मैं नियमित रूप से विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों से मिलता रहता हूँ। उनमें वे भी होते हैं जो अधिकृत विमान का उपयोग करते हैं या फिर मोटरों के काफिले में चलते हैं और वे भी जो कभी भी हवाई जहाज पर नहीं बैठे या वे भी जो बस किराये के दो रुपये चुकाने में भी समर्थ नहीं हैं। मूलतः उनमें से कुछ रात्रि को ठीक से सो नहीं पाते क्योंकि उनके पास बहुत अधिक है या फिर कुछ दूसरे भी हैं जिनके पास बहुत कम है। इससे मुझे यह समझ आता है कि शांतिपूर्ण निद्रा का उपाय सफलता पर आधारित नहीं है। आप चाहे जो भी करें यदि आप सो नहीं पा रहे तो फिर एक नींद की गोली खाकर सो जाइये और अपने स्वप्नलोक के अंतराल में आनंदित होइये! मैं मात्र परिहास कर रहा हूँ।

वास्तव में ऐसा क्या है जो कुछ लोगों को बहुत ही सफल बनाता है? ईमानदारी? बिलकुल नहीं (किंतु काश ऐसा होता!)। संभवतः भाग्य, संसाधनों तक पहुँच, सु-अवसर, समर्पण, परिश्रम आदि अहम भूमिका निभा सकते हैं। किंतु पुनः यहाँ बहुत से मेहनती लोग हैं जिनके पास वही साधन व अवसर हैं जैसा कि अन्य व्यक्तियों के पास हैं। फिर भी उनके लिये जीवन का कोई विशेष अर्थ नहीं होता – वे केवल जीवन के दिन एक एक कर के गुज़ार रहे हैं।

तो वह एक गुण जो आप सभी सफल व्यक्तियों में पाते हैं, क्या है? अबाध रूप से हर सफल व्यक्ति में है यह गुण। कोई भी छूटा नहीं। इतने सफल लोगों से मिलने के पश्चात कम से कम मैंने यह देखा है कि उनमें से प्रत्येक में निश्चित ही एक समानता है। यह एक ऐसा गुण है जिसे कोई भी प्राप्त कर सकता है और विकसित कर सकता है। इसकी व्याख्या करने से पूर्व मैं एक छोटी सी कथा साझा करना चाहता हूँ जो मैंने हाल ही में पढ़ी है। “डैन एराइली” की प्रशंसनीय कृति “पूर्वानुमेय रूप से तर्क हीन – गुप्त शक्तियां जो हमारे निर्णय को आकार देती हैं” में उन्होंने ज्यांग चू की कहानी का उल्लेख किया है जो चीन का सम्राट बना। प्रस्तुत है –

२१० ई.पू. चाइनीज सेनापति ज्यांग चू अपने सैन्य दल को यांग्जे नदी के पार क्विन (चीन) राजवंश की सेना पर आक्रमण हेतु ले गया। नदी के किनारे रात्रि अवसान के लिये रुके उसके सैन्य दल सुबह दहशत में यह देखकर जागे कि उनका जहाज जल रहा था। वे उतावली में अपने आक्रमणकारियों से लड़ने हेतु भागे। किंतु उन्हें तुरंत पता चला कि ज्यांग चू ने स्वयं उनके जहाज को आग लगाई थी और यही नहीं उसने यह भी आज्ञा दी थी कि खाना पकाने के समय सभी बर्तन तोड़ दिये जाए।

ज्यांग चू ने अपने सैन्य दल को स्पष्ट किया कि बर्तनों और जहाज के बिना उनके पास इसके अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं कि वे जी-जान लगा कर जीतने के लिये लडें, अन्यथा मर जाएं। इससे ज्यांग चू को चीनी सेना के प्रिय सेनापतियों में स्थान तो नहीं मिला किंतु इसने उसकी सेना का ध्यान पूर्ण रूप से केंद्रित कर दिया। अपने बल्लम व धनुष के साथ उन्होंने उग्र रूप से शत्रुओं पर आक्रमण कर दिया और क्विन राज-वंश की प्रमुख सेना का विनाश करते हुए निरंतर नौ युद्धों में विजय प्राप्त की।

हममें से कितनों में इतना साहस है कि अपने लक्ष्य के लिये सब कुछ दाँव पर लगा दें। हममें से कितने हैं जो स्वेच्छा अपने सारे द्वार बंद करने को उद्यत हैं जिससे वे एक-निष्ठ होकर विजय का पीछा कर सकें। यहाँ मैं अपक्रमकता या दृढ़ता के विषय में बात नहीं कर रहा। मेरी दृष्टि में एक विशेषता जो सभी सफल व्यक्तियों में होती है वह है निश्चितता।

हाँ निश्चितता।

सफल व्यक्ति निर्णय लेने से भयभीत नहीं होते हैं। एक बार सोच-विचार कर मन बना लिया फिर वे ठोस कदम उठाने में नहीं हिचकते।

यदि आप इस बात के लिये सज हैं कि कुछ द्वार आप के लिये बंद हो जायें ताकि वह द्वार खुल सकें जो आपके लिये महत्वपूर्ण हैं तो प्रकृति आप के लिये वह द्वार खोल देगी, केवल हार न मानें। जब तक आप उस सीमा तक जाने के इच्छुक नहीं जहाँ से वापसी संभव न हो तब तक अपने प्रयास से बहुत अधिक लाभ की अपेक्षा न करें। जब आप कुछ शुरू करते हैं एकमात्र संकल्प और विकल्प के साथ कि उसे सफल बनाना है तो फिर स्वतः ही सफल होने के असंख्य राह खुल जाते हैं। किंतु यदि आप निरंतर यह चिंता करते हैं कि आप के पास जो है उसे भी खो देेंगे तो आप जो भी प्राप्त कर सकते थे उसे प्रायः कभी प्राप्त नहीं कर पाते। किसी पराजय को टालने के प्रयास में आप स्वयं को विजयी होने की संभावना से भी वंचित रखते हैं।

वैसे निश्चितता का अर्थ लापरवाही नहीं। विचार शून्य निर्णय या बुद्धिहीन क्रिया-कलाप का अर्थ निश्चितता नहीं। इस प्रकार के आचरण के लिये और उपयुक्त शब्द है “मूर्खता”। निश्चितता का तात्पर्य है कि आप अपने उद्देश्य पर सावधानीपूर्वक विचार करें और अंतिम निर्णय लें। इसका अर्थ है कि आप स्वयं को जानें कि आप किस असंभव कार्य को करने का प्रयास कर रहे हैं और इसके प्रति वस्तु निष्ठ रहें। अपनी वास्तविकता और स्वप्नों के बीच बारीक संतुलन को निश्चितता कहते हैं। इसका आरंभ स्वयं के प्रति सच्चा होने से होता है।

जैसा कि सनत्जू ने “युद्ध कला” में वर्णित किया है, “यदि आप शत्रु को जानते हैं और स्वयं को जानते हैं तो आपको सैकड़ों युद्धों के परिणाम के प्रति आशंकित होने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप स्वयं को जानते हैं किंतु शत्रु से अनजान हैं तो प्रत्येक अर्जित विजय के साथ आपको एक पराजय भी मिलेगी। यदि आप न ही स्वयं को जानते हैं और न ही शत्रु को तो आप प्रत्येक संघर्ष में पराजित होंगे।”

अपनी सभी खोज में, चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसारिक, व्यक्तिगत हो या व्यावसायिक, आपको शत्रुओं का सामना करना पड़ेगा। किसी भी प्रकार का संघर्ष या विरोधी शक्तियां, चाहे वह आपका स्वयं का विश्वास या आपकी भावनाएं हों या दूसरों की, ये सब आपके शत्रु हैं। उनसे घृणा नहीं करनी है बल्कि उन्हें समझना है। क्योंकि आपके शत्रु आपको सशक्त बनाते हैं। वे आपको विचार करने पर विवश करते हैं। जब आप स्वयं को जानने का प्रयास करते हैं, इस विषय पर विचार करते हैं कि आपके मार्ग में क्या है, जब आप वर्तमान पल के मिथ्या-आश्रय को छोड़ एक नये पथ पर चलने के लिये सज हो जाते हैं, तो निश्चित रूप से आप शीघ्र ही अपने सपनों को साकार कर पाएंगे।

निर्णायक व्यक्ति अपने सपनों का पीछा नहीं करते हैं। वे अपने संसार को स्वयं आकृति देते हैं। निर्णय करना तब और भी सरल हो जाता है जब आप इस तथ्य को स्वीकार कर लेते हैं कि सारे निर्णय सही नहीं होंगे। हम प्रारंभ से ही यह मानकर चलें कि कभी कभी हम सभी धरती पर गिर के धूल चाटेंगे। इसे स्वीकार करें। हम पुनः उठें, धूल झाड़ें और पुनः आरंभ करें। जैसा कि गाँधी जी की एक उक्ति में कहा गया है “पहले वे आपको अनदेखा करेंगे, फिर वे आप पर हँसेंगे, फिर वे आप से लडेंगे और फिर आप विजयी होंगे।”

चाहे आप का विरोध आंतरिक हो या बाह्य, आपका कभी उपहास होगा या कभी आप निर्बल महसूस करेंगे, किंतु स्वयं को अपने निर्णय का स्मरण करायें और चलते रहें। एक बार में एक कदम, परिश्रम से, शालीनता पूर्वक। अपना मस्तक सत्य में ऊँचा किये हुए, आंखों में विनम्रता लिए, शीघ्र ही आप अपने सपनों को साकार करेंगे। वे सपने आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे – अपने मस्तक आदर, श्रद्धा व आत्मसमर्पण में झुकाये हुए। सफलता इसी प्रकार निर्मित होती है – निश्चितता से।

शांति।
स्वामी