैं। परंतु जब वे एक प्रवाह की स्थिति में होते हैं तब आप उनसे अपनी आँखें नहीं हटा पाते हैं। अपने कार्य में मेरी भेंट सिद्धहस्त संगीतकारों, कलाकारों, लेखकों एवं कवियों से होती रहती है। उनकी निपुणता मुझे मोहित करती है तथा उनकी प्रतिभा से भी अधिक उनकी विनम्रता मुझे द्रवित कर देती है।

अपने आसपास किसी अत्यंत साधारण व्यक्ति के विषय में विचार करें। अब थोड़ा समय निकाल कर उस व्यक्ति को जानें। आप आश्चर्य करेंगे कि यह व्यक्ति कितना विशेष है। यह आपको विनम्रता से भर देगा। किसी भी दिन प्रयास कर देखें।

एक रब्बी (यहूदी धर्मगुरू) अस्वस्थ होने के कारण प्रार्थनास्थल पर एक विशेष पूजन नहीं कर पाया जो वह कई वर्षों से करता आ रहा था। उसके स्थान पर, उस दिन एक कैंटर (गायक) ने वह सेवा करी जिसमें रब्बी के कई शिष्यों ने भाग लिया। प्रार्थना की समाप्ति के पश्चात वे सभी रब्बी के घर उसका हालचाल जानने के लिए पहुँचे।

“रब्बी” एक शिष्य ने कहा “वह कैंटर तो आपकी प्रशंसा करते रुक ही नहीं रहा था।”
“उसने क्या कहा?” रब्बी ने आंखों में एक चमक के साथ पूछा।
“उसने सभी को बताया कि आप कितने विद्वान हैं।”
“और क्या?”
“कि आपका चरित्र निर्मल है।”
“बस इतना ही?”
“ओह, उसने यह भी कहा कि आप बहुत बुद्धिमान, समझदार, सरस और दूसरों की सहायता को सदैव तत्पर रहते हैं।”
“कुछ और?” रब्बी ने एक मुस्कुराहट के साथ कहा।
“उसने यह घोषणा भी की, कि आप एक आदर्श यहूदी हैं।”
“और क्या?”
“मेरे विचार से बस यही कहा।”
“क्या उस अज्ञानी मूर्ख ने यह नहीं बताया कि मैं कितना विनम्र हूँ।”

हमारी प्रार्थनाएं एवं साधनाएं किसी काम की नहीं हैं यदि हम स्वयं की श्रेष्ठता के बोध के पार न जा पाएं और यदि हम अपने आसपास के व्यक्तियों में अच्छाई और दैवत्व को न देख पाएं। विनम्रता की अनुपस्थिति में कोई भी आध्यात्मिक प्राप्ति विलुप्त हो जाती है और अन्वेषक को पहले से भी बुरी अवस्था में छोड़ जाती है। इस आतुर व व्यस्त संसार में जहाँ हम प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करते हैं, जहाँ हम हर प्रकार के लाभ के लिये दूसरों पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने को तत्पर रहते हैं, जहाँ विनम्रता को कभी-कभी निर्बलता का प्रतीक माना जाता है, सत्य तो यह है कि जिनके हृदय में नम्रता का ताप है वह ही सौभाग्यशाली हैं।

यदि आप सबल होना चाहते हैं तब विनम्र बनें, क्योंकि विनम्रता ही परम शक्ति है।

शांति।
स्वामी