समाज, धर्म आदि से व्यक्ति सदैव प्रभावित होता है। मैं सदैव ऐसे बंधनों से मुक्ति की बात करता हूँ। मेरे प्रत्येक वीडियो के अंत में यह पंक्ति होती है – अपने सत्य की खोज करें, केवल यह वाक्य ही आप को मुक्त कर सकता है यह मैं सदैव कहता हूँ, परंतु बार बार यह प्रश्न मुझ से पूछा जाता है बंधन से मुक्ति का क्या अभिप्राय है? क्यों यह महत्वपूर्ण है कि अपने सत्य को पहचानें और क्यों मेरा धर्म और देवता मुझे मुक्त नहीं कर सकते? मैं आशा करता हूँ कि इस पोस्ट द्वारा इस दुनिया को एक दूसरे दृष्टिकोण से देखने में मैं आपकी सहायता कर सकूंगा।

इस अवसर पर मैं यह भी स्पष्ट कर दूँ कि मैं किसी भी धर्म, दर्शन, संप्रदाय अथवा विधि का विरोध नहीं करता हूँ। यह सभी की भलाई के लिए हैं, परंतु मेरी निरपेक्ष धारणा का अर्थ यह नहीं कि मैं उन सभी को स्वीकार करता हूँ। मेरा आशय केवल इतना है कि मेरी सहमति आपके अपने पथ पर चलने की है। जब तक कि वह आपको शांति और प्रसन्नता दे और विशेषकर किसी का अहित न करे, क्षति न पहुंचाए और आहत ना करे, इसी पथ पर चल कर आप कुछ प्राप्त कर सकते हैं। मुझे स्वयं प्रार्थना करना प्रिय है, परंतु कुछ प्राप्त करने की इच्छा से नहीं अपितु केवल आभार एवं प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए। आज के विषय बंधन पर आते हुए मैं आपको ले चलता हूँ “यूथिफ्रो” की ओर – जिसमें प्लेटो द्वारा सुकरात के अंतिम दिनों के चार मुख्य वार्तालापों में से एक का वर्णन है।

यूथिफ्रो में सुकरात पर ईशनिंदा का अभियोग है। उन पर नए देवताओं की खोज करने और युवाओं को दिग्भ्रमित करने का आरोप लगाया गया है। न्यायालय के बाहर उनकी भेंट यूथिफ्रो से होती है, जो एक अभियोजक हैं, और अपने पिता पर हत्या के मुक़दमे के अभियोजन लिए आये हैं। मुकदमा है कि एक निर्धन ने एक सेवक को मार डाला और आरोपित व्यक्ति को यूथिफ्रो के पिता ने खाई में फेंकने की आज्ञा दी। जब तक कि एथेंस के उच्चाधिकारियों द्वारा कोई और उपयुक्त दंड नहीं दीया जाता, जब तक की दूत उत्तर के साथ वापस आता, आरोपित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और युथिफ्रो के पिता पर हत्या का मुकदमा हो जाता है।

यूथिफ्रो, जो धार्मिक रूप से कट्टर थे, उन्हें यह विश्वास था कि उनके पिता ने पाप किया है, और वे उन्हें अभियोजित करने आये थे। सुकरात ये मानते थे कि यूथिफ्रो ने जब यह उत्तरदायित्व ली है तो उन्हें समझ होगी कि पाप और पुण्य कर्मों की प्रक्रति क्या है, धर्म क्या है और अधर्म क्या है।
“धर्म क्या है?”- सुकरात ने उनसे पूछा।
“धर्म वह है जो देवताओं को प्रिय हो और अधर्म वह जो देवताओं को प्रिय न हो” – यूथिफ्रो ने उत्तर दिया।
सुकरात ने यूथिफ्रो से पुनः प्रश्न किया – “कोई कार्य इसीलिए पवित्र है क्यों कि वह देवताओ को प्रिय है या फिर देवताओ को प्रिय है इसीलिए वह कार्य पवित्र है? क्या सब पवित्र कार्य उचित होते हैं? अथवा सब उचित कार्य पवित्र होते हैं?”

रोचक बात यह है कि इसी प्रकार से विश्व के अधिकांश धर्म पवित्र और अपवित्र कार्यों को विभाजित करते हैं। वे कार्य जो देवता को प्रसन्न करते हैं या फिर किसी स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करते हैं पवित्र कार्य माने जाते हैं। इस विडंबना को एक क्षण के लिए सोचें – यहाँ तक कि हत्या भी पवित्र और अनुकूल है यदि वह धार्मिक रीतियों से हो। यदि किसी जानवर की हत्या जैसे एक के धर्म में बताया गया है वैसे हो तो अच्छा है, परंतु दूसरे के धार्मिक तरीके से नहीं। यहूदी ढंग से काटा गया अच्छा है, हलाल नहीं, या फिर इसका उलटा। बौद्ध धर्मावलंबी कुछ जगहों पर जानवरों को दम घोंट के मार डालते हैं, और यह सिद्ध करते हैं कि यह सही है क्योंकि एक बूँद भी रक्तताप नहीं हुआ। भारत के अनेक भागों में हिंदू बकरों की बलि विभिन्न देवताओं को देते हैं। हर कोई सोचता है मेरा मार्ग सही है। यह सब समाज और धर्म से प्रभावित होने का परिणाम है। सदैव इस की प्रेरणा या कारण होता है किसी प्रकार का पुरस्कार – भगवान की ओर से किसी प्रकार के एहसान का, स्वर्ग, मुक्ति या फिर ऐसा ही कुछ।

इस बंधन से मुक्ति के लिए, सुकरात तीन प्रश्न सदैव पूछते थे। यह हैं वे तीन मूल प्रश्न जो आप पूछ सकते हैं अपने सत्य और ज्ञान को सिद्ध करने के लिए –
• आप क्या जानते हैं?
• आप कैसे जानते हैं कि आप क्या जानते हैं?
• आप के लिए क्यों यह महत्वपूर्ण है?

हम सच में क्या जानते हैं, और महत्वपूर्ण यह है कि कैसे हम जानते हैं? किस ने कहा कि हम जानते हैं? यदि हमारे पूर्वजों ने बताया तो उन्हें यह ज्ञान कैसे मिला? क्योंकि कोई कार्य पहले किसी विशेष तरीके से किया जाता था तो क्या यह मान लेना है कि यह ही सही है (यह मानते हुए कि यह पहली बार पहली जगह सही था)? और यदि हम इस अपने ज्ञान के उद्गम को जानने का प्रयास नहीं करेंगे तो कभी उसकी प्रमाणिकता या सत्यता को जान नहीं पाएंगे।

एक बार एक गांव में एक संत को प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया गया। वह अपने प्रिय भेड़ के साथ आये थे। प्रवचन के समय अपने भेड़ को पास के खूंटे से उन्होंने बांध दिया। गांव वालों को यह अद्भुत लगा कि एक जानवर को प्रवचन में लाया गया परन्तु संत की अप्रसन्नता के भय से उन्होंने कुछ न कहा। गर्मियों का मौसम था और संयोगवश उस दिन वर्षा भी हो गई। सभी को बहुत प्रसन्नता हुई। संत प्रवचन के पश्चात अपने भेड़ को ले कर चले गए, परंतु गांव में प्रवचन के समय भेड़ बांधने की परंपरा बन गई। वे सोचते थे कि इसका वर्षा से कोई सम्बन्ध है। उनका मानना था कि इन्द्र देव (वर्षा के देवता) इससे प्रसन्न होते हैं|

यह कहानी अवास्तविक लग सकती है, परंतु यदि आप चारों ओर देखें तो यह पाएंगे कि यह दुनिया इसी प्रकार की परम्पराओं से भरी पड़ी है। परम्पराएं जो धर्म का हिस्सा बन गई हैं अब लगभग अमर हो गई हैं, उन्हें स्वीकृति मिल गई है और बिना किसी प्रश्न के उनका पालन किया जा रहा है।

सभी कुछ जिसे सत्य मान लिया जाता है, क्या वास्तव में सत्य है? कदाचित उनमें से बहुत सा। परंतु क्या आप इस निष्कर्ष पर अपनी समझ से पहुंचे हैं अथवा यह आप को बताया गया है? बंधन कब सही और गलत, अच्छा और बुरा, नैतिक और अनैतिक है और दूसरे द्वन्द यह हमें बताये जाते हैं और हम उन्हें स्वीकार कर लेते हैं।

समाज और धर्म से प्रभावित होकर हम बंधनों में बंध जाते हैं। ये बंधन हमे ढालते हैं, कभी कभी संभवतः दुर्भाग्यवश और बिना किसी प्रयोजन के ये हमें कठोर भी बना देते हैं और कभी हमें दृष्टिहीन भी कर देते हैं। जितने कठोर आप होते हो उतने ही भंगुर भी बन जाते हो, आपकी कठोरता आपको सहिष्णु बनाती है परंतु एक बड़ा झटका सब कुछ तोड़कर रख देता है।

किसी भी संत, व्यक्ति धर्म या दर्शन को मानने से पहले कभी भी प्रश्न करने से मत झिझकें। उसकी वैध्यता को सिद्ध करने का प्रयत्न करें, जांचने की प्रक्रिया करें। बंधन को खोलने की प्रक्रिया तब शुरू होती है जब हम अपने मूलभूत मान्यताओं पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यह संभवतः असुविधाजनक हो सकता है परंतु यह ही शक्ति देता है और मुक्ति प्रदान करता है|

शांति।
स्वामी