जीवन विचित्र है। जितना अधिक हम सोचते हैं कि हमने इसे समझ लिया है, यह उतना ही रहस्यमय हो जाता है। एक कुशल जादूगर के समान, यह हमें अपनी अकल्पनीय योजनाओं को सफल रूप देने की क्षमता पर अचंभित कर देता है। परंतु जीवन की सभी आश्चर्यजनक वस्तुएं प्रिय नहीं होतीं। कुछ तो नितांत क्रूर हो सकती हैं। जब जीवन अप्रत्याशित प्रहार करता है तब आपकी आंतरिक शक्ति की परीक्षा होती है। उस समय प्रकृति के दिव्य न्यायालय में श्रद्धा व आत्मसमर्पण की पुकार होती है यह देखने के लिये कि क्या वे आप का साथ निभाएंगे?

क्या श्रद्धा का अर्थ यह है कि हम जीवन को अपने वश में कर सकते हैं? क्या हम जीवन के नियमों को निर्देशित कर सकते हैं? हर मनुष्य यह चाहता है, परंतु यह सब श्रद्धा या आत्मसमर्पण द्वारा संभव नहीं है। फिर ऐसे ईश्वर के प्रति श्रद्धा या आत्मसमर्पण क्यों करें जो हमारी समस्याओं का निदान नहीं कर सकता? यहाँ मैं महापुराण रामायण से एक सुंदर कहानी साझा करता हूँ।

राम और लक्ष्मण, सीता की खोज में घने वन में भटक रहे थे। वे एक प्रशांत एवं लुभावने तालाब के पास पहुँचे, जहाँ पर सुगंधित फूलों की अनेक झाड़ियाँ थीं। लक्ष्मण ने सुझाव दिया कि उन्हें तालाब में स्नान करके थोड़ी देर विश्राम करना चाहिये। आकर्षक स्वरूप वाले राम ने अपने सुगठित कंधों से अपना धनुष उतारा और उसे नर्म धरती पर टिका दिया। तूणीर को अपने धनुष पर लटकाते हुए, उन्होंने अपनी थकान को शांत करने के लिए तालाब में प्रवेश किया। लक्ष्मण निकट के वृक्ष से स्वादिष्ट बेर ले आये।

कुछ समय पश्चात उन्होंने अपने शरीर को सुखाया और जाने के लिए सज हो गए। जैसे ही राम ने अपना धनुष उठाया तब उन्होंने एक मेंढक की बहुत धीमी सी आवाज सुनी। उन्होंने नीचे देखा कि जिस स्थान पर उन्होंने अपना धनुष टिकाया था वहाँ एक छोटा मेंढक आहत हो गया है। करुणा के अभिभूत उन्होंने तुरंत अपने कोमल हाथों में उसे उठा लिया।

“हे नन्हें प्राणी तुम चिल्लाए क्यों नहीं?” राम ने कहा, “जब मेरे धनुष ने तुम्हें चोट पहुँचायी तो तुमने मदद के लिये क्यों नहीं पुकारा?”

वह मेंढक दर्द में हँसा और बोला “आप मेरे मुक्तिदाता हैं। सम्पूर्ण विश्व जब पीड़ित होता है तब आपको पुकारता है परंतु जब आप किसी को कष्ट पहुँचाने का निर्णय लें तब किसे पुकारा जाए?”

“मुझे बहुत दुख है” राम एक साधारण मनुष्य की भांति बोले। “तुम्हें कष्ट देने का मेरा कोई उद्देश्य नहीं था।”
“परंतु मै बहुत प्रसन्न हूँ, मेरे ईश्वर!” मेंढक ने कहा।

राम और लक्ष्मण दोनों ने उस नन्हें प्राणी की ओर बड़ी उत्सुकता से देखा। अंतत: इसमें प्रसन्न होने की क्या बात थी?

“राम, आपके हाथों मरने से बेहतर एक ही बात हो सकती है”, मेंढक बोला, “कि आपके हाथों में मेरी मृत्यु हो। मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि मैं आपके हाथों में अपना अंतिम श्वास ले रहा हूँ।”

जब मैंने इस कहानी को पहली बार सुना तब मैं इससे बहुत प्रभावित हुआ। मैंने सोचा कि इस कहानी में श्रद्धा का सार कितने सुंदर विधि से गर्भित है। यही श्रद्धा का सार है। जीवन के कुछ पहलुओं पर मेरा नियंत्रण नहीं है और मैं प्रकृति या ईश्वर को अपनी ओर से उन तत्वों का संचालन करने की स्वीकृति देता हूँ। श्रद्धा या आत्मसमर्पण का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हमारा कुछ अहित नहीं होगा या फिर सब कुछ वैसा ही होगा जैसा हमने विचार किया है। इसका अर्थ यह है कि प्रकृति की जटिल कार्य प्रणाली में बहुत से पहलू ऐसे हैं जो हम नहीं समझते और हम यह स्वीकार करते हैं।

मेंढक के समान संभवतः मैं इस बात का पूर्वानुमान नहीं लगा सकता न उसे रोक सकता हूँ कि एक शक्तिशाली धनुष मेरी पीठ पर आकर मेरी हड्डियाँ तोड़ देगा, परंतु यह मेरी आत्मा, मेरे विश्वास और मेरे आत्मसमर्पण को तोड़ नहीं सकता। इच्छा-रहित ईश्वर को निश्चित रूप से किसी के विश्वास या धन की आवश्यकता नहीं है। आत्मसमर्पण किसी भी ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए नहीं है। यह मात्र स्वयं को सुदृढ़ और शुद्ध करने हेतु है। यह प्रेम एवं नम्रतापूर्वक जीवन जीने के समान है। हम जिसका आदर करते हैं उसके प्रति प्रेम का अनुभव करना ही संक्षेप में आत्मसमर्पण है।

एक व्यक्ति एक पहाड़ी क्षेत्र की टेढ़ी मेढ़ी सड़क पर अपनी गाडी चला रहा था। एक तीव्र मोड़ पर उसकी कार पलट गयी। जब उसकी कार घाटी में नीचे गिर रही थी तब वह किसी प्रकार उससे बाहर निकल आया। गिरते समय चमत्कारिक ढंग से उसने एक पेड़ की टहनी को पकड़ लिया। वह पेड़ बहुत पुराना, पतला और दुर्बल था। हर बीते पल के साथ, ऐसा लगता था जैसे उसकी जड़े उखड़ रही हो।

उस व्यक्ति ने पूरी शक्ती से ईश्वर को पुकारा। परंतु कोई उत्तर नहीं आया और वह पेड़ बस टूटने ही वाला था। हार न मानते हुए उसने पुनः ईश्वर को पुकारा। कुछ क्षणों के बाद आकाश से एक वाणी गर्जी।

“उस टहनी को छोड़ दो” उस दिव्य वाणी ने कहा,“मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।”
उस व्यक्ति ने नीचे गहरे और काले चट्टानी घाटी को देखा। उसे बचने का कोई आसार नहीं दिखाई दिया। उसने आकाश की ओर देखा और जोर से चिल्लाया “क्या तुम्हें विश्वास है?”
“हाँ, छोड़ दो” उस आवाज ने कहा। “मैं ईश्वर हूँ।”
उस व्यक्ति ने एक पल सोचा और कहा “क्या वहाँ ऊपर कोई और भी है?”

कहीं न कहीं हममें से अधिकतर व्यक्तियों ने आत्मसमर्पण को एक परिहास बना दिया है। हमारी एक धारणा है कि हमें किस प्रकार बचाया जाए। जब हमारा जीवन हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होता तब हमें आपत्ति होती है, हम विरोध करते हैं और विद्रोह करते हैं। जब हमारी सहायता हमारी अपेक्षा के अनुरूप नहीं होती हैं तब हम प्रश्न करते हैं। हम आश्चर्य करते हैं कि हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है, जब कि हमने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसके कारण यह घटना हो। हो सकता है ऐसा हो, या फिर न भी हो। हो सकता है कि हम अपने आध्यात्मिक अतिचार या अतिक्रमण को बड़े सुविधाजनक ढंग से उपेक्षित कर रहे हों। जबकि प्रकृति कभी, किसी की उपेक्षा नहीं करती। सेब के पेड़ पर आम नहीं लगते।

ऐसी श्रद्धा का क्या काम जो संकट के समय डगमगा जाए? जब स्थिति अनुकूल हो तब कोई भी आत्मसमर्पण कर सकता है या विश्वास रख सकता है। कठिन परिस्थिति में ही हमें वास्तव में पता लगता है कि हमारा आत्मसमर्पण कितना दृढ़ है। आत्मसमर्पण कोई व्यापार योग्य वस्तु नहीं है। यह किसी वस्तु के बदले नहीं मिलता। यह कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है, ईश्वर के प्रति हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति की एक विधि है।

हमारे नियंत्रण से परे कष्टों का प्रतिविष है आत्मसमर्पण।

यदि आप जीवन की सुंदर मोतियों को खोजना चाहते हैं तब आप श्रद्धा के लंगर को दृढ़ता से पकड़ कर रखें। क्योंकि, कभी न कभी जीवन आपको विपत्तियों के विचलित गहरे समुद्र में गोता लगाने ले जाएगा। जैसा कि कहा गया है, “जीवन से कोई भी अछूता नहीं रह सकता है। जीवन सभी को कठोर पाठ पढ़ाता है।”

शांति।
स्वामी