इस तथ्य से अभिन्न कि आप किस मार्ग के अनुयायी हैं, आपकी सफलता का निर्णय इससे होता है कि आपका पथ पर बने रहने का संकल्प कितना सुदृढ़ है; आप अपनी योग्यता बढ़ाने, कुछ नया अपनाने व समझने के लिए कितने आतुर व उत्साही हैं, व आपकी जिज्ञासा कितनी प्रबल है।

संस्कृत भाषा में, निश्चय, वायदा, शपथ आदि के लिए शब्द है – ‘संकल्प’। जब आप एक निर्णय लेते हैं, एक सुदृढ़ विचार बना लेते हैं, इसका अर्थ है कि आपने संकल्प कर लिया है। इस श्रंखला के पिछले लेख में एक भक्त कि संकल्प-गाथा वर्णित की गई थी। त्याग के अभ्यास द्वारा अपनी इच्छा-शक्ति में अभिवृद्धि की जा सकती है, जिसके परिणामस्वरूप आप अपने संकल्प पर अडिग रह पाते हैं। इस तरह के अभ्यास आपकी चेतना को उत्तम रूप से गुणवान बनाते हैं। हालाँकि एक निर्मल मन, निर्मल चेतना व निर्मल-निश्चल आत्मा आपका मूल स्वरूप हैं, तथापि मन को वश करने के लिए निश्चित रूप से प्रबल प्रयास आवश्यक है, जिससे मन के निर्मल व अतीन्द्रिय स्वरूप का साक्षात्कार हो पाये व उस स्थिति को सदा-सर्वदा बनाए रखा जा सके।

यहाँ एक अतिउपयोगी तथ्य को समझना होगा, वह यह कि आपको ऐसे संकल्प लेने की कोई आवश्यकता नहीं जो जीवन-पर्यंत निभाने पड़ें। मानसिक परिवर्तन के मार्ग के सभी अभ्यास एक निश्चित अवधि के लिए होते हैं। वह अवधि कुछ दिन, कुछ सप्ताह अथवा कुछ मास की हो सकती है। तत्पश्चात, आपको निर्णय करना होता है कि आप उस अभ्यास को पुनः दोहराना चाहते हैं अथवा जीवन-पर्यंत उसका अनुसरण करना चाहते हैं। यदि आप अनासक्त भाव से जीवन जीते हैं तो आपकी आदतें कदापि आपको बद्ध नहीं कर सकतीं। किन्तु आपके अनासक्त भाव का स्तर जानने हेतु यह आवश्यक होगा कि आपको आपकी वांछित वस्तु/पदार्थ से विलग किया जाये।

पुनः, आज के विषय ‘संकल्प’ पर आते हुए – संकल्प के अभ्यास हेतु दृढ़ निश्चय व प्रबलता अत्यंत आवश्यक हैं। योग-सूत्र के अनुसार –

तीव्रसंवेगानामासन्नः॥  (पतञ्जलि योग-सूत्र, १.२१)
अर्थात – वह व्यक्ति जो अपने अभ्यास में दृढ़ता व उत्साह से रत रहता है, वह निश्चय ही शीघ्रतापूर्वक अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।

और
मृदुमध्याधिमात्रा ततोऽपि विशेषः॥  (पतञ्जलि योग-सूत्र, १.२२)
अर्थात – प्रबलता के अनुरूप ही परिणाम मिलते हैं। साधक साधारण, औसत, व अति इच्छुक, श्रेणी के होते हैं।

किसी चयन परीक्षा में उत्तीर्ण होने का विचार करें; जैसे एक प्रतिष्ठित संस्थान के अत्यंत वांछित विषय में स्थान पाने के लिए आपको दृढ़ता व अत्यंत उत्साहपूर्वक परीक्षा की तैयारी में जुट जाना होता है। एक बार उस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरांत आप थोड़ा सुस्ता सकते हैं। किन्तु आरंभ में परिश्रम करना अति आवश्यक है। परीक्षा की तैयारी में आपका परिश्रम, अनुशासन व प्रबलता के अनुरूप ही परिणाम प्राप्त होता है। सफलता व असफलता के मध्य यही अंतर है।

राह में अवरोध अवश्यंभावी हैं। यह आपकी वैचारिक स्थिति पर निर्भर करता है कि आप उन अवरोधों को लांघ पाते हैं अथवा उन्हें हटा पाने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। अपने संकल्प पर अडिग रहने से मन को अतुलित बल व सामर्थ्य-शक्ति मिलती है।

पतंजलि ने अपने एक श्लोक द्वारा हर प्रकार के अभ्यास में आने वाले संभव अवरोधों का समुचित रूप से वर्णन किया है –

व्याधिस्त्यानसंशय प्रमादालस्याविरति भ्रान्तिदर्शनालब्ध
भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ।  (पतञ्जलि योग-सूत्र, १.३०)
अर्थात – व्याधि, निष्क्रियता, संदेह, प्रमाद, आलस्य, अविरति, इंद्रियों की गुलामी, विभ्रांति, विलंबन, एवं पुनः-पतन – अभ्यास के मार्ग पर आने वाले विभिन्न अवरोध हैं।

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं –
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विञणचेतसा॥
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥  (भगवद् गीता, ६.२३, २४)
अर्थात – साधक को अत्यंत सुदृढ़ता व पूर्ण श्रद्धा से युक्त हो कर योग के अभ्यास में आरूढ़ होना चाहिए। इंद्रियगत सुखों का परित्याग करते हुए व आसक्ति रहित होकर, मनुष्य को अपने मन व इंद्रियों का संयम करना चाहिए।

एक उदाहरण द्वारा इसकी व्याख्या करते हुए – मान लें आप आने वाले 40 दिन तक प्रतिदिन एक घंटा शांत, अविचल बैठने का संकल्प लेते हैं। भले स्थिति कुछ भी हो, आपने दृढ़ निश्चय किया है कि प्रतिदिन आप एक घंटा चट्टान कि भांति स्थिर बैठेंगे ही। उस एक घंटे के समय में आप अत्यंत सुदृढ़ता पूर्वक, अपनी सम्पूर्ण इच्छा-शक्ति का उपयोग करते हुए अति सतर्कतापूर्वक एकाग्रता के अभ्यास में संलग्न रहेंगे। आप हर प्रकार से इस बात का स्मरण रखेंगे कि उस एक घंटे के अभ्यास में जब भी आपका मन इधर उधर भटकेगा, आप उसे प्रेमपूर्वक पुनः अपने ध्यान के केंद्र पर लाएँगे।

उपरोक्त अभ्यास के लिए एक उच्च स्तर की संकल्प-शक्ति आवश्यक होती है। जैसे-जैसे आप अपने संकल्प में आगे बढ़ते हैं, आप पाएंगे कि आपका प्रतिबंधित मन निर्बल होने लगा है। आपको एक अवर्णनीय आंतरिक-शक्ति का अनुभव होगा। ऐसी नवीन आंतरिक-शक्ति का साथ पा कर आप सुगमता पूर्वक सहजावस्था प्राप्त कर पाएंगे, परमानंद की नवीन व सदा रहने वाली सहज अवस्था।

अपने संकल्प की अवधि के दौरान यदि आप अपने अभ्यास से केवल एक बार भी च्युत होते हैं तो वह सम्पूर्ण असफलता ही मानी जाएगी व अभ्यास को पुनः आरंभ करना होगा। अभ्यास के लिए आप किसी अन्य प्रकार का संकल्प भी ले सकते हैं। स्थिर बैठना मात्र एक उदाहरण है।

मैंने मंत्र-योग, ध्वनियों का प्रारूप, से संबन्धित विभिन्न पवित्र-पुनीत अभ्यासों में बीस वर्ष का समय लगाया है। मंत्र-विज्ञान, जिसमें मेरी विशेषज्ञता है, में पुरषचरण – किसी मंत्र को सजीव बनाने की गुह्य कला, प्रमुखतः संकल्प की सुदृढ़ता पर ही आधारित है।

आसक्ति रहित होकर, शक्तिशाली इच्छा-शक्ति व सुदृढ़ चेतना, एकांत में रहने की योग्यता व मौन के अभ्यास सहित, आप की सूक्ष्म-एकाग्रता की यात्रा सुचारु रूप से आगे बढ़ पाती है। ऐसी एकाग्रता, जिसका विस्तृत वर्णन आने वाले लेखों में होगा, आपको ध्यान करना “सिखाएगी”।

किसी भी सहस्त्रों मील लंबी यात्रा को सम्पूर्ण करने के लिए पहला कदम आगे बढ़ाना आवश्यक होता है। हाँ, आप विशेष विमान द्वारा जा रह हों तो बात और है। तथापि, स्मरण रखें कि कामनाओं के घने जंगल में, प्रतिबंधित आत्मा की प्रवृतियों के गहरे सागर में, अपेक्षाओं के विस्तृत व निराधार गगन में, कोई विमान उतर नहीं सकता।

शांति।
स्वामी