यह एक प्रसिद्ध कहावत है कि हम जन्म के समय अपने साथ इस संसार में कुछ नहीं लाते और मृत्यु के समय हम अपने साथ कुछ नहीं ले जाते हैं। कदाचित हो सकता है। यदि यह पूर्णतः सत्य होता तब यह अच्छा होता। सत्य तो यह है कि ऐसा बहुत कुछ है जिसे हम जन्म के समय अपने साथ लेकर आते हैं और हम अपने साथ बहुत कुछ ले कर जाते हैं। निश्चित रूप से हमारे कर्म हमारे साथ जाते हैं। आप चाहे पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों या स्वर्ग में, हमारे कर्म हमारे वर्तमान जीवन से परे हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं।

जन्म के विषय पर फिर जाते हुए हम इस संसार में निश्चित ही बहुत कुछ ले कर आते हैं। शरीर और पांच इंद्रियाँ जो स्पर्श, गंध, स्वाद, ध्वनि और दृष्टि का अनुभव करने के योग्य बनाती हैं, उनके अतिरिक्त हम दो और अविश्वसनीय वस्तुओं के साथ जन्म लेते हैं। पहला है जीवन। हम एक भरपूर जीवन के साथ जन्म लेते हैं। जीवन श्वास लेने और बाहर निकालने की प्रतिक्रिया से अधिक है। यह अत्यंत क्रियात्मक या निष्क्रिय नहीं है। आरंभ में जीवन सुंदर होता है और उमंग से भरा होता है। जब आप बाल्यावस्था में होते हैं तब आप के चेहरे पर एक चमक होती है। होंठों पर मुस्कान होती है यहाँ तक कि आप का रोना भी आकर्षक लगता है (अधिकतर)। एक बच्चा निरंतर विस्मय में जीता है और जीवन की भव्यता का आनंद लेता है। उसकी भविष्य के प्रति कोई योजना नहीं होती और अतीत के लिये पश्चाताप नहीं होता। वह बस वर्तमान क्षण में जीता है। परंतु जैसे- जैसे आप बड़े होते हैं हर व्यतीत किया हुआ दिन आप से कुछ तोड़ कर ले जाता है। आप बदलते हैं, आप और भी अकेले व नकारात्मक हो जाते हैं और जीवन से थक जाते हैं।

यदि हम चाहें कि हम सदा के लिए एक बच्चे के रूप में रहें, यह संभव नहीं है। क्योंकि जिस दूसरी वस्तु के साथ हम पैदा होते हैं, वह वर्तमान क्षण में रहने के हमारे संकल्प और वास्तविकता के बीच आती है। आप चाहते हैं कि आप बच्चों के समान हों, सकारात्मक और साहसी। आप ईर्ष्या, नकारात्मकता या उपेक्षा की भावनाओं को नहीं चाहते हैं। आप जीवन का आनंद लेना चाहते हैं, आप भविष्य की चिंता नहीं करना चाहते, परंतु एक विचार सब कुछ बदल देता है। सम्पूर्ण सुंदरता ऐसे लुप्त हो जाती है जैसे संध्या होने पर सूर्य की किरणें लुप्त हो जाती हैं। जीवन का यह दूसरा पक्ष हमारे गले में बंधे बोझ के समान है। यदि आपने अनुमान नहीं लगाया है तो मैं जिसके सन्दर्भ में बात कर रहा हूँ वह है “मन”। प्रत्येक व्यक्ति एक मन के साथ जन्म लेता है। निरंतर बात करने वाला मन।

यदि आप ध्यान दें तब आप जान जाएंगे कि यह कभी शांत नहीं होता। जब तक आप पहला उपहार (जीवन) चाहते हैं, तब तक आपको दूसरा उपहार (मन) भी साथ रखना होगा। जैसा कि जॉन मिल्टन ने “पैराडाइज़ लॉस्ट” में लिखा है –

“मन का अपना जगत है और उस जगत में,
एक नर्क स्वर्ग बन सकता है और एक स्वर्ग, नर्क बन सकता है।”

यदि आप प्रयोग करना चाहते हैं, तो मात्र एकांत में शांति से मौन बैठने का प्रयास करें और आप पाएंगे कि विचार चारों ओर से आप पर आक्रमण कर रहे हैं। अधिकतर नकारात्मक, चिंताजनक, निराशाजनक विचार। अच्छे विचार यदाकदा आते हैं जैसे कि शीतकाल में वर्षा। परंतु क्या आप जानते हैं कि सावधानी का शिखर क्या है? वह है इस बुद्धिमत्ता के साथ जीना है कि विचार रिक्त होते हैं। उनका अपना कोई अर्थ नहीं होता। वे किसी भी प्रकार के तत्व से हीन हैं। आप उन्हें स्वयं को मूर्ख न बनाने दें। यह एक टीवी के समान है, हर चैनल पर कुछ न कुछ आ रहा है। मन भी कुछ इसी समान है। आपको उन चैनलों को देखने की आवश्यकता नहीं है।

अपने विचारों की उपेक्षा करने की क्षमता सावधानी से आती है। विडंबना यह है कि सावधानी का विकास प्राथमिक रूप से अपने विचारों के अवलोकन करने से होता है। आपके विचारों को एक स्वतंत्र पर्यवेक्षक (सावधानी से) के रूप में देखने और उनका अनुसरण करने में अंतर है। जब आप सावधानी की कला सीख लेते हैं, तब आप अपने मन पर असाधारण नियंत्रण प्राप्त करते हैं। आप यह जान लेते हैं कि आपको मन की निरर्थक वार्तालाप सुनने की आवश्यकता नहीं है। आप मन की अर्थहीन बातों का उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं हैं। अपने मस्तिष्क में कोलाहलपूर्ण मन के साथ लम्बा वार्तालाप रखना एक निरुद्देश्य, निरर्थक, अनावश्यक प्रक्रिया है। माइकल ए सिंगर की “द अनटेथर्ड सोल” से कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं –

आप जितना चाहते हैं, आपके विचारों का इस संसार में उससे कहीं कम प्रभाव होता है। यदि आप निरपेक्ष होकर अपने विचारों को देखें तो आप पाएंगे कि उनमें से अधिकतर विचारों की कोई प्रासंगिकता नहीं है। उनका दूसरों पर या किसी पर भी कोई प्रभाव नहीं होता, केवल आप पर होता है। जो कुछ हो रहा है, जो भी हो चुका है, या जो कुछ होगा, उस पर यह आपको मात्र अच्छा या बुरा ज्ञात करा सकते हैं। यदि आप अपना समय इस आशा में व्यतीत कर रहे हैं कि कल वर्षा नहीं होगी तब आप अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं। आपके विचार वर्षा को परिवर्तित नहीं करेंगे। आप यह देख पाएंगे कि अनवरत आंतरिक विचारों का कोई लाभ नहीं है, और हर वस्तु को समझने का निरंतर प्रयास करना आवश्यक नहीं है। अंततः आप देखेंगे कि समस्याओं का वास्तविक कारण ‘जीवन’ नहीं है। जीवन के प्रति व्याकुलता मन बनाता है और वास्तव में समस्याएं पैदा करता है।

क्या आपने कभी छोटे बच्चों को खिलौनों के साथ खेलते देखा है? खेलते समय वे निरंतर टिप्पणी करते रहते हैं। वे अपने खिलौनों से बातें करते हैं और कईं प्रकार की भावनाओं को व्यक्त करते हैं जैसे कि खिलौने जीवित हों। मन का कोलाहल उतना ही अर्थपूर्ण है, जितना कि एक बच्चे की विवरणात्मक कहानी। यह समझ आपके मन को शांत करने का पहला कदम है। ध्यान, मन को समझने की प्रतिक्रिया नहीं है। मन को समझना भी आवश्यक नहीं है। इसकी जगह अपने मन को देखना है, ताकि आप इसे अपनी इच्छानुसार अनदेखा करना या दिशा देना सीख सकें।

किसी ने एक दिन मुझे एक सुंदर चुटकुला ई-मेल किया। ओशो ने इसे पहली बार सुनाया था, मैं आपके लिये इसका भावानुवाद कर रहा हूँ।

एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक अपने छोटे बेटे के लिए एक उपहार खरीदना चाहता था।
“खिलौने नहीं” उसने दुकानदार से कहा, “मुझे अपने छः वर्षीय बच्चे के लिये कुछ बौद्धिक वस्तु दिखाओ”।
दुकानदार ने कुछ देर देखने के बाद एक चित्र-खंड पहेली निकाली जिस पर लिखा था, तीन वर्ष तथा अधिक आयु वाले बच्चों के लिये।
“यह तो अत्यंत सरल होगा” पिता ने उपहास किया, “वह एक वैज्ञानिक का बेटा है। मुझे कुछ और कठिन वस्तु दो।”
“महोदय मेरा विश्वास करें” दुकानदार बोला, “यह सबसे मुश्किल पहेली है। यहाँ तक कि आप भी इसे हल नहीं कर सकते।”
चुनौती के विषय में सुनते ही वैज्ञानिक तुरंत चित्र-खंड पहेली सुलझाने का प्रयास करने लगा। उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब अगले आधे घंटे पश्चात भी वह उसे हल नहीं कर पाया।
“मुझे समझ नहीं आ रहा” उसने अपना सर खुजलाते हुए कहा, “यह पहेली वास्तव में क्या है?”
“परेशान न हों महोदय” दुकानदार ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया, “इसे सुलझाया नहीं जा सकता। इसे समझा भी नहीं जा सकता। यह जीवन की पहेली है।”

एक बहती हुई नदी या एक शीतल हवा के झोंके की सुंदरता का अनुभव करने के लिये उसे समझने की आवश्यकता नहीं है। उसी प्रकार जीवन चमत्कार है और उसका आनंद लेने के लिए उसे समझने की आवश्यकता नहीं है। समझने के लिये सचेत मन के हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। ऐसे हस्तक्षेप की उपस्थिति में शांति की संभावना नहीं रहती। शांति वर्तमान में स्थित होने में है। बिना किसी धारणा के।

हम जीवन को समझने की जगह उसे जिएं और जीवन के उपहार का आनंद उठाएं। यदि कुछ समझने के योग्य है, तो समझने की एकमात्र बात यह है कि किसी एक चरण पर आकर सारी समझ निरर्थक हो जाती है। एक बच्चे के खिलौने के समान जीवन भी खेलने की वस्तु है। उसे अधिक गंभीरतापूर्वक न लें।

उन उपहारों के लिये कृतज्ञ हों और जीवन ऐसे जिएं जैसे आप जीवन से प्रेम करते हों।

शांति।
स्वामी