महाराष्ट्र के महान साधु संत एकनाथ केवल एक संत ही नहीं थे, पूर्णता के अवतार थे। वे जो कहते वही करते। वास्तव में यही गुण – जिन बातों का प्रचार करना उन पर अमल करना – एक सच्चे संत की पहचान है और उन्हें साधारण उपदेशकों से भिन्न करता है। एकनाथ अपने सदाचारी आचरण, गुरु के प्रति समर्पण और विशेष रूप से अपनी सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध थे। किसी ने भी उन्हें कभी क्रोध करते हुए नहीं देखा। स्थिति जितनी भी प्रतिकूल क्यों ना हो उनका आत्म-संयम सदैव अखंड रहता।

प्रति दिन प्रातःकाल वे स्नान करने गोदावरी नदी पर जाते। नदी के मार्ग पर रहने वाले गाँव के एक निवासी ने यह तय किया कि वह यह सिद्ध करेगा कि कोई भी मनुष्य क्रोध से परे नहीं और कोई भी सदा के लिए या असीम सहिष्णु नहीं हो सकता। उसने ठान ली कि वह संत एकनाथ को क्रोधित होने पर विवश करेगा। इस से उसे हासिल करने को कुछ भी नहीं था परंतु संसार में रहने वाले अधिकतर मनुष्यों के समान वह अहंकार एवं अज्ञान के अंधकार में आकर अपनी बात को सिद्ध करना चाहता था।

एक दिन जब संत एकनाथ उसके घर के पास से जा रहे थे, वह उन को अपमानजनक शब्द कहने लगा। एकनाथ ने बिल्कुल कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई और अपनी राह पर चलते रहे। उसने एकनाथ को वहाँ रुक कर उस की बातें सुन ने की चुनौती दी। ऋषि एकनाथ उसी क्षण वहाँ रुक गए और उस आदमी को देखते हुए स्नेह से मुस्कुराते हुए वहाँ खड़े हो गए। उस व्यक्ति ने अपना दुर्व्यवहार नहीं छोड़ा तथा और दुर्वचन बोलता रहा। जब वह एकनाथ से कोई भी प्रतिक्रिया पैदा करने में असमर्थ रहा वह निराश हो कर क्रोधित अवस्था में अपने घर के भीतर चला गया। एकनाथ नदी की ओर चल दिए।

अगली सुबह उसने फिर प्रयास किया परंतु फिर असफल रहा। इस बार वह और बेहतर तैयारी कर के आया था। जब एकनाथ नदी से वापस लौट के आ रहे थे, उस व्यक्ति ने उन पर गंदे पानी और कचरे से भरी बाल्टी उड़ेल दी। उनके श्वेत वस्त्र मैले हो गए। ऋषि ने अपने वस्त्र के सूखे कोने के साथ अपनी आँखें पोंछीं और बिना कुछ कहे नदी की ओर लौट गए। परंतु उस व्यक्ति ने हार नहीं मानी।

जब एकनाथ लौट कर आए उन के साथ फिर वही दुर्व्यवहार हुआ। एक बार फिर, किसी भी प्रतिक्रिया दिखाये बिना, वह शांति से स्नान करने नदी की ओर लौट गए। यह सिलसिला अगले छह घंटों के लिए इस तरह चलता गया। अठारह बार उस व्यक्ति ने एकनाथ को गंदे पानी से भिगो दिया, अठारह बार उनके हिम समान श्वेत वस्त्र को मैला कर दिया, अठारह बार उन्हें चुनौती देने का प्रयत्न किया, परंतु हर बार असफल रहा।

किंतु उन्नीसवीं बार उसकी योजना अलग थी। अज्ञान के अंधेरे से वह बाहर आ गया था। इस बार उसने फूलों के साथ अपनी बाल्टी भर दी और संत पर बरसा दिया। एकनाथ फिर मुस्कुराए, इस बार उनकी मुस्कान केवल थोड़ी और खिल गई। वह उनके पैरों पर गिर गया, और फूट फूट कर रोते हुए क्षमा की भीख माँगने लगा। उसके भीतर एक परिवर्तन आ गया। एकनाथ ने अपनी सहिष्णुता की शक्ति, अपने धार्मिक आचरण तथा अपने श्रेष्ठ व्यवहार से उसे पराजित कर सदैव के लिए परिवर्तित कर दिया।

उस व्यक्ति ने संत से पूछा कि उन होने बिना किसी प्रतिक्रिया के कैसे इस दुर्व्यवहार को सहा, तथा वे कैसे इतने सहिष्णु रह पाते हैं?

“सहिष्णु?” एकनाथ ने कहा, “आप ने वही किया जो आप को पसंद आया और मैंने भी वही किया जो मुझ को पसंद आया। और इसके अतिरिक्त मैं आपका धन्यवाद करना चाहूँगा क्योंकि मुझे आज अठारह बार स्नान करने का अवसर मिला – यह मेरे जीवन का सबसे पवित्र दिन है !”

अपने आप को प्रतिक्रिया करने से रोकना सहिष्णुता नहीं। बल्कि इसका अर्थ है कि आप ऐसी भावनाओं को पकड़ कर ही ना रखें। सहिष्णुता स्नेह की ही और एक अभिव्यक्ति है। क्योंकि दूसरों के प्रति आपका सद्व्यवहार ही केवल प्रेम नहीं। आप दूसरों को अपने साथ कैसा व्यवहार करने देते हैं यह भी आप के प्रेम का परिचय है। सहिष्णुता और शांति हाथ में हाथ मिलाए चलते हैं। केवल अपनी प्रतिक्रिया को रोकना ही सहिष्णुता नहीं। यह उस से कईं अधिक है। अगली पोस्ट में मैं सहिष्णुता के अभ्यास पर लिखूंगा। कृतज्ञता के समान, सहिष्णुता भी आप को शाश्वत शांति का अनुभव करा सकती है।

शांति।
स्वामी