सफलता हर व्यक्ति को प्रिय है। सदियों से यह प्रथा चलती आ रही है कि एक वरिष्ठ पीढ़ी अपनी नयी पीढ़ी को सफलता की स्वयं रचित परिभाषा से अनुबंधित कर देती है। प्रायः मैं देखता हूँ कि व्यक्ति किसी दूसरे द्वारा निर्धारित कसौटी को मानक बना कर अपनी सफलता की ओर बढ़ते हैं। कुछ सफल होते हैं, व कुछ, सफलता से परिपूर्ण। कुछ सफल होते हुए भी उसे पहचान नहीं पाते, अतः कठिन परिश्रम व संघर्ष में ही व्यस्त रहते हैं। ऐसे व्यक्ति सफल नहीं, सफल-मूर्ख होते हैं। कुछ सफलता प्राप्ति से संतुष्ट हो जाते हैं, अन्य मात्र सफलता द्वारा मूर्ख बन जाते हैं।

औसतन, चालीस विद्यार्थियों की एक कक्षा में, दो उच्च्तम श्रेणी पाते हैं, तीन उच्च श्रेणी पाते हैं, दस प्रथम श्रेणी व अन्य बीस केवल परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं। शेष पाँच तय सीमा तक भी नहीं पहुँच पाते, परिणामस्वरूप उन्हें “अनुत्तीर्ण” कर दिया जाता है। जिन्हें अनुत्तीर्ण माना जाता है, क्या वे सफल नहीं हैं? अथवा, जिन पाँच को ऊँची श्रेणी में रखा गया है, वे सफल हैं? वह पाँच जिन्हें अनुत्तीर्ण किया गया है, संभवतः वे किसी अन्य उद्यम में सर्वाधिक सफल हों! उनका यह वर्गीकरण व क्रम-निर्धारण मात्र एक छाप है, एक पट्टा है, जो किसी संस्था द्वारा निर्धारित मानक के अनुरूप है। इस उदाहरण में सफलता व असफलता में अंतर समझ पाना कदाचित सुगम है, किंतु जीवन के अन्य पहलुओं में यह अंतर प्रायः धूमिल हो जाता है।

क्या वैवाहिक संबंध-विच्छेद, विवाह की, अथवा दोनों साथियों की असफलता का द्योतक है? क्या किसी कर्मचारी का निष्कासन उस कर्मचारी, उसके मलिक, अथवा उस कार्य की असफलता है? नौकरी में वरिष्ठतम स्तर तक न पहुँच पाना अथवा एक नौकरी या पदोन्नति का न मिल पाना – इनके विषय में क्या राय बनाई जाए? जिस स्वर्ण पदक का लक्ष्य बनाया वह न मिल पाना, अथवा, अपने इच्छित विद्यालय में एक स्थान न मिल पाने को क्या कहा जाए? इन सब स्थितियों का सूक्ष्म निरीक्षण करें तो आप देखेंगे कि प्रायः हर परिस्थिति में आपको “फेल” घोषित कर दिया जाता है, चूँकि आप उस व्यक्ति द्वारा निर्धारित मापदंड पर खरे नहीं उतरते जो यह सारे निर्णय ले रहा है; वह एक संस्था भी हो सकती है। वस्तुतः, कोई अन्य आपके बारे में क्या राय रखता है – आप इससे अभिन्न होते हैं, विषेशरूप से तब जब आपका स्वयं का व्यक्तित्व सुदृढ़ व आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो। विश्व के महानतम सफल व्यक्तियों के जीवन, स्पष्ट रूप से, यही तथ्य प्रदर्शित करते हैं।

लगभग सभी धर्मोपदेशकों, दिव्य प्रचारकों, व भौतिक जीवन में सफलता के सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ व्यक्तियों में से कुछ को समाज व उनकी संबंधित संस्थाओं ने, आरंभ में, असफल घोषित कर दिया था। किंतु यह सब उन्हें अपने मार्ग का, अपनी शर्तों पर, व अपने स्वयं के द्वारा तय मानकों के अनुरूप, अनुसरण करने से रोक नहीं पाया। जब उनकी लगन व परिश्रम रंग लाये, तब उनके अनेकों अनुयायी बन गये, अनेकों उनके पथ के अनुगामी बन गये। एक चरवाहे का यह दृढ़ संकल्प होता है कि वह सभी पशुओं को एकत्र करके हाँक सकता है, इसी कारण पशु उसका अनुसरण करते हैं व एक दूसरे के पीछे चलने लग जाते हैं। यदि वह चरवाहा अपने संकल्प पर दृढ़ न रह पाए व अपनी सफलता का निर्धारण स्वयं न करे तो संभवतः वह सवयं भी उन भेड़ों के झुंड में ही कहीं खो जाएगा। उसकी शेर जैसी दहाड़ भी भेड़ों के मिमियाने की ध्वनि में खो जाएगी। और कुकुर! उनका उपयोग तो भेड़ों को एकत्र करने भर के लिए होता है, उनके दिशा-दर्शन के लिए नहीं।

चरवाहे व भेड़ के मध्य संवाद-विहीनता का एक विस्तृत रिक्त क्षेत्र होता है; समभाषी न होना उनके बीच की सबसे बड़ी रुकावट होती है। किंतु चरवाहे की नेतृत्व-क्षमता जो उसे अपनी संकल्प शक्ति, अनुभव एवं सुदृढ़ व्यक्तित्व से प्राप्त हुई है, वह उसे सुगमतापूर्वक इस रुकावट से पार ले जाती है। हाथ में एक दंड (डंडा); मुँह से कुछ आवाजें निकालने व फुसफुसाने की क्षमता, और कुकुर का साथ – ये सब उस चरवाहे को नियंत्रण करने की क्षमता व परम-सत्ता प्रदान करते हैं।

किसी उद्यम में सफल होने की तुलना दीवार में छेद करने की प्रक्रिया से की जा सकती है। छेद करते समय उस व्यक्ति का पूरा ध्यान उस छेद पर केन्द्रित होता है। उस व्यक्ति का संपूर्ण बल, पूर्ण सूक्ष्मता रखते हुए, उस छेदक-यंत्र द्वारा दीवार के बिंदु पर निर्देशित होता है। पूर्ण एकाग्रता, सूक्ष्मता पूर्वक किया कार्य, व उतना ही महत्वपूर्ण – एक उपयुक्त औजार – इन सबके योग से, वांछित परिणाम शीघ्रता से प्राप्त हो जाता है। आप त्रुटिहीन सूक्ष्मता, संपूर्ण बल, व उचित प्रवृति द्वारा कार्य तो करें किंतु यदि छेद करने के लिए एक चम्मच को औजार के रूप में उपयोग करने लगें, तो दीवार पर मात्र एक खुरचन भर कर पाएँगे।

एक एकाग्र मन ही वह श्रेष्ठ औजार है, बिल्कुल उस बहू-प्रयोजक़ छेदक यंत्र की भाँति जिसके साथ कई अन्य औजार जुड़े रहते हैं। एक स्थिर मन, योग्य व सक्षम चरवाहे के समान है। इस उदाहरण को लें तो इंद्रियाँ उस प्रहरी कुकुर का स्थान लेंगी। यदि उत्तम आशय, स्पष्ट लक्ष्य, नैतिकता को मूल मंत्र बना कर, करुणामयी व्यवहार, संतृप्त आत्मा, शांत चित्त्त, निर्मल अंतःकरण, निरंतर खोज, अथक प्रयास एवं दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ा जाए तो आप अतिशीघ्र सफलता प्राप्त कर लेंगे। ये सब शायद कुछ अधिक लग रहा हो किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है।

एक अंतर्मुखी मन, जो नैतिकता के प्रकाश से प्रकाशित हो, अन्य सभी गुणों को स्वतः आकर्षित कर लेता है, चूँकि आपका मन ही उन सभी भावों का उदगम स्थल है। यदि आप अपने ईश्वर में पूर्ण आस्था, व उत्साह सहित स्वयं में समर्पण भाव जगा पाते हैं, तो समझें आपका अधिकांश कार्य संपन्न हो गया। सफलता आपके चरण चूमने को उत्सुक है, व आपकी दासी बन कर सदा आपके पीछे आने को आतुर।

एक सामान्य नादानी यह होती है कि एक लक्ष्य पूरा होते ही आप नये लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं। ऐसा करना सामान्य व सुसंगत प्रतीत होता है, किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इसे उचित भी मान लिया जाए। यदि आप अपने लक्ष्य आगे की ओर धकेलते रहेंगे तब आप आने वाले संपूर्ण जीवन में सदा कार्यरत ही रहेंगे। करने की चाहना व करने की विवशता – इन दोनों के मध्य संघर्ष की स्थिति बनी ही रहेगी। नित नये भौतिक लक्ष्य तय करके आपका मन आपको मूर्ख बना रहा है व व्यस्तता में डुबो रहा है।

अपने भौतिक लक्ष्यों को समझ कर निर्धारित करें, व जीवन का कुछ भाग उनकी प्राप्ति में लगाएँ। तय लक्ष्य की प्राप्ति के उपरांत, अपना समय उन कार्यों में लगाने का विचार करें जिन्हें करने के लिए आप सदा से ही इच्छुक रहे हैं। अपना जीवन मानव कल्याण हेतु समर्पित करें, अथवा स्वयं के आध्यात्मिक उत्थान में लग जाएँ – दोनों में परस्पर भिन्नता नहीं है, वरन ये एक दूजे के पूरक हैं।

हालाँकि यह एक व्यक्तिगत राय का विषय है, तथापि अपना संपूर्ण जीवन केवल भौतिक क्रिया-कलापों में व्यर्थ गवाँ देना तर्क-संगत नहीं है। चाहे जितना भी सफल क्यों न हो, तब भी ऐसा जीवन अपूर्ण व तनावयुक्त ही होगा। संतुलन बना कर जीना सीखें। यदि आप अपनी इच्छाओं का त्याग कर पाएँ तो आपकी आवश्यकताएँ स्वतः कम होने लगेंगी। ऐसा होने पर भौतिक जीवन के संघर्ष भी लुप्त होने लगेंगे। मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों को जानता हूँ तो कार्य निवृत हो कर, एक अर्थपूर्ण, संतुष्ट व निश्चिंत जीवन का आनंद ले सकते हैं। किंतु उन्होंने संघर्षपूर्ण जीवन की राह अपनाई। ऐसा होने का एक कारण है उनका आवेश से भरा अस्थिर मन, जो उन्हें आरामदायक जीवन जीने ही नहीं देता, व एक अन्य कारण यह कि उन्हें इसके विकल्प का ज्ञान ही नहीं है। अन्य कुछ ऐसे हैं जो जानना ही नहीं चाहते – “सफल-मूर्ख”!

आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर ईमानदारी पूर्वक पग बढ़ाने पर, आपमें आत्म-परिवर्तन की ज्वाला स्वतः धधकने लगेगी। सब कुछ सुस्पष्ट हो जाएगा। व्यर्थ चेष्टाओं की निरर्थकता उस अग्नि में स्वयं ही भस्मिभूत हो जाएगी। आप सफलता के उस रूप का दर्शन करेंगे तो आपने पहले कभी न किया हो। आत्म-आनंद के सागर में इच्छाओं की एक भी लहर नहीं रह पाएगी। आपके चेतना रूपी प्याले में एक भी छिद्र नहीं रहेगा, और न ही आपके अंतःकरण में कोई दरार। केवल आप होंगे – अपने स्वयं के संसार में – अपनी आवश्यकता की हर सामग्री को स्वयं में समेटे हुए। सफलता की प्रस्तुति, अपने भव्य स्वरूप में “सफलता”!

जाएँ व सफल हों! इस बार आंतरिक सफलता को लक्ष्य बनाएँ। एक बार आप अंतःकरण की यात्रा का आनंद लेना जान गये तो बाह्य यात्रा निर्जीव, निरर्थक व रसहीन प्रतीत होने लगेगी। पहले यह समझें कि आपकी चाहत क्या है, उसकी प्राप्ति के उपरांत संतुष्ट होना सीखें। और अधिक की चाहत में न उलझें, वह एक महान भूल होगी।

शांति।
स्वामी