दंतकथाओं में कहा गया है कि मेवाड़ का महावीर शासक, महाराणा प्रताप, एक समय अपने एक विनम्र स्वभाव के सेवक के साथ बैठा था। सन १५८० की बात है जब वह मुगलों के साथ चल रहे संघर्ष में पूर्णतया पराजित हो गया था। हालाँकि पाँच वर्ष बाद ही वह अपने साम्राज्य का अधिकतर हिस्सा पुनः प्राप्त करने वाला था, अभी वह गुप्त रूप से जी रहा था और अपनी सेना को पुनर्निर्मित करने में लगा था। विद्वेष एवं अनिश्चितता के इस काल में, मिताहारी भोजन करते हुए, उसके किसी प्रजाजन ने उन्हें दो आम भेजे।

उसके सेवक ने आमों को आठ भागों में काटा और एक तश्तरी पर सजा दिया। वे बड़े लुभावने पके हुए व स्वादिष्ट लग रहे थे।

“तनिक यह बताओ कि इनका स्वाद कैसा है?” महाराणा प्रताप ने पहला टुकड़ा अपने सेवक को देते हुए पूछा।
सेवक ने थोड़ा स्वाद लिया और कहा, “हुकुम यह तो बहुत स्वादिष्ट है।” यह कह कर उसने एक टुकड़ा और माँगा।

तनिक अचंभित महाराणा ने उसे एक और टुकड़ा दिया जिसे सेवक ने एक क्षण में निगल लिया और पुनः और पाने के लिए याचना करने लगा। ऐसे अवांछनीय व्यवहार से राजा को झटका लगा किंतु उस व्यक्ति के लिए, जो उनकी इतने वर्षों से देखभाल कर रहा था राजा मान गया।

तनिक अचंभित महाराणा ने उसे एक और टुकड़ा दिया जिसे सेवक ने एक क्षण में निगल लिया और पुनः और पाने के लिए याचना करने लगा। ऐसे अवांछनीय व्यवहार से राजा को झटका लगा किंतु उस व्यक्ति के लिए, जो उनकी इतने वर्षों से देखभाल कर रहा था राजा मान गया।

कुछ ही क्षणों में, एक के बाद एक कर उसने सात टुकड़े खा लिए और राजा की अभिव्यक्ति विनोद व करुणा से अविश्वास व क्रोध में परिवर्तित हो गई।

“कृतघ्न दुष्ट व्यक्ति” महाराणा ने गरजते हुए कहा, “तुम मेरी सेवा करने के योग्य नहीं” और इसके साथ उन्होंने आम का अंतिम टुकड़ा अपने मुख में रख लिया जिसे उन्होंने तुरंत ही थूक भी दिया।
“तुम इस खट्टे और कड़वे आम को स्वादिष्ट कह रहे हो?” आश्चर्य से चिल्लाते हुए उन्होंने कहा। “यह तो बहुत बेस्वाद है।”
“मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ” सेवक ने कहा। “बरसों आपने मेरा एवं मेरे परिवार का भरण-पोषण किया है। स्थिति अच्छी रही हो या बुरी आपने हमारी रक्षा की है। मैं आपको बदले में कुछ भी नहीं दे सकता किंतु कम से कम मैं आपको उन खट्टे आमों का स्वाद लेने से तो रोक सकता ही हूँ।”

प्रेम के बदले में प्रेम की कामना करना अनुचित नहीं है। अपने प्रयासों व योग्यताओं की सराहना और स्वीकृति की चाह स्वाभाविक है। मित्रता एवं संबंध तभी पनपते हैं जब लोग बदले में कुछ प्रतिदान करते हैं।

किंतु सेवा की भावना एक नितांत भिन्न विषय है। सेवा अपने स्वामी की भलाई के अतिरिक्त बदले में और कुछ भी नहीं चाहती।

सच्ची सेवा के लिए पूर्ण निस्सवार्थता आवश्यक है, कुछ ऐसा जो परोपकारिता से भी परे हो क्योंकि सेवा में यह मानदंड नहीं होता कि आपकी अभिस्वीकृति हुई है या आप कोई विशेष हैं। इसके बजाय आपका लक्ष्य होता है कि आपके लिए जो कुछ भी मायने रखता है उसकी सेवा में सब कुछ समर्पित कर दें। और यही विरोधाभास है – हम पूर्ण हृदय से जितना स्वयं को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित करते जाते हैं, सराहना की परवाह करे बिना, पथ पर चलकर हमें उतनी ही प्रसन्नता एवं सफलता प्राप्त होती है।

कभी-कभी लोग मुझसे प्रश्न करते हैं कि समर्पण क्या है और हम किसी व्यक्ति/ध्येय के प्रति कैसे समर्पण करें? सेवा ही समर्पण है। बिना समर्पण के सच्ची सेवा संभव नहीं है और बिना सेवा के समर्पण अधिक देर जीवित नहीं रह पाता। समर्पण हृदय की वह भावना है जो हमें कुछ त्यागने देती है। यह हमें शांत होने तथा विश्राम करने में मदद करती है। यह हमें यह समझने में मदद करती है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी चल रहा है हमें उसे अपने वश में नहीं करना है और हम ऐसा कर भी नहीं सकते। और फिर सेवा स्वयं को उस वस्तु के प्रति पूरे हृदय से समर्पित कर देना है जिसे भी हम नियंत्रित कर सकते हैं – हमारे कर्म, शब्द तथा वह सभी वस्तुएं जो हमारी राह में आती हैं उनके प्रति हमारी प्रतिक्रियाएं।

हैसिडिक मास्टर्रस गाइड टू मैनेजमेन्ट में लेखक मोश क्रैन्क ने एक बहुत सुंदर नीतिकथा उद्धृत की है (जो सभी सभ्यताओं में भिन्न रूपों में पायी जाती है)-

एक बार मैं आकाश की ओर उढ़ कर गया। मैं पहले नर्क देखने गया और दृश्य अत्यंत भयावह था। मेजों की कतार दर कतारें बहुमूल्य भोज्य पदार्थ की तश्तरियों से भरी थीं। फिर भी मेज के चारों ओर बैठे लोग कृशकाय, भूख से कराह रहे थे। जब मैं उनके निकट गया तो मुझे उनकी दुर्दशा समझ आई।

प्रत्येक व्यक्ति ने एक चम्मच पकड़ा हुआ था किंतु उनके दोनों हाथों में लकड़ी की खपच्चियाँ लगी हुई थीं जिससे वे अपनी किसी भी कोहनी को मोड़कर खाने को अपने मुँह तक नहीं ला सकते थे। उन लोगों की पीड़ित कराह सुनकर मेरा हृदय टूट गया। उन्होंने अपने भोजन को इतने समीप रखा था फिर भी वे उसे खा नहीं पा रहे थे।

फिर मैं स्वर्ग को देखने गया। मैं यह देख कर दंग रह गया कि स्वर्ग में भी वही व्यवस्था थी जो जैसी मैंने नर्क में देखी थी। भोजन से लदी मेजों की कतार दर कतारें। परंतु नर्क के विपरीत यहाँ स्वर्ग में लोग एक दूसरों से बातचीत करते हुए संतुष्ट बैठे थे। निश्चित ही वे अपने तुष्टिकारक भोजन को खाकर संतृप्त थे।

जब मैं और पास गया, मैं यह जानकर आश्चर्य चकित हो गया कि यहाँ भी प्रत्येक व्यक्ति के हाथों में खपच्चियाँ लगी हुई थीं जो उन्हें उनकी कोहनियाँ मोड़ने से रोक रहीं थीं। फिर वे कैसे खा पाते थे?
मैंने देखा कि एक व्यक्ति ने अपना चम्मच उठाया और फिर उससे अपने सामने रखे भोजन को उठाया। फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और सामने बैठे व्यक्ति को भोजन खिलाया। इस कृपा के प्राप्तकर्ता ने उसे धन्यवाद देते हुए उसके इस कृत्य के प्रतिदान में अपना हाथ बढ़ाकर अपने दानकर्ता को भोजन कराया।

मुझे अचानक समझ आया। स्वर्ग एवं नर्क में समान परिस्थितियाँ एवं समस्याएं होती हैं। मुख्य अंतर उस व्यवहार में है जो लोग एक दूसरों के साथ करते हैं।

मैं तुरंत नर्क की ओर भागा जिससे वहाँ फंसे बेचारे लोगों को यह समाधान बता सकूँ। मैंने भूख से मरते एक व्यक्ति के कान में फुसफसाकर कहा, “तुम्हे भूखे रहने की आवश्यकता नहीं। अपने सामने वाले व्यक्ति को खिलाने के लिए अपने चम्मच का उपयोग करो और निश्चित ही वह तुम्हारे इस उपकार का बदला तुम्हे भोजन खिलाकर करेगा।”

“तुम मुझसे आशा करते हो कि मैं मेज पार बैठे उस घृणित व्यक्ति को भोजन खिलाऊँ?” व्यक्ति ने गुस्से में कहा। “मैं उसे भोजन का सुख देने से बेहतर मरना पसंद करूँगा।”

जब हमारा ध्यान स्वयं के प्रति चिंता करने से हटकर हमारे चारों ओर रहने वाले व्यक्तियों का जीवन बेहतर बनाने में एवं एक महान उद्देश्य की पूर्ति की दिशा में लग जाता है तो हमारी अंतर्निहित अच्छाई निकलकर सामने आ जाती है। फिर सभी कुछ संभव हो जाता है।

समय के साथ अच्छी वस्तुएं महान बन जाती हैं। समय बीतते अच्छे लोग महान व्यक्तियों में परिणित हो जाते हैं। यह स्वभाविक विकास है। क्योंकि अच्छाई का ध्यान नाम कमाने पर न होकर कुछ महत्वपूर्ण करने पर होता है। और सेवा से यही होता है। इससे कुछ नेक कुछ महत्वपूर्ण होता है।

दूसरों की देखभाल करना तथा उनकी सेवा करना ही एक सिद्ध व्यक्ति को एक साधारण व्यक्ति से भिन्न बनाता है।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - The Spirit of Service