यदि मुझे शब्दकोष में से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शब्द का चुनाव करना हो तो, बिना एक पल भी सोचे, मैं प्रेम शब्द चुनूँगा। सब भावनाओं में से उच्चतम व परम उत्कृष्ट भावना प्रेम है। इसकी गहराई व गूढता को देखते हुए, प्रेम को मात्र एक भावना की श्रेणी में रखना न्यायोचित नहीं होगा; यह हमारी सत्ता का होना है, अस्तित्व की गुह्य अवस्था। जितना अधिक गहराई से आप प्रेम में स्थित होते हैं, उतनी उच्च आनंद की स्थिति होती है। ऐसा आनंद जो सबमें अंतर्निहित है, वह अन्तःकरण से प्रकट होना आरंभ हो जाएगा। यदि ईश्वर-रूप व मनुष्य रूप में केवल एक अंतर देखना हो तो वह होगा ईश्वर रूप का सदा-सर्वदा केवल और केवल प्रेम ही बाँटना, जबकि मनुष्य कभी कभी डगमगा सकता है।

इस कृत्रिम जगत में, जो की बहुधा अपवित्र है, इस पवित्र से भी पवित्रतम शब्द का इतनी बार व इतना अधिक उपयोग व दुरुपयोग हो चुका है, कि यह उन सब शब्दों के लिए एक आवरण बन गया है जो यह है ही नहीं। बहुत से व्यक्ति, किसी से, अथवा किसी दर्शन या संप्रदाय, अथवा पंथ, या अपनी संपत्ति से, प्रेम करते हैं, और अपना पूरा जीवन उनको बनाने व संभालने में ही व्यतीत कर देते हैं। लोग प्रेम में पड़ना और निकलना व, फलत:, रिश्तों में बंधना व उन्हें तोड़ने का भी सन्दर्भ लेते हैं। कुछ अपना संपूर्ण जीवन व “प्रेम” एक दूसरे को समर्पित करने का प्रण लेते हैं, मात्र कुछ समय बाद अलग होने के लिए। बहुत से ऐसे हैं जो पाते हैं कि समय के साथ उनका प्रेम भी फीका हो गया है, जैसे धूप में अत्यंत चमकीले रंग भी हल्के हो जाते हैं। लेकिन यदि वह विशुद्ध प्रेम था तो वह लुप्त कैसे हो गया? सत्य भी, भले ही वह संपूर्ण न हो, किसी पर आश्रित नहीं होता। इसी प्रकार, सच्चा प्रेम प्रतिबंधित नहीं होता, क्योंकि जो किसी माप दंड पर आधारित होता है, वह समझौता अधिक है।

अधिकांश में से कुछ लोग, ईश्वर को सच्चा प्रेम कर पाते हैं। ईश्वर उनसे बात नहीं करते या सीधे उनके प्रश्नों के उत्तर नहीं देते। वह उनका भोग नहीं खाते, न ही वह कभी उन्हें अपना स्वरूप दिखाते हैं। फिर भी वे लोग निरंतर ईश्वर से प्रेम करते रहते हैं और उनके लिए रोते रहते हैं। यदि वे इस प्रकार की भक्ति भयवश होकर या किसी उद्देश्य के लिए नहीं कर रहे तो वे सच्चे प्रेम के समीप हैं। वे प्रेम में पूर्णत: प्रतिष्ठित हैं अथवा नहीं, इसका पता तभी चल पाता है जब उनका ईश्वर के साक्षात स्वरूप से वार्तालाप होता है। यदि वे अब भी हर प्राणी को एक समान भाव से ही प्रेम कर सकते हैं, तो वे प्रेम का प्रतिरूप बन चुके हैं। जब वे सदा-सर्वदा प्रेम के भाव से ही सबका प्रतिकार करते हैं तब वे स्वयं साक्षात प्रेमावतार से कम नहीं। यह जान लें कि ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति में आपका अपना व्यक्तित्व एक मौन रूपांतरण से गुज़रता है।

ईश्वर से प्रेम करना सरल है, चूँकि वे न तो आलोचना करते हैं न ही प्रशंसा; वे आपको गले से नहीं लगाते, न ही दूर भगाते हैं। आपने उन्हें उनके इसी रूप में स्वीकार किया हुआ है। वो आपकी आस्था की उपज हैं; दुर्भाग्यवश, बहुधा आपकी अपनी आस्था नहीं, बल्कि दूसरों द्वारा आप पर लादी हुई आस्था। तथापि, मनुष्य मात्र के लिए ईश्वर से प्रेम करना एक दिव्य कार्य है; हर प्राणी से प्रेम करना एक दिव्य-पुरुष का ईश्वरीय कार्य है। यदि आपके पास स्वयं की कोई अनुभूति नहीं है, और आपको किसी बारे में कोई ज्ञान नहीं है, किंतु यदि आप हर भाव का उत्तर केवल प्रेम से ही देने की ठान लें, तो लोग आपको अपने हृदय में सर्वोच्च स्थान पर विराजमान करेंगे व आपकी पूजा ईश्वर की पूजा से भी कहीं अधिक करेंगे। किसी प्रकार की कठिनाई का सामना करते समय, उन्हें ईश्वर से पहले आप की याद आएगी और हर्ष का विषय आने पर, वे पहले आपको संपर्क करने का प्रयास करेंगे और बाद में मंदिर-मस्जिद जायेंगे।

तो, आप कैसे एक दिव्य-पुरुष के स्तर तक ऊपर उठ सकते हैं! वास्तव में जितना आप सोच रहे हैं, ये उससे कहीं आसान है; हाँ, मूल-दर्शन को समझने से कहीं कठिन उसका आचरण होता है। प्रेम के भाव को विकसित करने के लिए आवश्यक है कि आप अपने स्वयं के साथ सुखद भाव में हों, व जो कुछ आपके पास है उससे संतुष्ट हों। आपको अंतर्मुख रहने का भी अभ्यास होना चाहिए ताकि न केवल आप अपनी आनंदमय स्थिति बनाए रख सकें, बल्कि संसार द्वारा प्रदत्त भावनात्मक, बौद्धिक व भौतिक अनुभवों में भी अविचल रह सकें। ऐसा होने पर यह आपको हमेशा प्रेम बाँटने के लिए ही प्ररित करेगा – शुद्ध, पवित्र व पुरातन प्रेम।

प्रेम हर प्राणी में स्वाभाविक विद्यमान होता है। यह आपकी सत्ता का मूल कारण है व आपके अस्तित्व का मूल आधार। वहीं, अधिकतर लोगों में यह अक्सर अनुचित ढंग से स्थापित होता है। प्रेम को यदि अनुचित दिशा मिल जाए तो यह आसक्ति का रूप ले लेता है, और, जब अव्यवस्थित हो तो तत्काल यह सम्मोह बन जाता है। जब तक आप पूर्ण रूप से अंतर्मुख नहीं हो जाते, उस समय तक, आप अपने प्रेम की वर्तमान अवस्था खोजने का प्रयास कर सकते हैं। इस लेख का निम्न भाग इसमें आपको सहयोग देगा। जिसके पश्चात, यदि आप अपने प्रेम को कुछ क्षतिग्रस्त पाएँ, तो इसका जीर्णोद्धार कर सकते हैं; शिथिल हो तो नवीकरण, मृत-प्राय: हो तो पुन: उजागर, और यदि नीरस हो गया हो तो पुन: इसे सरस बना सकते हैं। ऐसा करने में कुछ परिश्रम लगेगा किंतु इसका प्रतिफल अपरिमित, अमूल्य होगा। स्वयं में प्रेम की वर्तमान स्थिति जानने के लिए निम्न पर विचार करें –

लोग विभिन्न वस्तुओं से प्रेम करते हैं और ऐसा वे अलग अलग ढंग से करते हैं। अधिकांशत:, आसक्ति, सम्मोह, आकर्षण, या लोभ से लेकर पसंद, दया से लेकर आवेश, जैसी सभी भावनाएँ प्रेम ही समझ ली जाती हैं। प्रेम इनके मूल में व इन सब का जन्मदाता हो सकता है, किंतु जब प्रेम विषाक्त हो जाता है व पवित्र नहीं रह पाता, तब यह, स्थायी रूप से, ऊपर कही अवस्थाओं में से किसी एक का रूप ले लेता है। प्रेम अत्यंत अस्थिर होता है, व स्वरूप बदलने में अति माहिर। वे सब जो प्रेम करते हैं, उनका प्रेम सामान्यत: निम्नलिखित तीन में, बिना एक स्थिर मात्रा में विभाजित हुए, बँट जाता है; कभी वे तीन में से केवल एक से प्रेम करते हैं, व कभी केवल दो से। आपका उद्देश्य है अपने संपूर्ण प्रेम को बाकी सब श्रेणियों से हटा कर सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान पर स्थापित करना। अब श्रेणियों की बात की जाए –

वे जो वस्तुओं से प्रेम करते हैं

ऐसे व्यक्तियों की कोई कमी नहीं जो इस श्रेणी में आते हैं व पूरे जी जान से अपनी संपत्ति के प्रेम में डूबे होते हैं। व्यक्तिगत रूप से, मुझे हँसी आती है जब लोग नश्वर पदार्थों के प्रेम में डूबे दिखते हैं। ये सब अपनी कारों, साजो-सामान, सुविधा की सामग्री आदि के प्रति अत्यंत आसक्त होते हैं। वस्तुत: वे अपने हर उस सामान के साथ प्रेम करते हैं जिसका बाज़ार में पैसों मे मूल्य है। यदि ऐसे व्यक्ति की पत्नी की कार से दुर्घटना हो जाती है तो वह व्यक्ति अपनी कार व उसकी बीमा-योजना को लेकर अधिक चिंतित होगा, न कि अपनी पत्नी को लेकर। शायद वह चतुराई से अपनी भावनाओं को छुपा कर व्यावहारिक तौर पर अपनी पत्नी का हालचाल अवश्य पूछेगा और, तत्काल कार, कार को आए नुकसान आदि के बारे में अनेकों प्रश्न पूछ डालेगा। ऐसे व्यक्तियों का बहुत सारा समय अपनी निर्जीव संपत्ति व पदार्थों के रख रखाव में बीतता है, और, जो बचता है, वह उनकी चिंता में।

प्रेम एक विशिष्ट भावना है। यह आपको उसी में परिवर्तित कर देता है जिसे आप यह अर्पित करते हैं। आप किसी अपराधी को प्रेम करना आरंभ करें, आप देखेंगे कि आप उसके अनैतिक क्रिया-कलापों से सहमति रखने लगे हैं और स्वयं भी उसी की तरह बनते जा रहे हैं। आप एक सन्यासी से प्रेम करिए, आप स्वयं भी वही बन जाएँगे। इसी प्रकार, जब आप वस्तुओं से प्रेम करना आरंभ कर देते हैं, तो आप स्वयं भी एक निर्जीव वस्तु बन जाते हैं। बस एक ही अंतर होता है – आप में चेतना है व वस्तुओं में नहीं। वस्तुओं से प्रेम करने के पश्चात आप लोगों से प्रेम नहीं कर पाएँगे; निश्चित रूप से उतनी उदारता व अभिव्यक्ति पूर्वक तो नहीं। मैं आशा करता हूँ कि आप जानते हैं कि आपकी कार, घर, या गोल्फ क्लब आपको बिल्कुल भी प्रेम नहीं करते। वे किसी दूसरे के हाथों में भी उतने ही तत्पर व योग्य हैं जितना आपके। यदि वस्तुओं से प्रेम करते हुए आप स्वयं एक वस्तु ही बने रहेंगे तो बहुत जल्द आप भी एक भूली हुई वस्तु हो जाएँगे। चूँकि, अब आप स्वयं एक वस्तु हैं, तो या तो आप पुराने हो जाओगे अथवा तो आने वाले दिनों में अप्रचलित व पुराने ढंग के, क्योंकि “वस्तुओं” का तो समय के साथ यही हश्र होता है।

ईश्वर न करे, किंतु, यदि आप ऐसे व्यक्तियों में से एक हैं, तो आपको गहन चिंतन की आवश्यकता है। वस्तुओं के साथ अपनी इस आसक्ति का त्याग करें। अपने संपूर्ण प्रेम को अन्य श्रेणियों की ओर उपदिशित करें। प्रेम केवल तब ही और बढ़ता है जब प्राणी-मात्र के बीच बाँटा जाए, क्योंकि यह केवल अन्य सजीव प्राणियों में ही जीवित रहता है, अन्यथा मृत हो जाता है। नश्वर पदार्थों का प्रेम आप में से प्रेम की रसधार को सोख लेगा व आपको शुष्क व नीरस छोड़ जाएगा; इतनी दूर, इतना तन्हा, कि दूसरा कोई आपको सुन ही नहीं पाएगा, व इतना शुष्क कि आप में कोई सुगंधि, कोई रस शेष बचेगा ही नहीं। यदि आप लोगों से प्रेम करना प्रारंभ नहीं करते, वह भी उससे अनंत गुना अधिक जितना आप अपनी निर्जीव वस्तुओं से करते हैं, तो आप अपना सुंदर जीवन इन निर्जीव वस्तुओं के लिए व्यर्थ गवाँ देंगे। और एक दिन जीवन भी आपको छोड़ कर छू मंतर हो जाएगा, आपकी सारी की सारी संपदा यहीं पीछे छोड़ कर, दूसरे लोगों द्वारा अपनी इच्छा व आवश्यकता अनुसार उपयोग व दुरुपयोग करने हेतु। एक उदासीन दीवार पर आपकी निर्जीव बेमेल तस्वीर, बस औपचारिकता वश, टॅंगी हुई दिखेगी, यह याद दिलाने के लिए की, हाँ, आप भी कभी इस दुनिया में थे।

वे जो किसी दर्शन से प्रेम करते हैं

कुछ लोगों का प्रेम किसी दर्शन, धर्म, पंथ, संप्रदाय, उद्देश्य या किसी मत-मतांतर से होता है। इन सब में से, एक ऐसा उद्देश्य जो प्राणी मात्र के भले के लिए समर्पित हो, जीने लायक हो सकता है। बाकी के सब आपके ध्यान-मात्र, विचार अथवा सहानुभूति के पात्र तो हो सकते हैं किंतु आपके प्रेम के नहीं। स्मरण रहे, आप वह हैं जो आप विचारते हैं, किंतु आप वह बन जाते हैं जिसे आप प्रेम करते हैं। ऐसे लोग जो वस्तुओं से नहीं बल्कि किसी एक बौद्धिक विचारणा से प्रेम करते हैं, वे पहले वाले व्यक्तियों से तो बेहतर ही हैं। वे कम से कम अपना बौद्धिक विकास तो करते हैं या अपना जीवन एक धर्म या पंथ के अनुसार व्यतीत करते हैं। मेरा मानना है कि हर धर्म हमें कुछ न कुछ उत्कृष्ट प्रदान करता है।

फिर भी, यहाँ एक चेतावनी है। किसी एक धार्मिक-दर्शन के प्रति निरंतर लगाव, व्यक्ति को दुराग्रही व, कभी कभी, चरमपंथी बना सकता है। एक बार इस राह पर बढ़ गये तो बदलना अत्यंत कठिन है। चूँकि आपने एक ऐसा मत अपनाया है जो आपकी स्वयं की खोज पर आधारित न हो कर, आपके मन की सनक पर या ऊपरी ऊपरी बौद्धिक समझ पर टिका है, तो इस पर सारा प्रेम उड़ेलना आपको एक अल्पज्ञ व शुष्क व्यक्ति बना देगा। शुष्कता में प्रेम नष्ट हो जाता है।

जो व्यक्ति एक दर्शन या ऐसे ही कुछ अन्य से प्रेम करते हैं, उन्होंने उधार का अभिमत अपना रखा है; परिणामस्वरूप, उनका प्रेम, उसकी विभिन्न धारणाएँ और उसकी अभिव्यक्ति, सब एक कृत्रिम व दुराग्रही परिकल्पना मात्र बन के रह जाते हैं। लगभग सभी धार्मिक वृत्तियाँ; प्रदत्त या स्वेच्छिक, सामाजिक अथवा वाणिज्यिक; इस श्रेणी के अंतर्गत आती हैं। इसे अपनाने वाले अपने उद्देश्य या मत को अन्य प्राणियों से ऊँचा मानते हैं। कुछ तो ऐसे उद्देश्यों के लिए जान तक दे या ले सकते हैं।

यदि, कण मात्र भी गुंजाइश के चलते, आप इस श्रेणी में आते हों और अपनी मनोग्रसितता को अपना मनोभाव बता कर उसे न्यायोचित भी बताते हों; तो, कृपया, मेरी आपसे याचना है कि एक बार पुन: विचार करें व कंकर-पत्थर के बीच से मोती अलग करने का प्रयास करें। यदि आप अपना जीवन किसी दर्शन विशेष या धार्मिक सिद्धांतों को समर्पित करना ही चाहते हैं तो कम से कम वे अपने स्वयं के बनाएँ।

उधार का सिद्धांतवाद आपको बंधन में डाल कर, आपकी स्वतंत्रता छीन लेगा। एक मूलभूत उपलब्धि यह होगी की आप अपना प्रेम इस से निकाल कर अगली श्रेणी पर केंद्रित करें, जो यह है –

वे जो दूसरे प्राणियों से प्रेम करते हैं

आप वे हैं जिन्होंने यह सीख लिया है कि सभी मनुष्य, जाति, धर्म, रूप-रंग आदि का भेद किए बिना, आप ही की भांति मानव हैं व उसी ईश्वर का स्वरूप हैं जिस ईश्वर की आप पूजा करते हैं। मैं आपका इस धरती को सुशोभित करने के लिए धन्यवाद करता हूँ। आप इस सृष्टि को सुंदर बनाते हैं। आप चाहे किसी भी धर्म का पालन करें, आपने आध्यात्म का सत्व खोज व समझ लिया है। जब आप हर व्यक्ति के साथ वही व्यवहार करते हैं जो आप स्वयं के साथ करते हों, और हर प्राणी को ईश्वर समान ही देखते हों, और जब हर किसी को आपसे प्रतिउत्तर में सदा प्रेम ही मिले, तो आप संत हो गये। सच्चा प्रेम शर्तरहित होता है। यह गति के क्रिया-प्रतिक्रिया वाले सिद्धांतों द्वारा चालित नहीं होता, चूँकि यह भौतिक विज्ञान का विषय नहीं है।

जब आप किसी झील में पत्थर या पुष्प फेंकते हो तो झील बिना किसी भेदभाव के दोनों को स्वीकार कर लेती है। पत्थर तत्काल डूब जाता है, झील उसे अपने में समा लेती है व कोई शिकायत नहीं करती। किंतु, झील आपका आभार प्रकट करती है पुष्प को ऊपरी तह पर सज़ा कर। जब आप अपने “प्रेम” के प्रतिदान स्वरूप कुछ इच्छा या आशा रखते हैं तो समझ लें कि जो आपके पास है वो प्रेम नहीं है। जब आप पहले कुछ पाने की शर्त पर प्रेम देते हैं – चाहे वह अच्छा व्यवहार, प्रेम, आदर, या कुछ भी हो – तो वह भी प्रेम नहीं है। लेकिन, जब आपके पास देने के लिए केवल और केवल प्रेम ही है, और कुछ है ही नहीं, तब, नि:संदेह, वही प्रेम है।

जब आप बाजार से कुछ भी खरीदते हैं, तो आप हमेशा उसका मूल्य रूपयों में चुकाते हैं। केवल धन ही वह माध्यम है जिससे आप अपनी इच्छित वस्तु खरीद सकते हैं। बिल्कुल ऐसे ही, हर वह वस्तु जो अमूल्य है, उसे पाने का केवल एक मात्र माध्यम – प्रेम ही है। जितना अधिक यह आपके पास होगा, उतने अधिक आपके समक्ष विकल्प होंगे। जितना अधिक आप दे पाएँगे, उतनी अधिक आप खरीददारी कर पाएँगे। जैसे, आपके पास यदि करोड़ों रूपये हों किंतु यदि आप उसमें से एक भी पैसा देने को तैयार नहीं, तो आप कुछ भी नहीं खरीद सकते। आप एक संत या घोर पापी हो सकते हैं, किंतु, यदि आप प्रेम बाँटने के इच्छुक नहीं हैं, तो आप को बदले में भी प्रेम नहीं मिल सकता। जब आप अपने में व्याप्त प्रेम की आख़िरी बूँद तक बाँट देते हो, तब आप अनंत, अथाह, आनंद व प्रेम से परिपूर्ण कर दिए जाते हो।

प्रेम आपके व्यक्तित्व का ही हिस्सा है। यदि आप आनंद का अनुभव करना चाहते हों, बिना किसी कठिन कर्म-कांडीय मार्ग पर चले, तो बस प्रेम बाँटना आरंभ कर दें। जो कुछ भी आपको मिले, हर भावना का प्रतिउत्तर प्रेम से ही दें; आप के साथ कुछ भी हो, बदले में आपके हाव-भाव प्रेम से भरपूर ही हों। आपको कोई भी शब्द बोला जाए, आप उसका प्रतिकार प्रेमपूर्ण शब्दों द्वारा ही करें। इसे कुछ माह तक अविरत अपनाएँ, और अंतर स्वयं देखें।

अपना प्रेम किसी धर्म या वस्तु पर न्यौछावर करने से पूर्व इसे प्राणीमात्र में बाँटें, हर व्यक्ति को दें। वस्तुएँ तो वस्तुएँ हो रहती हैं – निर्जीव, प्राणरहित। ज़रा अपनी कार से कहें कि आज आप बहुत उदास हैं और देखें क्या वह भी आपकी उतनी ही चिंता करती है जितनी आपने उसकी की। अपने ईश्वर, अपने धर्म से बात करें, उन्हें बताएँ कि आप उदास महसूस कर रहे हैं, और देखें कि वो पुस्तक, तस्वीर या मूर्ति से बाहर आते हैं। अब यही किसी मनुष्य के साथ दोहरायें, आपको प्रतिक्रिया तो अवश्य मिलेगी। अपने दुख़ दूसरों को जाकर बताने से पहले, किसी अन्य की व्यथा सुनें व उसकी बेहतरी के लिए सहायता करें। जब आप ऐसा कुछएक बार, कुछ लोगों के लिए करेंगे, तो आपके पास भी आपकी बात सुनने के लिए हमेशा कोई होगा, कोई ऐसा जिसे आपकी चिंता है, जो आपको प्रसन्नचित देखना चाहता है।

मैं आशा करता हूँ कि आप यह जानते हो कि आपका प्रेम वस्तुओं पर लुटाने से कहीं अधिक मूल्यवान है।

आगे बढ़ें! प्रेम करना सीखें ताकि आप जीना सीख पाएँ! अपना प्रेम अभिव्यक्त करें। किसी को विशेष महसूस करवाएँ। दूसरों को उनकी महत्त्त्वता का एहसास करवाएँ। सबको मानव होने का अनुभव करवाएँ। सबको अपने प्रेम का पात्र बनाएँ। हर किसी को अपना बना लें। यदि आप मनुष्य बने रह कर थक गये हों, तो ईश्वर बन जाएँ। दिव्य बन जाएँ। यह सब तभी संभव हो सकता है जब आप बिना किसी अपेक्षा के जीवन जी सकते हों। और, वह तभी संभव है जब आप अंतर्मुख हो जाएँ। अंतर्मुखता प्रेम व आनंद के सभी द्वार खोल देती है। तब स्वाभाविक ही आप वही बाहर देंगे जो आपके स्वयं के अंतस में है। कल्पना करें – अपने शाश्वत स्वरूप की; अनंत प्रेम व आनंद से भरपूर जीवन की।

सस्नेह।
स्वामी