क्या आपने कभी ध्यान दिया कि हम सदा हमारे हृदय , अन्यों के हृदय और जीवनों में सदा एक स्थान की खोज करते रहते हैं। एक स्थान जो हमें ख़ुशी प्रदान कर सके। हम चाहते हैं कि हमारा महत्व हो। हम किसी से या किसी चीज़ से जुड़ना चाहते हैं। हमें यह विश्वास है कि हमारी माँग होना या प्रसिद्ध होना इस बात को इंगित करता  है कि हम कितने महत्वपूर्ण हैं या लोग हमें कितना प्रेम करते हैं। अन्य शब्दों में कहा जाए तो हम सोचते हैं कि जितना ही अधिक  मैं किसी के लिए अपरिहार्य होऊँगा, उतनी अधिक मेरी माँग होगी और जितनी अधिक मेरी माँग होगी  उतना ही अधिक  मुझे लगेगा कि मुझे प्रेम किया जाता है। हम किसी स्थान को इसलिए नहीं जाते कि वह हमें दिया गया है बल्कि उस स्थान की खोज में  जाते हैं जहाँ हमारी माँग हो, और इसके लिए बिना यह जाने कि हम क्या हैं एक स्थान से दूसरे स्थान को , इस आश्रम से उस आश्रम को, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के पास  भागते रहते हैं।

इसे उटोपिया, सिद्धाश्रम,ज्ञानगंज और क्या नहीं कहा गया :सर्वश्रेष्ठ स्थान,  पूर्ण सामंजस्यपूर्ण।कोई तत्व, कष्ट या विनाश नहीं, मात्र ख़ुशी, शांति, आनंद। सम्पूर्ण मानवता के इतिहास में इस बात के प्रमाण हैं कि हमारी कामनाओं को पूर्ण करने के लिए  हम लम्बी और दुष्कर  यात्राओं पर निकले हैं।वासको डी  गामा ने भारत के लिए समुद्री मार्ग की खोज की। हालाँकि कोलंबस ने अन्य प्रकार से सोचा ( किंतु कोलंबस को हृदय से धन्यवाद बिना उसकी दुर्घटनावश खोज के हम आय मेक , अमेजन और गूगल प्ले के बिना होते। यह इंगित करने की आवश्यकता नहीं है कि तब  विशाल भोजन, और डॉमिनोज़ मैक डॉनल्ड, बरगर किंग के भोजय  पदार्थों की सूची जिन के बिना हम नहीं रह सकते , वह भी न होती जिसके सहयोग से हमारी अन्य लोक को जाने की यात्रा पर दौड़ लगाते हैं । मेरा आपसे कहना है कि KFC की टोकरी यह फ़ास्ट फ़ूड, किसी को भी इस यात्रा में तेज़ी से दौड़ाने  में सहायता कर सकती है।

हँसी मज़ाक़ को एक ओर रखते हुए अब हम बात करते हैं कि वास्तव में हमें कहाँ होना चाहिए? सर्वोत्तम स्थान क्या है?

कोलेमन ‘द रेड बुक ( उस व्यक्ति को मेरा धन्यवाद जिसने मुझे इस पुस्तक की एक प्रति दी।)में एक सुंदर कथा है शाम तबरिज की मुलाक़ात । शाम सूफ़ी फ़क़ीर रूमी के आध्यात्मिक गुरु थे। कोलेमन के शब्दों में ही  यह कहानी दी जा रही है:

एक विशाल कारवाँ एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ कोई हरियाली नहीं थी और न ही वहाँ पानी था।वहाँ एक गहरा कुआँ था।लेकिन बालटी और रस्सी नहीं थी। ताज़े जल का स्वाद लेने के किए कारवाँ के लोगों से एक केटली को रस्सी से बाँधकर  नीचे लटकाया। यह नीचे जाकर  किसी चीज़ से टकरायी। जब उन्होंने उसे बाहर खिंचा तो देखा कि  केटली टूट गयी था।

उन्होंने दूसरी भीतर डाली किंतु यह भी टूट गयी । इसके बाद उन्होंने कारवाँ के एक प्यासे व्यक्ति को नीचे भेजा किंतु वह अदृश्य हो गया । इसके बाद अन्य व्यक्ति को फिर अन्य व्यक्ति को नीचे उतारा गया किंतु वे  भी अदृश्य हो गये । एक बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा वह नीचे जाएगा। वह तले में पहुँचने वाला था कि एक भयंकर काले रंग की आकृति प्रगट हुई ।

उस व्यक्ति ने कहा कि हे दैत्य ! “मैं कभी भी तुमसे बच नहीं सकता किंतु मुझे आशा है कि मैं इस बात के प्रति जागरूक रहूँगा कि मैं यह देख सकूँ कि मेरे साथ क्या हो रहा है।”

दैत्य ने कहा “मुझे अपनी लम्बी – लम्बी  कहानियाँ मत सुनाओ । तुम मेरे क़ैदी हो जब तक तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर नहीं देते तुम्हें मैं नहीं छोड़ूँगा।”

“पूछो।”

“सर्वोत्तम स्थान कहाँ है?”
बुद्धिमान व्यक्ति ने विचार किया “ मैं यहाँ बिलकुल असहाय हूँ।यदि मैं बग़दाद या किसी अन्य सुंदर स्थान का नाम लेता हूँ तो हो सकता है यह बिना कहे मैं उसके स्थान का अपमान कर दूँ।” उसने उत्तर दिया “ किसी के भी रहने के लिए वह स्थान सर्वोत्तम है जहाँ उसे  घर जैसा अनुभव हो। चाहे यह पृथ्वी पर कोई गड्ढा हाई क्यों न हो, किंतु यदि यह उसका घर है तो यह सर्वोत्तम स्थान है।”

दैत्य ने कहा तुमने ठीक कहा तुम बहुत बुद्धिमान  मनुष्य हो। तुम्हारी प्रशंसा के कारण  मैं अन्य व्यक्तियों को छोड़ दूँगा और तुम्हें पृथ्वी का स्वामित्व दे दूँगा। मैं अब किसी को क़ैदी नहीं बनाऊँगा और मैं इस कुएँ के जल के भी छोड़ दूँगा।

इस कहानी में शाम अपनी अद्भुत बुद्धि से  दैत्य जहाँ रहता है उस घर  की प्रशंसा करने  की सलाह देते हैं।क्योंकि यहाँ उसे अच्छा लगता है।

सर्वोत्तम स्थान वह है जहाँ हमें घर जैसा लगता है। एक घर में आप बहस कर सकते हैं, झगड़ सकते हैं और असहमत हो सकते हैं किंतु फिर भी दिन के अंत तक आप वहीं रहते हैं । आपको  अपने माता पिता या भाई बहनों के द्वारा जाँचा  जाता  है, लेकिन फिर भी आप एक छत  के नीचे खाना खाने में बुरा अनुभव नहीं करते। अन्य शब्दों में कहा जाए तो घर पर होने का अर्थ है कि जो लोग आपका ध्यान रखते हैं उनके साथ आपका एक छोटा सा अपना व्यक्तिगत स्थान होना। एक स्थान जहाँ आपको यदि कोई कहे कि आप ग़लत हैं तो आपको बुरा नहीं लगता।एक स्थान जहाँ जब आप नीचे गिरते हैं तो वापस जाते हैं। वे लोग जो वहाँ निवास करते हैं चाहे आप कितने भी व्यथित क्यों न हों आप नहीं चाहते कि उनकी  कोई भी हानि हो। जब आप अपनी चिंता और दुःख को बाँटना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले उनका ही ध्यान आता है।

योगी लोगों ने  हमारे शरीर  रूपी घर को भी अस्थायी कहा है ऐसा इसलिए क्योंकि जब हमारा मन आराम से नहीं होता तो यहाँ तक कि हमारा यह  घर भी घर जैसा नहीं लगता। यह किसी अन्य इमारत जैसा लगता है जहाँ कुछ लोग रहते हैं जिन्हें हम जानते  हैं पर नहीं जानते। हर चीज़ क्षणिक है और अंततः नष्ट होने वाली है। इसलिए इस क्षणिक वास्तविकता में अनंत शांति को खोजना अधिकतर निरर्थक  प्रयास है। इसके स्थान पर हमें अपनी प्रेरणा हमारी चेतना की  सर्वोच्च अवस्था से खोजना चाहिए, जितना ही अधिक आप अपने भीतर उतरेंगे क्योंकि यह जो कुछ भी हम खोज सकते हैं उससे यह दीर्घ काल तक रहने  वाली है। ज़रा कल्पना कीजिए जब हमारा मन कुछ सृजनात्मक, उत्पादक, कुछ ऐसी चीज़ में जो हम अभी तक जानते हैं उससे बाहर निकलने की चुनौती देती है और हमें भिन्न प्रकार से सोचने के लिए विवश करती है उसमें व्यस्त  रहता है तो हम कितना अधिक आनंदित अनुभव करते हैं।

जितना ही अधिक हम प्रकृति के साथ सामंजस्य के साथ रहते हैं उतना ही  अधिक आनंद होता है। जब हम प्रकृति कहते हैं तो इसका अर्थ पेड़, पहाड़ या जो आपके पास है उससे नहीं है। प्रकृति से मेरा अर्थ है भीतर के साथ बाहरी को  जोड़ना। मेरी कामनाएँ, मेरी आपेक्षाएँ, स्वप्न और लक्ष्य सभी मेरे मन में हैं, वे सर्वप्रथम मेरे मन में अस्तित्वमान होती हैं, मेरे आंतरिक जगत में। मेरी भौतिक सम्पत्ति, मेरे चारों ओर के लोग, मेरी सम्पत्ति बाह्य जगत में अस्तित्वमान होती हैं। मैं जो भीतर देखता हूँ और जो मैं बाहर पाता हूँ जो कि घर से बहुत दूर है उन दोनों के मध्य बहुत अंतर है । हालाँकि आदर्शतः घर पर होने में उन लोगों से घिरे होते हैं जो कि आपको चाहते हैं और माँगते हैं लेकिन यह मात्र आधा सत्य है निस्सन्देह अपूर्ण। घर पर होना अर्थात मुक्त होना और मुक्ति अंदर का मामला है, एक अंदर की अवस्था।

बाहरी संसार ज़ंजीरें तोड़ सकता है किंतु यह विचारों के बंधनों को नहीं तोड़ सकता। यह दूरी को कम कर सकता है, लेकिन हृदय के  प्रेम का विकास नहीं कर सकता। संसार में, आपके काम में, आपके  सम्बंधों में जो पूर्णता का अनुभव है वह सौ प्रतिशत इस पर निर्भर है कि आपके भीतर से आप कितने संतुष्ट हैं।

शायद इस लेख को समाप्त करने के लिए रूमी की उसी पुस्तक से उद्धरण देने से अधिक अच्छा तरीक़ा कोई नहीं है।

झरने के जल के भरे बर्तन पर्याप्त नहीं होते।

हमें नदी के पास नीचे ले चलो।

चंद्रमा की तरह कोई फिसलता हुआ बादल नहीं,

शांति का चेहरा, स्वयं सूर्य है,

और वह जिसका कार्य अपूर्ण रह गया है,

उसे फिर से एक के बाद एक स्पष्ट  सुबह दो,

चूँकि हम  क्षीण , निष्क्रिय , हालाँकि भरे हुए ,शून्य  और मुक्त हो गए हैं

तो फिर हमारा काम कौन है?

शांति।

स्वामी