“मुझे सोमवार पूर्णतया नापसंद है,” किसी ने मुझसे एक दिन कहा। “और यदि सोमवार का अवसाद नामक कोई रोग है, तब मुझे अवश्य वह रोग है।”
इस व्यक्ति ने तर्क दिया कि हालांकि वह धन उपार्जन कर रहा था, वह अपना आदर्श जीवन नहीं जी रहा था। उसने सब कुछ किया क्योंकि वह अनिवार्य था। “यदि मेरे उत्तरदायित्व नहीं होते तो मैं आपके जैसे वस्त्र पहनता और स्वतंत्र रूप से घूम रहा होता।”
“ओह!” मैंने मुस्कुराते हुए कहा। “यह फ़ेसबुक का मायाजाल है।”
उसने मुझे विचित्र रूप से देखा और मैंने कहा, “मेरा अर्थ है, जब आप सोशियल मीडिया पर किसी का चित्र देखते हैं और सोचते हैं कि वह अपने जीवन के सुनहरे पल बिता रहा है।”
“परंतु आप वह कर रहे हैं जो आपको प्रिय है!”
“मैं जो कर रहा हूँ मैंने उससे प्रेम करना सीख लिया है और आप भी ऐसा कर सकते हैं।”
उसने कहा, “मुझे सवेरे उठना नापसंद है और हर सप्ताह पांच दिनों तक अरुचिकर कार्य करना भी।”
“और, आप क्या करना पसंद करेंगे?”
“सेवानिवृत्त हो कर और तनाव मुक्त हो कर, कदाचित लम्बे अवकाश पर जाउँ, या जीवन को आराम से बिताउँ। मुझे जब चाहे तब उठूँ या काम करूँ। संभवतः एक या दो पुस्तक लिखूँ और बस जीवन के प्रवाह के साथ चलूँ।”

ऐसी सोच हमारे लिए इतनी जन्मजात व स्वभाविक हैं कि मैं सोचता हूँ कि कहीं यह हमारे मस्तिष्क में यंत्रस्थ तो नहीं। हम में से कई लोगों का मानना है कि वर्तमान जीवन उतना उत्तम नहीं है, कि हम किसी और वस्तु अथवा पड़ाव की ओर काम कर रहे हैं। कुछ समय बाद हमें उन कार्यों को नहीं करना पड़ेगा जिन्हें हम पसंद नहीं करते। जिस दिन हम उस किनारे तक पहुंचेंगे, जीवन में धूप व इंद्रधनुष ही होंगे और हम अपने जीवन के हर क्षण को उन कार्यों में बिता पाएंगे जिन्हें हम पसंद करते हैं, या कल्पना करते हैं या जिनके सपने देखते हैं। जैसे कि मानो प्रसन्नता एवं पूर्ति एक निश्चित अवस्था है जहाँ हम केवल उन व्यक्तियों से घिरे रहेंगे जो हमें प्रेम करते हैं और जिन्हें हम प्रेम करते हैं। जहाँ केवल बहुतायत होगी, कोई तनाव, संघर्ष या बीमारियां नहीं, केवल प्रसन्नता व आनंद, केवल सुख और शांति। कुछ कहते हैं कि यही ज्ञानोद्दीप्ति है।

मेरा मानना है कि यह केवल अवास्तविक ही नहीं अपितु एक अज्ञानतापूर्ण व विसंगतिपूर्ण विचार भी है। मैं नहीं जानता कि हम इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे कि मुक्ति का अर्थ है हमारे दैनिक जीवन में काम से स्वतंत्रता या हमारे सपनों की पूर्ती में हमें कोई प्रतिरोध नहीं होगी। मैंने जारोल्डिन एडवर्ड्स द्वारा लिखित उत्सव नामक पुस्तक में एक छोटी कथा पढ़ी थी।

कई वर्ष पूर्व हमें प्रथम ग्रेट अमेरिका मनोरंजन पार्क के उद्घाटन के लिए कई हज़ार अन्य लोगों के साथ आमंत्रित किया गया। वह एक अविश्वसनीय अनुभव था! जब हम अपने साथ बारह बच्चों को लेकर पार्क में भर्ती होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब हमारे बारह वर्षीय बेटे ने कहा, “मैं द्वार के खुलने के लिए आतुर हूँ माँ। मुझे लगता है कि इस द्वार का खुलना इस विश्व का सर्वोत्तम कार्य होगा।”

केवल उस एक रात के लिए, सब कुछ पिनोक्यो पुस्तक में प्लेषर आइलैंड के समान लग रहा था। अर्थात वहाँ सब कुछ मुफ्त था।

मेरे बेटे और उसके चचेरे भाई, जो एक ही आयु के थे, उन्होंने अपनी इच्छा से कहीं भी जाने की अनुमति माँगी। चूंकि मनोरंजन पार्क पर्याप्त रूप से प्रकाशित और कड़ी फेंस से सुरक्षित था, और वहाँ उपस्थित सभी अतिथि थे, हमने उन्हें अनुमति दी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि दो अत्यंत मुदित लड़के एक माया नगर की सैर करने निकलें हों। वे हर सवारी पर बैठ सकते थे, जी भर के भोजन खा सकते थे, खेल सकते थे, और उस जगह की महिमा का आनंद ले सकते थे।

उनकी पार्टी शाम के आठ बजे से आधी रात तक चली। हमने लड़कों से पौने बारह बजे मैरी-गो-राउंड के पास मिलने की व्यवस्था की थी। निस्संदेह, हमने उन्हें शाम के समय कई बार देखा, नित्य नई सवारी, भोजन से भरे हाथ, उनकी आँखें उज्ज्वल, उत्सुक, और थोड़ी लालची।

दिन के अंत में थके हुए परिवार बाहर निकलने के लिए दरवाज़े की ओर बढ़ने लगे। हम ने हमारे दो थके हुए छोटे लड़कों को, चॉकलेट और मस्टर्ड से चिह्नित चेहरे लिए और सिर थकावट से झुके हुए, अपने पैरों को घसीटते हुए हमारे पास लौटते देखा। मेरे बेटे ने मेरी ओर देखा।

वह मुझसे बोला, “मैंने कुछ सीखा है। आप को याद है कि मैंने कैसे कहा था कि पूरे संसार में सबसे अच्छी बात तब होगी जब वह द्वार खोले जाएंगे? हम पार्टी और मनोरंजन का आनंद लेंगे!” उसने विशाल प्रवेश द्वारों की ओर संकेत किया। मैंने सहमति में अपना सिर हिलाया। “परंतु, अब,” उसने कहा, “मुझे लगता है कि यदि वे द्वार बंद हो जाएं और मैं बाहर नहीं जा पाऊँ तब यह इस संसार में सबसे बुरी घटना होगी।”

वह शाम उसके बचपन की सबसे अच्छी शाम में से एक थी, परंतु उसने यह भी सीखा कि आनंद का एक टाइमर होता है, और जब टाइमर बजता है, तब मजेदार समय समाप्त हो जाता है। तब समय आ जाता है उन मौलिक वस्तुओं पर लौटने का जो मनोरंजन को अर्थ देते हैं। कार्य ही जीवन को उद्देश्य व महत्व देता है, और जो कुछ भी हम करते हैं उसमें वह उद्देश्य की भावना ही मनोरंजन को और अधिक अर्थ देते हुए एक उत्सव बना देती है।

ज्ञानपूर्ण शब्द इससे श्रेष्ठतर रूप से नहीं कहे जा सकते। दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद मुलायम बिस्तर पर सोने का आनंद पूरे दिन विलम्बन करने से और दिन भर नेटफ्लिक्स पर पलकें झपकाए बिना कार्यक्रम देखने से कहीं अधिक है। उदाहरण के लिए, यदि रात में आप देर तक जाग कर बेकार के कार्य करते हैं जो आपका मनोरंजन करते हैं परंतु आपको कोई चुनौती नहीं देते या आप के विकास में आपकी सहायता नहीं करते, तो ध्यान दें कि अगली सुबह उठने पर आप कैसा अनुभव करते हैं – सुस्त, निष्प्राण, सिर में दर्द तथा मुंह में मिट्टी व अस्थिरता का स्वाद। आप नूतन और ऊर्जावान नहीं जागेंगे। इसके बजाए, आप पाते हैं कि कल की तुलना में आज आप में और भी कम इच्छाशक्ति है। इस का कारण बहुत सरल है – पूर्ण आराम का आनंद कमाए बिना उसका अनुभव नहीं किया जा सकता। और आप ऐसे कार्यों के माध्यम से यह आनंद कमा सकते हैं जिन कार्यों को आप आम तौर पर टालना चाहते हैं। अर्थात अपने जीवन को संतुलित करके – काम और आराम के बीच में संतुलन बना कर।

हमारे दैनिक जीवन में हमें जो करना चाहिए यदि हम उससे भयभीत हुए तो हमारे मन में दमनकारी व नकारात्मक भावनाएं पैदा होती हैं। जारोल्डिन एडवर्ड्स उसी अध्याय को आगे बढ़ाते हुए बड़े सुंदर ढ़ंग से कहतीं हैं –

हम में से कई लोगों को सवेरे अपनी आंखें खोलते ही उन सभी कार्यों का तत्काल व असहनीय अनुभव होता है जो हम पर टूट पड़ने वाले हैं। फर्श पर पैर रखने से पहले ही हमें पूर्णतया पराजित होने का अनुभव होता है जैसे हम किसी बंदूक के निशाने पर हों। हमारा जीवन मैले कपड़ों की उस भारी टोकरी की भांति प्रतीत होता है, जिसे हम एक खड़ी सीढ़ी पर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। वस्तुएं फिसलती जा रही हैं और हमारे पीछे अपना चिह्न छोड़ रही हैं।

मैंने यह अनुभव किया है कि उन दमनकारी भावनाओं को नियंत्रित करने हेतु मुझे दो वस्तुएं करने की आवश्यकता है। सबसे पहले लगातार यह देखना आवश्यक है कि आपने क्या कुछ किया है इसके बजाय कि आपने कौन सा कार्य नहीं किया। किसी और व्यक्ति को यह पहचानने की आवश्यकता नहीं कि आपने जीवन में क्या सिद्ध किया है। यह पर्याप्त है कि आप स्वयं यह जान पाएं कि आप ने क्या कार्य पूर्ण किया है। दूसरा, यह अनुभव करना है कि अपने कर्म पर आप के स्वयं का ही अधिकार है। यह आप तय कर सकते हैं कि कौन सा कार्य किया जाना चाहिए, कब, और कैसे। आप योजनाकार और कर्ता हैं – और यदि वस्तुओं को बदलने या बेहतर करने या भिन्न विधि से करने की आवश्यकता है, तब आपके पास अपनी निर्णय व विचार करने की शक्ति है।

ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसे कुछ भी चिंता न हो। हममें से कोई भी सदा प्रसन्न नहीं रह सकता, चाहे कुछ भी कर ले। आशावादी व सकारात्मक अवश्य रह सकता है। किंतु चुनौतियों, संघर्ष या कठिनाइयों के बिना नहीं रह सकता।

यदि आपको अभी तक अपने जीवन का उद्देश्य नहीं मिला है तब यह अवश्य जान लें कि इससे पहले कि आप को कोई उद्देश्य प्राप्त हो, यह समझना आवश्यक है कि शक्तिशाली बनने की नींव है कड़ा व्यायाम व प्रशिक्षण। दृढ़ सहनशक्ति, धैर्य तथा जो कार्य करना आवश्यक है उसमें प्रसन्नता प्राप्त करने की निपुणता तभी प्राप्त हो सकती है जब आप अपनी इष्टतम क्षमता पर काम करते हैं।

कुछ दिन पूर्व, मुझे एक १५ वर्षीय एथलीट को पानी में मछली की भांति तैरते देखने का अवसर मिला। वह नव युवक ४ बजे उठता है, सप्ताह के पाँच दिन स्कूल जाता है, सप्ताह के हर दिन ७ घंटे तैरता है, दो घंटे अपने प्रशिक्षण व अभ्यास सत्र तक पहुँचने हेतु यात्रा में व्यतीत करता है, और जो भी समय शेष है उसे पियानो बजाने के लिए समर्पित करता है (वह मनुष्य-जाति का ही है इसलिए वह सोता भी है!)। पिछले पांच वर्षों में वह अपने अभ्यास में एक दिन भी नहीं चूका है। एक भी दिन नहीं! मुझे निश्चित रूप से विश्वास है कि उसे भी कभी-कभी सवेरे अंधेरे में उठना पसंद नहीं आता होगा और ना ही कैनेडा की सर्दियों में ठंडे पूल में कूद कर तैरना (जैसा कि उच्च कोटि के तैराकों के लिए आवश्यक है)। जब आकाश में धुँधले बादल थे या जब भारी हिमपात हो रही थी वह अपने बिस्तर पर आराम से सो सकता था। परंतु नहीं, उसने स्वयं को गर्म रजाई से बाहर निकाला और वह किया जो उसके उद्देश्य को पूरा करने के लिए आवश्यक था। इस प्रकार से चैंपियन बनते हैं।

उद्देश्य भरा जीवन जीना एक प्रकार की आदत है जो हम आत्म-अनुशासन व त्याग के माध्यम से निर्मित कर सकते हैं। यह कोई आकस्मिक खोज नहीं है। यदि आप निरीक्षण करें, तब आप देखेंगे कि संसार के सबसे उल्लासपूर्ण व्यक्ति अधिकतर बहुत मेहनती होते हैं। मेरा अर्थ यह नहीं है कि वे हर दिन अठारह घंटे काम करते हैं, परंतु जो कार्य अनिवार्य है उसे पूर्ण करने हेतु वह कभी आलस्य नहीं दिखाते।

मुल्ला नसरुद्दीन के शिक्षक ने उससे पूछा, “हम किसी ऐसे व्यक्ति को क्या कहते हैं जो सुन नहीं सकता?”
मुल्ला ने उत्तर दिया, “आपको जो पसंद है उसे आप वह कह कर बुला सकते हैं क्योंकि वह सुन ही नहीं सकता!”

अवसर हर समय आपके द्वार पर खटखटा रहे हैं, आपको अपने जीवन के उद्देश्य से परिचित कराने के लिए। यदि आप उन्हें देखने का प्रयास नहीं करते और इसके बजाय किसी भव्य, अपूर्व, अवास्तविक घटना पर अपना सारा ध्यान देते हैं अथवा उसकी प्रतीक्षा करते हैं, तब आप निराश होंगे।

यदि आप वह जीवन जीना चाहते हैं जिस की आप कल्पना करते हैं, तब सबसे पहले अपने वर्तमान को पूर्ण ऊर्जा एवं उत्साह से जिएं। शीघ्र ही आप अपने जीवन का उद्देश्य जान लेंगे जिस के द्वारा आप को गहरी पूर्णता व पूर्ति का अहसास होगा। जब आप अपना हृदय, मन व आत्मा किसी भी कार्य में लगा देते हैं, यह आपको मुक्त कर देता है। एक मुक्त आत्मा ही जीवन की यात्रा को सहजता एवं लावण्य से तय करती है, जैसे एक निपुण तैराक पानी में तीव्रता से तैरता है। यह एक देखने योग्य दृश्य है।

अपने जीवन को विराट, भव्य व शानदार बनाना पूर्ण रूप से आपके हाथों में है। ध्यानपूर्वक निर्णय लें।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - The Secret of a Fulfilling Life