हताश व्यक्ति ने जो कि बड़ी ही आशा से कबीर के बारे में उनकी कुशाग्रबुद्धि   की बातें सुनकर आया था, कबीर से कहा क्या आपके पास मेरे लिए कोई सलाह है?

कबीर ने अपने चरखे पर वस्त्र कातते हुए कहा क्यों?

क्या हुआ?

“ मेरी पत्नी और मैं बिलकुल अनुरूप नहीं  हैं। हम हर चीज़ पर बहुत वाद-विवाद करते हैं। मैं नहीं जानता मैं अपने विवाह को कैसे बचाऊँ।”

कबीर ने अपनी कताई रोककर कहा; मेरे मित्र! निराश न हो, हर चीज़ का हमेशा कोई हल होता है।

मौन में कुछ क्षण बीते इस  समय में कबीर अपनी कविता गुनगुनाते रहे और  अपने चरखे का पहिया घुमाते रहे। दर्शनार्थी को पसीना आ रहा था और भारत के  निष्ठुर सूर्य से कोई आराम नहीं था। वह अपनी चटाई को इधर से उधर खिसका रहा था और अपनी दृष्टि को इधर से उधर घुमा रहा था।उसकी असुविधा उसकी हताशा  जितनी ही महान थी। वह सोच रहा था कोई छाया नहीं , कोई हाथ वाला पंखा भी नहीं, यह व्यक्ति यहाँ रहता कैसे है, कविता लिखना तो भूल ही जाओ।

लेकिन कबीर तो शांत चित्त थे  और शांति में डूबे हुए थे। मौसम  और जीवन के कठिन परिश्रम के बारे में कोई शिकायत नहीं। वह मितव्ययी थे । क्योंकि वे किसी उच्च जाति  से नहीं थे और  इसी कारण उनकी उत्कृष्ट कविताओं पर ध्यान नहीं दिया गया किंतु फिर भी वह इससे दुखी  नहीं थे ।

कबीर ने अपनी पत्नी को जो कि रसोईघर में थी धीरे से पुकारा “ क्या तुम मुझे लालटेन लाकर दे सकती हो?”

कुछ  दस मिनिट बाद उनकी पत्नी एक लालटेन लेकर आयी। उसकी छोटी सी लौ  चमकते हुए सूर्य के सामने पूरी तरह निस्तेज़  स्थिर थी।

कबीर ने अपनी पत्नी से कहा हमारे यहाँ एक मेहमान आए हैं, कृपया मुझे थोड़ा गुड़ और जल लाकर दे दो ।

उन दिनों में अमीर लोग अपने मेहमान का स्वागत अक्सर मिठाई और जल  के साथ किया करते थे। मध्यम वर्गीय लोग अपने मेहमान का स्वागत आँवले के मुरब्बे के साथ और निर्धन लोग गुड़ और जल के साथ किया करते थे।

गुड़ तो ठीक है परंतु इस दिन के उजाले में लालटेन का क्या काम है इसमें क्या रहस्य है उस व्यक्ति ने सोचा परंतु  कुछ नहीं कहा बस देखता रहा।

अगले १० मिनिट व्यतीत हो गए उनकी पत्नी एक गिलास जल  और कुछ नमकीन चीज़ें लेकर आयी। कबीर ने अपनी पत्नी को धन्यवाद दिया और मेहमान को खाने के लिए  आग्रह किया।

वह सोचने लगा यह क्या पागलपन है? पहले तो वह दिन के उजाले में लालटेन लेकर आयी और जब उन्होंने मिठाई की माँग की तो वह  हमारे लिए सारी नमकीन चीज़ें  ले आयी।मैं बहुत बड़ा मूर्ख हूँ जो यहाँ  ज्ञान प्राप्त करने के लिए आया।

कबीर ने कहा तुमको अवश्य आश्चर्य हो रहा होगा कि यहाँ  पर क्या हो रहा है?” मैने दिन के उजाले में लालटेन की माँग की और वह बिना एक भी शब्द कहे ले आयी। और जब मैने मीठा लाने को कहा तो वह आपके लिए नमकीन ले आयी।”

ईमानदारी से कहूँ तो “ मैं चकरा गया।”

देखो मेरे मित्र ! सुखी विवाह का रहस्य यह है कि अनावश्यक वाद-विवाद  की  उपेक्षा करो क्योंकि इनमें से अधिकांश  निरर्थक चीज़ों के ऊपर होता   है। हर   वाद-विवाद  एक  आघात को प्रेरित करता है और यदि इसे नहीं रोका जाए तो यह विवाह को तोड़ देता है।मेरी पत्नी यह पूछ सकती थी कि मुझे दिन के समय लालटेन की क्या आवश्यकता थी लेकिन उसको मुझ पर विश्वास था। वह जानती थी कि मेरी इस विचित्र माँग के लिए अवश्य  ही कोई कारण होगा। और जब वह मीठे के स्थान पर नमकीन ले आयी तो मैने सोचा कि या तो घर पर गुड़ ख़त्म हो गया होगा या और कोई मीठा उपलब्ध नहीं होगा। मैने उससे पूछने के स्थान पर उस पर विश्वास किया । जो विश्वास हम दोनों को एक दूसरे पर है वह हम दोनों को वह  स्थान देता है जो कि जो हम कर सकते है उसे और अच्छा करने के लिए आवश्यक होता है।

और हम दोनों विश्वास का निर्माण कैसे करें?उस व्यक्ति ने पूछा।

विवेकी , ईमानदार और धैर्यवान बनो।

यह अक्सर होता है , कम से कम  मैंने हमेशा यही सुनता हूँ कि दो लोग जबकि उनका विवाह काफ़ी समय पहले हो चुका है ,ऐसा अनुभव करते हैं वे एक दूसरे के अनुरूप नहीं हैं। वह मेरी बात नहीं सुनती। वह मुझे नहीं समझता।वह कोई भी वह चीज़ नहीं पसंद करती जो मुझे पसंद है।वह घर में कोई  काम नहीं करता। हमारी पसंद नहीं मिलती, हम  संसार को कैसे देखते है या हम हमारे जीवन से जो चाहते हैं उसमें हम एक दूसरे से एकदम विपरीत  हैं।

सत्य यह है कि अनुरूपता का निर्माण एक संयुक्त  प्रयास है।यदि आप संभाव्यताओं के लिए खुले हैं, तो आप एक दूसरे की रुचियों को स्वीकारना आरम्भ कर देते हैं।जबकि यह एक रात में नहीं होता यह अंत में  प्राप्त होता है। परेशानी तब उत्पन्न होती है हम  बिना इसे अर्जित किए एक सम्बंध की  सुविधा और पुरस्कार चाहते हैं। किसी से विवाह करना एक नौकरी के अनुबंध पर हस्ताक्षर करने जैसा है, यह दिखाता है कि आपने एक वादा किया है। आपको हस्ताक्षर करने का पुरस्कार मिल सकता है किंतु असली काम तब आरम्भ होता है जब आप वहाँ काम करना आरम्भ करते हैं।

जिस प्रकार हमारे स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हम देखते हैं कि हम हमारे शरीर में क्या डाल रहे हैं, उसी प्रकार एक संबंध की रक्षा और पोषण के लिए हमें इस बात के प्रति सजग रहना होगा कि हम इसे क्या खिलाएँ। गम्भीर प्रयास, श्रेष्ठ  उद्देश्य, करुणा  के शब्द और ईमानदारी पूर्वक प्रयत्न अपने सम्बंधों में डालें और एकमात्र चेतावनी और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मात्र तभी काम करता है जब यह  प्रयास संयुक्त रूप से किया जाता है।

कभी कभी जो लड़ाई, तर्क  , कहासुनी करने और धमकी से नहीं हो पाता वह अन्य व्यक्ति को प्रेरित करने, उसे प्रेम करने से हो जाता  है। इसलिए, मेरा अनुमान है, प्रयत्न करने के समय अपना बिंदु सिद्ध करने  के स्थान पर स्वयं से पूछें :

“ मैं इस व्यक्ति को मेरा दृष्टिकोण  देख पाने हेतु प्रेरित करने हेतु क्या कर  सकता हूँ? या और भी अधिक अच्छा होगा कि आप सोचें  “ उसके दृष्टिकोण को देखने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ? ऐसा करना सारा अंतर ला देगा।,

इस सजगता में आप एक दूसरे को आघात पहुँचाने वाले शब्दों के  एक दूसरे की ओर फेंकने  के मार्ग से अविश्वसनीय ढंग से  नीचे उतर जाएँगे।

एक वाद-विवाद  को बचाना थोड़ा अधिक प्रेम अर्जित करना है। जितना अधिक आप संचित करेंगे , उतना ही अधिक आप तब ख़र्च कर सकने योग्य होंगे  जब उसकी आपको सर्वाधिक आवश्यकता होगी।

प्रेम मात्र  दो दिलों की ठंडक को पिघलाने  के बारे में है। यदि आप इसमें हैं और यदि इसके कार्य करने का कोई  अवसर है, तो मात्र प्रेम और इसके व्युत्पन्न (दयालुता, देखभाल, सौजन्यता समानुभूति आदि) परिवर्तन को प्रभावित कर सकते हैं।

मैने रीडर्स ड़ायजेस्ट में एक बार पढ़ा था “ एक माँ अपनी बेटी को डेटिंग के बारे में टिप दे रही थी “ जेनी  यह पक्का करो कि जिस व्यक्ति को तुम खोज रही हो  यदि उसकी रुचि  तुम्हारी रुचियों के बिलकुल एक समान नहीं हो तो कम से कम उससे मिलती जुलती हों । यदि वह जैसा तुम पसंद करती हो वैसा पसंद करता हो, यदि तुम दोनों  एक ही प्रकार की फ़िल्म देखना पसंद करते हो, यदि वह उसी संस्कृति से है जिससे तुम हो ,और  उसी धर्म को मानता है , जिसे तुम मानती हो, तो तुम्हारे विवाह में चीज़ें अधिक आसान हो जाएँगी।”

लेकिन माँ अग्नि को जलाए रखने के लिए विचार-भिन्नता आवश्यक है। उसने कारण बताया कि “ मैने पढ़ा है कि परस्पर विरोधी  लोग एक दूसरे को आकृष्ट करते हैं।”

लेकिन जेनी  एक पुरुष और एक स्त्री होना इतना ही  परस्पर विरोधी होना  पर्याप्त है।हमें इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि संबंध कई बार कठिन होते हैं, लेकिन यदि आप चारों ओर (या अपने भीतर देखेंगे), तो आप पाएँगे कि मनुष्य उनके बिना हो नहीं सकते। अकेलापन अधिकांश के लिए बहुत अधिक  हताशाजनक है। और यदि आप एक संबंध में जा रहे हैं , तो आपको इसे अर्जित करने के लिए  काम करना होगा। मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ, कि आप कहेंगे कि आपके  संबंध में परेशानी के कारण आप नहीं हैं, यह अन्य व्यक्ति  है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि एक बार और सोचें। कभी कभी हम अन्य व्यक्ति से  अच्छा या बुरा  बाहर निकालें यह हमारे भीतर  है।

इसलिए मैं यह कह रहा था कि यदि आपको एक संबंध में रहने की आवश्यकता है तो आपको इस पर  परिश्रम पूर्वक, धैर्य पूर्वक काम भी करना होगा।।यह प्रतिफल देगा ।

शांति

स्वामी