गत लेख में मैंने किसी एक वस्तु पर केन्द्रित हो कर एकाग्रता विकसित करने के अभ्यास का वर्णन किया था। आप में से वे सब जिनकी जीवन शैली अति-व्यस्ततापूर्ण है, उनके लिए संभवतः प्रतिदिन ३० मिनट निकाल पाना भी कठिन हो। हालांकि, यदि आप मन बना लें तो अवश्य ही आप समय भी निकाल पाएंगे।

इस लेख में मैं श्रवण के अभ्यास पर विस्तार से प्रकाश डालूँगा। श्रवण – संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है – सुनना। श्रवण का अभ्यास आपकी एकाग्रता बढ़ाने का एक साधारण व प्रभावशाली मार्ग है। मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि श्रवण का उल्लेख केवल नवधा भक्ति में भक्ति के एक रूप में है, अन्य किसी भी योगिक ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं मिलता। मैं अपने प्रथम-दृष्टा निजी अनुभव से यह कह सकता हूँ कि आप एक तीव्र रूपांतरण से गुजरेंगे, आपके ध्यान की कुशलता में एक चढ़ाव आ जाएगा यदि आप श्रवण की कला का अभ्यास कर पाते हैं।

सुनने के लिए आपको वर्तमान क्षण में पूर्णतः सचेत व सजग रहना होता है। वर्तमान क्षण में जी पाना ही ध्यान का वास्तविक लक्ष्य है। एक ऐसा मन जो वर्तमान में जीता है, वह स्वाभाविक रूप से न तो बीते हुए समय का विचार करता है और न ही भविष्य की चिंता। यदि आप ऐसा कर पाते हैं कि न तो आप बीते हुए समय में जाएँ और न ही आने वाले समय का चिंतन करें, तो आपने ध्यान की आभासी-स्थिति प्राप्त कर ली। और, जब आप हर नए क्षण के आगमन को भी देख पा रहे हैं तो आप ने ध्यान में सम्पूर्ण स्थिति पा ली। मान लें कि आप कहीं मार्केटिंग विषय पर अभिभाषण सुनने के लिए उपस्थित हैं। वहाँ, यदि आप वक्ता की बातों पर ध्यान नहीं दे रहे ; अन्य शब्दों में कहें कि आप कुछ सुन नहीं रहे, तो ऐसी स्थिति में आपका वहाँ उपस्थित होना व्यर्थ है। वक्ता क्या बोल रहे हैं, यह जानने के लिए आपको सुनना होगा व सुनने के लिए आपको अपना ध्यान उस ओर लगाना होगा – यही एकाग्रता है।

सुनने का यह अभ्यास जो मैं आपको बता रहा हूँ, यह एकनिष्ठ एकाग्रता बनाए रखने का सर्वाधिक सुगम मार्ग है। यह इस प्रकार है –

जब कभी भी सुलभ हो, इसका अभ्यास करें; हो सके तो दिन में कई बार। जब आप गाड़ी चला रहे हों अथवा कहीं जा रहे हों, तो संभवतः आप संगीत का वाद्य चला देते हों। बस, उस गीत को सुनें। संक्षेप में, यही अभ्यास करना है। अपना कोई प्रिय गीत लगाएँ व उस गीत के प्रत्येक शब्द को सुनें। यह इतना सुगम नहीं जितना प्रतीत हो रहा है। ऐसा कितनी बार हुआ कि आपने अपना प्रिय गीत इस विचार से लगाया कि आप उसे पूरा सुनेंगे, किन्तु, आप पाते हैं कि कुछ ही मिनट में वह समाप्त हो गया और आप उसे सुन ही नहीं पाये? संभवतः, उसे पुनः सुनने के विचार से आप उसे दुबारा चलाएं। सर्वाधिक सुरीले गीत को भी यदि पूरा सुनना हो तो मस्तिष्क को एक विशेष अभ्यास की आवश्यकता होती है, जिससे वह उस गीत पर टिक पाये। हो सकता है कि आप पहली कड़ी तो पूरी सुन लें व दूसरी कड़ी का भी आधा भाग सुन लें, किन्तु आरंभ व अंत के परिच्छेद के मध्य ही कहीं आपका ध्यान भटक जाये व आपको पता भी न चले।

श्रवण के माध्यम से एकाग्रता विकसित करने के अभ्यास में आप कोई संगीत बजाएँ व उसे सुनें। उसे सुनना आपके मस्तिष्क का प्रमुख कार्य रखें। उसे पृष्ठभूमि में रख कर न सुनें; ऐसा करने से आपकी एकाग्रता तनुकृत हो (बिखर) कर कमजोर हो जाएगी। संगीत को बजता हुआ छोड़ देना व उसे न सुनना आपके मस्तिष्क को शोर में ही जीने का अभ्यस्त कर देता है। बहुत से लोग कानों में हैडफोन लगा लेते हैं व साथ ही पुस्तक पढ़ने लगते हैं। यदि आप उनसे पाँच घंटे पश्चात पूछें तो संभावना है कि वे ठीक से नहीं बता पाएगे कि उन्होंने पुस्तक में क्या पढ़ा और न ही वे उस गीत का स्मरण रख पाएंगे। यदि आप मस्तिष्क को इस प्रकार की मंद एकाग्रता का अभ्यस्त कर देंगे तो ध्यान व उससे प्राप्त होने वाले आनंद का अनुभव कर पाना कठिन हो जाएगा। ऐसे में, एक स्थिर, शांत व पूर्णतः अपने वश में किए हुए मन का तो विचार भी भूल जाएँ।

प्राचीन समय में जब हैडफोन व संगीत के छोटे छोटे सुवाह्य उपकरण उपलब्ध नहीं थे, तब लोग विशेष रूप से संगीत बजाते थे व उस समय केवल संगीत ही सुनते थे। पढ़ते समय वे केवल पढ़ते ही थे। वर्तमान युग की देन – बहुप्रयोजक कार्यप्रणाली – अर्थात, अनेक काम एक साथ करना, आपकी एकाग्रता को विध्वंस कर देती है। यदि आप एक समय में एक ही कार्य करने की पूर्ण योग्यता विकसित कर लें तो एक साथ कई काम करना भी सुगम व प्रभावी हो जाएगा। यदि आप मानते हैं कि आप अनेक कार्य एक साथ करने में सक्षम हैं तो कृपया तीन संतरों को एक साथ उछालने-घुमाने -पकड़ने (जुग्ग्लिंग) की बाजीगरी करने का प्रयत्न करें।

ध्यान के बिना एकाग्रता निरर्थक है व बिना एकाग्रता के ध्यान व्यर्थ है।

शांति।
स्वामी