शून्यता एक वास्तविक भावना है। यह कोई विकृति नहीं है। यह मात्र अकेलापन, उदासी, भ्रम या वियोग नहीं है, परंतु इन सभी का मिश्रण है। कभी न कभी हममें से प्रत्येक को दर्दनाक शून्यता के एक चरण का अनुभव होता है। एक दिन मैंने एक सुंदर अज्ञातकृत उद्धरण पढ़ा।

मुझे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे मेरे जीवन में सब कुछ ठीक है। मैं लोगों के चुटकुलों पर हंसता हूँ। अपने मित्रों के साथ हास्यप्रद बातें करता हूँ जैसे कि मेरा जीवन चिंतामुक्त है। परंतु यह विचित्र है कि जब मैं घर लौट कर आता हूँ, तब मैं उस मानसिक स्थिति से बाहर आ जाता हूँ। तब अचानक ही मैं टूट जाता हूँ। मैं स्वयं को अकेला, रिक्त और थका हुआ अनुभव करता हूँ। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कि मैं दो विभिन्न व्यक्ति हूँ। एक समाज के लिये, दूसरा स्वयं के लिये। यदि वे सत्य जान सकते तो संभवत: स्थिति कुछ और होती।

मैं इस बात से अचंभित हूँ कि हम पहले से कहीं अधिक अकेले क्यों हो गये हैं? हम सब कुछ प्राप्त करके भी रिक्तता का अनुभव क्यों करते हैं? जैसे कि जीवन की परिपूर्णता शून्यता पर आधारित है। मैं एक साधारण किंतु सुंदर लघुकथा साझा करता हूँ जो कि मैंने बचपन में पढ़ी थी।

एक छोटा बच्चा धूप में अपने खिलौनों के साथ खेल रहा था। कुछ देर बाद, उसने ध्यान दिया कि उसके साथ एक रहस्यमय छवि है, जो उसका अनुकरण कर रही है। इस खेल से मंत्रमुग्ध और विस्मित होकर उसने अपने मित्र को पकड़ने की चेष्टा की। परंतु कईं बार प्रयास के बाद भी वह उसके चेहरे को स्पर्श नहीं कर सका और उसको पकड़ नहीं पाया। जैसे कि चुंबक के समान सिरे एक दूसरे को दूर हटाते हैं, उसका मित्र भी उससे दूर जाता रहा।

निराश होकर वह बच्चा रोने लगा और उसकी माँ दौड़ी आयी। तुतलाते हुए उसने बताया कि वह अपने मित्र को पकड़ना चाहता है।

“यह तुम्हारा प्रतिबिंब है,” उसकी माँ ने उसकी अबोधता पर हंसते हुए कहा “तुम अपने प्रतिबिंब को नहीं पकड़ सकते”।
परंतु न तो वह बच्चा यह समझ पाया कि उसकी माँ क्या कह रही थी और न ही वह संतुष्ट हो सका। वह और भी अधिक रोने लगा।

उसकी माँ ने कोमलता से उसका हाथ पकड़ा और उससे अपने सिर और चेहरे को स्पर्श करने को कहा। उस प्रतिबिंब ने भी वैसा ही किया। स्वयं को पकड़ कर वह प्रतिबिंब को भी पकड़ पाया। वह बच्चा अत्यंत प्रसन्न हो गया, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा खज़ाना खोज लिया हो।

जीवन में उपभोग भी हमारे प्रतिबिंब के समान हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि वे निरर्थक हैं या उनके पीछे जाना व्यर्थ है। परंतु उनका पीछा करना एक खेल ही है, अपने प्रतिबिंब से खेलने जैसा। जब तक हम उनके साथ खेलकर, उनकी अस्थिरता में आनंदित हैं, तब तक सब ठीक रहता है। जिस क्षण हम उन्हें पकड़ना, उन्हें अपनाना चाहते हैं तब संघर्ष आरंभ हो जाता है। स्वयं को पकड़ना ही एकमात्र विवेकपूर्ण मार्ग है।

जैसे की गुरुत्वाकर्षण का केंद्र किसी भी भौतिक वस्तु के संतुलन को निर्धारित करता है, उसी प्रकार हमारे पास आनंद का केंद्र है जो हमारे भावनात्मक और आध्यात्मिक संतुलन को प्रभावित करता है।

जब तक बच्चा घुटनों के बल पर चलना या पैरों के बल पर चलना नहीं सीख लेता, उसकी माँ ही उसका सारा संसार होती है। उसके लिए माँ का दूध ही सबसे मीठा भोजन और उसकी गोद ही सबसे सुरक्षित जगह होती है। उसके आनंद का केन्द्र उसकी माँ होती है। जब वह बच्चा थोड़ा बड़ा होता है तब उसका ध्यान उसकी माँ और उसके खिलौनों के बीच रहता है। अब वह अपनी माँ की गोद से बाहर निकलकर अपनी पुलिस कार या दमकल गाडी से खेलना चाहता है। उसके आनंद का केन्द्र उसकी माँ से हटकर उसके खिलौनों में चला जाता है।

कुछ और वर्ष बीतते हैं और बच्चा अब अपने मित्रों के साथ खेलना चाहता है। पहले वाले खिलौने अब उसे मोहित नहीं करते। छुपन-छुपाई का खेल जो वह अपनी माँ के साथ खेला करता था, अब उसे हास्यास्पद एवं लज्जाजनक लगता है। आनंद का केन्द्र फिर बदल जाता है। माँ और खिलौनों को छोड़ कर, अब उसके मित्र एवं उसके सपने उसके मन में घर कर लेते हैं।

अब वह बड़ा होता है और उसका ध्यान विषयासक्त सुखों की ओर आकर्षित होता है। युवा अवस्था में वह घर से बाहर, पर्यवेक्षण से दूर, मनोरंजन करना चाहता है। वह अपने सामर्थ्य से अधिक आनंद लेना उचित समझता है। उसका आनंद का केन्द्र उसके दैहिक सुखों और बड़े लोगों के उपकरणों में बंट जाता है।

धन के अधिग्रहण की दिशा में, उसकी महत्त्वाकांक्षाएं उसे अधिक परिश्रम करने के लिये प्रेरित करतीं हैं। वह नौकरी करता है, धन-अर्जन करता है और अधिक धनवान होने की स्पर्धा में संलग्न हो जाता है। उसकी आयु में यह कार्य परिश्रांत होने की जगह आनंदकर होता है। उसे भौतिक उन्नति में उपलब्धि और आनंद आता है, क्योंकि उसके आनंद का केंद्र अब उसकी जीविका है। उपकरणों से लगाव बना रहता है, जैसे कि दैहिक सुखों की आवश्यकता बनी रहती है, परंतु आकर्षण कम होने लगता है। ये वस्तुएं नियमित जीवन का एक अंश मात्र बन जाती हैं।

कुछ और वर्षों बाद उसका परिवार हो जाता है और वह अपने बच्चों और परिवार की देखभाल करने में व्यस्त हो जाता है। उसके चारों ओर हर व्यक्ति अपने-अपने जीवन पर ध्यान केंद्रित करता दिखाई देता है, और अचानक एक दिन वह अनुभव करता है कि वह अकेला है। पूर्ण रूप से अकेला। तब उसका अकेलापन उसके जीवन को कठिन बना देता है। माँ, खिलौने, शिक्षा, सफलता, धन, परिवार अब उसके आनंद का केंद्र नहीं रहते हैं। वह सुखों को त्यागने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि वह सोचता है कि इनके बिना उसका जीवन रिक्त हो जाएगा।

परंतु इन सुखों को पकड़ कर रखने से कोई लाभ नहीं होता। शून्यता उसे लगातार परेशान करती हैं, जिससे वह भ्रम, अकेलापन और कमी का अनुभव करता है। बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं दिखाई देता। उसे जीवन का कोई उद्देश्य और कोई अर्थ दिखाई नहीं देता है। कोई दिशा नहीं, कोई आकर्षण नहीं। संतोष और प्रसन्नता को तो भूल ही जाइये।

इसका उपाय यह है कि अपने आनंद का केंद्र अपने आंतरिक संसार में बनाए रखें। इसे खोज लेने में कभी भी देरी नहीं होती। यदि आप मेरा विश्वास करें, तो मैं कहूँगा कि इस खोज का आरंभ ध्यान से नहीं होता। यह केवल इसका एक छोटा भाग है (आपके ध्यान का केंद्र आपके आनंद का केंद्र निर्धारित करता है)। तथापि स्वयं को खोजने की आंतरिक यात्रा सचेतन संतोष, कृतज्ञता और करुणा की भावना को विकसित करने से आरंभ होती है।

यदि आप संतुष्ट हैं तो रिक्त नहीं हो सकते, यदि आप कृतज्ञ हैं तो दुखी नहीं हो सकते, यदि आप करुणामय हैं तो आप क्रोधित नहीं हो सकते।

स्वयं को प्रेम से भरें, यह सर्वथा योग्य है। अपने विचारों को फिर से संशोधित करें, ताकि आप अपनी भावनाओं की पुनरावृत्ति कर सकें।

धर्म-ग्रंथों में इसे शून्यता कहा गया है जो कि संस्कृत शब्द शून्य से लिया गया है जिसका अर्थ है रिक्तता। यह जीवन का सार है और सभी तथ्यों का भी सार है।

आत्मा की अंधेरी रात में, जब आपका प्रतिबिंब खो जाता है, जब शून्यता का दर्द और असहनीय रिक्तता का आभास होता है, तब दृढ़ता से बैठे रहें और भोर की प्रतीक्षा करें। सूरज पुनः निकलेगा और प्रसन्नता की छाया आपको एक बार फिर मंत्रमुग्ध करेगी। परंतु ध्यान रखें वह छाया ही है। छाया अस्थायी और अस्थिर है। यही सभी कुछ है। यही जीवन है। यही ठीक है। यही सुंदर है।

शांति।
स्वामी