मैं 11 वर्ष का था और अपने पिताजी के साथ रेल में यात्रा कर रहा था। हमें एक दूसरे के पास बैठने की जगह नहीं मिल पाई, परंतु हम खुश थे कि कम से कम हमें रिज़र्वेशन तो मिल गई। मैं खिड़की के पास बैठ गया और दूसरी ओर की सीट पर चालीस के करीब पहुँचती उम्र के एक सज्जन बैठे थे। उन्होंने लाल टी-शर्ट, जीन्स व एक स्पोर्टी घड़ी पहनी हुई थी। हमें एक लंबा समय साथ बिताना था (24 घंटे से अधिक)। तो, उन्होंने मेरे साथ वार्तालाप आरंभ किया। मैंने कहा कि उन्होंने वार्तालाप आरंभ किया, चूंकि मैं एक अपने में सिमटा व्यक्तित्व था जो बहुत कम ही बात आरंभ किया करता।

“क्या तुम कोई खेल खेलते हो?” उन्होंने मुझसे पूछा।
“कभी कभी क्रिकेट” मैंने उत्तर दिया।
“कोई और खेल?”
“शतरंज”
“क्या यह एक खेल है?”
“यह इनडोर खेल है।”
“क्या आप कुछ खेलते हैं?” मैंने पूछा।
“हाँ। वास्तव में मैं अपनी आजीविका के लिए खेलता हूँ।” उन्होंने अपने मुड़े हुए होंठों में मुस्कान भर कर कहा।
“ओह, वाकई?” मैं हैरान था क्योंकि देखने में, शरीर से, वे मुझे खिलाड़ी जैसे नहीं लग रहे थे।
“आप क्या खेलते हैं?”
“मैं दिलों के साथ खेलता हूँ।” उन्होंने अपना सिर पीछे की ओर झटका और ज़ोर से ठहाका लगाया। मुझे उनका चुटकला समझ नहीं आया। ( मैं आज के 11 वर्ष के बच्चों की तरह चुस्त नहीं था।)
“मैं एक हृदयरोग विशेषज्ञ हूँ।” वे बोले।

हम दोनों मिल कर हँसे, चूंकि अब मुझे उनकी बात समझ आ चुकी थी। कुछ घंटों के बाद, वर्षा आरंभ हो गई। हम दोनों खिड़की से कोहनी निकाले, बाहर की ओर निहार रहे थे। मैंने जल्दी से अपनी बाजू अंदर कर ली।

“क्या हुआ?” उन्होंने मुझसे पूछा।
“बाहर बारिश हो रही है।”
“तो क्या हुआ? सबल बनो।” और, उन्होंने अपना हाथ बाहर कर दिया और उसे बारिश की बड़ी बड़ी बूंदों से भीगने दिया। “आप मजबूत कैसे बनोगे, यदि आप इस तरह पीछे हट जाओगे?”
मैंने अपनी कोहनी दुबारा बाहर कर दी।
“हाँ, यही है सही तरीका”, उन्होंने मस्ती में भर कर कहा। “मजबूत बनो! बारिश तुम्हें पिघला नहीं देगी?”

सबल बनो। (हाँ, ठीक है!)

इस तरह का परामर्श हममें से हर किसी को कई बार मिल चुका है। यदि कोई बच्चा गिर जाये, इससे पहले कि वह रो पाये, हम बच्चे से कहते हैं कि कुछ नहीं हुआ, आप तो बहादुर बच्चे हो। हम उन्हें रोने नहीं देना चाहते। हम उनकी पीड़ा को कुछ इस तरह फूँक मार कर उड़ा देते हैं कि वो पीड़ा को अपने अंतस्थ में ही समाहित कर लें, बजाय उसे अभिव्यक्त करने के। बड़े होने के दौर में, बड़े हो जाने के पश्चात, बूढ़े हो जाने पर, कोई न कोई आपको मजबूत बने रहने कि सलाह देता रहेगा। वे आपको बताएँगे कि जो घटना आपको पूरी तरह से मार नहीं पाती, वह आपको और अधिक शक्तिशाली बना देती है। इस बात में कोई शक नहीं कि उनकी इस राय के पीछे उनकी भावना हमारे भले की होती है। किन्तु, यह हमेशा सही राय नहीं होती।

कभी कभी मजबूत बनना सही है, किन्तु, अन्यान्य प्रसंगों के दौरान, हमें स्वयं को अभिव्यक्त करने का मार्ग अवश्य ढूंढ़ना चाहिए। मजबूत बनने का यह अर्थ नहीं कि आप सब कुछ सहते चले जाएँ। मजबूती और सहनशक्ति एक समान नहीं होते। मजबूती के माने है कि आप कितना आगे तक जा सकते हैं, जबकि सहनशक्ति यह होती है कि आप परिस्थितियों के साथ कितना निभा पाते हैं। मजबूत होने का अर्थ है कि किसी परिस्थिति का सामना हिम्मत के साथ करना, किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि ऐसा आप चुपचाप करें। मुझसे पूछा जाये तो मैं यह कहूँगा कि यह लचीलापन नहीं है, यह अज्ञानता है। रोना व अपने को अभिव्यक्त करना पूर्ण रूप से सामान्य है। जी हाँ, यदि आप एक युवक अथवा पुरुष हैं, तब भी; अपने आंसुओं को बहने देना बिलकुल ठीक है। किसी भी स्थिति में, भावों को दमन करने से अधिक, उन्हें अभिव्यक्त करने को बढ़ावा देना चाहिए। ताकतवर बनने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है अपने सहज स्वभाव में रहना, मनुष्य बन कर रहना । लोग चाहते हैं कि आप सदा एक अमिट, स्थायी मुस्कान अपने चेहरे पर चिपकाए रखें। हमारा समाज हम पर दुनिया के साथ, उसके हिसाब से चलने का बहुत दबाव बनाता है, और, चाहता है कि हम अपनी असली भावनाओं को हजार तहों के नीचे दबा कर रखें। रोता हुआ बच्चा किसी को पसंद नहीं।

दूसरों को खुश करने के लिए हम स्वयं का प्रतिकार आरंभ कर देते हैं, हम इस प्रकार दर्शाते हैं कि मानो हमारी भावनाओं, हमारी आवश्यकताओं का हमारे लिए कोई महत्व नहीं। हम तो मजबूत हैं। हम सब कुछ संभाल सकते हैं। यह एक बहुत बड़ी गलती है।

मजबूत बने रहने का एक भयानक नकारात्मक पहलू है। मजबूत लोगों को लगातार सब कुछ झेलते रहना पड़ता है। मैं आपको बताता हूँ कि आप कभी भी रैस्टौरेंट जा कर भी खाने का मजा नहीं ले पाएंगे, क्योंकि आप तो बाकी सब के लिए ऑर्डर देने में व्यस्त रहेंगे। आप हर छोटी चीज के लिए स्वयं को ही चिंता में डाले रखेंगे, क्योंकि वे जो आपके साथ आए हैं, उन सबने सबकुछ आप पर छोड़ रखा है, चूंकि आप मजबूत हैं।

यदि आप इसी प्रकार मजबूत बनते रहेंगे तो आप उदास होते चले जाएँगे। एक अकेलापन आप में भर जाएगा। एक दिन आप बहुत अकेलापन महसूस करेंगे, क्योंकि आपके आसपास कोई आपका दुख बांटने वाला नहीं होगा। क्यों? क्योंकि, आप तो मजबूत हैं। वे आपसे पूछेंगे कि आप को क्या हो गया है। मेरे विचार में यह परम महत्वपूर्ण है कि आप अपने को अभिव्यक्त करें, व इससे पहले कि आपकी सहनशक्ति की सीमा समाप्त हो जाये, आप अपने हाथ खड़े कर दें। स्वयं को इतना अधिक न खींचें कि एक दिन आप टूट जाएँ।

और, अतिशय सबल होने का प्रदर्शन यही करता है। यह आप को तोड़ देता है। बाह्य रूप से देखने पर सब कुछ ठीक व वास्तविक आभासित होता है। आपके आस पास वालों को सब कुछ बढ़िया लग रहा होता है। किन्तु, अन्तःकरण में, आप सोच रहे हैं कि क्या आपको वास्तविक खुशी का कण मात्र भी कभी प्राप्त हो पाएगा। आप स्वयं से पूछें कि क्या वास्तव में आप इतनी उदासी से भरे जीवन में से कुछ खुशी के पल कभी चुन भी पाएंगे! स्वयं के साथ ऐसा न करें। निर्बाध रूप से स्वीकार करें और कहें, “मैं थक गया हूँ… मुझे कुछ आराम चाहिए, और दूसरों द्वारा थोड़ी देखभाल भी।”

यह जिंदगी बहुत छोटी है, और यदि आप अपनी जिंदगी जीना आरंभ नहीं करते, तो आप पाएंगे कि आप किसी और की जिंदगी जी रहे हैं। ऐसे जीवन का हर एक पल गहन उदासी में डूबा व दु:ख को स्वयं आमंत्रित करने जैसा होता है। हर हाल में, हर समय, मजबूत बने रहना आपको हर दिन थोड़ा और तोड़ता चलता है, यह धीरे धीरे, आपको इतना रौंद डालता है कि अंत में आप स्वयं धूल बन जाते हैं।

मजबूत बने रहने की चिंता न करें। बल्कि, मनुष्य रहें, अपने वास्तविक, सहज रूप में रहें। आप जीवन को बेहतर समझ पाएंगे। किसी भी बात का ज्ञान हो जाने पर, भय व संघर्ष लुप्त हो जाते हैं। सच्ची मजबूती सदा हाँ करने से अथवा हर परिस्थिति में हमेशा टिके रहने से ही नहीं आती। यह आती है अंतःकरण के दृढ़ विश्वास व शांति से। यदि आप अंतस्थ में शांत हैं तो बाहर आप स्वतः ही मजबूत होंगे। ऐसी मजबूती आपको नीचे नहीं जाने देगी। और, मैं आपको बता दूँ कि अंतर की शांति, स्वयं की ओर से विमुख हो कर, अथवा अपनी पसंद का ध्यान न रख कर, कभी नहीं आ सकती। आप अपनी आत्मा की आवाज को दबा सकते हैं, आप अपने हृदय के रागों को अनसुना कर सकते हैं, किन्तु कुछ समय तक ही। एक दिन यह ज्वालामुखी की भांति फूटने वाला है, आपको जीवन की राहों पर प्रक्षेपित कर आपको अपनी स्वयं की खुशी, व आपके अपने जीवन के अर्थ एवं उद्देश्य के बारे में सोचने को मजबूर करने के लिए।

एक धार्मिक व्यक्ति ने एक स्त्री, जो एक दुर्घटना में घायल हो गई थी, से कहा कि यदि तुम्हारी आस्था सच्ची होती तो यह हादसा कभी न हुआ होता। वह यह जानकार बुरी तरह टूट गई कि उसकी श्रद्धा पक्की नहीं। उसने अपने गुरु से पूछा कि वह स्वयं को किस प्रकार पवित्र करे।

“तुम्हें उस व्यक्ति को अपने डंडे से मारना चाहिए था”, गुरु ने कहा, “और कहना था कि यदि तुम्हारे में श्रद्धा है तो तुम्हें डंडे से दर्द नहीं होगा।”

मजबूत होने का यह तात्पर्य कदापि नहीं कि आपको पीड़ा का अनुभव ही नहीं होगा। और, यदि आपको दर्द होता है, तो उसे छुपाते क्यों हो? कम से कम हर समय तो नहीं।

अगली बार कोई आपसे मजबूत बने रहने को कहे, तो सलाह देने के लिए उनको धन्यवाद दें, किन्तु केवल अपने भीतर की आवाज पर ही चलें। मजबूत न बनें, यदि वास्तविकता में कुछ आपको कमजोर कर रहा हो। सब कुछ सहजता से लें। क्या घास के कोमल तिनके उन विशालकाय वृक्षों से अधिक समय तक नहीं बने रहते, जो भयंकर तूफान के समय टूट कर गिर जाते हैं?

यदि आपको भीगना अच्छा नहीं लगता तो बाजू अंदर खींच लेने में कोई बुराई नहीं। जीवन कोई सैन्य शिविर नहीं जहां आप केवल कठिन व निष्ठुर प्रशिक्षण के माध्यम से ही सीख सकते हैं। हो सकता है यह रंगों व कला का एक सुंदर नमूना हो, कुछ सौम्य रंगों से सजा, जिसे उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए, उसे सराहने व उसका आनंद लेने के लिए, बस एक सौंदर्यपूर्ण दृष्टि चाहिए। आइये इसे कोमलता से, कुलीनता से सजाएँ, न कि मजबूती से।

शांति।
स्वामी