आज जब मैं आश्रम के आगंतुकों से मिलकर अपने कमरे में वापस आया तो वर्षा तभी रुकी थी। हल्की बूंदाबांदी हो रही थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हम धुँधले बादलों के कोहरे में खड़े हैं। शीघ्र ही बूंदाबांदी भी समाप्त हो गयी। मुझे दूर चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी।

सर्दियों के सूर्य ने बड़े मजाकिया ढंग से बादलों से झाँका और गर्म किरणों का एक कंबल मेरी अध्ययन करने वाली मेज पर फैल गया। चिड़ियों का चहचहाना और भी निकट महसूस हुआ। मैं उठा और दूसरी खिड़की से बाहर देखा। ओह, कितना सुंदर दृश्य था। कईं छोटी गौरैया प्रसन्नतापूर्वक धर्ती से अपना भोजन लेने हेतु छेद कर रहीं थीं। हालाँकि मुझे निश्चित नहीं था वे किस वस्तु पर चोंच मार रहीं थीं। उनकी गति-विधि में तालमेल था। मैंने उस सामंजस्य को कईं मिनटों तक देखा। आकाश मेघों से घिर गया और पुनः वर्षा होने लगी। गौरैया गायब हो गयीं जैसे नीले आकाश में इन्द्रधनुष विलीन हो जाता है।

पर्वत जहाँ थे, वहीं खड़े थे और नदी तटस्थ बहती रही। संसार में जो जैसा था वैसा ही चल रहा था। मैं विस्मयित था। उन सुंदर छोटी चिड़ियों में, उनके कार्य में इतनी सरलता थी कि मैं लगभग गहन समाधि में चला गया। वे सूर्य के निकलने के साथ निकली थीं, अपना कार्य किया और जब पुनः वर्षा हुई तो छिप गयीं। कितना सरल है।

सरलता ही आध्यात्मिकता है।

यहाँ तक कि ध्यान भी इसलिए किया जाता है कि आप स्वयं को बेहतर समझ सकें। कि आप अपने जीवन को कुशाग्र-बुद्धि से समझें और स्वयं के भीतर झाँक सकें। स्पष्ट ध्यान से चेतना का विस्तार होता है, जो आप को शिशु समान सुलभ व निष्कपट बनाता है। आप वस्तुओं एवं घटनाओं को बिना किसी धारणा के देखने लगते हैं। आप जान जाते हैं कि आपके जीवन की कोई भी जटिलता इस बात का प्रस्तुतीकरण मात्र है कि आप किसी बात को कैसे देखते या अनुभव करते हैं। सरलता की समझ आप के भौतिक एवं मानसिक संसार को व्यवस्थित करने में मदद करती है।

जब आपकी बुद्धि सजग होती है तो जीवन अपने आप ही सरल हो जाता है। आप स्वभाविक रूप से एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण विकसित करते हैं। आप कैसे जानेंगे कि आप आध्यात्मिकता की ओर बढ़ रहे हैं? इस बात से कि, आप जीवन के हर पहलू को एक आशीर्वाद के रूप में देखने लगेंगे। इस संसार की अस्थायी क्षण भंगुर प्रवृत्ति से अब आप परेशान नहीं होंगे। और आप जैसे ही अपने अनंत अस्तित्व में गहरे जाते हैं और भी निडर होते जाते हैं। क्योंकि आध्यात्मिकता की जड़ में एक सरल समझ है कि हर वस्तु एक आशीर्वाद है।

एक योगी था जिसने अत्यंत कठोर तपस्या से ईश्वर को अवतरित किया और अमरता का वर माँगा। ईश्वर ने उसे अमर बना दिया। वह गर्व से भर उठा। वह एक गाँव में बस गया तथा समय असमय गाँव के व्यक्तियों को अपनी सेवा करने हेतु विवश कर तंग करने लगा। यह जानते हुए कि वह अमर है गाँव के लोगों ने उसकी मांग के आगे समर्पण कर दिया किंतु उसके अत्याचार बढ़ते रहे।

उसी गाँव में एक हृष्ट-पुष्ट पहलवान रहता था जिसने तय किया कि अब बहुत हो चुका।
“मैं तुम्हारे शरीर की एक-एक हड्डी तोड़ डालूँगा और आंखें निकाल लूँगा” उसने अमर योगी से कहा।
योगी बोला, “मुझे कोई नहीं मार सकता!”।

पहलवान योगी पर झपट पड़ा और निश्चित ही उसकी एक एक हड्डी तोड़ डाली और उसे अंधा कर दिया। परंतु अमरत्व के वरदान के कारण वह मर नहीं सकता था। किंतु उसी समय, एक ऐसे शरीर के साथ जो कि हिल नहीं सकता था, आँखें जो देख नहीं सकती थीं, उसकी जीवन जीने की सारी इच्छा समाप्त हो गयी। लोगों ने उससे प्रतिशोध ले लिया था और उसे मरने के लिए अकेला छोड़ दिया था। किंतु वह मर भी ना सका।

अंतत: उसने निष्कर्ष निकाला कि उसके कष्टों का एकमात्र उपाय मृत्यु है। उसने उग्रता से मृत्यु के लिए प्रार्थना की। वह केवल मृत्यु चाहता था। उसे यह अहसास हुआ कि अमरता कोई वरदान नहीं। कम से कम मृत्यु उसे पुनः जन्म लेने का और वह भूल न करने का अवसर दे सकती है। उसे एक नया शरीर और जीने का एक और अवसर मिल सकता है।

मैं यही नहीं कह रहा कि हर किसी को मृत्यु के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और अपने जीवन के खाते को बंद कर देना चाहिए। मैं यह कह रहा हूँ कि हममें से बहुत से व्यक्ति अमरत्व एवं एक प्रकार के स्थायित्व को पकड़ कर रखना चाहते हैं। सत्य तो यह है कि जब आप जीवन को एक बोझ नहीं वरन एक वरदान समझते हैं, जब आप इसके अस्थायित्व को एक कमी नहीं वरन एक समाधान के रूप में देखते हैं तो जीवन एक बहुत बड़ा आशीष बन जाता है।

अब जब हम यहाँ हैं तो हम कृतज्ञता एवं सकारात्मकता के साथ जिएं। एक कोने में बैठ कर चिंता करने और पिनपिनाने का क्या अर्थ है? यह किसी की मनोदशा को उन्नत नहीं करने वाला। इससे बेहतर है कि जीवन का उत्सव मनाएं। स्वयं का उत्सव मनाएं।

एक बालक के माता-पिता दुखी थे जब उनके पालतू कुत्ते टिंकर की मृत्यु हो गयी। उन्हें पता न था कि वे अपने पाँच वर्ष के पुत्र को मृत्यु के विषय में कैसे समझायेंगे।
“मम्मी, टिंकर को क्या हुआ ? वह हिल क्यों नहीं रहा?”
“पुत्र वह मर चुका है।” माँ ने उत्तर दिया “वह स्वर्ग चला गया है, ईश्वर के साथ रहने।”
“क्या?” बच्चे ने भोलेपन से कहा “ईश्वर एक मृत कुत्ते का क्या करेंगे?”

यदि हम यहाँ इस संसार में रहकर जीवन में आनंदित नहीं हैं और जब हमें अवसर है हम प्रसन्न चित्त नहीं हैं तो हम किसी अन्य संसार (या जीवन) में आनंदित कैसे रहेंगे। अंतत: हम वही प्रवृत्ति आगे ले जाते हैं। या तो अभी या फिर कभी नहीं। यही है, यह जीवन जैसा भी है यह एक वरदान है। इसे दूसरी विधि से क्यों जिएं?

जब सूर्य उभरता है तो गौरैया आती है भोजन खोजती है और साँझ को उड़ कर अपने घोसले में लौट जाती है। ठीक इसी प्रकार सही समय पर एक आत्मा को एक गर्भ मिलता है, अपना जीवन जीती है और पुनः उसी चेतना में लीन होने लौट जाती है। या फिर अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु उसका पुनर्जन्म होता है। उसी भूखी चिड़िया के समान जो भोजन की खोज में निरंतर उड़ती रहती है। यही संसार का चक्र है। यही प्रकृति का रहस्यमयी नाट्य है। अस्थायी किंतु निरंतर, परिष्कृत तथापि सरल।

जिस प्रकार भी देखें यह एक आशीर्वाद है। हमारे जीवन के समान, हमारे ग्रह के समान, सुंदर।

शांति।
स्वामी