आज मैं एक कहानी से यह लेख आरंभ करता हूँ। यह एक प्रबुद्ध गुरु की पौराणिक कथा है। आपने यह कहानी पहले भी कईं बार सुनी होगी। फिर भी, जो अपने जीवन पर पुनर्विचार करने को तत्पर हैं, उनके लिए इस कहानी में एक प्रेरणादायक व मर्मस्पर्शी संदेश छुपा है।

यह घटना तब की है जब गुरुनानक देव मात्र अठारह वर्ष के होंगे। उनके पिता मेहता कालू एक व्यापारी थे। और वे नानक को सांसारिक तौर-तरीकों से लुभाने का व्यर्थ प्रयास करते रहते थे। गुरुनानक अन्य व्यक्तियों से भिन्न थे। बल्कि वे एक अपूर्व ईश्वरीय आत्मा थे जो इस पृथ्वी की शोभा बढ़ाने आये थे। और जिनकी एक मात्र रुचि मानवता के कल्याण में थी। फिर भी उनके पिता को यह आशा थी कि एक दिन उनका पुत्र अपने आध्यात्मिक उद्देश्य को त्याग कर भौतिक सुखों में तल्लीन हो जायेगा। जैसा कि अन्य व्यक्ति किया करते हैं।

इसी उद्देश्य से बीस रुपये देते हुए उन्होंने गुरुनानक से कहा कि वे दूसरे शहर जाएं और कोई लाभदायक सौदा करके लाएं।

“यदि लौटने पर तुमने लाभ की सूचना दी”, मेहता कालू ने कहा “तो मैं तुम्हें अगली बार और अधिक धन दूँगा।”

नानक मुस्कुराए क्योंकि बाल्यावस्था से ही कोई भी वस्तु उन्हें बाँध नहीं सकी थी और यहाँ उनके पिता फिर भी प्रयास कर रहे थे। गुरुनानक लगाव व निर्लिप्तता से परे थे। धन के होने या न होने में उन्हें कोई अंतर न था। उन्होंने देखा कि उन बीस रुपयों से उन्हें नेक कर्म अर्जित करने का अवसर मिला है। अपने पिता की आज्ञा का पालन करके लाभ कमाने का अवसर।

वे चुपचाप अपने मित्र एवं सहयोगी मरदाना के साथ निकल लिये। ठीक उसी प्रकार जैसे आनंद ने बुद्ध की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और एक छाया के समान अपने गुरु के साथ रहे।

“हमें आज सच्चा सौदा करना चाहिए” मरदाना ने गुरुनानक से कहा, “हम लोग कुछ लाभ पैदा करते हैं जिससे आपके पिता को प्रसन्न कर सकें।”

“हाँ मरदाना” नानक ने रहस्यवादी रूप से कहा “आज हम सबसे लाभदायक सौदा करेंगे।”

नानक के दयालुपूर्ण नेत्रों ने चारों ओर देखा। उन्हें कईं दिनों से भूखे संन्यासियों का एक समूह दिखाई दिया। २० रुपये देते हुए उन्होंने मरदाना को निर्देश दिया कि संन्यासियों के भरपेट भोजन की व्यवस्था करे। पहले तो मरदाना ने गुरुनानक से तर्क-वितर्क किया कि यह धन का उत्तम प्रयोग न होगा। किंतु शीघ्र ही वे समझ गये कि उनके मित्र को पूर्ण रूप से ज्ञात है कि वे क्या करने जा रहे हैं। भोजन की व्यवस्था की गयी तथा शीघ्र ही दूसरे दरिद्र एवं भूखे व्यक्ति भोजन करने आ गये।

गुरुनानक ने अपने हाथों से उन्हें भोजन परोसा और प्रत्येक ने जीवनकाल का सबसे रमणीय भोजन किया।

“हमने एक पैसा भी नहीं बनाया” लौटते समय रास्ते में मरदाना ने कहा “तुम्हारे पिता अत्यंत क्रोधित होंगे। हमने उनके सारे पैसे खर्च कर दिये।”

“मरदाना, हमने उनके पैसे खर्च नहीं किये”, शांति में तल्लीन नानक ने कहा “अपितु हम ने तो उस का निवेश किया है। यह सबसे लाभदायक लेन-देन था। भूखों को भोजन कराने से सच्चा सौदा क्या हो सकता है। हमारे सौदे में किसी का घाटा नहीं हुआ। हर कोई सफल हुआ। मैं सदैव दूसरे सौदों की अपेक्षा इसे ही चुनूँगा।”

उन्होंने इसे “सच्चा सौदा” कहा।

जब आप निस्वार्थ भाव से कार्य करते हैं तो प्रकृति आपके शब्दों को असाधारण प्रबलता प्रदान करती है। गुरुनानक के शब्द ऐसे ही निस्वार्थ भाव व विशुद्ध विचार से गढ़े थे कि आज भी पाँच सौ सालों के पश्चात, पूरे संसार में सारे सिख गुरुद्वारों में प्रतिदिन करोड़ों लोगों को भोजन कराया जाता है। चाहे वे लोग किसी भी क्षेत्र या किसी भी धर्म के हों। निःशुल्क भोजन।

निस्वार्थ भाव का यह सबसे बड़ा पुरस्कार है – आपके शब्द नष्ट नहीं होते। एक बीज के समान वे पीढ़ी दर पीढ़ी फल प्रदान करने वाले विशाल वृक्ष में परिवर्तित हो जाते हैं। जैसा कि मैंने पहले भी कईं अवसरों पर कहा है – ईश्वर या प्रकृति (या फिर आप जो भी नाम देना चाहें) स्वाभाविक रूप से उन्हीं की ओर झुकते हैं जो रचना को पनपने और उसकी प्रगति में सहायक होते हैं। जब आप दूसरे की सहायता करते हैं तो आप प्रकृति की सहायता करते है।

यदि आध्यात्मिक गुरुत्वाकर्षण जैसा कोई शब्द होता तो मैं कहूँगा कि वह निस्वार्थता है। जिस प्रकार पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण बल से वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है उसी प्रकार निस्वार्थ व्यक्ति अपने परार्थवादी व्यवहार से सभी कुछ विशालता में आकर्षित करते हैं। निस्वार्थता से मैं यह सुझाव नहीं दे रहा कि आप अपनी आवश्यकताओं की उपेक्षा करें और स्वयं को कष्ट पहुंचाएं। निस्वार्थता केवल जीवन जीने की एक विधि है। एक समझ कि यदि हम दूसरों की प्रसन्नता पर ध्यान नहीं दें तो हम भी प्रसन्न नहीं रह सकते। आप सारा आहार अकेले स्वयं खा सकते हैं। परंतु यदि दूसरों के साथ बाँट कर खायें तो यह वास्तव में संतोषप्रद होगा।

यदि आपको मेरी बातों पर संदेह है तो अकेले किसी भोजनालय में जाकर पूरा भोजन खा कर देखें। भरपूर भोजन से आपका पेट भरा होगा किंतु वह संतोषप्रद नहीं होगा। क्योंकि वह केवल आपके लिये था। चाहे वह मेज कितनी भी सजी क्यों न हो किंतु यह एक निजी भोज होगा। हम में से अधिकतर का जीवन के विषय में यह भ्रांतिपूर्ण दृष्टिकोण है कि मेरा जीवन केवल मेरे लिये है। यदि हम सब का जीवन केवल स्वयं के लिये होता तो मानव प्रजाति का अस्तित्व संभव ही न होता। आप दूसरों की देखभाल करें और प्रकृति आपकी देखभाल करेगी।

जब आप किसी भोजनालय में पचास रुपये का भोजन करते हैं तो हालांकि इससे देश की अर्थव्यवस्था में उन्नति आ सकती है, हम सभी जानते हैं कि सत्य तो यह है कि दुनिया की मदद करना हमारा प्राथमिक उद्देश्य नहीं था। उद्देश्य तो स्वयं को भोजन कराना था। यह कोई परोपकार नहीं है। किंतु जब आप उसी भोजनालय में दस या पन्द्रह रुपये की टिप देते हैं तो आप तुरंत किसी के जीवन में कुछ बदलाव लाते हैं। हम किसी को लुभाने के लिये टिप नहीं देते (यदि ऐसा होता तो हम सभी भोजन के प्रारंभ में टिप देते)। टिप देकर हम अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। यह पूर्णतया निस्वार्थ तो नहीं किंतु लगभग वैसा ही है।

अनगिनत परिस्थितियों में जीवन आपको निस्वार्थ होने के करोड़ों अवसर देता है। मेरा विश्वास करें और प्रत्येक अवसर का उपयोग करें। अंतिम विश्लेषण में यही महत्वपूर्ण होगा। यही वह सब कुछ है जो आपके साथ जाएगा – आपका कर्म। यही है जो आपको शांति व संतुष्टि देगा। विरोधाभासी ढंग से कहा जाए तो आप जो कुछ भी दूसरों को देते हैं वही आपके साथ रह जाता है। आप प्रेम देते हैं तो प्रेम रह जाता है। आप घृणा देते हैं तो घृणा रह जाती है। आप कुछ भी नहीं देते तो कुछ भी नहीं रह जाता। केवल शून्यता। अपने अस्तित्व को विस्तृत करने की एकमात्र विधि है – देना। आप जिसे अपनी संपत्ति समझते हैं, यदि उसे स्वयं से अलग करने का आप में साहस नहीं, तो कम से कम उसे साझा तो करें। दान के बाद जो उत्तम गुण है – वह है बाँटना।

इस अस्थायी संसार में, हमारे इस क्षणिक जीवन में दान का सौदा सबसे सच्चा सौदा है। यह सबसे लाभदायक लेन-देन है। दयालु बनें। नि:स्वार्थी बनें। तब आप जिस कार्य का भी प्रारंभ करेंगे वह सफल होगा। आपके हाथों की धूल हीरा बन जाएगी। मात्र आपका स्पर्श ही लौह को स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा। आप कसौटी बन जाएंगे। आपकी योजनाएं असफल नहीं होंगी। आपके शब्द व्यर्थ नहीं जाएंगे। ऐसा कैसे संभव है? आप आश्चर्य करेंगे। क्योंकि प्रकृति निस्वार्थ व्यक्ति को परेशान करने का न तो साहस करती है और न ही ऐसा होने देती है।

परार्थवाद हर सकारात्मक भावना का बीज है। निस्वार्थता आध्यात्म की जननी है। यह आपको आगे बढ़ कर आपसे परे देखने में मदद करती है। जिससे आप यह देख कर विस्मित, हैरान और चकित हो जाएं कि आपके पास देने के लिये और अपने (एवं दूसरों के) सपनों को साकार करने के लिये कितनी संपत्ति है।

शांति।
स्वामी